जीवन की सफलता के लिए अपनाना होगा पुरुषार्थ चतुष्टय : देवेंद्र सिंह आर्य

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ग्रेटर नोएडा (विशेष संवाददाता ) गुरुकुल मुर्शदपुर में चल रहे 21 दिवसीय चतुर्वेद पारायण यज्ञ में 17 वें दिन मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए उगता भारत समाचार पत्र के चेयरमैन देवेंद्र सिंह आर्य एडवोकेट ने कहा कि भारत के ऋषियों ने धर्म ,अर्थ, काम और मोक्ष की अवधारणा को विकसित कर संसार पर भारी उपकार किया। जो मनुष्य इस के अनुसार जीवन जीता है वह जीवन के सार को समझकर जीवन के उद्देश्य को भी समझ जाता है। श्री आर्य ने कहा कि साधारण मनुष्य के लिए जीवन का सार और उद्देश्य समझ लेना ही बहुत बड़ी बात है। जिसकी समझ में यह दोनों चीजें आ जाती हैं वह संसार के राग द्वेष से अपने आप को मुक्त कर परमपिता परमेश्वर की ओर बढ़ चलता है।


श्री आर्य ने कहा कि मनुष्य जीवन का उद्देश्य सत्कर्म करके धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति है। इस पुरूषार्थ चतुष्टय में मोक्ष का विवरण वेद, दर्शन व उपनिषदों आदि प्राचीन ग्रन्थों में मिलता है। महर्षि दयानन्द जी ने अपने विश्व प्रसिद्ध ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश में इसका विस्तार से वर्णन किया है जो कि अन्यत्र दुर्लभ एवं अप्राप्त है। मोक्ष की महत्ता के कारण ही जीवन में सारे धर्म-कर्म आदि कृत्य किये जाते हैं। अतः इसका ज्ञान सभी मनुष्यों के लिए परमावश्यक है। अन्य मत-मतान्तरों में मोक्ष विषयक समुचित ज्ञान प्राप्त नहीं होता। इसके लिए सारी मनुष्य जाति हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों सहित महर्षि दयानन्द की चिर ऋणी है। उन्होंने कहा कि इस संसार के जितने मत पंथ संप्रदाय हैं वे सब ही संसार की कीचड़ में फंसाने के उपदेश देते हैं। उनका चिंतन दलदल में फंसाने का है। जबकि भारत के वैदिक चिंतन के माध्यम से मनुष्य संसार के दलदल से निकलकर अपने आपको पहले कमल की भांति पवित्र करता है, उसके पश्चात मोक्ष अभिलाषी बनकर मोक्ष पद को प्राप्त होकर जीवन मरण के चक्र से छूट जाता है।


श्री आर्य ने कहा कि मोक्ष पद को प्राप्त जीवात्मा शुद्ध वैदिक उच्चारण से हो रहे यज्ञ आदि को देखने के लिए भी आ जाया करती हैं। इसके लिए आवश्यक यह है कि यज्ञ पर चर्चा उनके स्तर की होनी चाहिए और शुद्ध उच्चारण भी होना चाहिए। इसी को पौराणिक जगत में देवों का आवाहन करना कहा जाता है।दुःख से छूटने पर मनुष्यों की जीवात्मा सुख को प्राप्त होता है । मोक्ष में जीव ब्रह्म में रहता है।  परमेश्वर की आज्ञा पालन, अधर्म-अविद्या-कुसंग-कुसंस्कार बुरे व्यसनों से अलग रहना और सत्यभाषण, परोपकार, विद्या, पक्षपातरहित न्याय-धर्म की वृद्धि करना, वैदिक रीति से परमेश्वर की स्तुति-प्रार्थना और उपासना अर्थात् योगाभ्यास करना, विद्या पढ़ने-पढ़ाने और धर्म से पुरूषार्थ कर ज्ञान को उन्नति करना, सबसे उत्तम साधनों को करना और जो कुछ करें वह सब पक्षपात रहित न्याय-धर्मानुसार ही करना इत्यादि साधनों से मुक्ति प्राप्त होती है। इनसे विपरीत साधनों व ईश्वराज्ञा भंग करने आदि कर्मों से “बन्ध” अर्थात् जन्म-मरण के बन्धन में फंसना होता है। मुक्ति में जीव का ईश्वर में लय वा विलय नहीं होता अपितु पृथक अस्तित्व बना रहता है। मुक्ति में जीव ब्रह्म में रहता है। ब्रह्म सर्वत्र पूर्ण है। उसी में मुक्त जीव अव्याहतगति अर्थात् उसको कहीं रूकावट नहीं, विज्ञान (पूर्ण ज्ञान-विज्ञान पूर्वक) व आनन्दपूर्वक स्वतन्त्र विचरता है। मुक्ति में जीव का स्थूल शरीर नहीं रहता। सुख और आनन्द-भोग भोगने के उसके साथ सत्य संकल्प आदि स्वाभाविक गुण सामथ्र्य सब रहते हैं। भौतिक संग जीवात्मा में नहीं रहता।
श्री आर्य ने कहा कि मोक्ष में भौतिक शरीर वा इन्द्रियों के गोलक जीवात्मा के साथ नहीं रहते, किन्तु अपने स्वाभाविक शुद्ध गुण रहते हैं। जब सुनना चाहता है तब श्रोत्र, स्पर्श करना चाहता है तब त्वचा, देखने के संकल्प से चक्षु, स्वाद के अर्थ रसना, गन्ध के लिये घ्राण, संकल्प-विकल्प करते समय मन, निश्चय करने के लिए बुद्धि, स्मरण करने के लिये चित्त, और अहंकार के अर्थ अहंकाररूप अपनी स्वशक्ति से जीवात्मा मुक्ति में हो जाता है। और संकल्पमात्र शरीर होता है। वैसे शरीर के आधार रहकर इन्द्रियों के गोलक के द्वारा जीव स्वकार्य करता है, वैसे अपनी शक्ति से मुक्ति में सब आनन्द भोग लेता है।
उन्होंने कहा कि हम गुरुकुल मुर्शदपुर के माध्यम से वेद की विद्या के प्रचार प्रसार का एक केंद्र स्थापित करने में सफल हुए हैं। जिसका जितना अधिक से अधिक प्रचार-प्रसार होगा भारतीय संस्कृति उतना ही अधिक उन्नत होगी। भारत को फिर से विश्व गुरु बनाने के लिए हमें वेदों की ओर लौटना होगा और महर्षि दयानंद के सपनों को साकार करने के लिए इस प्रकार के अन्य गुरुकुलों की भी स्थापना करनी होगी। उन्होंने गुरुकुल के प्रबंधन तंत्र की प्रशंसा करते हुए कहा कि तन मन धन से समर्पित होकर जिस प्रकार प्रबंधन तंत्र गुरुकुल की चौमुखी उन्नति के लिए समर्पित है, वह निश्चय ही उनके कर्मयोगी होने का प्रमाण है। उन्होंने कहा कि यह बड़े सौभाग्य की बात है कि आचार्य विद्या देव जी जैसी दिव्य आत्मा इस गुरुकुल में निवास करती है।

 

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