सब पक्षपात रहित न्याय-धर्मानुसार करने से ही मुक्ति प्राप्त होती है: आर्य

Devendra singh arya

ग्रेनो (अजय कुमार आर्य) यहां गुरुकुल मुर्शदपुर में चल रहे 21 दिवसीय वेद पारायण यज्ञ में विशिष्ट वक्ता के रूप में बोलते हुए उगता भारत के चेयरमैन एवं वरिष्ठ अधिवक्ता देवेंद्र सिंह आर्य एडवोकेट ने कहा कि जीवात्मा शुद्ध वैदिक उच्चारण से हो रहे यज्ञ आदि को देखने के लिए भी आ जाया करती हैं। इसके लिए आवश्यक यह है कि यज्ञ पर चर्चा उनके स्तर की होनी चाहिए और शुद्ध उच्चारण भी होना चाहिए। इसी को पौराणिक जगत में देवों का आवाहन करना कहा जाता है। दुःख से छूटने पर मनुष्यों की जीवात्मा सुख को प्राप्त होता है । मोक्ष में जीव ब्रह्म में रहता है।  परमेश्वर की आज्ञा पालन, अधर्म-अविद्या-कुसंग-कुसंस्कार बुरे व्यसनों से अलग रहना और सत्यभाषण, परोपकार, विद्या, पक्षपातरहित न्याय-धर्म की वृद्धि करना, वैदिक रीति से परमेश्वर की स्तुति-प्रार्थना और उपासना अर्थात् योगाभ्यास करना, विद्या पढ़ने-पढ़ाने और धर्म से पुरूषार्थ कर ज्ञान को उन्नति करना, सबसे उत्तम साधनों को करना और जो कुछ करें वह सब पक्षपात रहित न्याय-धर्मानुसार ही करना इत्यादि साधनों से मुक्ति प्राप्त होती है। इनसे विपरीत साधनों व ईश्वराज्ञा भंग करने आदि कर्मोंसे “बन्ध” अर्थात् जन्म-मरण के बन्धन में फंसना होता है। मुक्ति में जीव का ईश्वर में लय वा विलय नहीं होता अपितु पृथक अस्तित्व बना रहता है। मुक्ति में जीव ब्रह्म में रहता है। ब्रह्म सर्वत्र पूर्ण है। उसी में मुक्त जीव अव्याहतगति अर्थात् उसको कहीं रूकावट नहीं, विज्ञान (पूर्ण ज्ञान-विज्ञान पूर्वक) व आनन्दपूर्वक स्वतन्त्र विचरता है। मुक्ति में जीव का स्थूल शरीर नहीं रहता। सुख और आनन्द-भोग भोगने के उसके साथ संकल्प आदि स्वाभाविक गुण सामर्थ्य सब रहते हैं। भौतिक संग जीवात्मा में नहीं रहता।


श्री आर्य ने कहा कि मोक्ष में भौतिक शरीर वा इन्द्रियों के गोलक जीवात्मा के साथ नहीं रहते, किन्तु अपने स्वाभाविक शुद्ध गुण रहते हैं। जब सुनना चाहता है तब श्रोत्र, स्पर्श करना चाहता है तब त्वचा, देखने के संकल्प से चक्षु, स्वाद के अर्थ रसना, गन्ध के लिये घ्राण, संकल्प-विकल्प करते समय मन, निश्चय करने के लिए बुद्धि, स्मरण करने के लिये चित्त, और अहंकार के अर्थ अहंकाररूप अपनी स्वशक्ति से जीवात्मा मुक्ति में हो जाता है। और संकल्पमात्र शरीर होता है। वैसे शरीर के आधार रहकर इन्द्रियों के गोलक के द्वारा जीव स्वकार्य करता है, वैसे अपनी शक्ति से मुक्ति में सब आनन्द भोग लेता है।

उन्होंने कहा कि हम गुरुकुल मुर्शदपुर के माध्यम से वेद की विद्या के प्रचार प्रसार का एक केंद्र स्थापित करने में सफल हुए हैं। जिसका जितना अधिक से अधिक प्रचार-प्रसार होगा भारतीय संस्कृति उतना ही अधिक उन्नत होगी। भारत को फिर से विश्व गुरु बनाने के लिए हमें वेदों की ओर लौटना होगा और महर्षि दयानंद के सपनों को साकार करने के लिए इस प्रकार के अन्य गुरुकुलों की भी स्थापना करनी होगी। उन्होंने गुरुकुल के प्रबंधन तंत्र की प्रशंसा करते हुए कहा कि तन मन धन से समर्पित होकर जिस प्रकार प्रबंधन तंत्र गुरुकुल की चौमुखी उन्नति के लिए समर्पित है, वह निश्चय ही उनके कर्मयोगी होने का प्रमाण है।
उन्होंने कहा कि यह बड़े सौभाग्य की बात है कि आचार्य विद्या देव जी जैसी दिव्य आत्मा इस गुरुकुल में निवास करती है।
श्री आर्य ने चिम्मन आर्य आर्ष गुरुकुल का नाम चिन्मय आर्य आर्ष गुरुकुल करने के लिए सुझाव एवं प्रस्ताव गुरुकुल प्रबंधन को दिया जिसका सभी लोगों ने करतल ध्वनि से स्वागत करते हुए समर्थन किया। वास्तव में श्री चिम्मन आर्य ने अपने जीवन काल में यमुना के पावन तट पर अपनी निजी भूमि में गुरुकुल की स्थापना करके अपने आप को अमर कर लिया है अर्थात वह चिन्मय हो गए, इस प्रकार भौतिक शरीर में नए रहते हुए भी अब वह मरे नहीं है।
ऐसे शुभ अवसर पर मंच का कुशलता पूर्वक संचालन करने वाले श्री आर्य सागर खारी द्वारा 17 सितंबर को विश्वकर्मा दिवस के अवसर पर विश्वकर्मा पर अपने विचार अभिव्यक्त करने के लिए श्री आर्य से निवेदन किया जो श्री आर्य ने सविनय स्वीकार करते हुए ईश्वर को सबसे बड़ा विश्वकर्मा अपने उद्बोधन में सिद्ध किया। ईश्वर को सबसे बड़ा विश्वकर्मा सिद्ध करने के लिए श्री आर्य ने स्थूल शरीर ,जो दिखने वाला है, सूक्ष्म शरीर जो अदृश्य है,कारण शरीर जो प्रकृति से उपादान कारण से ईश्वर के द्वारा बनाया गया और चौथे तुरीय शरीर जो संस्कार जन्य शुद्ध शरीर जिसमें समाधि में ईश्वर में व्यक्ति मग्न रहता है, पर अपनी अभिव्यक्ति दी। उन्होंने अपने उद्बोधन में बताया कि सूक्ष्म शरीर दो प्रकार का होता है। एक भौतिक दूसरा अभौतिक।
भौतिक शरीर वह जो सूक्ष्म भूतों से बना जो मुक्ति में साथ नहीं रहता। अभौतिक शरीर वह है जिसमें आत्मा के स्वाभाविक गुण मुक्ति में भी साथ रहते हैं।
इसी को संकल्पिक शरीर भी कहते हैं। जब जीव इन गुणों की संकल्पना करता है ,इनको चाहता है, तो मुक्त अवस्था में यह 24 सामर्थ्य उसको प्राप्त होते हैं।
वे 24 सामर्थ हैं बल, पराक्रम, आकर्षण, प्रेरणा, गति ,भाषण, विवेचन, क्रिया, उत्साह, स्मरण, निश्चय, इच्छा ,प्रेम, द्वेष ,संयोग, विभाग संयोजक, विभाजक, श्रवण, स्पर्सन ,दर्शन, स्वादन, गंध- ग्रहण और ज्ञान।
मुक्त आत्माएं अर्थात मोक्ष में रहते हुए स्थूल शरीर को छोड़कर संकल्प में शरीर से आकाश में परमेश्वर में विचरते हैं, क्योंकि जो शरीर वाले होते हैं वह सांसारिक दुख से रहित नहीं हो सकते। शरीर रहित मुक्त जीवात्मा ब्रह्म में रहता है। उसको सांसारिक सुख दुख का स्पर्श भी नहीं होता, किंतु सदा आनंद में रहता है। इसी संकल्पिक शरीर समुदाय से मुक्त आत्मा जहां जाना चाहता है ,जो सुनना चाहता है ,और जो रसास्वादन करना चाहता है, वह स्वयं करता है। यही जीवन मुक्ति का आनंद है।
सूक्ष्म शरीर को लिंग शरीर भी कहते हैं। सांख्य दर्शन में कपिल मुनि जी का सूत्र है जिसमें सूक्ष्म शरीर को लिंग शरीर कहा गया है।
श्री आर्य ने अपने प्रवचनात्मक उद्बोधन में अमृत वर्षा करते हुए कहा कि आत्मा का जो परिवार होता है उसमें 18 तत्व होते हैं। सत्यार्थ प्रकाश के नवे समुल्लास में 17 तत्वों का उल्लेख आता है। वास्तव में यह 18 होते हैं, परंतु पंडित भीमसेन जी जो महर्षि दयानंद के शिष्य थे,लेकिन पौराणिक थे। उन्होंने महर्षि दयानंद द्वारा कृत पुस्तकों में प्रक्षेप किया था , गड़बड़ की थी। जो गड़बड़ आज तक सत्यार्थ प्रकाश में चली जाती है।
जो 18 तत्व होते हैं, वह निम्न प्रकार हैं ।पांच ज्ञानेंद्रियां, पांच कर्मेंद्रियां और पांच तन्मात्राएं, बुद्धि, अहंकार और मन।
श्री आर्य ने अपने उद्बोधन में इस भ्रांति का निवारण किया कि “अंतः करण चतुष्टय” का उच्चारण गलत किया जाता है अंतः करण के केवल तीन ही तत्व होते हैं। बुद्धि, अहंकार और मन।
बुद्धि ,चित्त ,अहंकार और मन चार नहीं होते। क्योंकि मन और चित्त दोनों एक ही होते हैं। एक ही तत्व के 2 नाम है ।जब यह संकल्प विकल्प करता है तो इसको मन कहते हैं। जब यह पुरानी स्मृतियों को उठा कर लाता है तो इसको चित्त कहते हैं।
इसको एक उदाहरण से स्पष्ट करते हैं,जैसे एक ही व्यक्ति को, एक ही कुर्सी में बैठे हुए को एक ही समय पर, जिला जज अथवा जनपद न्यायाधीश उस समय पुकारते हैं जब वह सिविल प्रकृति के वादों की सुनवाई करता है। जब वही व्यक्ति, उसी कुर्सी में बैठा हुआ आपराधिक प्रकृति के वादों की सुनवाई करता है तो उसको सेशन जज कहते हैं, अथवा सत्र न्यायाधीश बोलते हैं।
एक ही व्यक्ति को दो पदनाम से जैसे पुकारते हैं ।इसी प्रकार एक ही तत्व को मन व चित्त कहते हैं।
योग दर्शन में चित्त व मन एक ही वस्तु है। ऋषि पतंजलि के “योगश्चित्त वृत्ति निरोध: ” के सिद्धांत के अनुसार यहां चित्त शब्द आया है। जो मन का पर्याय है। इसमें कहा गया है कि चित्त की वृत्तियों को रोक देना ही, निरोध कर देना ही योग है , अर्थात ईश्वर से जुड़ना है।
इसको ऐसे भी समझ सकते हैं कि योग के कारण या साधन 13 प्रकार के बताए गए हैं। जिनमें पांच ज्ञानेंद्रियों ,पांच कर्मेंद्रियां 10 बाह्य कारण होते हैं तथा तीन अंतःकरण मन ,बुद्धि और अहंकार होना बताए गए हैं। इससे भी सिद्ध होता है कि मन, बुद्धि और अहंकार अंतःकरण तीन ही हैं, चतुष्टय नहीं है।
महर्षि व्यास जी भाष्यकार ने भाष्य में भी मन ही लिखा है। तो कोई स्पष्ट हुआ कि ऋषि पतंजलि के द्वारा चित्त और महर्षि व्यास जी के द्वारा मन एक ही तत्व के बारे में प्रयोग किया गया।
श्री आर्य ने महतत्व को स्पष्ट करते हुए बताया कि महतत्व का तात्पर्य बुद्धि से है।प्राण का अर्थ भी इंद्रियों के रूप में आता है। महर्षि दयानंद कृत अमर ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश में पांच प्राण लिखे हैं। जिन का तात्पर्य 5 तन्मात्राएं रूप, रस, गंध, शब्द और स्पर्श हैं। पंचमहाभूत पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु ,आकाश भी तन्मात्रा कहीं जाती है। सृष्टि की संरचना करते समय ईश्वर इन्हीं तन्मात्राओं से अर्थात इन्हीं के सूक्ष्म रूप से महतत्व प्रदान करके अर्थात अपने ज्ञान से सृजना करते हैं।
उक्त सूक्ष्म शरीर पांच ज्ञानेंद्रियां, पांच कर्मेंद्रियां, पांच तन्मात्रा ,तीन अंतः करण कुल 18 का समुदाय आत्मा का परिवार कहा जाता है। जो मृत्यु के समय आत्मा के साथ जाता है। इंद्रियों के गोलक मृत शरीर के साथ ही जाते हैं। लेकिन असली इंद्रियां सूक्ष्म शरीर के साथ जाती हैं। जो असली इंद्रियों सूक्ष्म शरीर के साथ जाती हैं उनको अतींद्रिय कहा जाता है। उन्हीं को आंतरिक इंद्रियों भी कह सकते हैं। जैसे कान, नाक, आंख के गोलक मृत शरीर के साथ साथ जाते हैं। बाहर दिखाई देने वाले नाक, कान ,आंख आदि बाह्य इंद्रियां है।
लेकिन इनके अंदर जो देखने, सुनने, सूंघने, स्पर्सन आदि की शक्तियां होती हैं वह आत्मा के साथ ही चली जाती है। जैसे हम देखते हैं कि मृत शरीर की बाह्य इंद्रियां सब कुछ उसके साथ होती है लेकिन न तो देख सकता है, सुन सकता है ,और न भाषण कर सकता है, जबकि बाह्य इंद्रियां उसी शरीर में लगी हुई दिखाई पड़ती रहती है।
इससे यह सिद्ध होता है शरीर जो ईश्वर ने प्रकृति से बनाया था, प्रकृति में से ईश्वर ने उसके 3 गुण सत्व, रज और तम से इसको बनाया था, यह प्रकृति जन्य शरीर प्रकृति की तरह ही जड़ है।
इसमें एक गुण सत शरीर के अंदर ठीक है ,बाकी दो रजोगुण तमोगुण दोनों ही गलत हैं ।रजोगुण और तमोगुण की अधिकता होने के कारण प्रत्येक व्यक्ति परेशान रहता है।
श्री आर्य ने कहा कि जो हमारा कारण शरीर होता है, वह प्रकृति के तत्वों से बना होता है। प्रकृति उसके लिए उपादान कारण है। सत्व, रज और तम ही वास्तव में कारण शरीर है। इस कारण शरीर के 25 पदार्थ मिलकर के एक साम्य बनाते हैं जैसा कि सांख्य दर्शन में उल्लेख आता है। अर्थात इन 25 पदार्थों का एक साम्य बनकर प्रकृति कहीं जाती है। जिसमें प्रकृति का अधिक अनुपात होता है। यह 25 पदार्थ निम्न प्रकार के होते हैं।
प्रकृति, महतत्व अर्थात बुद्धि , अहंकार, मन, पांच ज्ञानेंद्रियां ,पांच कर्मेंद्रियों, पंचमहाभूत, 5 तन्मात्राएं और एक पुरुष मिलकर एक प्रकृति बनती है । यह सभी प्रकृति जन्य हैं। इसीलिए सभी नाशवान है। इससे स्पष्ट होता है कि सत्व, रज और तम सब के शरीर का उपादान कारण है। इसको एक अन्य उदाहरण से भी समझा जा सकता है ।कारण शरीर को कार्य शरीर भी कह सकते हैं अर्थात कार्य वस्तु। जैसे प्लास्टिक के छोटे-छोटे अणु और कणों से मिलकर के एक विधि से संकलित करके मशीनीकरण से एक पेन बनाया जाता है, तो उसमें जो प्लास्टिक के अणु है, वह कारण शरीर है । जो उस से तैयार हुआ पेन है वह कार्य -शरीर है जिसे कार्य- वस्तु कहते हैं। ऐसे ही प्रकृति के सत्व रज और तम के उचित साम्य से हमारा कारण शरीर बनता है।
उन्होंने कहा कि मृत्यु के बाद जब यह शरीर अग्नि की भेंट किया जाता है तो प्रकृति के तत्व सूक्ष्म रूप में पंचमहाभूत अपने-अपने समुदाय में मिल जाते हैं। इससे हम देखते हैं कि प्रकृति का रूप परिवर्तित होता है प्रकृति नष्ट नहीं होती है। केवल जगत नष्ट होता है , शरीर नष्ट होता है , इसलिए जगत को एवं शरीर को नाशवान कहते हैं । क्योंकि अध्यात्म की कक्षा में प्रथम दिन से यह पढ़ाया जाता है की ईश्वर जीव और प्रकृति तीनों अनादि हैं, तीनों अमर हैं, तीनों अजर हैं।
प्रकृति किसे कहते हैं?
इसको स्पष्ट करते हुए श्री आर्य ने बताया की प्रकृति दो शब्दों से मिलकर के बना है।एक शब्द” प्र” और दूसरा “कृति”।
यहां “प्र” का अर्थ है जो पूर्व से ही है। और “कृति” का अर्थ है संरचना।
अर्थात ऐसी वस्तु जिस की संरचना पूर्व से ही है। दूसरा शब्द प्रभु होता है। इसमें “प्र” का अर्थ पूर्व से और “भू” का अर्थ होना है।
अर्थात वह जो पहले से ही होता है ,वह प्रभु है।
ईश्वर सर्वशक्तिमान होते हुए भी प्रकृति और जीव की रचना नहीं करता। नई प्रकृति और नया जीव नहीं बनाता। क्योंकि ईश्वर, जीव और प्रकृति सदैव से रहे हैं और सदैव रहेंगे। तीनों ही अजर, अमर, अनादि है।
फिर भी जीव इन सब से पृथक है। जीव ही पाप -पुण्य करता है और जीव ही सुख -दुख को भोगता है। इसलिए जीव कर्ता और भोक्ता है। शरीर भोक्ता नहीं है। इसीलिए जीव साक्षी नहीं है क्योंकि वह तो कर्ता, भोक्ता है। यहां ईश्वर साक्षी है। न्याय दर्शन में जो साक्षी की परिभाषा दी हुई है उसके अनुसार ईश्वर साक्षी की परिभाषा में आता है।ईश्वर ही जीव के कर्मों को देखता है। ईश्वर फिर कर्मों के अनुसार कर्म -फल देता है। उसी से ईश्वर कर्माश्य तैयार करता है।जिस में सुख और दुख जीव को प्राप्त होते हैं।
श्री आर्य ने स्पष्ट किया कि आत्मा द्रव्य है। ईश्वर भी द्रव्य है।
विज्ञान में जो द्रव्य की परिभाषा दी है उससे इतर द्रव्य होता है। अध्यात्म में जो द्रव्य की परिभाषा है वह विज्ञान की परिभाषा के विपरीत है। विज्ञान में पदार्थ कहते हैं जो चार प्रकार का होता है ठोस ,द्रव्य, प्लाज्मा और गैस। लेकिन वैदिक परिभाषा में द्रव्य उसको कहते हैं जिसमें गुणों हों व क्रिया हो।
आत्मा में गुण हैं ,परमात्मा में भी गुण हैं। दोनों में ही क्रिया भी है। आत्मा के स्वाभाविक गुण इच्छा, राग, द्वेष, सुख,दुख, कर्म , ज्ञान और प्रयत्न हैं। आत्मा के 2 गुण मुख्य एवं विशेष हैं जो ज्ञान और प्रयत्न हैं। इन्हीं गुणों के आधार पर आत्मा को द्रव्य कहा जा सकता है। परमात्मा के अंदर दया, सेवा, परोपकार, त्याग आदि कर्म है, गुण हैं ।इसलिए परमात्मा भी एक द्रव्य है।
ईश्वर ने मनुष्य को जो यह शरीर दिया है यह मुक्ति प्राप्त करने का एक साधन है। जैसे हम किसी कार में बैठकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं अथवा वायुयान में बैठकर दूसरे स्थान पर पहुंचते हैं ।ऐसे ही शरीर में आत्मा ईश्वर से योग करने के लिए शरीर रूपी साधन दिया गया है।
इस शरीर को चलाने के लिए ईश्वर ने आत्मा दी है ।आत्मा को ऐसे मानो जैसे किसी कार को, किसी बस को , किसी रेल अथवा ट्रक को एक ड्राइवर चलाता है उसी प्रकार आत्मा शरीर का चालक है। इस शरीर रूपी साधन से मोक्ष की सिद्धि करना जीवन का एक उद्देश्य है। लेकिन मोक्ष की सिद्धि में 5 तत्व बाधक हैं। जो निम्न प्रकार हैं।
अस्मिता ,अविद्या, राग, द्वेष, अभिनिवेश।
अस्मिता कहते हैं बुद्धि को आत्मा से भिन्न नहीं समझना।
अविद्या कहते हैं मिथ्या ज्ञान को, अर्थात सत्य विद्या के विपरीत जो ज्ञान हैं वह अविद्या है।
राग कहते हैं सुख में प्रीति होना।
द्वेष कहते हैं दुख से अप्रीति होना।
अभीनिवेश कहते हैं कि मैं मरू नहीं।
यह पांचों कारण मुक्ति प्राप्ति में बाधक होते हैं।
5 कोश होते हैं। अन्नमय कोश, मनोमय, प्राण मय कोश, विज्ञान मय कोश, आनंदमय कोश।इन्हीं पंचकोशो का जीव को विवेचन करना चाहिए। त्वचा से लेकर हड्डियों तक का समुदाय पृथ्वीमय हैं। जिसको अन्नमय कोश कहते हैं।
दूसरा प्राण मयकोश है। प्राण भीतर से बाहर जाता, अपान, बाहर से भीतर आता, समान जो नाभि में पहुंचकर सारे शरीर में रस पहुंचाता, उदान, जिससे गले में स्थित अन्न आदि को अंदर को खींचा जाता, बल पराक्रम जिसमें होता है ,और व्यान जिससे सब शरीर में चेष्टाआदि कर्म जीव करता है, यह सभी प्राणमयकोश है।
तीसरा मनोमय कोष हैं जिसमें मन के साथ अहंकार ,वाणी ,पैर, हाथ, आदि पांच कर्मेंद्रियां हैं।
चौथा विज्ञान मय कोश जिसमें बुद्धि, चित्त,कान ,त्वचा ,नेत्र, जिहव्या और नासिका,5 ज्ञानेंद्रियां, जिनसे जीव विज्ञान आदि व्यवहार करता है।
तथा पांचवा आनंद मय कोश होता है। जिसमें प्रीति, प्रसन्नता, न्यून आनंद, अधिक आनंद और आधार कारण रूप प्रकृति है। यह पांच कोश कहे जाते हैं। इन्हीं से जीव सब प्रकार के कर्म उपासना और ज्ञान आदि व्यवहारों को करता है। इससे सिद्ध होता है कि ईश्वर इस सृष्टि का सबसे बड़ा विश्वकर्मा है।

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