रूपकुण्‍ड की मेरी यात्रा

rupkund

मैं काफी वर्षों से रूपकुंड जाने का इच्छुक था मैंने सोचा की नंदा देवी राज जात यात्रा के दौरान मैं रूपकुंड जाऊँगा पर लगातार दो साल से राज जात यात्रा किसी न किसी कारणवस स्थगित होने के कारण रूपकुंड जाने का प्लान नहीं बन पा रहा था पर इस साल मैंने सोचा की यात्रा हो या न कोई साथी हो या ना रूपकुंड जा के ही रहूँगा |

7 सितम्बर को मैं दिल्ली से अपने गाँव अयारतोली, गरुड़ के लिए रास्ता लगा और वहां से 11 सितम्बर को रूपकुंड के लिए रवाना हुवा 10 सितम्बर की शाम और रात को गाँव में भारी बारिश होने के कारण अगली सुबह घर वालों ने न जाने के लिए कहने लगे एक बार मेरे मन में भी ना जाने का विचार आने लगा पर मैंने अपने मन को समझाया और जाने का निश्चय किया गरुड़ से ग्वालदम की गाडी पकड़ी ग्वालदम से देवाल और वहां से लोहाजंग , लोह्जंग में पटवाल जी के होटल में दाल भात खाया वहां से वाण जाने की गाडी काफी लेट मिली वाण पुल पे जब पंहुचा अँधेरा होने लगा था कुछ स्थानीय लोगो ने मुझे गेस्ट हाउस में रूकने को कहाँ पर मैंने सोचा अगर कोई वाण से गैरोली पाताल जाने तक का साथ मिल जाए तो रात को भी चल लूँगा उतने में मुझे किसी ने नरेंदर नाम के लड़के का मोबाइल नो. दिया और कहा की ये 3 लड़कों के साथ २० मिनट पहले यहाँ से गैरोली पाताल के लिए निकले हैं अगर आप चाहो तो आप भी इन के साथ चले जाओ, आज रात कुरुड नंदा देवी का डोला गैरोली पाताल में रुकी हुवी थी इसलिए मैं भी वहां तक पहुचना चाहता था , मैंने नरेंदर जी को फ़ोन किया और उन्हें मुझे भी अपने साथ गैरोली पाताल ले जाने को कहा उन होने मुझे जल्दी से आने के लिए कहा मैं वाण पुल से जल्दी जल्दी ऊपर को चढाई चढ़ने लगा पर जल्द ही मैं बुरी तरह थक गया दस दस कदम चलने पर मैं बार बार बैठने लगा जल्द बाजी में मैंने पानी भी नहीं रखा और मेरा गला सूखने लगा मुस्किल से 800 मीटर चढ़ाई चढ़ा ही था की वापिस नीचे जाने का ख्याल आने लगा अब एक कदम भी आगे बढ़ाना मुस्किल हो गया था धीरे धीरे कुछ कदम आगे बढ़ा मुझे एक घर दिखाई दिया रात के आठ बज चुके थे मैं उस घर की तरफ बेजान तरीके से बढा और घर के एक महिला सदश्य से पानी के लिए कहा उन हो ने मुझे कहा की पानी जरा ऊपर चल के है वहां जा के पि लेना पर मैं इतना थका हुवा था मैं उन के आगन की दिवार में बैठ गया और पानी के लिए फिर से कहा और तभी नरेंदर जी को भी फ़ोन किया और उन्हें अपनी हालत बताई उन्होंने मुझे कहा उस घर मैं जो भी सद्श्य आप के सामने हैं उन्हें फ़ोन दे दो मैं बात करता हूँ मुझे उन की बात से पता चला की जिस घर में मैं पंहुचा हूँ वो नरेंदर जी का ही घर हैं और उन के पिता जी श्री रघुवीर सिंह बिष्ट जी वाण गाँव के प्रधान हैं नरेंदर जी ने वही रुकने को कहा इस तरह मेरा रूपकुंड यात्रा का पहला दिन और रात गुजरी सुबह जल्दी उठा और आगे की यात्रा की तैयारी करने लगा कुछ देर के बाद गाँव के प्रधान जी भी उठ गए उन हो ने कहा की में भी बेदनी जाने वाला हूँ वान समुद्र तल से लगभग 2400 मीटर की ऊंचाई पर है। यहाँ से बेदनी दस किलोमीटर आगे हैं मैंने सोचा ये तो यही के है जल्दी जल्दी चलेंगे मुझे काफी वक़्त लगेगा इसलिए मैंने उन से जल्दी निकलने की इज्जाजत मांगी और वहां से 6:30 बजे चल दिया कुछ आगे चलते ही हल्की बारिश भी होने रास्ते में एक घर से एक छोटी बोतल पानी का भी रखा और चलते रहा धीरे धीरे रण का धार पहुच गया वहां जरा देर बैठा और आगे चलने लगा अब नीलगंगा की आवाज भी कानों में गुजने लगी थी कुछ देर ढलान में चल के नीलगंगा पुल आ गया वहां से अब सीधा खड़ी चढाई शुरु होने वाली थी में अभी से थकने लगा था पर थकान भूल मै अपनी मंजिल कि तरफ बढता गया बैठते बैठते धीरे धीरे मैं आगे बढ़ा 9 बज चुके थे अब बेदनी में राज जात पूजा भी समाप्त होने के कारण शर्धालों वापिस आने लगे थे 10 बजे तक काफी जनता वापिस वाण गाँव कि तरफ वापिस जा रही थी और मुझे सभी कह रहे थे भाई कहा जा रहे हो अब तो पूजा ख़त्म हो गई हैं पर मैं उन्हें रूपकुंड जाने कि बात कर रहा था मुझे रास्ते में कई लोग मिले बहुतों से बात कि बेदनी कि जानकारी ली 11 बजे के लगभग मुझे राज्य सभा के सद्श्य श्री तरुण विजय जी भी बेदनी मेले से वापिस आते हुवे मिले जिन से मैंने रास्ते में खड़े खड़े पांच मिनट बात कि और उस के बाद मैं आगे को चलता रहा बेदिनी से दो किलोमीटर पहले एक जगह आती है, नाम है गैरोली पाताल। यहां दो तीन झौंपडियां हैं और भेड चराने वाले भी। वहाँ एक चाय कि दुकान में चाय पि 30 मिनट रुकने के बाद आगे के लिए चल पड़ा कुछ आगे चलते ही डौलियाधार पहुच गया — जहां से जंगल खत्म हो जाता है और बेदिनी की सीमा शुरू हो जाती है। अब हम रूपकुण्ड तक जंगल को छोड देंगे, रास्ते में आगे कोई पेड नहीं मिलेगा। यहां से आगे दूर तक बेदिनी बुग्याल का विस्तार दिखाई देता है। डोलियाधर में जरा देर बैठा और बेदनी कि तरफ बढ़ा जैसे जैसे बेदनी में बने फाइबर हट दिखने लगे मेरी थकान भी दूर होने लगी मन में ख़ुशी थी कि बेदनी बुग्याल तो पहुंच ही गया।

बेदनी कुंड

बेदनी –बेदिनी बुग्याल- भारत के विशाल बुग्यालों में से एक। बुग्याल कहते हैं गढवाल में वृक्ष रेखा से ऊपर घास के बडे बडे मैदानों को। ये अक्सर 3000 मीटर से ज्यादा ऊंचाई पर ही मिलते हैं बेदनी पहुचते ही बारिश भी शुरू हो गई मेरा प्लान आज के दिन जितना चला जाए चलने का था पर बारिश और तेज भूख लगने के कारण में बेदनी के झोपड़ी नुमा ढाबे में बैठ गया और दाल भात खाया चाय पि बारिश तेज होती जा रही थी वहाँ बैठे लोगों ने मुझे आज यही रुकने कि सलाह दी जिसे मैंने मान लिया तेज बारिश के कारण लगभग दस बारह लोग उस ढाबे में बैठे हुवे थे और उत्तराखंड को लेकर चर्चा कर रहे थे बेदनी मेला सीमिति के उपाध्यक्ष श्री दानु पूरा नाम ध्यान में नहीं आ रहा हैं उन हो ने मुझे मेला सिमिति के खाली पड़े टेंट में सोने का न्योता दिया जिसे मैंने स्वीकार लिया जिस से मुझे अपना टेंट लगाने कि जरुरत नहीं पड़ी और बेदनी में मेरा सोने और खाने कि व्य्वस्था आराम से हो गई , बारिश बंद होने के बाद टेंट में चला गया और बेदनी में चल रहे भागवत में जरा देर शामिल होने के बाद रात कि आरती में भाग लिया खाना खा के सोने अपने टेंट में चला गया

हरीश रावत

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