“ जब कश्मीरी पंडितों को दे दिए गए थे केवल तीन विकल्प 

———इंजीनियर श्याम सुन्दर पोद्दार, वीर सावरकर फ़ाउंडेशन 

आजादी से पूर्व शेख़ अब्दुल्ला ने मुस्लिम कांफ्रेंस के नाम से अपने राजनीतिक दल का गठन किया था। इस प्रकार उसकी शुरुआत ही भारत विरोध और कश्मीर में फिर से मुस्लिमों के शासन को स्थापित कर हिंदुओं के दलन और दमन के सपने को लेकर हुई थी। 1939 में उसने अपने इस संगठन का नाम मुस्लिम कॉन्फ्रेंस से बदलकर नेशनल कॉन्फ्रेंस रख दिया जो वास्तव में हिंदुओं की आंखों में धूल झोंकने के लिए ही रखा गया था।
१९४७ में जब उसके हाथ में कश्मीर का प्रशासन आया तो काश्मीरी भाषा में कश्मीर घाटी में रहने वाले हिन्दुओं को स्पष्ट
कहा था “या निकल ज़ाओ,या मुसलमान बन जाओ या मर जाओ “। जो उसके बेटे फ़ारूख  अब्दुल्ला ने १९९० में कश्मीरी हिन्दुओं को कश्मीर घाटी में उनका नरसंहार आरम्भ कराकर कश्मीर घाटी से उनको निकाल कर पूरा कर दिया। एक मामूली से गरीब शिक्षक की इतनी ताक़त पाने की सम्पूर्ण कहानी यह है। कश्मीर के महाराजा हरी सिंह ने १९३०  के गोल मेज़ सम्मेलन में  अंग्रेजजों से भारत को स्वाधीनता देने की पैरवी की। अंग्रेज़ी सरकार की तब से महाराजा पर कोप दृष्टि हो गई। शेख़ अब्दुल्ला एक सरकारी स्कूल में पढ़ाने वाला शिक्षक था। उसने एक छात्र के साथ अनैतिक कार्य किया इस लिये उसे सरकारी नौकरी से निकाल दिया गया। शेख़ अब्दुल्ला ने मुस्लिम कॉन्फ़्रेन्स नामक एक राजनैतिक दल बनाया व महाराजा के विरुद्ध हिंसात्मक साम्प्रदायिक आंदोलन किया। जिसमें उसे ब्रिटिश सरकार से पूरी मदद मिली ताकि ब्रिटिश सरकार महाराजा पर दबाव बना सके।
      महाराजा हरी सिंह को झुकना पड़ा। उसने संविधानिक सुधारो के लिये ग्लासी कमीशन बैठाया तथा गिलगित का क्षेत्र साठ वर्षों के लिए  पट्टे पर अंग्रेजों को दे दिया। इस प्रकार अंग्रेजों तथा उनके पिट्ठुओं का उद्देश्य पूरा हुआ। अंग्रेज़ को गिलगित मिल गया तथा शेख़ अब्दुल्ला को  राजनैतिक  मान्यता  मिल गई। बाद में काश्मीर घाटी में मुस्लिम लीग का प्रभाव बढ़ने लगा तो भारत के कांग्रेस नेताओं के नज़दीक आने के लिये शेख़ अब्दुल्ला ने 1939 में मुस्लिम कॉन्फ़्रेन्स का नाम बदल कर नैशनल कॉन्फ़्रेन्स कर दिया।
  जिसका उसे पूरा लाभ मिला। ब्रिटिश सरकार का दलाल कांग्रेस का कृपा पात्र बन गया। नेहरू ने देश की आत्मा के साथ फल करते हुए  उसे कांग्रेस की सरकार बनने पर काश्मीर का शासन दे दिया। जब नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर के मामले को भेज दिया व कश्मीर में जनमत संग्रह की बात हो गई। शेख़ अब्दुल्ला ने नेहरू से कहा – मुझे काश्मीर की मुस्लिम जनता के बीच जाने से पहले विशेष अधिकार  काश्मीर को मिले तभी जा पाऊँगा। नेहरू ने उसे संविधान सभा के अध्यक्ष डॉक्टर अम्बेडकर के पास भेज दिया।
   डॉक्टर अम्बेडकर ने संबिधान में ३७० लगाने से स्पष्ट मना कर दिया कि भारत सरकार की कश्मीर के बारे में ज़िम्मेवारी तो पुरी होगी पर अधिकार कुछ नही होगा । ऐसा भारत विरोधी कार्य मै नही कर सकता। तब नेहरू ने अपने एक मन्त्री गोपाल स्वामी अयंगर के माध्यम से संविधान सभा में ३७० रखवाने के लिये प्रयास किया कि यह ३७० धारा कुछ समय के लिये ही लागू रहेगी। जब काश्मीर में जनमत संग्रह का काम हो जायेगा तो इसे समाप्त कर दिया जायेगा। इसलिये अस्थायी धारा के रूप में इसे सम्मिलित कर लिया जाय तथा संविधान में अस्थायी रूप में सम्मिलित करने की स्वीकृति मिली।
    अब शेख़ अब्दुल्ला के हाथों को मज़बूत करने के लिए नेहरू ने चुनाव आयोग का सहारा लिया व जम्मू क्षेत्र को  राज्य की ७५ विधान सभा सीटों में ३८ सीट मिलनी चाहिये थी उसे घटा कर ३२ कर दिया व काश्मीर घाटी को ३३ सीट मिलनी चाहिये थी उन्हें ३९ कर दिया।
  अब राज्य में शेख़ अब्दुल्ला को चुनाव जिताना एक चुनौती थी। उसी के लिए कार्य किया जाना आरंभ हुआ। कश्मीर घाटी में मुस्लिम लीग ताकतवर है व जम्मू क्षेत्र में प्रजा परिषद। इलेक्शन कमीशन ने नैशनल कॉन्फ़्रेन्स के अलावा मुस्लिम लीग व प्रजा परिषद व निर्दलियों के नामांकन अवैध घोषित कर दिये व शेख़ अब्दुल्ला की पार्टी को बिना निर्वाचन शत प्रतिशत सीटों पर  विजयी बना दिया। १९४९ में जब संयुक्त राष्ट्र में भाषण देकर शेख़ अब्दुल्ला लौट रहा था, उसने लन्दन में “डेली टेलिग्राफ” नाम के प्रमुख समाचार पत्र में कश्मीर घाटी को स्वतंत्र राज्य बनाने सम्बन्धी अपना विचार सार्वजनिक रूप से पहले ही व्यक्त किया।
   इससे सरदार पटेल को हस्तक्षेप करने का अवसर मिल गया। उन्होंने लौटते ही शेख़ अब्दुल्ला को दिल्ली बुलाया तथा उसे बताया कि यदि उसे स्वतंत्रता चाहिये तो भारत कश्मीर घाटी से अपनी सेनायें बुलाने को तैयार है। इससे वह हतप्रभ रह गया। जैसे ही भारतीय सेनायें वापस लौटती, पाकिस्तान घाटी पर बलात् अधिकार कर लेता और खान अब्दुल ग़फ़्फ़ार खान की तरह उसको भी जेलों की हवा खानी पड़ती। सरदार पटेल की १९५० में मृत्यु के बाद वह फिर से खुल कर खेलने लगा। वह अमरेकी संगरक्षकों तथा पाकिस्तान के सहयोग से काश्मीर को स्वतंत्र शेख़ राज्य  घोषित करने की योजना को अंतिम रूप दे रहा था। शेख़ अब्दुल्ला को पदच्युत कर गिरफ़्तार कर लिया गया। 
   १९७५  में मीरकासिम के षड्यंत्र से इन्दिरा गाँधी ने शेख़ अब्दुल्ला को पुनः गद्दी पर बैठा दिया।  १९८२ में शेख़ अब्दुल्ला की मौत के बाद उसका बेटा फ़ारूख अब्दुल्ला गद्दी पर बैठा। इसके पहले फ़ारूख अब्दुल्ला जम्मू व काश्मीर लिबरेशन फ़्रंट का संस्थापक सदस्य था व  बिदेसी पत्नी के साथ ब्रिटिश नगरिकता ले लिया था। १९८४ में कांग्रेस ने फ़ारूख अब्दुल्ला को हटा कर कांग्रेस के सहयोग से जी.एम .शाह  को  मुख्य मन्त्री बनाया तथा १९८७ में कांग्रेस ने नैशनल कॉन्फ़्रेन्स के साथ मिल कर चुनाव लड़ा और फ़ारूख अब्दुल्ला मुख्य मन्त्री बने। इस बार फ़ारूख अब्दुल्ला कश्मीर घाटी से हिन्दुओं को निकालने के काम में लग गया। ७० आतंकवादियों को छोड़ा। ग्रामीण अंचल से सुरक्षा बलों को उठा लिया  एक तरफ़ हिंदुवो का नरसंहार आरम्भ हुआ । दूसरी तरफ़ हिन्दुओं से शेख़ अब्दुल्ला का कथन कहा गया “निकल ज़ाओ या मुसलमान हो ज़ाओ या मारे ज़ाओ”तथा काश्मीर घाटी से हिन्दुओं का पलायन आरम्भ कराकर अपने पिता शेख़ अब्दुल्ला के कथन को सार्थक कर मुख्य मन्त्री पद से १९ जनवरी १९९० त्याग पत्र देकर फ़ारूख अब्दुल्ला विदेश भाग गया।
  आजादी से पहले शेख अब्दुल्ला ने कश्मीर में महाराजा कश्मीर छोड़ो आंदोलन चलाया था, उस समय भी उसने इसी प्रकार आग लगाकर और हिंदुओं के विरुद्ध बड़े पैमाने पर दंगे करवाये थे । फिर उन दंगों से अपने आपको अलग कर कश्मीर छोड़कर भाग गया था। अपने पिता के इसी आचरण का इतिहास फारूक अब्दुल्ला ने 1990 में दोहराया । इस प्रकार हिंदुओं को कश्मीर से भगाने का कुसंस्कार अब्दुल्ला परिवार के खून में बसा हुआ है। वास्तव में यह परिवार देशद्रोही और खूनी आचरण वाला परिवार है। जन से किसी प्रकार के देशभक्ति की उम्मीद नहीं की जा सकती। इनके खूनी आचरण की जांच करवा कर दा कश्मीर फाइल्स को पूरा कराया जाना समय की आवश्यकता है।

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