वैदिक संपत्ति : अध्याय -चितपावन और आर्य शास्त्र

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गतांक से आगे….
इसलिए यह निश्चय और निर्विवाद है कि, चितपावनों ने जिस प्रकार छल से क्षत्रियों का राज्य लिया और जिस प्रकार छल से ग्रन्थों में मिश्रण किया, उसी तरह छल से ही उन्होंने अपनी जाति की यह कथा और पूजा भी आर्यों में दाखिल कर दी। यहूदी लोग संसार में छ्ली प्रसिद्ध हैं। ये चितपावन भी यहूदी ही हैं। इसलिए छल करने में इनको संकोच नहीं हो सकता। इनको हम ही छली नहीं कहते, प्रत्युत लोकनायक तिलक के जीवन चरित्र में प्रसिद्ध लेखक नरसिंह चिन्तामणि केलकर लिखते हैं कि, ‘देशस्थ लोकों में जैसे साधुसन्त उत्पन्न हुए वैसे ही कोंकणस्थों में वीर और नीतिमान उत्पन्न हुए। यदि पूछा जाए कि अंग्रेजी राज्य में छल करना किसके हिस्से में आया होगा, तो कहा जाएगा कि कोंकणस्थो के। क्योंकि ज्यू लोगों की भांति चितपावनों के लिए भी प्रसिद्ध है कि, वे छली है और इस छल की ही बदौलत उनको वीरता और ऐश्वर्य की प्राप्ति हुई है। इतिहास प्रसिद्ध है कि कोंकणस्थ भट घराना छ्ल से ही देश में घुसा और पेशवाई प्राप्त की।इस तरह से इनका छली और प्रपंची होना तथा विदेशी होना सिद्ध है। इनमें विदेशीपन और अनार्यत्व की एक रिवाज अब तक बनी हुई है। पण्डित गावस्कर कहते हैं कि, विसलामपुर तथा रत्नागिरी के रहने वाले चितपावनों में अब तक रिवाज है कि, श्रावणी (उपाकर्म) विधि में अथवा और किसी दिन साल में एक बार यह लोग जातिभोजन कराते हैं। उस समय आटा की एक गाय बनाकर पकाते हैं और उसके पेट में मधु (शहद) भरकर उसकी बलि देते हैं। अपने कुलदेवता को बलि देकर उसके अनेक टुकड़े कर डालते हैं और जब सब लोग भोजन करने के लिए बैठते हैं, तो सबकी पत्तलों में प्रसाद के तौर पर उसका एक-एक टुकड़ा परसते हैं। उसके भीतर जो शहद होता है, उसे तीर्थ कहते हैं। यदि यह सत्य है, तो दु:ख से कहना पड़ता है कि, यह रिवाज इनमें बहुत ही भयंकर है।
यहां तक हमने मिश्रनिवासी चितपावनों का शास्त्रविध्वंस दिखलाया और बतलाया कि, इनके मिश्रण से इनकी सोहबत से और इनके सकाश से आर्यो में कैसे-कैसे भयंकर रिवाज जारी हुए और किस प्रकार शुद्ध आर्य अपवित्र हुए। कौन कह सकता है कि, ये अपवित्र आसुरी रिवाज और आचरण आर्य जाति के पतन का कारण नहीं हुए और इन्हीं से आर्य जाति का पतन नहीं हुआ?
ब्राह्मण बन जाने वाली तो अनार्य जातियों का हाल यहां तक लिख कर देखा गया है कि उन्होंने किस प्रकार आर्य साहित्य का सत्यानाश किया है इन 2 जातियों के अतिरिक्त अन्य अनेकों कार्यों में समा गई मालूम नहीं उन्होंने और क्या-क्या मिशन किया हो कुछ कानपुर नए-नए संप्रदाय चलाना नए-नए का रचना और पुराने ग्रंथों में प्रक्षेप करने का तो तूफान ही बरपा हो गया था उस समय जिनकी जी में जो कुछ आता था वह वही लिख मारता था यही नहीं कि ब्राह्मणों ने ही प्रचलित किया है किंतु हम ने गत प्रकरणों में दिखला दिया है कि उपनिषदों में क्षत्रियों की ओर से भी रखे हुए हैं यही नहीं अपितु हमको कायस्थों की ओर से भी प्रक्षेप किया हुआ लेख मिलता है महा गरुड़ पुराण अध्याय 9 2 में लिखा है कि –
चित्रगुप्तपुंर तत्र योजनानां तु विशति:। कायस्थास्तत्र पश्यन्ति पापपुण्ये च सर्वशः॥
अर्थात् चित्रगुप्त का पुर बीस योजना के विस्तार में है, जहां सब लोगों के पापपुण्यों को कायस्थ लोग देखते हैं। यह प्रक्षेप न तो ब्राह्मणों का किया हुआ है और ने क्षत्रियों का। इस गप में कायस्थों का ही स्वार्थ है, इसलिए यह उन्हीं का किया हुआ है। क्योंकि कायस्थों के स्वार्थ की बदनामी न तो पहले कम थी न अब कम है। मिताक्षरा में लिखा है कि, कायस्थों को पीट कर प्रजा की रक्षा की जाए। इससे पाया जाता है कि, इन्होंने बहुत बड़ा अत्याचार कर रक्खा था, इसलिए ऐसा कहा गया है।
क्रमशः

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