1भारत विधि का जन्मदाता राष्ट्र रहा है। भारत की विधि व्यवस्था का मूल स्रोत शांति है, और अंतिम लक्ष्य भी शांति है। कहने का अभिप्राय है कि विधि वही उत्तम मानी जाती है जो शांति से उत्पन्न हो, शांति के लिए स्थापित हो और शांति प्राप्त कराने में सहायक हो। अब प्रश्न ये आता है कि ये शांति क्या है? तो इसका उत्तर भी ये है कि शांति एक नीति परक व्यवस्था का नाम है। ऐसी नीतिपरक व्यवस्था जो न्याय पर आधारित हो। इस प्रकार ‘न्याय’ भारतीय विधि व्यवस्था में पहले आता है, विधि निर्माण उसके उपरांत आता है। क्योंकि ‘न्याय’ की प्राप्ति ही विधि निर्माण का उद्देश्य है। पश्चिमी जगत में विधि-निर्माण न्याय से पहले है। इसका कारण ये है कि पश्चिमी जगत में जब कानून बनाने के लिए लोगों ने सोचना आरंभ किया तो उनकी सोच किसी ऐसे वर्ग या मानव संप्रदाय को मिटाकर उस पर अपना वर्चस्व स्थापित करने की थी जो उनकी साम्प्रदायिक मान्यताओं में विश्वास नही करता था। इस प्रकार हर देश ने जैसे-जैसे उनके धर्मग्रंथ की मान्यताओं में आस्था प्रकट करनी आरंभ की वैसे-वैसे ही उस देश में उस धर्मग्रंथ में अनास्था रखने वालों की ‘कयामत’ आ गयी। इसीलिए हमारा मानना है कि वहां अनास्था रखने वाले लोगों को मिटाने के लिए कानून पहले बना और न्याय उसके उपरांत आया। यद्यपि जहां वर्चस्व का संघर्ष आरंभ हो जाता है, वहां न्याय की अपेक्षा करना ‘गिद्घ के घोंसले में मांस ढूंढने’ वाली बात ही होता है। यही कारण है कि पश्चिमी जगत आज तक ‘न्याय’ ढूंढ रहा है और उसकी परिभाषा गढऩे में लगा है, जबकि हम पश्चिम के अंधानुकरण में अपने आप को भूलकर अपने ‘न्याय दर्शन’ को ही भूल बैठे हैं।

भारत में न्यायदर्शन का दर्शन शास्त्र में प्रमुख स्थान है। इस दर्शन के प्रवत्र्तक महर्षि गौतम रहे हैं। इस प्रकार न्यायदर्शन का इतिहास उतना ही पुराना है जितना महर्षि गौतम का काल पुराना है। आज तक भी इस महर्षि के सम्मान में गौतम गोत्र भारत में प्रचलित है। कितनी प्यारी परंपरा है भारत की कि अपने महापुरूषों के महान कार्यों को स्मरण रखने के लिए लोग गोत्र का ही निर्माण कर लेते हैं, जिससे कि उस महामानव की परंपरा को अक्षरश: आगे बढ़ाने में सहायता मिल सके।

महर्षि गौतम ने तर्क, प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टांत, सिद्घांत, अवयव, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति और निग्रहस्थान इन सोलह माध्यमों से सिद्घ किया कि मनुष्य स्वयं अपने साथ भी न्याय करते हुए हर स्थिति-परिस्थिति में अपनी स्वस्थ भूमिका का निर्वाह करते हुए सदा ही मोक्षाभिलाषी बना रहे।

हमें न्याय का अर्थ अपने दार्शनिक साहित्य में यूं मिलता है-‘‘जिसके द्वारा किसी प्रतिपाद्य विषय की सिद्घि की जा सके, जिसकी सहायता से किसी निश्चित सिद्घांत पर पहुंचा जा सके, उसी का नाम न्याय है।’’ विद्वानों की मान्यता है कि न्यायदर्शन को चार भागों में विभक्त किया जा सकता है, जिनमें  से प्रथम है-सामान्य ज्ञान की समस्या को हल करना, इसका अभिप्राय है कि न्याय करते समय उन तथ्यों का ध्यान रखा जाएगा जो सामान्य ज्ञान में आते हैं। दूसरा है-जगत की पहेली को सुलझाना। सचमुच जगत एक पहेली है। इस पहेली को सुलझाना भी है और स्वयं को इससे निरपेक्ष भी रखना है, इसे सुलझाते-सुलझाते इसी में उलझना नही है। यदि उलझ गये तो स्वयं के साथ तो अन्याय होगा ही, अन्य लोगों के साथ भी अन्याय कर बैठोगे। इसलिए यथायोग्य धर्मानुसार वत्र्तने का प्रयास करना चाहिए।

तीसरा है-जीवात्मा तथा मुक्ति। इसका अभिप्राय है कि जीवात्मा संसार में आवागमन के चक्र  में क्यों फंसा है? यहां हमें बार-बार क्यों आना पड़ रहा है, और इस आवागमन से छुटकारा कैसे मिल सकता है? यह चिंतन हमें धर्मशील और न्यायशील बनाये रखता है। हमारा विवेक हमारा मार्गदर्शन करता रहता है, और हम दूध का दूध और पानी का पानी करने के न्यायशील मार्ग के पथिक बने रहते हैं। इस मार्ग पर चलते-चलते हमें जीवात्मा का बोध होता है और हम मुक्ति के अधिकारी बनते जाते हैं।

चौथा है-परमात्मा तथा उसका ज्ञान। परमात्मा परम चेतन सत्ता है, वह सर्वत्र है, सर्वज्ञ है, सर्वाधार है, सर्वेश्वर है, सर्वान्तर्यामी है और सर्वरक्षक है। उसे जानने के लिए उसका नित्य यजन-भजन, जप और तप करना हर मनुष्य के लिए आवश्यक है। क्योंकि परमात्मा का ज्ञान ही हमारी बुद्घि को निर्मल, निश्छल,  सूक्ष्म और तत्वान्वेषी बनाता है। बुद्घि जितनी सूक्ष्म और तत्वान्वेषी होगी उतनी ही वह न्यायशील होगी। ऐसी सूक्ष्म और तत्वान्वेषी  बुद्घि दूसरे व्यक्ति के आने के उद्देश्य और आकर के भी आपसे वह व्यक्ति जो कुछ छुपाना चाहता है, आदि को बड़े ही सहज भाव से समझ लेती है।

इन चार बातों को समझने के लिए ही न्यायदर्शन के दर्शनकार ने प्रमाण, प्रमेय आदि 16 पदार्थ माने हैं। प्रमाण को न्याय का प्रतिपाद्य विषय माना गया है। न्याय दण्ड को निर्धारित करने की वस्तु नही है, अपितु न्याय वह प्रमाण देने की वस्तु है जिससे यह सिद्घ हो सके कि कहीं न कहीं अन्याय हुआ है। प्रमाण पर पहुंचते ही न्याय पूर्ण हो जाता है, उससे आगे लोकविधि के अनुसार जो कुछ किया जाता है, वह तो दण्ड निर्धारण की प्रक्रिया कही जा सकती है। न्याय दण्ड को निर्धारित नही करता है, अपितु दण्ड के लिए प्रमाण देता है। यद्यपि दण्ड निर्धारण को भी प्रचलित मान्यता के अनुसार न्याय की अंतिम परिणति माना जाता है। ऋषि गौतम का न्यायदर्शन हमें मोक्ष की ओर लेकर चलने वाली पगडंडी पर डालता है। वह संसार के रागद्वेष से हमें मुक्त करता है और दुख, जन्म, प्रवृत्ति अर्थात पाप-पुण्य, मोह और मिथ्याज्ञान का नाश करने में सहायता प्रदान करता है। रागद्वेष की उत्पत्ति शरीर को आत्मा समझने जैसे मिथ्या ज्ञान से होती है। जब व्यक्ति राग-द्वेष में फंस जाता है तो, लोगों के साथ उदार या कठोर व्यवहार निष्पन्न करता है। जिससे व्यावहारिक जीवन में अन्याय और अत्याचार का प्रभाव बना रहता है और व्यवहार में मर्यादा व समभाव वर्तने की हमारी संभावनाएं क्षीण होने लगती हैं। जिससे हमारे चारों ओर पाप-पुण्य का घेरा बनता रहता है। पाप-पुण्य के चक्र में पड़े रहने से जन्म होता है। क्योंकि ईश्वर की कर्मफल व्यवस्था के अंतर्गत पाप और पुण्य का फल मिलना अवश्यंभावी है। इसलिए व्यक्ति मृत्यु और जन्म के चक्र में पड़ा रहता है, जिससे दु:ख होता है।

न्याय का उद्देश्य व्यक्ति निर्माण है, व्यक्ति को चतुर चालाक बनाना नही। व्यक्ति निर्माण से ही समष्टिनिर्माण संभव है। इसलिए न्याय की बड़ी सूक्ष्म विवेचना महर्षि गौतम ने की है। कदाचित दु:ख के निवारणार्थ ही महर्षि गौतम ने व्यक्ति निर्माण को न्याय का उद्देश्य माना। इसलिए दु:ख के नाश के लिए उन्होंने न्याय की खोज की। यह सच है कि जब तत्वज्ञान हो जाता है और सूक्ष्म होकर हमारी बुद्घि न्यायपथगामिनी हो जाती है तो उस समय ही हमारे मिथ्या ज्ञान का नाश होता है। मिथ्याज्ञान के नाश से रागद्वेष आदि का नाश होकर दु:ख का नाश होता है। दु:ख का नाश हो जाना ही मोक्ष है। ईश्वर के विषय में ऋषि गौतम के न्यायदर्शन की मान्यता है कि संसार के जितने भी पदार्थ हैं वे सबके सब सावयव हैं। अत: उनका कोई चैतन्य कर्ता होना चाहिए। एक ऐसीशक्ति होनी चाहिए जो कि परम चेतन हो और लोक लोकांतरों को आकाश में पक्षी के समान भ्रमण कराने की सामथ्र्य से मुक्त हो। वह शक्ति ही मनुष्यों को उनके कर्मों के अनुसार फल देने में सक्षम हो। सृष्टिके प्रारंभ में ईश्वर की सृष्टिके सफल संचालन के लिए मनुष्य को वेद ज्ञान देता है। इसलिए वेद अपौरूषेय हैं, अर्थात उन्हें किसी व्यक्ति ने नही बनाया। उस ईश्वर का साक्षात्कार बाह्य साधनों से नही होता, अर्थात घंटे, शंख, घडिय़ाल बजाने से ईश्वर को नही पाया जा सकता, अपितु उसे भीतरी साधनों  से जप-तप के माध्यम से शुद्घ किये गये अंत:करण से ही पाया जा सकता है।

इस प्रकार न्याय भारतीय दर्शनशास्त्र के ऋषि की दृष्टिमें और भारतीय परंपरा में बहुत ही विस्तृत अर्थों और संदर्भों में प्रयुक्त किया गया है। सारे संसार के दुखों से निवृत्ति का नाम ही न्याय है, हमारी नीर क्षीर विवेकशक्ति का नाम ही न्याय है, और अभ्युदय से नि:श्रेयस की ओर बढऩे का नाम ही न्याय है। इसी से हम विज्ञान वा राज्यादि ऐश्वर्यों की प्राप्ति कर सकते हैं। न्याय के इसी विचार को यदि अक्षरश: सारे विश्व में लागू करा दिया जाए तो सारे संसार के समस्त विवादों का, सारे झगड़ों का और सारे कष्ट-क्लेशों का सर्वथा नाश ही हो जाएगा। हम अपने ‘हीरे’ को छुपाएं नही, अपितु उसे गर्व से संसार के घुप्प अंधेरे को मिटाने के लिए प्रयोग करें, जिससे कि विश्व का कल्याण हो सके। गौतम को विस्तार दें, पुस्तकों में समेटें नही।

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