पुस्तक समीक्षा :  ‘भावों की उर्मियां’ ( कुंडलियां संग्रह )

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‘भावों की उर्मियां’ ( कुंडलियां संग्रह ) –  की लेखिका श्रीमती शकुंतला अग्रवाल ‘शकुन’ हैं। जब मनुष्य का आध्यात्मिक जागरण होता है तो उसे ‘कुंडली जागरण’ भी कहा जाता है। ‘कुंडली जागरण’ का अर्थ है बड़ी आध्यात्मिक साधना के पश्चात एक ऐसे विशाल क्षेत्र के दर्शन हो जाना जिसमें आत्मा को आनंद के साथ उड़ान भरने में सहजता प्राप्त हो जाती है। जिस समय कुंडली जागरण होकर कोई सौभाग्यशाली मनुष्य उन क्षणों का रसास्वादन लेता है तो वह क्षण कितने हर्षदायक होते होंगे – इसकी अनुभूति केवल उस अनुभव को करने वाला ही जानता है।
  साहित्यिक क्षेत्र में कुंडलियां छोटे में बड़ी बात को कहने में सक्षम होती हैं। छोटे में बड़ी बात कहना भारत के काव्य जगत की ही नहीं बल्कि मानवता के काव्य जगत की भी विशिष्टता रही है। वेदवाणी मानवता की सबसे पहली कविता है, जो सीधे ईश्वर ने ही काव्य रूप में हमें प्रदान की। उनमें भी बड़ी बात को बहुत छोटे में सूत्र रूप में कहा गया है। इस प्रकार कुंडलियां बीज का काम करती हैं।
   काव्य की उर्मियों ने कवयित्री श्रीमती शकुंतला अग्रवाल ‘शकुन’ को बहुत कुछ लिखने के लिए प्रेरित किया है। उर्मियों की विशेषता भी यही होती है कि वह मनुष्य को और विशेष रूप से कवि को शांत नहीं बैठने देती हैं । उनमें रचनात्मकता का प्रवाह सतत प्रवाहित रहता है। यही कारण है कि कवि भी सतत क्रियाशील रहकर काव्य के माध्यम से देश और समाज का निर्माण करने की दिशा में क्रियाशील रहता है। अपने इस काव्य संग्रह के माध्यम से श्रीमती ‘शकुन’ के द्वारा भी ऐसा ही वंदनीय प्रयास किया गया है।
  अपनी पुस्तक के पृष्ठ संख्या 29 पर श्रीमती शकुंतला ‘नीयत’ शीर्षक के माध्यम से लिखती हैं :-

नीयत जिसकी साफ़ हो कष्ट न आएं पास ।
जीवन भर मिलते रहे,  प्रीत भरे  एहसास।
प्रीत भरे एहसास ,  जिंदगी   महका   देते।
विपदा का  हो ह्रास समय  रहते  जो   चेते।
खुशियों से अहिनाथ ,  भरे हैं झोंली उसकी ।
रहें सदा शिव साथ,   साफ़ है नीयत जिसकी।

कवि अनेकों अनुभूतियों के दौर से गुजरता है और फिर जितनी जितनी अनुभूतियां होती जाती हैं, उसका ह्रदय उतनी उतनी ही कविता की कुंडलियां गढ़ता जाता है। कवि ,कविता, अनुभव  और अनुभूतियों का चोली दामन का साथ है। इनकी अन्योन्याश्रित स्थिति एक दूसरे की पूरक है। श्रीमती शकुंतला अग्रवाल ‘शकुन’ अपनी अनेकों अनुभूतियों के दौर से गुजरी हैं और उन अनुभूतियों से उपजी कविता को कुंडलियों के रूप में उन्होंने इस पुस्तक में स्थान दिया है। अपनी ‘मजबूरी’ नामक कुंडली में पृष्ठ 34 पर वह लिखती हैं :-

आंखों में मजबूरियां अधरों पर है प्यास।
निर्धन की बेचारगी , नहीं छूटती  आस ।
नहीं छूटती आस हुआ है जर्जर तन मन।
मन में है विश्वास सुनेंगे विनती भगवन ।
छूना है आकाश  जोश  रखना पाखों में ।
करे ‘शकुन’ अरदास अश्रु मत ला आंखों में।

कवि अपनी कविता में समाज की विकृतियों पर भी प्रहार करता है। यद्यपि उसके प्रहार का उद्देश्य किसी के दिल को तोड़ना नहीं बल्कि टूटे हुए दिलों को जोड़ना होता है। वह चाहता है कि उसकी कविता से निकले प्रेरक बाण मनुष्य के मानस को प्रभावित करें और उसे यह सोचने के लिए विवश करें कि जो कुछ स्थिति आज समाज में बन चुकी है या बन रही है, उसकी विकृति को तोड़ने या समाप्त करने के लिए वह खड़ा हो जाए।
इस प्रकार कविता क्रांति का एक मौन आवाहन है। यह चुनौतियों को देखकर उनसे भागती नहीं है बल्कि उनसे भिड़ने की प्रेरणा देकर मनुष्य को खड़े होकर उनका सामना करने के लिए आंदोलित करती है श्रीमती शकुंतला अग्रवाल की कविता ‘ढाई आखर’ हमें कुछ इसी प्रकार से आंदोलित करती हुई दिखाई देती है :—

   ढाई आखर प्रेम के बांचे हैं अब कौन ।
निजहित के आगे सभी रह जाते हैं मौन ।
रह जाते हैं मौन तोड़कर  प्रेमिल  डोरी ।
रिश्ते नाते  गौण  जिंदगी  रहती  कोरी ।
जान सके तो जान प्रेम वह पुस्तक भाई ।
पढ़ता सिर्फ सुजान प्रेम के आखर ढाई।

इस प्रकार यह पुस्तक कविता रस से भरी हुई और प्रेरणा की उर्मियों को भी बिखेरती हुई एक अनुपम पुस्तक है।
  पुस्तक के प्रकाशक साहित्यागार , धामाणी मार्केट की गली, चौड़ा रास्ता, जयपुर 302003, फोन न0 0141- 2310785, 4022382 है । पुस्तक का मूल्य ₹200 है । यह पुस्तक कुल 110 पृष्ठों में लिखी गई है । जिनमें 252 कुंडलियां समाविष्ट हैं।
पुस्तक के लिए श्रीमती शकुंतला अग्रवाल का प्रयास वंदनीय और अभिनंदनीय है।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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