‘आर्यत्व का धारण ही जीवन का उद्देष्य एवं श्रेष्ठ मानव धर्म’

ashram_brahmacharya_1ओ३म्

मनुष्य संसार में एक षिषु के रूप में माता की कोख से जन्म लेता है। संसार की सभी स्त्रियों में मातृत्व को धारण करने का गुण पाया जाता है जो स्वाभाविक, नैसर्गिक व प्राकृतिक है। इस नियम का संसार के किसी देष में व्यतिक्रम या उल्लंघन नहीं है अर्थात् यह नियम सर्वत्र एक समान रूप से व्यवहारिक व सब स्त्रियों के जीवन का एक प्रमुख गुण, भाव व अंग है। सृष्टि के आरम्भ से ही यह परम्परा चली आ रही है कि युवा अवस्था होने पर एक स्त्री का समान गुण, कर्म व स्वभाव वाले पुरूष से विवाह होता है। कुछ समय बाद उनसे सन्तानें जन्म लेती है। उनका पालन पोषण माता-पिता करते हैं। उन्हें षिक्षित व व्यवसाय करने योग्य बनाते हैं। इसी बीच माता-पिता की आयु बढ़ती रहती है। वह बूढ़े हो जाते हैं और वृद्धावस्था आने या रोग आदि हो जाने के पष्चात उनकी मृत्यु हो जाती है। सभी देषों में यह नियम एक समान है एवं सृष्टि के संचालन का आधारभूत सिद्धान्त है। क्या हिन्दू, क्या मुस्लिम, ईसाई, जैन, बौद्ध, सिख, पारसी व नास्तिक कहे जाने वाले कम्यूनिस्ट, सभी में ऐसा ही हो रहा है। सबके षरीरों की बनावट या आकृति एक जैसी है। सभी में पांच ज्ञानेन्द्रियां व पांच कर्मेन्दियां हैं। मन, बुद्धि, चित्त व अंहकार रूपी करण व काम, क्रोध, मोह, ईर्ष्या, द्वेष आदि स्वभावजन्य गुण भी सभी मनुष्यों व सारी भूमि पर रहने वाले सभी मतों व सम्प्रदायों के लोगों में एक समान व न्यूनाधिक हैं। इससे एक ईष्वर का होना सिद्ध होता है। यदि ईष्वर एक है तो उसी के द्वारा यह सारा संसार व सृष्टि बनी है या अस्तित्व में आयी है। वही इसको धारण कर रहा है व उसी से यह चल रही है। इस सृष्टि व प्रकृति में जितने भी नियम कार्य कर रहे हैं उनका अधिष्ठाता व उनको व्यवहारिक रूप से चलाने व पालन कराने वाला भी हमारा प्राणों से भी प्रिय ईष्वर – सच्चिदानन्द स्वरूप ही है। इस बात को सिद्धान्त रूप में इस प्रकार से भी कह सकते हैं कि सब सत्य विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं, उन सबका आदि मूल परमेष्वर है।

ईष्वर के नित्य व अपरिवर्तनीय विधान व नियमों से अनादि, अजन्मा, चेतन व एकदेषी जीवात्मा मनुष्य व प्राणी के षरीरों का धारण करती है। ईष्वर ने हमें व अन्यों को मनुष्य षरीर क्यों दिया? यह जानने के लिए जीवात्मा को जानना होगा। जीवात्मा एक सूक्ष्म, एकदेषी, अजन्मा, अनादि, अमर, अनन्त, अल्पज्ञ, कर्म-फलों में बंधा हुआ एक चेतन तत्व है। चेतन तत्व में ज्ञान व क्रिया का होना उसका लक्षण व स्वाभाविक गुण होता है। ईष्वर एक सर्वव्यापक चेतन तत्व है तो उसमें भी ज्ञान व कर्म वा क्रिया का होना स्वाभाविक है। इसके विपरीत गुण अर्थात् जड़ता व कर्महीनता, अकर्मण्यता, कर्मों से रहित होना चेतन तत्व ईष्वर व जीवात्मा में असम्भव सिद्ध होता है, यदि ऐसा होता तो यह दोनों भी प्रकृति के समान जड़ तत्व होते। अतः दोनों ही ज्ञान व क्रियाओं से युक्त हैं। जीवात्मा को मनुष्य व विभिन्न योनियों के प्राणियों का जन्म उनके पूर्व जन्म के कर्मों के अनुसार ईष्वर के द्वारा मिलता है। यह कर्म-फल का चक्र ईष्वर, जीवात्मा व प्रकृति के अनादित्व के सिद्धान्त के अनुसार प्रवाह से अनादि है। इसका आरम्भ कभी नहीं हुआ। यह सदा-सदा से चला आ रहा है। यह कभी समाप्त नहीं होगा। सदा-सदा व हमेषा चलता ही रहेगा। जीवात्मा को ईष्वर ने उसके पूर्व जन्म के अच्छे व बुरे कर्मों के अनुसार मनुष्य जन्म दिया है। अपने सर्वव्यापक व सर्वान्तर्यामी स्वरूप से ईष्वर जीवात्माओं के प्रत्येक मन, वाणी व षरीर से किये गये कर्मों को यथार्थ रूप में जानता है। मनुष्य जन्म में जीवात्मा कर्म करता है। ज्ञान जीवात्मा व मनुष्य का स्वाभाविक गुण है, उसको बढ़ाना व उसी के अनुसार कर्म करना जीवन का एक उद्देष्य है। इसी प्रकार ज्ञान के अनुरूप ही कर्म करना, विपरीत कर्म न करना, अज्ञान, अन्धविष्वास व स्वार्थ में न फंसना भी उसका कर्तव्य व धर्म है। यदि वह ऐसा करता है तो उसके जीवन का उद्देष्य पूरा होता है और वह उन्नति को प्राप्त होता है। यदि वह इसके विपरीत करता है तो अवनति को प्राप्त होता है। अवनति अर्थात् अगले जन्म में वह मनुष्य जन्म न पाकर पषु, पक्षी, कीट, पतंग व अन्य असंख्य निम्न व नीच योनियों में से किसी योनि जो उसके पूर्व जन्मों के कर्मों पर आधारित होती है, सजा पाता है। अतः निर्विवाद रूप से सभी को अच्छे व श्रेष्ठ कर्म करने चाहियें जिससे ईष्वर से हमें सजा न मिले अपितु हमारी उन्नति हो और हम ईष्वर की जीवात्मा को सर्वोत्तम देन जिस में दुःखों की सर्वथा निवृत्ति हो जाती है, उस ‘‘मोक्ष व मुक्ति’’ को प्राप्त होकर जीवन को सफल करें। मोक्ष का अर्थ है कि जन्म व मरण का आवागमन का जो सिद्धान्त है, उसको अवरूद्ध करके अपने वास्तविक, सत्य व यथार्थ चेतन स्वरूप में स्थित रहकर ईष्वर की सतत व निरन्तर अनुभूति करते हुए सर्वत्र स्वेच्छा से विचरण करना।

आईये, आर्यत्व क्या है, इस पर दृष्टि डालते हैं। इसको जानने के लिए जीवात्मा के लिगों की चर्चा करते हैं। न्याय दर्षन 1/1/10 के अनुसार ‘इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःख- ज्ञानान्यात्मनों लिंगमिति।।’ इच्छा=राग, द्वेष=वैर, प्रयत्न=पुरूषार्थ, सुख, दुःख, ज्ञान=जानना गुण हों, वह ‘जीवात्मा’ कहलता है। वैषेषिक दर्षन 3/2/4 ‘प्राणापाननिमेषोन्मेषजीवनमनोगतीन्द्रियान्तर्विकाराः सुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नाष्चात्मनों लिंगानि।।’ के अनुसार प्राण=भीतर से वायु को बाहर निकालना, अपान=बाहर से वायु को भीतर लेना, निमेष=आंख को नीचे ढांकना, उन्मेष=आंख को ऊपर उठाना, जीवन=प्राण का धारण करना, मनः=मनन विचार अर्थात् ज्ञान, गति=यथेष्ट गमन करना, इन्द्रिय=इन्द्रियों को विषयों में चलाना, उनसे विषयों का ग्रहण करना, अन्तर्विकार=क्षुधा, तृषा, ज्वर, पीड़ा आदि विकारों का होना, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष और प्रयत्न ये सब आत्मा के लिंग अर्थात् कर्म और गुण हैं। यहां जिन्हें आत्मा के कर्म व गुण कहा गया है, हमें लगता है कि वह आत्मा के स्वाभाविक कर्म व स्वाभाविक गुण हैं। इन्हें मूल स्वाभाविक कर्म व मूल स्वाभाविक गुण भी कह सकते हैं। जन्म-जन्मान्तर, पूर्व जन्म के संस्कारों व प्रारब्ध आदि के कारण इन गुणों का सन्तुलन सभी मनुष्यों व प्राणियों में भिन्न-भिन्न होता है। मूल षब्द का प्रयोग हम जीवों में प्रकट होने वाले व कुछ अन्तर लिए हुए गुणों से पूर्व इस लिए कर रहें हैं कि यह आयु, अनुभव व अध्ययन आदि के साथ उन्नति व अवनति में परिवर्तित होते रहते हैं। मूल स्वाभाविक गुण सभी जीवों के एक समान ही होते हैं परन्तु जन्म-जन्मान्तर, पूर्व संस्कारों, प्रारब्ध, भिन्न-2 योनियों में इन स्वभाविक गुणों में कुछ अन्तर दिखाई देता है। सभी मनुष्यों व प्राणियों में जीव तो एक ही जैसा है परन्तु उनमें इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख व ज्ञान आदि सब गुण कुछ भिन्न प्रतीत होते हैं। मनुष्य जीवन में श्रेष्ठ गुणों को धारण करना ही मनुष्य जीवन का उद्देष्य है। श्रेष्ठ गुण क्या हैं, इसका उत्तर है कि वेदों का ज्ञान प्राप्त कर उसके अनुसार जीवन को बनाना ही आर्यत्व व जीवन का उद्देष्य है। इसमें सत्य बोलना, सत्य कर्म करना, ईष्वर को जानना व उसकी यथार्थ विधि से उपासना करना जिससे उसका साक्षात्कार हो सके, वायुमण्डल की षुद्धि व पर्यावरण की रक्षा के लिए यज्ञ व अग्निहोत्र यथासमय करना, माता-पिता-आचार्य-विद्वान-गुणी-वृद्धों-अतिथियों का सम्मान व सेवा करना, देष-भक्ति, परोपकार, सभी प्राणियों को मित्र की दृष्टि से देखना, अंहिसा का पालन करना, अंहिसा व हिंसा के वास्तविक रूप को समझना व उसे प्रयोग में लाना, दुष्टों की संगति से बचना व उनके सुधार के प्रयत्न करना, सभी प्रकार के ज्ञान व विज्ञान को जानना, अध्ययन करना, उसका उपयोग करना व ज्ञानपूर्वक, अन्धविष्वास, कुरीतियों से दूर रहकर जीवनयापन करना आदि गुण ही आर्यत्व की पहचान है। यदि हमारे जीवन में यथार्थ ईष्वर स्तुति, प्रार्थना व उपासना, यज्ञ व अग्निहोत्र की भावना व कर्म नहीं हैं तो हम आर्य न होकर अनार्य कहलाते हैं और हम ईष्वर की दृष्टि में भी अच्छे न होकर बुरे बनते हैं जिसका परिणाम हमें सजा के रूप में दुःखों की प्राप्ति होती है। अतः हमें आर्यत्व को धारण कर सत्कर्म व पुरूषार्थ करना चाहिये जिसमें विद्या-प्राप्ति मुख्य है।

संसार में जितने भी मत व मतान्तर हैं, उनकी कुछ मान्यतायें समान है व कुछ में अन्तर व एक दूसरे से विरोध है। मनुष्य जीवन का उद्देष्य सत्य को ग्रहण करना व असत्य का त्याग करना है। जब हम असत्य को छोड़ने की प्रवृति का अनुसरण करेगें तो हम किसी एक मत में नहीं रह सकते। क्योंकि जब हम अपने मत की असत्य मान्यताओं व सिद्धान्तों को छोड़ देगें तो हम उस मत के न होकर सत्य मत का मानने वाले बन जायंेगे। यह सत्य मत हमारे पहले के मत से कुछ समान व कुछ भिन्न होगा। ऐसी ही स्थिति सभी मतों को मानने वालों की होगी। इस प्रकार से सत्य को ग्रहण करने वालों का एक ही मत होगा जो मान्यताओं व सिद्धान्तों से एक समान होगा और षेष लोग वह बचेगें जो सत्य व असत्य में भेद न कर पाने व किन्हीं स्वार्थों के कारण अपने पूर्व मत मंक बने रहेगें। सत्य मत वालों का तब यह कर्तव्य हो जाता है कि वह अज्ञानी, भूले हुए, गुमराह, स्वार्थी व मतान्ध लोगों को समझा कर व प्रेरणा करके, प्रचार, उपदेष व अन्य प्रकार से सत्य मत ग्रहण कराये। इसकी विधि वही हो सकती है जो विद्यालय का एक अध्यापक अपने विद्याथिर्यों के प्रति अपनाता है। जो विद्यार्थी पढ़ने में लगनषील होते हैं उनका सम्मान व आदर करता है और जो पढ़ने में असावधानी व लापरवाही करते हैं, उनको दण्ड देकर उन्हें अध्ययन व ज्ञानार्जन में प्रेरित व प्रवृत्त करता है। सत्य को ग्रहण व धारण कराने की यही विधि धर्म व मत-सम्प्रदायों में भी लागू कर सभी मनुष्यों को सत्य धर्म में प्रवृत्त करना चाहिये। जब तक ऐसा नहीं होगा, मनुष्यों का जन्म धारण करना व्यर्थ होता रहेगा और वह मनुष्य जन्म के उद्देष्य – धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष से वंचित होते रहेगें। अतः सभी विद्वानों का यही कार्य है कि वह प्रचार व उपदेष द्वारा सभी मतों के लोगों को अन्धविष्वास, अज्ञान, कुरीतियों व स्वार्थों से दूर करके सत्य को धारण करने की प्रेरणा देकर उनको सत्याचारी बनायंे व उनका मानवीकरण कर उन्हें मननषील व चिन्तनषील सच्चा ईष्वर-भक्त बनायें। यही कार्य स्वामी दयानन्द ने अपने जीवन में किया था व आर्य समाज के सभी प्रचारक, उपदेषक, विद्वान आदि अपने प्रवचनों, व्याख्यानों, उपदेषों, लेखों व पुस्तकों की रचना द्वारा करते हैं। हम यह भी अनुभव करते हैं कि आर्य समाज के अतिरिक्त सम्प्रति भूमण्डल पर विद्यमान किसी भी मत में, अपने मत के असत्य सिद्धान्तों व मान्यताओं की पहचान करके निराकरण करने की कोई योजना व कार्यक्रम नहीं है जिससे अनेक षताब्दियों से सभी मतों में असत्य व अन्धविष्वास आदि विद्यमान हैं। यदि हम ईष्वर व जीवात्मा के स्वरूप को ही लें, तो सभी मत-मतान्तरों में इनका जो स्वरूप पाया जाता है या प्रयोग में लाया जा रहा है, वह भिन्न-2 व कुछ व अधिकांष असत्य पर आधारित है एवं सत्य व असत्य मान्यताओं का मिश्रण है। इस असत्य को निकालना व हटाना उन-उन मतों के मताचार्यों का कर्तव्य है। हमें लगता है कि वह इस बारे में मौन, उदासीन व निष्क्रिय हैं। इससे काम चलने वाला नहीं है। ऐसे लोग अन्य मनुष्यों के जीवन के साथ खिलवाड़ करते हैं। उनकी बुद्धि पर तरस भी आता है कि ईष्वर व जीवात्मा के बारे में इतना तर्क संगत, बुद्धिसंगत व ज्ञान-विज्ञान के अनुरूप सिद्धान्तों व मान्यतायें के होने पर दूसरे मतों के धर्माचार्य उन पर विचार कर सत्य के मण्डन व असत्य के खण्डन में प्रवृत्त क्यों नहीं होते जिससे सत्य का निर्णय हो सके। इसमें कारण, हमें उनका केवल स्वार्थ व अज्ञान ही दृष्टिगोचर होता है। ईष्वर सब धर्माचार्यों व मताचार्यों पर कृपा करें कि सभी लोगों में सत्य को जानने, मानने व सत्य को जीवन में धारण करने की प्रवृत्ति पैदा हो और संसार के सभी लोग सत्य व असत्य का विचार कर सत्य मतस्थ हों।

हमारे इस लेख से यही निष्कर्ष निकलता है कि सत्य व मानवीय गुणों को धारण करने व उनका आचरण करने वाले मनुष्यों की ही संज्ञा आर्य है। इन सब सत्य गुणों को धारण करना ही आर्यत्व है। आर्यत्व ही श्रेष्ठ जीवन, जीवन पद्धति व जीवन के उद्देष्य को पूर्ण करने वाला धर्म, संस्कृति व सभ्यता है। यही वैदिक विचारों, मान्यताओं, सिद्धान्तों व धर्म का पर्याय भी है।

-मनमोहन कुमार आर्य
पताः 196 चुक्खूवाला-2
देहरादून-248001
फोनः 09412985121
म्उंपसरू उंदउवींदंतलं/हउंपसण्बवउ

Comment:

norabahis giriş
betnano giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
maxwin giriş
maxwin giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
betpas giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betplay giriş
betplay giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
mariobet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
mariobet giriş
betvole giriş
mariobet giriş
safirbet giriş
safirbet giriş
mariobet giriş
betpas giriş
hititbet giriş
madridbet giriş
madridbet giriş
dedebet
betkanyon
radissonbet
casinofast
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
norabahis giriş
betgaranti giriş
betnano giriş
norabahis giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
norabahis giriş
betnano giriş
betnano giriş
betwild giriş
redwin giriş
safirbet giriş
safirbet giriş
betpark giriş
vegabet giriş
vegabet giriş
redwin giriş
vaycasino giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
realbahis giriş
realbahis giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
timebet giriş
timebet giriş
betpark giriş
hilarionbet giriş
hilarionbet giriş
parmabet giriş
parmabet giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
hilarionbet giriş
parmabet giriş
parmabet giriş
hazbet giriş
hazbet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
maxwin giriş
maxwin giriş
norabahis giriş
ikimisli giriş