जम्मू कश्मीर में हिन्दुओं के अस्तित्व का यक्ष प्रश्न-11

जम्मू कश्मीरगतांक से आगे…..

काला कानून क्रमांक-९

१९५४ में भारत सरकार ने धारा ३७० के आधार पर भारत के संविधान की धारा ३५ए जोड़ दी, जिसके अनुसार जम्मू कश्मीर में पाकिस्तान से आए हुए शरणार्थियों को मूल अधिकारों से वंचित रखा।

काला कानून क्रमांक-१०

धारा ७(२) जो लोग १९४७ में जम्मू कश्मीर से पाकिस्तान चले गये, यदि वे वापिस आना चाहें तो धारा ७(२) के अंतर्गत उन्हें वापिस आने की अनुमति मिल सकती है।

काला कानून क्रमांक-११

१९५४ में इसी धारा का सहारा लेकर धारा ६(२) लागू की गयी कि पाकिस्तान चले गये लोग विशेष परमिट लेकर पुन: जम्मू कश्मीर में आ सकते हैं। यह परमिट देने का अधिकार भारत सरकार के पास ही सुरक्षित रखा गया।

सरकारें आयीं और गयीं, हिंदू शरणार्थी नागरिक नही बन सके :

१९७६ के केन्द्र में जनता पार्टी सरकार के मंत्री सिकंदर बख्त ने इन शरणार्थियों से मिलकर कुछ आश्वासन दिये थे। आज तक उसका क्रियान्वयन नही हो सका।

फरवरी १९८१ में इन शरणार्थियों ने भारत पाक सीमा पर भूख हड़ताल की। भारत से मिले तिरस्कार सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें पाक सीमा में नही घुसने दिया। मार्च १९८१ में लोकसभा व राज्यसभा में भी यह मामला उठाया गया, सभी दलों ने हिन्दू शरणार्थियों को अधिकार दिये जाने की मांग का समर्थन किया। पुनर्वास मंत्री भागवत झा आजाद ने आश्वासन दिया कि इन शरणार्थियों को इनके मूल अधिकार दिलाए जाएंगे। आज तक इस दिशा में कोई भी सरकार कुछ भी नही कर सकी।

मार्च १९८२ में जम्मू से दिल्ली तक सैकड़ों शरणार्थियों ने पैदल मार्च किया। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें आश्वासन दिया कि उन्हें मानवाधिकार दिलाये जाएंगे। किंंतु आज तक वही ढाक के तीन पात।

काला कानून क्रमांक- १२

जम्मू कश्मीर सरकार ने १९८२ में पुनर्वास कानून बनाया जिसके अनुसार १९४७ में जम्मू कश्मीर छोडक़र पाक चले गये लोग यदि वापिस आना चाहें तो उन्हें उसी जमीन व मकान में बसाया जाएगा, जिसको छोडक़र वे १९४७ में चले गये थे। यह मामला भारत सरकार के पास आया तो सरकार ने राष्ट्रपति के पास विचारार्थ भेज दिया। राष्ट्रपति जी ने पुन: फारूख अब्दुल्ला सरकार को विचारार्थ भेज दिया।

भला हो भारत के सर्वोच्च सर्वोच्च न्यायालय का जिसके द्वारा इस कानून को अवैध बताते हुए अभी सन २००२ में इसे निरस्त घोषित कर दिया गया। अर्थात यहां भी न्यायालय का योगदान रहा। प्रदेश या केन्द्र सरकार के नेताओं का इसमें कोई योगदान नही है।

समस्या का समाधान :-

धारा ३५ (ए) तथा धारा ७(२) में भारत सरकार को संशोधन करना पड़ेगा। पहले इस सुविधा के लिए केवल दस वर्ष दिये गये थे, परंतु पाकिस्तानियों को भारत आकर जम्मू कश्मीर में बसने केे लिए यह दस वर्ष १९५७ में समाप्त हो जाने के बाद भी यह यह कार्यवाही २००२ तक (४५ वर्ष बाद तक) चलायी जाती रही।

हिंदुओं के साथ अन्याय, मुस्लिमों को सुविधा :

धारा ६(ख) (द्ब)(द्बद्ब) में सुविधा दी गयी है कि १९ जुलाई १९४८ से पहले जिन्होंने पाकिस्तान से भारत में प्रवजन किया वह भारत  का नागरिक बनने का अधिकार रखता है।

हिंदू शरणार्थियों को इस धारा के अनुसार जम्मू कश्मीर सहित भारत की नागरिकता मिलने का अधिकार प्राप्त था, परंतु जम्मू कश्मीर सरकार ने जानबूझकर इन अधिकारों का अपहरण कर लिया। परिणामस्वरूप ये दो लाख हिंदू शरणार्थी, जिनकी नयी संतति मिलाकर अब ५ लाख से भी अधिक हो गयी होगी, वे आज न भारत के नागरिक हैं और न पाकिस्तान के। इन्हें भारत की संसद के चुनावों मं वोटन् डालने का अधिकार तो प्राप्त है, परंतु जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनावों में ये वोट डालने के अधिकारी नही हैं।

भारत सरकार को चिंता है कि दक्षिण अफ्रीका में अश्वेत लोगों को पूर्ण मानवाधिकार दिलाये जाएं, भारत सरकार फिलिस्तीनियों को उनके अधिकार दिलाने के लिए जागरूक है, भारत सरकार ने सूडान में भी मानवाधिकारों की रक्षा के लिए संयुक्तराष्ट्र संघ के निर्देशन में अपनी सेना भेज रखी है, श्रीलंका में राजीव गांधी के समय भारतीय शांति सेना भेजी गयी और संघर्ष में हमारे हजारों सैनिकों का बलिदान भी हुआ, परंतु हमारी सरकार पाकिस्तान से १९४७ में भारन्त आए दो लाख शरणार्थियों को आज तक केवल इसलिए भारत का नागरिक नही बना सकी क्योंकि वे हिन्दू थे। क्रमश:

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