स्वयं का कर उद्घार तू, त्याग सभी अवसाद

depressedबिखरे मोती-77

गतांक से आगे….
स्वयं का कर उद्घार तू,
त्याग सभी अवसाद।
मत कोसै नित स्वयं को,
गीता को रख याद ।। 828।।

भगवान कृष्ण गीता में अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं-हे पार्थ! जो स्वयं (आत्मा) की शक्ति को पहचान जाते हैं वे स्वयं का उद्घार स्वयं करते हैं। उन्हें किसी भी प्रकार का अवसाद अथवा आत्महीनता घेरती नही है। अपने आपको कभी मत कोसो अर्थात गीता की इस बात को हीन मत समझो। याद रखो-तुम भी इस संसार में अपनी किस्म के एक फूल हो। तुमने अपने सौंदर्य और सुगंध से इस संसार की शोभा बढ़ानी है। हमेशा अच्छा सोचो, अच्छा होगा।
सर्वदा उत्साह से भरे रहो। यदि जीवन के किसी मुकाम पर हार भी जाओ तो हार कर भी कभी हिम्मत (धैर्य-साहस) मत हारो। इतना याद रखना कि यदि तुम्हारी हिम्मत का पैर उखड़ गया तो बीमारी, गरीबी दुर्भाग्य इत्यादि के पैर जम जाएंगे और यदि तुम्हारा धैर्य (हिम्मत-हौंसला) अंगद के पैर की तरह अडिग रहा तो, बीमारी, गरीबी दुर्भाग्य इत्यादि के पैर उखड़ जाएंगे और यह संसार आपको अपना प्रेरणा स्रोत मानेगा।

मुदिता करूणा उपेक्षा,
उर में मैत्री का भाव।
ब्रह्मा के ये मुख कहे,
जीवन के है पांव ।। 829।।

प्रत्येक व्यक्ति चाहता है कि मैं अपना जीवन सुख पूर्वक बिताऊं, आनंद के साथ रहूं। प्रसन्नता से जीवन जीने के लिए हमारे ऋषियों ने चार सूत्र दिये-मैत्री, मुदिता, करूणा, उपेक्षा। ये ब्रह्मा के चार मुख कहलाते हैं तथा सुखी जीवन के मूलाधार हैं।
संपन्न अथवा सुखियों के प्रति आपके हृदय में यदि मित्रता का भाव होगा तो ईष्र्या का विकार उत्पन्न नही होगा, बल्कि गर्व का भाव उत्पन्न होगा। संसार में जो जन दुखी हैं, उनके प्रति आपके हृदय में करूणा दया, उदारता का भाव होना चाहिए, मित्रता का नही। यदि आप उनसे मित्रता करेंगे तो स्वयं भी दुखी हो जाएंगे। इसके अतिरिक्त संसार में जो दुष्ट हैं, अथवा पापी हैं उनके प्रति आपके हृदय में उपेक्षा का भाव होना चाहिए। ऐसे लोगों से न तो मित्रता अच्छी है और न ही शत्रुता अच्छी है। अत: ऐसे लोगों से सर्वदा दूरी बनाकर रखो। सदैव मुदिता में रहिए अर्थात प्रसन्नचित्त रहिए। यदि इन चार सूत्रों का आप पालन करेंगे तो आप का जीवन सुख पूर्वक बीतेगा। आप आनंद में रहेंगे।

ज्ञान का नित भोजन करो,
कट जाएंगे शोक।
भयरहित विचरण करें,
लोक हो या परलोक ।। 830।।
भगवान कृष्ण ने गीता में अर्जुन को समझाते हुए कहा, ”हे पार्थ! यदि संसार के शोकों, दुखों से बचना है अथवाभय रहित रहना है तो नित्य नूतन ज्ञान का अर्जन करो। ऐसा आचरण करने पर मनुष्य इस लोक में ही नही अपितु परलोक में भी भयरहित रहता है। यह बात एक उदाहरण से और भी सरलता से समझ में आ जाएगी। एक रोगी अपनी बीमारी से भयग्रस्त रहता है, जबकि डाक्टर नही। क्योंकि डाक्टर को अमुक बीमारी के इलाज का ज्ञान है। इसलिए वह रोगी को उस बीमारी से बचाता है और हौंसला देता हुआ कहता है-घबराओ नही, ठीक हो जाओगे। ऐसा कहकर डाक्टर रोगी के टूटे हुए मनोबल अथवा उत्साह को पुनर्जीवित करता है। ठीक इसी प्रकार संसार के विभिन्न प्रकार के शोकों के निवारण का ज्ञान जिन्हें होता है, वे इस लोक में क्या परलोक में भी भयरहित रहते हैं। इसलिए नित्यप्रति विविध प्रकार के नूतन ज्ञान का अर्जन करते रहिए।

काठ से अग्नि न तृप्त हो,
जितना डालो बढ़ जाय।
पुरूष से स्त्री न तृप्त हो,
कितने ही लाड लडाय।। 831।।
क्रमश:

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