मोदी मंदिर: व्यक्ति पूजा की घातक प्रवृत्ति

modi mandirप्रमोद भार्गव

व्यक्ति विशेष के आदर्श व गुणों को जीवन में उतारने की बजाय उसका मंदिर बनाना और मूर्ति लगाकर पूजा-अर्चना करना अंधविश्वास को बढ़ावा देने के साथ चाटूकारिता का भी चरम है। कुछ ऐसा ही प्रपंच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कट्टर समर्थक रमेश उद्धव ने राजकोट में पांच लाख रुपए खर्च करके मंदिर बनाकर उसमें भव्य प्रतिमा भी लगा दी। लेकिन जब मंदिर खबरों की सूर्खियों में आया तो खुद मोदी ने न केवल मंदिर निर्माण पर नाराजगी जताई, बल्कि भारतीय परंपरा का हवाला देते हुए मंदिर निर्माताओं को नसीहत भी दी। कहा, ‘भारतीय संस्कृति और पंरपरा इसकी अनुमति नहीं देते। मंदिर निर्माण की इच्छा रखने वालों के पास समय और धन है तो वे इसका सदुपयोग ऐसे कामों में करें जिससे देश और समाज का भला हो।’ प्रधानमंत्री की इस नाराजगी के सार्वजनिक होते ही रोजकोट प्रशासन ने मंदिर से मोदी की मूर्ति को हटा दिया। यह उन अंधविश्वासियों के लिए कठोर संदेश है, जो जिंदा व्यक्ति के लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचने पर, चमचागिरी का चरम प्रस्तुत करने की दृष्टि से बेहूदी हरकतों का पाखण्ड रचते हैं।

हमारे देश में नामी हस्तियों के मंदिर बनवाना या उन्हें देवी-देवताओं के रुप में कैलेण्डर व पोस्टरों में प्रस्तुत करना कोई नई बात नहीं है, यह सिलसिला चलता ही रहता है। उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने तो स्वयं की और कांशीराम व बसपा के चुनाव चिन्ह हाथी की मूर्तियां अनेक उद्यानों में लगवा दी थीं। आजम खान, सपा प्रमुख मुलायम सिंह का मंदिर बनवाने की मांग कर रहे हैं। अमिताभ बच्चन और क्रिकेट खिलाड़ी सचिन तेंडुलकर के मंदिर बनाए जाने की खबरें भी आई हैं। दक्षिण भारत में तो फिल्म जगत के अनेक कलाकारों को लोग घरों व सार्वजनिक स्थलों पर मूर्ति लगाकर पूजते रहे हैं। मंदिर निर्माण में लगे इन भक्तों को नेता, अभिनेता और खिलाड़ी निर्माण की जानकारी मिलने के बावजूद, रोकते नहीं हैं। ऐसा करना उन्हें भक्तों की भावना से खिलवाड़ लगता है। ऐसा शायद पहली बार हुआ है कि व्यक्ति-पूजा के विरोध में नरेंद्र मोदी का विरोध इस तरह से सामने आया कि आखिर में प्रशासन को हस्तक्षेप करते हुए मंदिर से मोदी की मूर्ति हटाने को विवश होना पड़ा है। क्या अच्छा नहीं होता ऐसी ही नाराजगी मोदी महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे का मंदिर बनाने वालों पर भी जताते ? क्योंकि ऐसे कथित मंदिरों को न तो बहुसंख्यक हिंदू समाज स्वीकारता है और न ही दुनिया में हमारी छवि अच्छी बनती है। लिहाजा समय रहते व्यक्तिगत पाखंड से जुड़े ऐसे उपासना स्थलों पर राजकोट की तरह रोक लगाने की जरुरत है।

हमारे देश में राजनीतिझों का ईश्वरीय अवतार या दैवीय शक्ति के प्रतीकों के रुप में बदलने के मामले सामने आते ही रहते हैं। 2010 में इलाहबाद में एक कांग्रेस सभा में लगाए गए दो पोस्टरों में से एक में सोनिया गांधी को भारत माता और राहुल गांधी को चुनावी कुरुक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण के रुप में रथ पर सवार दिखाया गया था। इसी तरह सोनिया को मुरादाबाद में देवी दुर्गा के रुप में और फिर इसके तत्काल बाद 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की महान वीरांगना झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के रुप में पेश किया गया था। उस समय सोनिया की भी यह खूबी रही थी कि उन्होंने इन चित्रों पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई थी और इस चित्र-श्रंृखला को हरकत करार देते हुए कुछ कार्यकर्ताओं को पार्टी से निकाल भी दिया था।

लालकृष्ण आडवाणी ने जब सोमनाथ से आयोध्या तक की ऐतिहासिक रथ-यात्रा की थी, तब उन्हें भी कुरुक्षेत्र के विजयी योद्धा के रुप में भाजपाइयों ने महिमा-मंडित किया था। आडवाणी ने इस उपक्रम का विरोध नहीं किया था। लालू यादव जब लोकप्रियता के शिखर पर थे, तब उन पर हनुमान चालीसा की तर्ज पर ’लालू चालीसा’ लिखा गया था। तमाम उपहास उड़ाए जाने के बावजूद लालू चालिसा लेखन को लेकर प्रसन्नचित्त दिखते रहे। इसी तरह राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधराराजे सिंधिया को उनेक पहले कार्यकाल में जोधपुर से प्रकाशित एक कैलेण्डर में देवी अन्नपूर्णा के अवतार के रुप में दिखाया गया था। उस समय कैलेण्डर निर्माता यह भूल गए थे कि ये वही वसुंधरा हैं, जिन्होंने राजस्थान के अन्नदाताओं पर उस समय गोलियां बरसाईं थीं, जब वे गंगानगर में सिंचाई के लिए पानी की मांग करते हुए आंदोलित थे। मसलन कथित देवी अन्नपूर्णा ने उन्हीं किसानों पर बेरहमी बरती, जो अनाज उत्पादन के स्त्रोत हैं। इंदिरा गांधी की पाकिस्तान विजय पर अटलबिहारी वाजपेयी ने उन्हें देवी दुर्गा की संज्ञा देकर गौरवान्वित किया था। इस प्रसंग की आलोचना इसलिए नहीं होती, क्योंकि इंदिरा गांधी ने कुशल राजनीतिक और कूटनीतिक कौशल दक्षता तथा अदम्य दुस्साहस का परिचय देते हुए न केवल पाक को पराजित किया, बल्कि उसके टुकड़े करके स्वतंत्र राष्ट्र बांग्लादेश खड़ा कर दिया। वास्तव में यह वह समय था, जब भारत को एक सषक्त शक्तिशाली राष्ट्र की पहचान दुनिया में मिली और भारत का लोहा माना जाने लगा। यहां वाकई इंदिरा गांधी की देवी से तुलना करना सार्थक प्रतीकात्मकता है। सही मायने में व्यक्ति को देवी-देवता में बदलने के मोदी-मंदिर जैसे कथित प्रदर्शन छुटभैयों की सांस्कृतिक दरिद्रताओं का प्रदर्शन हैं। किसी नेता-अभिनेता के चरित्र में यदि कुछ चरित्रजन्य खूबियां हैं तो उन्हें अपनाकर अपने आत्मबल को मजबूत करने की जरुरत है। खूबियों को अपने आचरण व दिनचर्या में ढालकर उनके प्रगति-पथ का अनुसरण ध्येय होना चाहिए न कि मूर्ति लगाकर पूजा-अर्चना करना ? कांग्रेसियों ने महात्मा गांधी जैसे महापुरुष को पूजा की वस्तु बनाकर यही किया और कमोबेश ऐसा ही दलितों ने डॉ भीमराव आंबेडकर के साथ किया। पूजा के ये हथकण्डे किसी भी महान व्यक्ति के जीवन – दर्शन को अप्रासंगिक बना देने के थोथे उपाय भर हैं। लिहाजा चाटूकारिता की मोदी-मंदिर जैसी प्रवृत्तियों को पनपने से पहले ही नष्ट करने की जरुरत है। इस लिहाज से नरेंद्र मोदी ने चापलूसों द्वारा उन्हें देवत्व प्रदान करने के प्रयास को नकार कर एक उदात्त संदेश दिया है। वैसे भी भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में जीवित व्यक्ति का मंदिर बनाना निषेध है। मोदी ने यही आदर्श तब प्रस्तुत किया था जब उनकी जीवनी पाठ्क्रम में पढ़ाये जाने की पहल राजस्थान और गुजरात सरकारों ने की थी।

हमारे नेता मंदिर तो बहुत बड़ी बात है, अंधविश्वास से जुड़े टोने-टोटके और शुभ-अशुभ के प्रतीकों को भी नहीं नकार पाते। वाजपेयी जब प्रधानमंत्री बने थे, तब उनके बंगलें की संख्या बदलकर सात कर दी गई थी। क्योंकि हमारे कर्मकाण्डी दर्शन में सात और नौ के अंक विशेष रुप से शुभ माने जाते हैं। जब जयललिता मुख्यमंत्री थीं तो एक अंधविश्वास के चलते वे जब घर बाहर निकलती थीं तो अपनी कार से कद्दू कुचलाकर आगे बढ़ती थीं। कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने अंधविश्वास के चलते दुष्ट आत्माओं के प्रकोप से बचने के लिए तांत्रिकों के ताबीज भी गले में लटकाए थे। यही नहीं विधानसभा भवन का कथित वास्तुदोष दूर करने की दृष्टि से एक दरवाजा भी दीवार खड़ी करके चिनवा दिया गया था। ये बानगियां हमारे उन संसदीय नेताओं की हैं, जो ईष्वर को साक्षी मानकर धर्मनिरपेक्षता की शपथ तो लेते हैं, लेकिन आत्मिक अनुशासन का आदर्श उपस्थित करने में ज्यादातर असफल ही रहते हैं। वास्तव में प्रतीक और अनुष्ठान हमें कमजोर व विकलांग बनाने का काम करते हैं। ईश्वरीय और उनके प्रति कर्मकाण्डी अनुष्ठान आखिरकार यथार्थवाद या जमीनी हकीकत से पलायन के प्रतीक हैं न कि सार्थक पहल के? इसलिए व्यक्ति और व्यक्तिवादी संज्ञाओं की पूजा की प्रवृत्ति से नरेंद्र मोदी की तरह बचने की जरुरत है।

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