जीवन का पुनर्मूल्यांकन और जर्जर समाज

घनश्याम भारतीय
भारत गांवो का देश है, क्योंकि देश की अधिकांश आबादी गांवो में बसती है। इसलिए गांवो और ग्रामीणो की दशा सुधारने के लिए सरकार द्वारा कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से प्रयास तो किये जा रहे है परन्तु वह परिणाम सामने नही आ पा रहा है जो आना चाहिए। इसका अर्थ यह हुआ कि हम अपने अवदान के प्रति कही न कही अभिशप्त हैं। क्योंकि देने वाला महत्वपूर्ण तो है ही उसे लेने और उपयोग करने का तरीका भी महत्वपूर्ण होना चाहिए। यदि आसमान से हुई बारिश में तेजाब घोलकर फसलों व अन्य वनस्पतियों का सिंचन करे और हरे-भरे सुन्दर जीवन की कल्पना भी करे तो क्या यह सम्भव हो पायेगा ? वास्तव में आज जीवन के पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता है परन्तु वह सामाजिक जर्जरता के चलते सम्भव नहीं हो पा रहा है।
शदियों से जर्जर चली आ रही चीन की सामाजिक व्यवस्था को एक माओत्से तुंग ने अल्पसमय के प्रयास में परिवर्तित कर दिया। परिणाम यह हुआ कि आज चीन जीवन के हर क्षेत्र में बादशाह बना हुआ है। आज भारत में भी एक माओत्से तुंग जैसे व्यक्ति की आवश्यकता है। जो जर्जर सामाजिक व्यवस्था को बदल सके। एक उठा हुआ समाज हमेशा अच्छे लोगों को पैदा करता है। जहां कभी भी किसी तरह की तंगी नही होती। अबुध कुटुम्बी ही धनहीन होतें है। जिनको अपनी भुजाओं पर विश्वास है, जिनमें एक आत्मिक उत्कर्ष है वे स्वयं तो आसानी से जीवन जीते ही है, उनके पीछे एक परिवार का अच्छे ढंग से गुजर-बसर हो जाता है। यही परिवार समाज को एक दिशा देता है। समाज में ऐसे भी लोग है जो जहाज बनाने की नहीं सोच सकते परन्तु कच्ची शराब खूब बनाते हैं। इन्ही लोगों की बदौलत यदि जहाज पर उडने का शौक किया गया होता तो वह शौक स्वप्न बनकर रह गया होता। उठा हुआ समाज आइंस्टीन, सुकरात, प्लेटो तथा ह्विटमैन पैदा करता है जबकि गिरा समाज तमाम सुल्ताना व लादेन पैदा करता हैं। जो समाज व राष्ट्र के लिए अशुभ संकेत है।
सवाल यह उठता है कि हमारी सामाजिक व्यवस्था जर्जर क्यों है ? उसमें सुधार क्यों नहीं हो पा रहा है ? वास्तव में अन्तर्राष्ट्रीय परिवेश में ऊपर उठे उन्नत देशों को सामने रखकर सोचने की आवश्यकता है। पुनर्मूल्यांकन की कमी, रूढियों का अधिपत्य, भ्रष्टाचार, धार्मिक, झूठी आस्थाओं का प्रकोप, गहन सामाजिक बोध शून्यता, गिरा हुआ शिक्षा का स्तर, अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वयं को न सोच पाने की कमजोरी तथा नयी उद्भावनाओं के लिए क्रांति की कमीज्। जीवन से जुडी ये तमाम ऐसी कडियां है जो हमारे पूरे समाज को अनावश्यक असभ्यता के दलदल में फसाये हुए हैं। तमाम ऐसे उत्तर हैं जो सदियों से हमारे सिरहाने सोयें है परन्तु वैचारिक अपकर्ष एवं रूढियों के कारण हमें मिल नही पाते। एक दृष्टि हीन समाज सदियों धूप में जलने के बाद भी बगल में पडी छाया का उपयोग नही कर पाता। अपनी अपसंस्कृतियों से जुडने के कारण कभी-कभी हम अनावश्यक संघर्षो के शिकार भी हो जातें है और अपने पास आने वाली जीवन से जुडी शांति की लहरों से वंचित भी रह जाते हैं।
आज यह देखा जाना आवश्यक है कि कहां जीवन मूल्यों से जुडकर एक नयी शक्ति का अपने में उदय पा रहे और कहां सडी गली मान्यताओं को लेकर पराभव की तरफ जा रहे है। जिन सामाजिक विसंगतियों ने हमारे लिए अतीत में अवरोध का काम किया, उन्हे जीवन की राहों से टालना भी आवश्यक है। जीवन का यही पुनर्मूल्यांकन हमारे लिए एक नया मार्ग प्रशस्त करेगा। इसके द्वारा ही हम अपने आर्थिक सामाजिक व मानवीय रिश्तों को आसानी से मजबूत कर सकेगें। इसी की कमी के कारण हम सैकडो वर्ष अंधेरे में भटकने के बाद भी उजाले की तलाश में आगें नही बढ पा रहे है।
जिन्दगी में व्याप्त रूढियां हमे सही दिशा बोध से वंचित रखती है। तमाम क्षति के बाद भी अपने पैरो में पड़ी बेडिय़ों को हम इसी नाते नहीं काट पाते क्योंकि वह हमें पैतृक विरासत में मिली होती हैं। उनसे हमारा रागात्मक अनुबंध बन चुका होता है। आज रूढिय़ों से जुड़ी विसंगतियां जिन्दगी में अंलकरण की तरह सजा ली गयी हैं। जिससे संवरने के बजाय जिन्दगी विद्रूपता का शिकार हो गयी है। जब मन ही स्वस्थ नहीं होगा तब सोचने की क्रंाति कहां से पैदा होगी। मोह के चलते हानियों के बाद भी हम विसंगतियों का परित्याग नहीं कर पा रहे हैं। यदि इनसे मुक्ति मिल जाये तो सही दिशा निर्धारण होगा जो मजबूत समाज के लिए आवश्यक है।
हमारी संस्कृति में बढ़े स्वार्थवाद से इमानदारी शर्मिन्दा हुई है। इससे मजबूती से जुडे लोग अपने लोगों से काफी दूर होते जा रहे हैं। स्वहित में समाज को कुर्बान करने वाले लोग राष्ट्र के लिए एक बूंद पसीना भी नहीं बहाना चाहते। जिससे भ्रष्टाचार को बढावा मिलता है। स्वार्थ और भ्रष्टाचार में चोली दामन का साथ हो चुका है। जिससे राजनीति भी प्रभावित हुई है। आज तो सियासत को भ्रष्टाचार की जननी कहा जाना चाहिए। जहां जनभावनाओं के साथ खिलवाड़ कर पहले समाज व राष्ट्र विरोधी कदम उठाये जाते हैं और फिर उन पर घडियाली आंसू बहाना गौरव भी समझा जाता है। सन्ता के लिए हर कदम को जायज ठहराया जा रहा है। उद्योगपतियों को खुश करने के लिए मंहगाई को बढ़ावा दिया जा रहा है। खादी और खाकी रास्ते से भटक गयी हैं। व्यक्ति समाज की इकाई होता है। जब वही भ्रष्ट होगा तो समाज कैसा होगा ? समाजवाद के पुरोधा डॉ0 राम मनोहर लोहिया ने राजनीति को अल्पकालीन धर्म और धर्म को दीर्घकालीन राजनीति बताया है। इसके बावजूद ’’अश्वथामा मरो, नरो या कुंजरो’’ के धार्मिक छद्म से आगे बढकर सियासी छद्म में आज हमारा समाज आंखो में पिपरमेंट लगाकर आंसू दिखाने की निम्न स्तरीय प्रक्रिया तक पहुंच चुका है।

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