भारत का वास्तविक राष्ट्रपिता कौन ? श्रीराम या ……. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पुरोधा श्रीराम, अध्याय – 10 ख – श्रीराम के विशेषण और विशेषता

images (93)


रामचंद्र जी को शत्रुओं का नाश करने वाला , प्रतापी , पराक्रमी अर्थात जिसका नाम सुनने से ही शत्रु के ह्रदय फट जाते हैं, ऐसा विशेष पराक्रमी, शत्रुओं का पराभव करने वाला, जिसका धनुष बहुत बड़ा है, जिसके पास उत्तम से उत्तम अस्त्र शस्त्र हैं , जिसके क्रुद्ध होने पर देव भी घबरा जाते हैं, क्रोध आने पर जो अग्नि के समान दीखता है, जो विद्वान है, ज्ञान संपन्न है , विचक्षण अर्थात आत्मा, अनात्मा इन सब पदार्थों के तत्वों का जानने वाला है, जो बुद्धिमान है ,उत्तम बुद्धि से युक्त है, स्मृतिमान अर्थात स्मरण शक्ति से युक्त है, धनुर्वेद का उत्तम ज्ञाता है जो वीर्यवान, महावीर है ,जिसका पराक्रम बहुत बड़ा है, जो पराक्रम में विष्णु के समान है, जो सत्य भाषण करने वाला है, जो उत्तम वक्ता है ,जिसका शरीर बहुत सुंदर है, जो उत्तम मस्तक वाला है, जिसका ललाट बहुत अच्छा है, जो बड़े बड़े बाहुवाला है, घुटनों तक जिसके लंबे लंबे हाथ हैं, जैसे विशेषणों से संबोधित किया गया है। श्रीराम के इन्हीं गुणों ने उन्हें हमारे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का पुरोधा बनाने में सहायता प्रदान की। इन गुणों को लेकर वह भारतीय संस्कृति और धर्म की रक्षा के लिए कार्य करते रहे। श्रीराम पर मैथिलीशरण गुप्त जी की यह पंक्तियां कौन से प्रकट होती हैं :-

देखी मैंने आज जरा।
क्या ऐसी ही हो जाएगी मेरी यशोधरा ?
क्या मिट्टी में मिल जाएगा वर्ण सुवर्ण खरा ?
धिक ! मेरे रहते जो मेरा चेतन जाए हरा ।।

जैसे विशेषण श्री राम जी के लिए उपरोक्त कथन में दिए गए हैं वैसे विशेषण किसी साधारण व्यक्ति के लिए नहीं दिए जा सकते। जिसने अपने जीवन में आतंक ,आतंकवाद और आतंकवादियों को मिटाने का संकल्प लिया हो और जो समग्र भूमंडल पर शांति स्थापित करने के महाव्रत को धारण करके चलने वाला हो, ऐसे महावीर ,पराक्रमी ,शौर्यसंपन्न व्यक्तित्व को ही इन विशेषणों से संबोधित किया जा सकता है।
       भारत की वर्तमान राजनीति में किसी भी राजनीतिज्ञ को ब्रह्मचर्यव्रतधारी, जितेन्द्रिय, वैदिक विद्वान, धार्मिक और वेदों के प्रकांड पंडित जैसे विशेषणों से नहीं पुकारा जाता है। जिसका कारण केवल एक ही है कि हमने उन लंपट, बदमाश, अत्याचारी और निर्दयी शासकों को पढ़ते – पढ़ते अपने शासकों के दिव्य गुणों को पूर्णतया विस्मृत कर दिया है जो मध्य काल में तुर्क, मुगल और बाद में अंग्रेजों के नाम से जाने गए। वर्तमान राजनीति इन्हीं मध्यकालीन शासकों को अपना आदर्श मानकर चल रही है। क्योंकि महात्मा गांधी जैसे व्यक्ति के लिए यदि इतिहास में कोई आदर्श व्यक्तित्व है तो वह मुगल बादशाह औरंगजेब है और गांधीजी वर्तमान राजनीति के आदर्श हैं।
हमारे शासकों के लिए ब्रह्मचर्यव्रतधारी ,जितेंद्रिय आदि शब्द जब प्रयोग किए जाते थे तो उससे उनके व्यक्तित्व और कृतित्व दोनों का बोध होता था। वह कैसा गरिमा युक्त जीवन जीते थे ?– इस बात का पता चलता था। उनकी महानता का पता चलता था ।इन शब्दों की चोरी कब हो गई या भारतीय लोकतंत्र के राजपथ पर चलने वाली गाड़ी के ये शब्दरूपी पुर्जे कब ढीले हो कर कहां गिर गए ? – कुछ पता ही नहीं चला। ऐसा नहीं है कि राजनीति में आज शब्दों का टोटा है , शब्द तो आज भी हैं परंतु कोई व्यक्तित्व ऐसा नहीं है जिन पर यह शब्द पूर्णतया लागू हो जाएं।
इससे स्पष्ट हो जाता है कि वर्तमान राजनीति कितनी पतित हो चुकी है? भारतवर्ष राम के आदर्श व्यक्तित्व को अपने लिए पूजनीय तो मानता है परंतु व्यवहार में स्वीकरणीय नहीं मानता।
मूर्ति पूजा का यही सबसे बड़ा दोष है।
  हमें रामचंद्र जी के जीवन का मूल्यांकन करते समय यह भी ध्यान रखना चाहिए कि वह जितने दिव्य और महान थे उतने ही उनके माता-पिता भी दिव्य और महान थे। उनके माता-पिता ने संतान की कामना से पुत्रेष्टि यज्ञ नहीं कराया था, अपितु धीर ,वीर, गंभीर , धार्मिक विद्वान और इच्छित संतान प्राप्त करने के लिए उन्होंने पुत्रेष्टि यज्ञ ऋषि श्रृंग की अध्यक्षता में संपन्न कराया था। उन्हें संतान तो बिना ऐसा यज्ञ कराये भी हो सकती थी, परंतु उस समय जिस प्रकार सूर्यवंशी राजाओं के साम्राज्य को बहुत सीमित करते हुए शत्रु राक्षस देश और भूमंडल पर अपना साम्राज्य बढ़ाते जा रहे थे, उसके दृष्टिगत उन्हें ऐसी संतान की आवश्यकता थी जो न केवल सूर्यवंश की पुरानी यशस्वी परंपरा को स्थापित कर सके बल्कि साम्राज्य को ग्रहण लगाती चली जा रही राक्षस शक्ति का अंत भी कर सके।
      रामचंद्र जी की माता कौशल्या देवी को जैसे ही यह आभास हुआ कि वह गर्भवती हो चुकी हैं तो उन्होंने स्वयं को ऋषियों के संसर्ग और संपर्क में रखने के लिए राजभवनों को त्याग दिया था और वनों में जाकर सात्विक परिवेश और सात्विक खानपान के माध्यम से रामचंद्र जी जैसे सुयोग्य पुत्र और महानतम शासक महावीर को उत्पन्न किया। जिसका मूल सशक्त, समर्थ और शाश्वत होता है, उसका फल भी वैसा ही होता है। इनसे पता चलता है कि रामचंद्र जी के माता-पिता के अपने संस्कार भी ऐसे ही बन चुके थे कि वे राष्ट्र रक्षा, संस्कृति रक्षा और धर्म रक्षा करने वाली सुयोग्य संतान चाहते थे।
उस समय की परिस्थिति परिवेश में चुनौती पैदा कर रही थी। उस चुनौती को दशरथ स्वीकार कर चुके थे। उसी के दृष्टिगत उन्होंने रामचंद्र जी जैसे धर्म रक्षक, संस्कृति रक्षक और  राष्ट्ररक्षक पुत्र की इच्छा की।

पुत्रेष्टि याग रचाकर धर्म रक्षक पुत्र उत्पन्न किए।
अनमोल मिले हीरे सारे मात-पिता ने पुण्य किए।।
स्वार्थभाव ना तनिक भी उनमें राम सभी से न्यारे।
मर्यादा की डोर पकड़ ली बने धर्म के प्रिय सारे ।।

संतान के निर्माण के संबंध में हमें यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि जब संतान उत्पन्न हो जाती है तो उसके बाद माता – पिता उसे उस समय उतने संस्कार नहीं देते, जितने उसे गर्भावस्था काल में माँ के द्वारा दे दिए जाते हैं। उससे भी पहले जब गर्भाधान संस्कार होता है तो उस समय जो संस्कार दिए जाते हैं वह तो और भी अधिक प्रबल होते हैं। क्योंकि उसी समय के संस्कार बीज का निर्माण करते हैं और वह बीज ही आगे वृक्ष से महावृक्ष बनकर देश -धर्म और संस्कृति का संरक्षक बनता है। माता कौशल्या और पिता दशरथ जिस संस्कार बीज को डाल रहे थे, वह विभाजनकारी शक्तियों के विनाश के लिए डाला गया बीज था, जो संयोजन में विश्वास रखता था। वह एकीकरण के समीकरण से राष्ट्रीयकरण की प्रक्रिया को पूर्ण करने वाला बीज था । कोई आश्चर्य नहीं कि रामचंद्र जी ने जब अपने जीवन में इन्हीं महान कार्यों का संपादन किया तो उसके पीछे उनके माता-पिता के यही संस्कार प्रमुख कारण थे।
   आज हमारे देश में संयोजनकारी सृजनात्मक शक्तियों का अभाव होता जा रहा है। संयोजन से सृजनशील ऊर्जा प्रवाहित होती है। जिस जीवन से संयोजन और सृजनशक्ति विनष्ट हो जाती है वह जीवन निरर्थक हो जाता है। उसकी सार्थकता भंग हो जाती है । मनुष्य की संयोजनात्मक, सृजनात्मक और सकारात्मक शक्तियों का हनन और पतन करने में विघटनकारी शक्तियां निरंतर प्रयासशील रहती हैं। आज यही शक्तियां देश के विनाश और विभाजन के बीज निरंतर बिखेरती जा रही हैं। उन विखंडनकारी बीजों का संचयन करने वाले लोग भी तेजी से बढ़ रहे हैं अर्थात विभाजनकारी प्रक्रिया समापन की ओर नहीं बल्कि और भी अधिक विस्तार प्राप्ति की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है। जो कि देश के सँयोजनकारी लोगों के लिए चिंता का विषय है। ऐसी परिस्थितियों के लिए एकमात्र कारण यही है कि देश का मूल अर्थात माता-पिता का चिंतन विकृत हो गया है।       
      पुत्रेष्टि यज्ञ की प्रक्रिया पूर्णतया बंद हो गई है और परिवार से लेकर राष्ट्र तक के विभाजन की मानसिकता रखने वाले माता-पिता विभाजनकारी और विखण्डनकारी संतान को दिन प्रतिदिन बड़ी मात्रा में पैदा करते जा रहे हैं । सर्वत्र विनाश के बीज बिखर रहे हैं और हम अपेक्षा कर रहे हैं कि हमें सुयोग्य संतान प्राप्त हो।
ऐसा नहीं है कि देश के तथाकथित बुद्धिजीवी ह्रास की इस प्रक्रिया के मूल को जानते नहीं हैं, वे सब जानते हैं, परंतु उनका उद्देश्य भारत को उसके मूल से जोड़ना नहीं है बल्कि भारत की दिशा और दशा को बिगाड़ना उनका उद्देश्य है। इसलिए भारत के मूल से जोड़ने वाली प्रक्रिया और शिक्षा प्रणाली को सांप्रदायिक शिक्षा प्रणाली कहकर उसे उपेक्षित करने के भारी षड़यंत्र रचे जाते हैं। इन षड़यंत्रों की गहरी और मोटी परतों के नीचे रामचंद्र जी और भारत का गौरवमयी अतीत कहीं दबकर रह जाता है। दशरथ और कौशल्या का त्याग ,बलिदान और उनका उच्च संस्कार कहीं छुपा दिया जाता है और माता कौशल्या का राम के निर्माण में दिया गया भारी योगदान विस्मृति के गहरे गड्ढे में डाल दिया जाता है।

राज भी गहरे,
दाग भी गहरे,
चारों ओर लगे हैं पहरे,
  कौन समझेगा बोल मेरे ?
कौन-कौन है कहां छिपे ?
जटिलता में कौन घिरे ?
देश की धड़कन बोले राम !
राजघाट भी कहता ‘हे राम ‘!

  इस प्रकार की निराशाजनक परिस्थितियों के निर्माण में आज के तथाकथित राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का महत्वपूर्ण योगदान है । क्योंकि उन्होंने स्वयं ने जब 1937 में भारत की भावी शिक्षा नीति का निर्माण करवाया था तो उसमें राम और उनके चरित्र को काल्पनिक मानकर पाठ्यक्रम से बाहर कर दिया था  जबकि मुस्लिमों के धर्म गुरुओं को उसमें रखने की व्यवस्था की गई थी। जिनकी शिक्षा पूर्णत: सांप्रदायिक थी उन्हें हमारे लिए पूजनीय माना गया और जिनकी शिक्षाएं मानवीय थीं उनके सारे चिंतन और और उनकी महानतम विचारधारा को हमारी नजरों से ओझल कर दिया गया। जब आतंकवाद और आतंकवादियों को ही आदर्श मानकर पढ़ाया व समझाया जाएगा तो देश की युवा पीढ़ी आतंकवाद और आतंकवादियों को ही अपना आदर्श मानकर चलेगी। उनके अनुसार ही अपना कार्य व्यवहार निष्पादित और संपादित करेगी।
देश की आतंकवादी शक्तियां अहिंसावादी गांधी के देश में जब तलवार की बातें करती हैं तो उन्हें वीरता का प्रतीक माना जाता है और जब रामचंद्र जी की परंपरा में विश्वास रखने वाले लोग देश से आतंकवाद और आतंकवादियों के विनाश की योजनाओं पर काम करते हैं या इस प्रकार के भाषण देते हैं तो उन्हें सांप्रदायिक और देश के लिए विघटनकारी कहकर तिरस्कृत किया जाता है। रामराज्य के समर्थक रहे गांधी जी की अहिंसा भी रामचंद्र जी की वीरता को कभी स्वीकार नहीं कर सकी। वह सदा दोगली बातें करती रही और दब्बू राष्ट्र के निर्माण के लिए भाषण देती रही। किसी दोगली और छद्मवादी नीति से भारत में तथाकथित गंगा -जमुनी -संस्कृति का निर्माण करने का भ्रम पाला गया जो आज इस देश के लिए विनाश का कारण बनती जा रही है।

(हमारी यह लेख माला मेरी पुस्तक “ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पुरोधा : भगवान श्री राम” से ली गई है। जो कि डायमंड पॉकेट बुक्स द्वारा हाल ही में प्रकाशित की गई है। जिसका मूल्य ₹ 200 है । इसे आप सीधे हमसे या प्रकाशक महोदय से प्राप्त कर सकते हैं । प्रकाशक का नंबर 011 – 4071 2200 है ।इस पुस्तक के किसी भी अंश का उद्धरण बिना लेखक की अनुमति के लिया जाना दंडनीय अपराध है।)

  • डॉ राकेश कुमार आर्य
    संपादक : उगता भारत एवं
    राष्ट्रीय अध्यक्ष : भारतीय इतिहास पुनर्लेखन समिति

  

Comment:

Kuponbet Giriş
betgaranti giriş
Teknik Seo
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
milanobet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
winxbet giriş
winxbet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
safirbet giriş
ikimisli giriş
ikimisli giriş
safirbet giriş
ikimisli giriş
safirbet giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
milanobet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
safirbet giriş
safirbet giriş
betpark giriş
ikimisli giriş
betnano giriş
betpas giriş
betpas giriş
safirbet giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betasus giriş
betasus giriş
betpark giriş
betpark giriş
hitbet giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
ikimisli giriş
savoybetting giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
grandpashabet giriş
betorder giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
betpas giriş
betpas giriş
betorder giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
betgaranti giriş
betnano giriş
betpark giriş
galabet giriş
galabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpas giriş
betpas giriş
betorder giriş
betorder giriş
betnano giriş
betnano giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
betnano giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betpas giriş
betorder giriş
betnano giriş
betnano giriş
mariobet giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betnano giriş
betnano giriş
betper giriş
rekorbet giriş
betnano giriş
betticket giriş
betnano giriş
betper giriş
betpark giriş
betpark giriş
savoybetting giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
jojobet giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vaycasino
vaycasino giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpas giriş
betpas giriş
betorder giriş
betorder giriş
betpas giriş
betpas giriş
betorder giriş
betorder giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betnano giriş
betnano giriş
restbet giriş
safirbet giriş
betnano giriş
restbet giriş