शिवराज को घेरने वाले दिग्विजय अब खुद घिर गये लगते हैं

वीरेन्द्र सिंह परिहार

ब्यापम घोटाले को लेकर प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की घेराबन्दी करनें वाले प्रदेश के भतूपूर्व मुख्यमंत्री एवं कांग्रेस पार्टी के बड़बोले नेंता दिग्विजय सिंह स्वत: कुछ ऐसे घिर गये हैं कि निकलने का रास्ता शायद ही मिल सके। उल्लेखनीय है कि दिग्विजय सिंह वर्ष 1993 से वर्ष 2003 तक सतत् दस वर्षों तक प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। कम – से – कम शिवराज सिंह पर ऐसा कोई आरोप नहीं है कि उन्होनें नियमों को शिथिल करके या नियम – विरूद्ध ढ़ंग से स्वत: किसी को नौकरी मे रखवा दिया हो । लेकिन दिग्विजय सिंह पर अव यह मात्र आरोप नहीं है बल्कि प्रमाणित है कि उन्होनें लोगों को स्वत: नियम-विरूद्ध तरीके से नौकरियां दिलर्वाइं या दीं। अभी हाल में म.प्र. उच्च न्यायालय नें दिग्विजय सिंह द्वारा सारे नियमों को शिथिल करके दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी को उपयंत्री बनाये जानें संबंधी जारी किये गये आदेश को खारिज कर दिया। चीफ जस्टिस ए.एम. खानविलकर और जस्टिस के.के. त्रिवेदी की युगल पीठ नें उपरोक्त आदेश के साथ प्रदेश के मुख्य सचिव को यह भी आदेशित किया है कि वे इस मामले के दोषियों के खिलाफ सख्ती से कार्यवाही करें। इसके साथ ही युगलपीठ नें अपनें आदेश में यह भी कहा है कि सभी विभागों में नियमों को शिथिल कर पिछले दरवाजों से की गई नियुक्तियों की जांच कर रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत करें।

उल्लेखनीय है कि नगर पंचायत मऊगंज के तत्कालीन पार्षद मनसुखलाल सराफ की ओर से वर्ष 1999 में एक जनहित याचिका दायर की गई थी । जिसमें यह कहा गया था कि अरूण कुमार तिवारी की नियुक्ति रीवा जिले के मऊगंज नगर पंचायत में दैनिक वेतन भोगी के रूप में वर्ष 1990 में हुई थी। पर अरूण कुमार की नियम विरूद्ध ढ़ंग से पदोन्नति कराई गई और आखिरकार 3 अप्रैल 1995 में उसे उपयंत्री बना दिया गया। इस पर वर्ष 1995 में ही इस आदेश को चुनौंती दी गई और म.प्र.  उच्च न्यायालय जबलपुर नें 11 सितम्बर 1997 को अरूण कुमार तिवारी की पदोन्नति को अवैध ठहराते हुये निरस्त कर दिया था। इतना ही नहीं उसे दैनिक वेतन भोगी के पद पर ही बहाल करने के आदेश दिये थे। चूंकि अरूण तिवारी तत्कालीन जिला पंचायत अध्यक्ष श्रीमती मंजूलता तिवारी के पति थे और मंजूलता तिवारी तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी की खास थीं। ऐसा माना जाता है कि श्रीमती मंजूलता तिवारी को जिला पंचायत रीवा का अध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी ने ही बनाया था। चूंकि उस समय श्रीनिवास तिवारी की रीवा में तूती बोलती थी। दिग्विजय सिंह खुले मंचों में कहते थे कि मैं प्रदेश का मुख्यमंत्री जरूर हूं, पर रीवा के मुख्यमंत्री श्रीनिवास तिवारी ही हैं, इतना ही नहीं वह उन्हें गुरूदेव कहकर सम्बोधित किया करते थे। इस तरह से दादा श्रीनिवास तिवारी रीवा जिला के एक छत्र बादशाह थे। स्थिति यह थी कि किसी थाना प्रभारी की यह हिम्मत नहीं थी कि दादा अर्थात श्रीनिवास तिवारी की अनुमति के बगैर गंभीर-से-गंभीर प्रकरण में भी एफ.आई.आर दर्ज कर ले। अस्तित्व रक्षा के लिये जिले के बड़े से बड़े अधिकारी भी दादा को साष्टांग दंण्डवत करते थे। उनके समर्थक यह नारा ही लगाते थे कि ‘‘दादा न होय दऊ आ, वोट न देवे तऊ आय’’। खैर उस जमानें में दादा को लेकर तरह-तरह के किस्से अब तक प्रचलित हैं। जैसे एक समय दादा के एक समर्थक नें किसी महिला से वीभत्स ढ़ंग से बलात्कार किया और वहां का थाना प्रभारी दौड़ते हुये दादा के पास रीवा आया कि एफ.आई.आर. दर्ज करें कि नहीं, दादा का हुक्म था कि वह मेरा आदमी है, भला उसके विरूद्ध एफ.आई.आर. कैसे दर्ज हो सकती है। किसी ने एक और किस्सा इस लेखक को सुनाया। रीवा के नजदीक रमपुरवा गांव में दादा के सुपुत्र वर्तमान विधायक सुन्दरलाल तिवारी का फार्म हाउस है । किसी पिछड़े जाति के कृषक की भूमि उनके फार्म हाउस के बीच पड़ती थी। स्वाभाविक है कि इससे दादा के पुत्र को बड़ी असुविधा हो रही थी। संयोग से उस कृषक की बहू बीहर नदी में गिरकर मर गई। बस दादा को मौका मिल गया, और उस कृषक समेत उसकी पत्नी, पुत्र सभी को अंदर करा दिया। वह परिवार पुलिस की गिरफ्त से तभी छूटा, जब फार्म हाउस के बीच में स्थित अपनी जमीन उसने सुन्दरलाल को दे दिया।

इस तरह से जब उच्च न्यायालय द्वारा अरूण कुमार तिवारी को उपयंत्री की पदोन्नति निरस्त कर दी गई तो दादा जो अपने को दऊ अर्थात सबसे ऊपर मानते थे, उन्होंने अरूण कुमार तिवारी की नियुक्ति तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के माध्यम से 21 मई 1998 को जल संसाधन विभाग में उपयंत्री के पद पर करा दी। जिस पर मनसुखलाल सराफ द्वारा इस आदेश के विरूद्ध मान्नींय उच्च न्यायालय में पुन: याचिका प्रस्तुत की गई। जिस पर युगलपीठ ने दिनांक 07.08.2015 को अपनें आदेश में कहा कि दैनिक वेतन भोगी के रूप में नियुक्ति अरूण कुमार तिवारी की सीधी भर्ती नहीं हो सकती थी। मुख्यमंत्री की नोटशीट में किसी ऐसे कानून की भी जिक्र नहीं है, जिसके तहत सरकार उनकी नियुक्ति इस तरह से कर सके। उच्च न्यायालय की युगलपीठ ने प्रदेश के मुख्य सचिव को निर्देशित किया है कि सभी संबंधित विभागों के प्रमुख सचिवों से 4 सप्ताह के भीतर जांच कराकर रिपोर्ट बुलायें। जांच में यह पता लगाया जाये कि कितने आयोग्य कर्मचारियों को पिछले दरवाजे से नियुक्तियां देकर लाभान्वित किया गया । उक्त रिपोर्ट का परीक्षण कर चार सप्ताह के भीतर उक्त रिपोर्ट को हाईकोर्ट में प्रस्तुत किया जाये।

यह मामला सिर्फ एक नियुक्ति का नही है। बल्कि इस तरह से और भी कई नियुक्तियां सामने आई हैं। विधानसभा में इस तरह की कई नियुक्तियों को लेकर कई लोगों के विरूद्ध प्रकरण पंजीबद्ध है, जिनको अभी हाल मे म.प्र.  उच्च न्यायालय द्वारा जमानत दी गई है। स्वत: श्रीनिवास तिवारी को जमानत हेतु सर्वोच्च न्यायालय तक जाना पड़ा, अलबत्ता इस प्रकरण में मुख्यमंत्री की हैसियत से दिग्विजय सिंह से पूछ-ताछ होना अभी बाकी है। इसके अलावा भी अपने मुख्यमंत्री कार्यकाल में भी दिग्विजय सिंह द्वारा कई नियुक्तियां नियमों को शिथिल कर दिये जानें की जानकारी सामने आई है। आश्चर्य जनक तथ्य यह है कि उस दौर मे दिग्विजय सिंह ने इस तरह से जितनीं अवैध नियुक्तियां स्वत: की, करीब उतनी ही दादा अथवा गुरूदेव श्रीनिवास तिवारी के कहने पर किया। क्या इसका मतलब यह नहीं निकाला जाना चाहिये कि दिग्विजय सिंह किसी भी तरह दादा को खुश रखना चाहते थे, ताकि विधानसभा की पूरी कार्यवाही उनके सुविधानुसार चले। इसी के चलते अवैध नियुक्तियों के साथ वह दादा को ‘रीवा जिला पूरी तरह छोड़े हुये थे, ताकि ‘‘खुला खेल फर्रूखावादी’’ की तर्ज पर वह खेल सके, और खेला भी। अब इस तरह से बेनकाब होने पर काँग्रेसी शिवराज सिंह पर माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल मे भी कुछ ऐसी नियुक्तियों का आरोप लगा रहे हैं।

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