उपरिलिखित निर्देश हमारे हिन्दू समाज की भीतरी दुरावस्था की ओर संकेत करते हुए हमें उस समय की वास्तविकता से परिचित कराते हैं।

स्वतन्त्र भारत में हमें भारत के नवनिर्माण के लिए इस दुरावस्था को दूर करने के लिए लड़ाई लडऩे की आवश्यकता थी उससे हमने मुँह फेर लिया। हमने सामाजिक विकृति के विरूद्घ एक आन्दोलन खड़ा करने के स्थान पर इस सामाजिक विकृति को राजनीति का अस्त्र बनाकर प्रयोग करना आरम्भ कर दिया। राजनीति कर्तव्य धर्म को पहचानने वाली न होकर भावनात्मक नारों और भावनात्मक अभिवादनों में उलझकर रह गयी। समय ने सिद्घ कर दिया कि जातिवाद और गरीबी को मिटाने के लिए कांग्रेस का गरीबी हटाओ का नारा असफ ल रहा। सांझे प्रयास करने की राजनीतिक इच्छा शक्ति कहीं भी दिखायी नही दी।

आजकल हमारे राजनीतिज्ञों की मानसिकता ये रहती है कि समस्याओं को उलझाओ, सुलझाओ नही। क्योंकि यदि ये सुलझ गयीं तो हमारी राजनीति समाप्त हो जायेगी। हमारा मानना है कि आजकल जब देश में गठबन्धनों की सरकारें बन रही हैं और सरकारें न्यूनतम सांझा कार्यक्रम पर कार्य कर रही हैं, तो ‘दलितोत्थान के कार्यक्रम को अपना न्यूनतम सांझा’ कार्यक्रम क्यों नही बनाया गया। कु. मायावती भी नहीं चाहतीं कि इस दिशा में सभी राजनीतिक दल मिलकर एक आन्दोलन चलायें और समाज में जहाँ-जहाँ घृणित रूप में जातिवाद अभी भी है, या छूआछूत और उफँच नीच की भावना जीवित है, उसे समाप्त कर दिया जाये। उन्हें पता है कि सांझे लक्ष्य और संघर्ष से यह समस्या अधिकतम पाँच वर्ष में देश से समाप्त हो सकती है। इसीलिए वह नही चाहेंगी कि उनकी दीर्घकालीन राजनीतिक पारी मात्रा पाँच वर्ष तक सीमित रह जाये। अत: वह प्रतिशोध की राजनीति को ही अपने लिए अमोघ अस्त्र मानती हैं।

देश दल-दल में फँ सता जा रहा है। मायावती करोड़ों रूपये की माला पहन रही हैं और वो लोग ताली बजा रहे हैं जो एक एक पैसा के लिए तंग हैं। यह केवल जातिगत भावनाओं और किसी एक जातिगत नारे की देन है। मायावती आदर्शों की राजनीति के लिए मैदान में आयी थीं, वह झोंपड़ी में रहने वाले भारत की नेता बनतीं और भारत की आत्मा की प्रतिनिधि बनकर महामति चाणक्य की भाँति झोंपड़ी में रहकर ही अपना जीवन यापन करतीं तो वह एक मिसाल बन जातीं। पर उन्होंने अपने आचरण से यह सिद्घ किया है कि जितनी निर्ममता से कांग्रेस के नेताओं ने आदर्शो की अवहेलना की हम उससे अधिक निर्मम होकर आदर्शो की अवहेलना करेंगे। उनकी यह सोच ही उनकी राजनीति का आधार है।

कुं. मायावती जी को भी अपनी सोच में परिवर्तन करने की आवश्यकता है। उनकी उंचाई से बहुत लोगों को प्रेरणा मिली है। यदि वह उंचाई पर रहते हुए अपनी सोच को प्रतिशोधात्मक न बनाकर सुधारात्मक बनाये रखें तो वह सचमुच सर्वजन की सम्माननीय नेता हो सकती हैं। वस्तुत: हम समस्याओं का समाधान नही खोज रहे हैं अपितु समस्याओं के भंवर जाल में और फं सते जा रहे हैं। ऐसी सोच से मायावती तो मन्दिरों में पूजी जा सकेंगी परन्तु देश की समस्याओं का समाधान सम्भव नहीं होगा। राजनीति का मुख्य प्रयोजन समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करना ही होता है। पर आज हमारी राजनीति ही हमारे लिए एक समस्या बन गयी है। हमें आज लौटना होगा-अतीत की ओर। अतीत की वर्ण व्यवस्था (वास्तविक जातिविहीन समाज) की स्थापना कर समाज से शोषण और उत्पीडऩ की समाप्ति के लिए संविधान की सौगन्ध खाकर हम पर शासन करने वाले लोग ही पूर्ण निष्ठा से यह प्रतिज्ञा कर लें कि वे जातिवाद को अपनी राजनीति में अपने कथन में, आचरण में लें कि वे जातिवाद को अपनी राजनीति में अपने कथन में, आचरण में लें कि वे जातिवाद को अपनी राजनीति में अपने कथन में, आचरण में या कार्य शैली में तनिक भी स्थान नहीं देंगे तो सारी समस्या का समाधान हो जायेगा।

आज हमें यह नहीं देखना चाहिए कि मायावती क्या विषवमन कर रही हैं, अपितु देखना यह चाहिए कि वह किस ‘जातिवादी व्यवस्था’ की विषबेल की देन हैं? उनके निर्माण में आज के हरिजन का योगदान उतना नही है जितना ब्राह्मणवादी दृष्टिकोण से निर्मित ‘जातिवादी व्यवस्था’ इसके लिए उत्तरदायी है। क्योंकि वह इसी जातिवादी व्यवस्था को चुनौती देकर रणक्षेत्र में उतरी हैं। इसीलिए पूर्ण सत्यनिष्ठा से कार्य करने की आवश्यकता है। किसी को भी गाली देने से पूर्व यह सोचना चाहिए कि हम स्वयं कितने सही हैं, और यह भी कि क्या हमारी भावनाऐं इतनी पवित्र हैं कि हम किसी दूसरे को गाली दे सकते हैं? इस पैमाने पर कु. मायावती सहित अन्य सभी राजनीतिक दल स्वयं को तोलकर देख लें। समस्या का समाधान मिल जायेगा। हमें स्मरण रखना चाहिए कि प्रत्येक समस्या का समाधान सदा उतना ही हमारे पास विद्यमान रहता है जितना कि वह समस्या अपनी उपस्थिति की अनुभूति हमें कराती है।

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