पूज्य पिता महाशय राजेंद्र सिंह आर्य जी की 30 वीं पुण्यतिथि के अवसर पर : उस मीठे आभास को,गहरे अहसास को , मीठा नमन ….

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पिता सृष्टि का उतना ही पवित्र शब्द है जितना माता। क्योंकि हमारे जीवन निर्माण में जितना माता का योगदान होता है उतना ही पिता का भी योगदान होता है। जो लोग पिता के योगदान को कम करके आते हैं , वे हमारे इन दोनों नैसर्गिक संरक्षकों और पालकों के साथ न्याय नहीं कर पाते। माना कि माता हमें अपने गर्भ में रखकर अनेकों कष्टों का सामना करती हैं और हमारी प्रसन्नता व संपन्नता के लिए उन कष्टों को सहर्ष सहन कर लेती है। पर माता हमें जन्म देकर पिता की गोद में दे देती है और फिर उसके पश्चात हमारे निर्माण में पिता जितना संघर्ष करता है उस संघर्ष को माता के संघर्ष से कम नहीं माना जा सकता।
   पिता हमारा पालक है और ऐसा पालक है जो अपनी खुशियों को हमारी खुशियों में विलीन कर देता है । जो हमारी हर एक प्रकार की सफलता पर प्रसन्नता के सच्चे आंसू निकालता है। उसका उत्साहवर्धन और आंखों में आँसू बनकर छलछला जाने वाला प्रेम जीवन के हर मोड़ पर जब भी याद आता है तो हर एक पुत्र को निश्चय ही उन आंसुओं की स्मृति भावुक कर देती है।
  व्याकरण के आचार्यों का कहना है कि पिता शब्द ‘पा रक्षणे’ धातु से निष्पन्न होता है। ‘यः पाति स पिता’ जो रक्षा करता है, वह पिता कहलाता है। जब हमारा पिता हमारे पालक के रूप में हमारे साथ खड़ा होता है तो समझो कि वह ईश्वर का साक्षात रूप होता है। क्योंकि इस धरती पर हमारे पालक के रूप में साक्षात देवता के रूप में हमारा पिता हमारी उंगली पकड़े चलता है। जबकि सारे चराचर जगत के पालक जगतपालक परमपिता परमेश्वर हैं। यदि पिता के इन कर्तव्यों का या इस पवित्र धर्म का पालन हमारा कोई भाई, बहन, मामा ,फूफा ,चाचा, ताऊ या कोई अन्य व्यक्ति कर रहा है तो वह भी हमारे लिए पिता तुल्य होकर इतने ही सम्मान का पात्र हो जाता है। अतः पिता एक व्यापक अर्थ वाला शब्द है। इसे केवल रूढ़ अर्थों में ही नहीं लिया जाना चाहिये अपितु चिन्तन-मनन कर इसके अनेक प्रयोगों पर विचार किया जाना व उन अर्थों को भी ग्रहण करना चाहिये। ऋषि यास्काचार्य प्रणीत ग्रन्थ ‘निरुक्त’ के सूत्र 4/21 में कहा गया है-‘‘पिता पाता वा पालयिता वा”। निरुक्त 6/15 में कहा है -‘‘पिता-गोपिता” अर्थात् पालक, पोषक और रक्षक को पिता कहते हैं।

मनुस्मृति के 2/145 सूत्र में पिता के गौरव का वर्णन मिलता है। श्लोक है-‘उपाध्यायान्दशाचार्य आचार्याणां शतं पिता। सहस्त्रं तु पितृन् माता गौरवेणातिरिच्यते।।’ इस श्लोक का अर्थ है कि दस उपाध्यायों से बढ़कर आचार्य, सौ आचार्यों से बढ़कर पिता और एक हजार पिताओं से बढ़कर माता गौरव में अधिक है, अर्थात् बड़ी है। मनुस्मृतिकार ने जहां आचार्य और माता की प्रशंसा की है, उसी प्रकार पिता का स्थान भी ऊंचा माना है। मनुस्मृति के श्लोक 2/226 में ‘‘पिता मूर्त्ति: प्रजापतेः” कहकर बताया गया है कि पिता पालन करने से प्रजापति (राजा व ईश्वर) का मूर्तिरूप है।
महाभारत के वनपर्व में यक्ष-युधिष्ठिर संवाद में भी माता व पिता के विषय में प्रश्नोत्तर हुए हैं जिसमें इन दोनों मूर्तिमान चेतन देवों के गौरव का वर्णन है। यक्ष युधिष्ठिर से प्रश्न करते हैं कि ‘का स्विद् गुरुतरा भूमेः स्विदुच्चतरं च खात्। किं स्विच्छीघ्रतरं वायोः किं स्विद् बहुतरं तृणात्।।’ अर्थात् पृथिवी से भारी क्या है? आकाश से ऊंचा क्या है? वायु से भी तीव्र चलनेवाला क्या है? और तृणों से भी असंख्य (असीम-विस्तृत) एवं अनन्त क्या है? इसके उत्तर में युधिष्ठिर ने यक्ष को बताया कि ‘माता गुरुतरा भूमेः पिता चोच्चतरं च खात्। मनः शीघ्रतरं वाताच्चिन्ता बहुतरी तृणात्।।’ अर्थात् माता पृथिवी से भारी है। पिता आकाश से भी ऊंचा है। मन वायु से भी अधिक तीव्रगामी है और चिन्ता तिनकों से भी अधिक विस्तृत एवं अनन्त है। महाभारत में पिता को आकाश से भी ऊंचा माना है, अर्थात् पिता के हृदय-आकाश में अपने पुत्र के लिए जो असीम प्यार होता है, वह अवर्णनीय है।
     महाभारत शा. 266/21 में कहा गया है कि ‘पिता धर्मः पिता स्वर्गः पिता हि परमं तपः। पितरि प्रीतिमापन्ने सर्वाः प्रीयन्ति देवता।।’ अर्थात् पिता ही धर्म है, पिता ही स्वर्ग है और पिता ही सबसे श्रेष्ठ तपस्या है। पिता के प्रसन्न हो जाने पर सारे देवता प्रसन्न हो जाते हैं।
   अब से सही 30 वर्ष पूर्व हमारे पूज्य पिता महाशय राजेंद्र सिंह आर्य जी इस असार संसार से चले गए थे । 13 सितंबर 1991 का वह दिन हमारे मानस पटल पर जीवन भर के लिए अंकित हो गया। उनके अंतिम शब्द और अंतिम क्षणों में चेहरे की भाव भंगिमा कभी भुलाए नहीं भूली जाती। 30 वर्षों का 1 दिन भी ऐसा नहीं रहा होगा जब पूज्य पिता की स्मृति ने किसी ना किसी संदर्भ या प्रसंग में  हमारा मार्गदर्शन न किया हो या उनकी याद ना आयी हो। आज उनकी मीठी स्मृतियों को भारतीय आर्षग्रंथों के उपरोक्त श्लोकों, मन्त्रों या उद्धरणों की व्यवस्थाओं के संदर्भ में जब जब कसकर देखते हैं तो कसौटी के हर दृष्टिकोण पर वह  पुण्यात्मा, धर्मात्मा, पूज्य पिता सर्वोत्कृष्ट ही सिद्ध होते हैं।
समाज सेवा और राष्ट्र सेवा का जो भी कार्य हमारे द्वारा संपन्न हो पा रहा है उसमें पूज्य पिता की दी हुई प्रेरणा शक्ति हमारा निरंतर मार्गदर्शन कर रही है । जिसके चलते हम उन्हें एक प्रकाश स्तंभ के रूप में मानकर आगे बढ़ते जा रहे हैं । यह तो निश्चित है कि अब उनसे मुलाकात नहीं हो सकती परंतु यह भी नहीं कहा जा सकता कि उनकी मीठी यादों के सिलसिले में होने वाली मुलाकातों को हम यह कह दें कि उनसे मुलाकात ही नहीं होती।
उनकी मीठी यादें और उनका वह भौतिक शरीर हमारे लिए एक पहेली है। जिसे हम सुलझा नहीं पाते। क्योंकि उनकी मीठी यादों के झरोखे हमें यह और भी अधिक गहरा आभास करा जाते हैं कि पूज्य पिता हर क्षण हर पल हमारे साथ हैं ।
उस मीठे आभास को,
गहरे अहसास को ,
मीठा नमन,
शत शत नमन ,
सारे परिवार का नमन।।

13 सितंबर 1991 के शाम के 7:15 बजे जब पिताश्री आपने इस लोक से प्रस्थान किया था तो वह पल भुलाए नहीं भूले जाते। जब भी उनकी याद आती है तो वे भावुक कर जाते हैं। आपका वह स्थान, जहां पर आप की चारपाई रहती थी आज भी हमसे बड़े-बड़े सवाल पूछता है । आपकी यादों का घेरा वहां इतना सघन बना हुआ है कि चाहे हम जहां हों पर उस स्थान को हृदय से हमेशा नमन करते रहते हैं और ऐसा लगता रहता है जैसे आप अब भी वही मिल जाएंगे और जैसे ही हम चरण स्पर्श करेंगे तो निश्चित ही आपके मुंह से निकलेगा -“आयुष्मान, विद्यावान, यशस्वी ,तेजस्वी भवः, खुश रहो बेटा।”
आप जहां भी हो वही आपको प्रभु खुश रखे। आपका ही आशीर्वाद हमारे लिए आज भी बहुत उत्साहवर्धक होता है। आपको नमन।

हम सभी परिजन आपके आशीर्वाद के सदा ऋणी रहेंगे।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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