वामपंथ के लिए चिंतन का सही समय

मनमोहन सिंह

अगर वोटों के हिसाब से देखें तो वामपंथी विचारधारा पिछड़ती नजर आ रही है। सोवियत संघ के टूटने के बाद पूर्वी यूरोप के देशों ने जिस तरह इस विचारधारा को दरकिनार किया, उसने पूरी दुनिया के साम्यवादी आंदोलन को कठघरे में ला खड़ा किया है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। चौंतीस साल तक पश्चिम बंगाल में वाम शासन देखने के बाद वहां के लोगों ने वामपंथी दलों को परास्त कर दिया। उस राज्य में, जहां सांप्रदायिकता कभी पनप नहीं पाई, वहां भी अब धर्म के नाम पर वोट पडऩे लगे हैं। तो, चौंतीस सालों से वामपंथी दल वहां क्या करते रहे?

केरल में स्थिति भिन्न है। वहां शुरू से ही धर्म और जाति का प्रभाव रहा है। हालांकि पहली गैर-कांग्रेसी सरकार और पहली चुनी हुई कम्युनिस्ट सरकार 1957 में इएमएस नंबूदरीपाद के नेतृत्व में वहां बनी थी, लेकिन कांग्रेस और कम्युनिस्ट बदल-बदल कर सरकार चलाते रहे। कभी एक गठबंधन जीत जाता, तो कभी दूसरा। राजनीति में वामपंथी ताकतें धीरे-धीरे कमजोर होती गईं और अब लगभग खात्मे की तरफ दिखाई दे रही हैं।

पूर्वोत्तर के छोटे से प्रांत त्रिपुरा को छोड़ दें तो कहीं वामपंथी सत्ता में तो क्या, विकल्प के रूप में भी दिखाई नहीं दे रहे। पश्चिम बंगाल में निकट भविष्य में होने वाले चुनावों में वामपंथी अपनी स्थिति सुधार सकेंगे, इसकी संभावना कहीं दिखाई नहीं दे रही। वहां वामपंथियों की जगह भारतीय जनता पार्टी विकल्प के रूप में नजर आ रही है। बिहार में भी कभी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का भारी असर था, लेकिन अब स्थिति यह है कि वहां वामपंथी दलों के गठबंधन को दो सीटें मिलने की संभावना भी कोई व्यक्त नहीं कर रहा।

आखिर लोगों के अधिकारों के लिए जूझने वाले वामपंथी दल पीछे क्यों होते जा रहे हैं? क्या यह कोई संगठनात्मक कमजोरी है या फिर कार्ल माक्र्स का सिद्धांत ही गलत है? क्या केवल इंसान रोटी, कपड़ा और मकान के लिए जीवित है या फिर उसकी जिंदगी की कुछ और जरूरतें भी हैं? क्या फिर यह कहा जाए जो हिटलर भी कहता था कि लोग तो भेड़-बकरियां होते हैं, केवल उन्हें हांकने वाला होना चाहिए। अगर इसे ही सही मान लिया जाए, तो वामपंथी दलों के पास आज एक भी नेता ऐसा नहीं है, जो लोगों को सम्मोहित कर सकता हो।

उत्तर भारत में ये दल कभी बड़ी पैठ नहीं बना सके। एक समय में पंजाब दूसरा बंगाल बनता दिखने लगा था, लेकिन धीरे-धीरे वहां भी हालात बिगड़ते गए। मौजूदा समय में नजर दौड़ाएं तो पंजाब, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और जम्मू-कश्मीर को मिला कर वामपंथ का एक ही विधायक है और वह है जम्मू-कश्मीर की कुलगांव सीट से। यहां से माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के कामरेड मोहम्मद यूसुफ तरीगामी चौथी बार चुनाव जीत कर विधानसभा में पहुंचे हैं।

वामपंथी पार्टियों में सबसे अधिक नुकसान भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) का हुआ है। उत्तर भारत में कभी यह दल बहुत मजबूत था, लेकिन 1975 के आपातकाल से लेकर कांग्रेस के हर फैसले पर उसका साथ देने के कारण इसने अपनी साख खो दी। एसए डांगे की नीतियां भाकपा को गर्त में ले गईं। आपातकाल के समय जब माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) समेत सभी दल उसके विरोध में थे, तो भाकपा इंदिरा गांधी के बीस सूत्रीय कार्यक्रम का समर्थन कर रही थी। उधर पूरा देश जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में शामिल हो रहा था तो भाकपा उस जन आंदोलन को ‘प्रतिक्रियावादी’ आंदोलन का नाम देकर उसका विरोध कर रही थी।

हिमाचल प्रदेश में सत्तर के दशक में जब पूरे राज्य के कर्मचारी हड़ताल पर थे तो भाकपा ने तत्कालीन मुख्यमंत्री वाइएस परमार का साथ देना मुनासिब समझा और परिवहन क्षेत्र में भाकपा की यूनियन ने हड़ताल में शामिल न होने का फैसला कर लिया। उस समय इस पहाड़ी राज्य में भाकपा एकमात्र वामपंथी पार्टी थी। उस समय भाकपा के रुख ने भारतीय जनसंघ को मजदूरों और कर्मचारियों में एक बड़ा आधार दे दिया। जो कर्मचारी और मजदूर ‘लाल झंडे’ को अपना साथी समझते थे वे ‘भगवा’ झंडे की ओर मुड़ गए। इसका परिणाम यह हुआ कि जो पार्टी शहरों में भी सही तरीके से नहीं उभर पाई थी, वह गांवों तक जा पहुंची।

आपातकाल के बाद 1977 में जब चुनाव हुए तो जनसंघ की जगह जनता पार्टी आ गई थी।

शांता कुमार हिमाचल के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने। उस समय तक राज्य में भाकपा लगभग अपनी साख खो चुकी थी। फिर हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में कामरेड मोहर सिंह ने माकपा की छात्र शाखा एसएफआइ को जन्म दिया। इस संस्था ने कुछ कॉलेजों और विश्वविद्यालय में अपने पैर जमाने शुरू किए। छात्रों की ताकत इतनी बढ़ी कि एक बार तो शिमला विधानसभा सीट पर माकपा उम्मीदवार राकेश सिंघा ने जीत भी दर्ज कर ली। भाजपा और कांग्रेस दोनों सरकारों ने एसएफआइ को तोडऩे की हर कोशिश की। उन्हें हिंसावादी साबित करने की कोशिश की गई, लेकिन चुनाव में उन्हें हरा नहीं सके। आज भी वहां की कारपोरेशन के मेयर और डिप्टी मेयर की कुर्सी पर माकपा के संजय चौहान और टिकेंद्र पंवर बैठे हैं।

इसके साथ ही माकपा ने सेब उत्पादकों, छोटे किसानों और वहां चल रही बिजली परियोजनाओं में काम कर रहे कर्मचारियों और मजदूरों में अपनी अच्छी पैठ बना ली है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने तो एसएफआइ को रोकने के लिए वहां चुनाव न कराने का फैसला कर लिया है। इस प्रकार हिमाचल प्रदेश में माकपा एक तीसरी ताकत हो सकती है, लेकिन उसके लिए वहां किसी लोकप्रिय नेता को उजागर करना जरूरी है। हिमाचल लोकहित पार्टी (हिलोपा), जो भाजपा से नाराज उसके कुछ लोगों ने बनाई है, का कुछ ज्यादा असर नजर आ रहा है। पंजाब की स्थिति इस पहाड़ी राज्य से भिन्न है। यहां वामपंथ कभी काफी मजबूत रह चुका है। छोटे और मझोले किसानों और कारखाना मजूदरों में वामपंथियों की पूरी पैठ रही है। यहां भाकपा का आधार अच्छा था। लेकिन यह आधार खिसकता जा रहा है। इस राज्य में वामपंथी विचारधारा कई गुटों में बंट गई। कुछ लोग तो नक्सलवादी आंदोलन से जुड़ गए, कुछ माकपा में आ गए और कुछ भाकपा में रहे। इस तरह पिछले तीस-चालीस साल में धीरे-धीरे यह ताकत बंटती-बंटती खत्म जैसी हो गई है।

राज्य में आज भी लोग माक्र्सवादी विचारधारा से जुड़े लगते हैं, लेकिन नेता और पार्टी की कमी साफ झलकती है। लोग कम्युनिस्टों को ईमानदार, जुझारू और अपना हितैषी तो मानते हैं, लेकिन वोट देते समय जाति, धर्म और क्षेत्र को तरजीह देते हैं। लोग यह भी मानते हैं कि आतंकवाद का सामना अगर किसी राजनीतिक पार्टी या संगठन ने खुलेआम किया, तो वे कम्युनिस्ट ही थे।

माकपा के आंकड़ों के अनुसार पंजाब में आतंकवाद के दौरान उनके तीन सौ से ज्यादा नेता और कार्यकर्ता मारे गए। उनमें भाकपा के प्रमुख नेता दर्शन सिंह कैनेडियन, मशहूर कवि और माकपा नेता अवतार सिंह पाश, सोहन सिंह ढेरी, जोगिंदर सिंह, स्वर्ण सिंह चीमा, गुरनाम सिंह उप्पल, चनन सिंह धूत और करतार चंद जैसे प्रमुख नेता शामिल हैं। इनके अलावा जिला और ब्लॉक स्तर के बहुत नेता इस आतंकवाद की भेंट चढ़ गए। इस तरह पंजाब का वामपंथी आंदोलन नेतृत्व विहीन हो गया।

इसके अलावा सन 2000 में पासला गु्रप का अलग हो जाना पूरे वामपंथी आंदोलन के लिए भारी पड़ गया। भाकपा के लोग मानते हैं कि पासला का अलग होना सबसे नुकसानदेह साबित हुआ। हालांकि इसका सबसे बड़ा नुकसान पासला को ही हुआ, लेकिन वे लोग कभी इस बात को समझ नहीं पाए। भाकपा आज कहीं नजर नहीं आ रही। आतंकवादियों को खुली चुनौती देने वाले वामपंथी लोगों से क्यों कट गए, यह भी विचारणीय विषय है।

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