ऋषि दयानंद ने अविद्या दूर करने सहित संसार का उपकार किया

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ओ३म्

सृष्टि के आरम्भ से संसार में मनुष्य आदि प्राणियों का जन्म होता आ रहा है। मनुष्य बुद्धि से युक्त प्राणी है जो सोच विचार कर सत्य और असत्य का निर्णय कर अपने सभी कार्य करता व कर सकता है। सामान्य मनुष्य दूसरे शिक्षित मनुष्यों को देखकर अपने जीवन को भी अच्छा व सुखी बनाने का प्रयत्न करते हैं। मनुष्य को माता, पिता व आचार्यों द्वारा जो पढ़ाया व बताया जाता है उसी से वह सन्तुष्ट होकर अपने जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए अपने जीवनकाल को सुखपूर्वक व्यतीत करने का प्रयत्न करते हैं। संसार में अनेक महापुरुष भी हुए हैं। महापुरुष उन मनुष्यों को कहते हैं जो साधारण मनुष्य से इतर देश व समाज के लिए कुछ महत्वपूर्ण कार्यों को करते हैं। मनुष्य को अपनी बुद्धि की उन्नति करने के लिए ज्ञान की आवश्यकता होती है। ज्ञान के भी अनेक स्तर होते हैं। भौतिक ज्ञान में मनुष्य भौतिक पदार्थों का ज्ञान प्राप्त करते हैं। सामाजिक ज्ञान का अध्ययन कर वह समाज विषयक बातों का अध्ययन व उन्हें ग्रहण करते हैं।

हम संसार में सूर्य, चन्द्र, पृथिवी, ग्रह, उपग्रह व नक्षत्रों से युक्त विशाल सृष्टि को देखते हैं। सृष्टि सहित प्राणी तथा वनस्पति जगत में विद्यमान आदर्श व्यवस्था को भी देखते हैं। इस सृष्टि का निर्माण एवं सृष्टि में सर्वत्र व्यवस्था के होने से विद्वान मनुष्य इसमें निहित व क्रियारत एक अदृश्य सूक्ष्म सत्ता के दर्शन करते हैं। यदि वह सूक्ष्म सत्ता न होती तो यह संसार किससे बनता व कैसे चलता? यदि बन भी जाता तब भी यह उस व्यवस्थापक चेतन सत्ता के बिना कैसे चलता? हम अपने नगरों में वाहनों को देखते हैं। वह तभी चल सकते हैं जब वह यांत्रि़क दृष्टि से निर्दोष हों, उसमें ईधन हो तथा उसे कोई चेतन मनुष्य, जिसको वाहन चलाना आता है, वह चलाये। इसी प्रकार से इस जड़ जगत को भी चलाने के लिए इसका निर्दोष नियमों में आबद्ध होना तथा इसके नियन्ता व संचालक द्वारा इसका चलाया जाना आवश्यक होता है। ऐसी ही सत्ता को ईश्वर कहा जाता है। इस सत्ता का ज्ञान व प्राप्ति निर्दोष रूप में केवल वेद और वैदिक साहित्य से ही होती है। सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय आदि ग्रन्थ भी वेद व वैदिक साहित्य के अनुकूल व उसके पोषक ग्रन्थ हैं। सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थ हिन्दी में हैं जिन्हें हिन्दी भाषी लोग पढ़कर वेद व वैदिक साहित्य के प्रायः सभी सिद्धान्तों व रहस्यों को समझ सकते हैं और ईश्वर सहित अपनी आत्मा व अन्य प्राणियों मे विद्यमान आत्माओं का भी ज्ञान प्राप्त कर निःशंक हो सकते हैं। ईश्वर, जीव तथा प्रकृति के मूल स्वरूप का ज्ञान हो जाने पर मनुष्य की गूढ़ व सभी प्रकार की शंकाओं का समाधान हो जाता है। इससे मनुष्य अपने जीवन को जीवन के उद्देश्य व लक्ष्य के अनुसार व्यतीत कर आत्मा को ज्ञान से युक्त कर धर्म, अर्थ तथा काम आदि का धर्मपूर्वक संग्रह व सेवन करते हुए आत्मा को आवागमन के चक्र से मुक्त कर मोक्ष को प्राप्त हो सकते हंै। जीवात्मा का उद्देश्य व लक्ष्य तथा उसकी प्राप्ति के उपायों का तर्क एवं युक्ति संगत प्रामाणिक ज्ञान ऋषि दयानन्द के समय में विद्वानों व सर्वसुलभ पुस्तकों में उपलब्ध नही होता था। ऋषि दयानन्द ने सन् 1839 की फाल्गुन मास की शिवरात्रि के दिन ईश्वर के सच्चे स्वरूप को प्राप्त करने का बोध प्राप्त कर कालान्तर में अपने पुरुषार्थ एवं तपस्वी जीवन से अपनी सभी आशंकाओं को दूर किया था और ऐसा करते हुए उन्हें जो अमृतमय ज्ञान की प्राप्ति हुई थी उसे उन्होंने अपने उपदेशों सहित अपने सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका तथा ऋग्वेद आंशिक तथा सम्पूर्ण यजुर्वेद भाष्य के माध्यम से समस्त संसार को पिलाने व जिलाने का कार्य किया था।

ऋषि दयानन्द सरस्वती जी (1825-1883) का जन्म गुजरात के टंकारा नामक एक ग्राम में हुआ था। उनके समय में संसार अविद्यान्धकार में डूबा हुआ था। लोगों को ईश्वर के सच्चे स्वरूप का ज्ञान नहीं था। मूर्तिपूजा, अवतारवाद, फलित ज्योतिष, मृतक श्राद्ध आदि अनेक अन्धविश्वास देश व समाज में प्रचलित थे। समाज में अनेकानेक कुरितियां विद्यमान थी। समाज में अनेक प्रकार के भेदभाव भी थे। मनुष्य जाति जन्मना जाति व्यवस्था में बंटी हुई थी। स्त्री व शूद्रों को वेद पढ़ने व उसके मन्त्र बोलने का अधिकार भी नहीं था। समाज में बाल विवाह व बेमेल विवाह होते थे। बाल विधवाओं की दशा अत्यन्त दुःखद व चिन्ताजनक थी। मनुष्य कैसे सुखी रह सकता है तथा किस प्रकार से दुःखों सहित मृत्यु पर विजय प्राप्त कर सकता है, इसका प्रामाणिक ज्ञान कहीं भी सुलभ नहीं था। ईश्वर की कर्म फल व्यवस्था को भी भुला दिया गया था। शिक्षा की दृष्टि से भी देश व समाज अत्यन्त अवनत व पिछड़ी हुई अवस्था में था। हिन्दी भाषा का भी देश में समुचित प्रचार नहीं था। संस्कृत भाषा की स्थिति भी अत्यन्त संकीर्ण व संकुचित थी। यह भाषा व इसका व्यवहार कुछ थोड़े से लोगों तक ही सीमित हो गया था। शास्त्राध्ययन पर एक ही वर्ग का अधिकार था और वह सब भी वेद आदि प्रमुख प्रामाणिक शास्त्रों का अध्ययन नहीं करते थे। वेद विरुद्ध पुराण ग्रन्थों का महत्व समाज में गाया जाता था। तर्क व युक्ति विरुद्ध बातों को भी आंखे बन्द कर स्वीकार किया जाता था। देश छोटे छोटे राज्यों व रियासतों में बंटा हुआ था। देश पर विदेशी शासकों अंग्रेजों का अधिकार था। इससे पूर्व वर्षों तक मुस्लिम शासकों ने दूर देशों से आकर भारत में मन्दिरों आदि की लूटमार की थी और भारत को गुलाम बनाया था। उन्होंने मातृशक्ति का भी घोर अपमान किया था। हमारे स्वधर्मी बन्धुओं का अन्याय व अत्याचार द्वारा धर्म परिवर्तन किया था। आज भी यह कार्य देश के अनेक भागों में गुप्त रीति से किये जाते हैं। ऐसी अवस्था में ऋषि दयानन्द ने देश में उपलब्ध वेद आदि समस्त शास्त्रों का अपने अपूर्व पुरुषार्थ एवं तप से अध्ययन कर उनके सत्य अर्थों को प्राप्त किया। वह ज्ञान व अज्ञान तथा विद्या व अविद्या में अन्तर करना जानते थे। उन्होंने ईश्वर का सत्यस्वरूप भी वेदाध्ययन एवं उपनिषद तथा दर्शन ग्रन्थों के आधार पर निर्धारित किया था। महाभारत युद्ध के बाद ऋषि दयानन्द व उनके बाद के समय में यह पहला अवसर था कि जब देश में वेदों व वेदानुकूल ग्रन्थों उपनिषद तथा दर्शनों में सुलभ ईश्वर व जीवात्मा आदि के सत्यस्वरूप की चर्चा देश के सामान्य लोग कर रहे थे जिसकी प्रेरणा व प्रचार ऋषि दयानन्द जी ने ही किया था।

ऋषि दयानन्द मथुरा के गुरु दण्डी स्वामी विरजानन्द सरस्वती जी के सुयोग्य शिष्य एवं योग समाधि सिद्ध सन्यासी एवं विद्वान थे। गुरु जी ने उन्हें बताया था कि सारा संसार अविद्या व अज्ञान से ग्रस्त है। अविद्या व अज्ञान ही संसार की सभी समस्याओं की जड़ तथा सब मनुष्यों के दुःखों का कारण थी। इसको दूर करने के लिए विश्व में वेदों व ज्ञान का प्रचार किया जाना अत्यन्त आवश्यक था। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये ऋषि दयानन्द ने देश भर में घूम घूम कर वैदिक सत्य मान्यताओं का प्रचार किया था। विपक्षी विद्वानों की शंकाओं का समाधान किया था तथा सभी को सत्यासत्य का निर्णय करने के लिए संवाद तथा शास्त्रार्थ की चुनौती दी थी। जो लोग संवाद व शास्त्रार्थ के लिए सामने आये थे उनका उन्होंने तर्क एवं युक्तिपूर्वक समाधान किया था। कुछ निष्पक्ष लोगों ने उनके विचारों व सिद्धान्तों को स्वीकार किया था और बहुतों ने अपने हित व अहितों का ध्यान कर स्वीकार नहीं किया था। उनका प्रचार निरन्तर बढ़ रहा था। पंजाब के लोगों पर उनका विशेष प्रभाव था। वर्तमान के पाकिस्तान देश जो पहले पंजाब कहा जाता था, उसके लाहौर, झेलम आदि अनेक स्थानों पर वेदों का प्रचार होकर आर्यसमाजें स्थापित हुईं थीं। पंजाब में ऋषि दयानन्द को स्वामी श्रद्धानन्द, पं. लेखराम, पं. गुरुदत्त विद्यार्थी, महात्मा हंसराज तथा लाला लाजपतराय जैसे महान देशभक्त एवं समाज सुधारक विद्वान प्राप्त हुए थे।

वेदों के निरन्तर स्थाई रूप से प्रचार के लिए ऋषि दयानन्द जी ने 10 अप्रैल, 1875 को मुम्बई में आर्यसमाज संगठन वा वेद प्रचार आन्दोलन की स्थापना की थी। आर्यसमाज ने अपनी स्थापना से वर्तमान समय तक देश में अन्धविश्वासों को दूर करने तथा समाज सुधार के अनेकानेक व प्रायः सभी कार्य किये जिससे देश व समाज की तस्वीर सुधरी है। देश अज्ञान के कूप से बाहर निकला है। अभी इसे वेदों की सत्य मान्यताओं को स्वीकार करने का लक्ष्य भी प्राप्त करना है। जब तक ऐसा नहीं होता मनुष्यों में ज्ञान व शिक्षा अधूरी व अपूर्ण है व रहेगी। देश की आजादी का मूल मन्त्र भी आर्यसमाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने ही दिया था। सत्यार्थप्रकाश के आठवें समुल्लास में उनके अमर व स्वर्णिम शब्द जो उन्होंने विदेशी राज्य के विरोध में कह थे, अंकित हैं। आर्यसमाज की देश को आजाद कराने तथा आजादी के आन्दोलन को स्वतन्त्रता सेनानी देने में महत्वपूर्ण भूमिका है। आर्यसमाज ने ही देश में हिन्दुओं के धर्मान्तरण की प्रक्रिया को रोका व बदला। ऋषि दयानन्द के स्वामी श्रद्धानन्द एवं पं. लेखराम आदि ने अपने अनेक बिछुड़े भाईयों को शुद्ध कर पुनः स्वमत में दीक्षित किया। आर्यसमाज ऐसा संगठन है जिसमें मनुष्यों के प्रति परस्पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं है। सब शाकाहारी हैं। यहां सब बन्धु मिलकर ईश्वर की उपासना व देवयज्ञ अग्निहोत्र करते हैं। सत्संग का आनन्द लेते हैं। विद्वानों के प्रवचनों व भजनीकों के भजन सुनते हैं। आर्यसमाज सब मनुष्यों व प्राणियों को सर्वव्यापक तथा सच्चिदानन्दस्वरूप ईश्वर की सन्तान मानता है। आर्यसमाज पुनर्जन्म को मानता है तथा उसे युक्ति व तर्क से भी सिद्ध करता है। आर्यसमाज एक मानवतावादी सार्वभौमिक सामाजिक संगठन है जो विश्व से अविद्या दूर कर सभी मनुष्यों को ईश्वर की सत्य उपासना की शिक्षा देता है और सबको धर्म, अर्थ, कार्म तथा मोक्ष की प्राप्ति करने के लिए सद्कर्मों को करने की प्रेरणा करता है। ऋषि दयानन्द ने भारतीय समाज में समग्र क्रान्ति की थी। उनके जैसा महापुरुष महाभारत युद्ध के बाद दूसरा कोई नहीं हुआ। ऋषि दयानन्द देश के पितामह हैं। दिनांक 8 मार्च, 2021 को ऋषि दयानन्द सरस्वती का 196 वां जन्म दिवस है। हम इस अवसर पर उनको सादर नमन करते हैं। उनके द्वारा बताया वेदों का मार्ग ही मानवता तथा मनुष्यों के समग्र विकास वा उन्नति का मार्ग है। इसी से विश्व का कल्याण एवं विश्व शान्ति के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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