जसवंतसिंह, पृथ्वीसिंह और दुर्गादास राठौर की वीरता को नमन

images (48)

मारवाड़ क्षेत्र में जोधपुर राज्य का भी इतिहास में विशेष और महत्वपूर्ण स्थान है । जोधपुर राज्य की स्थापना 13 वीं शताब्दी में राजपूतों के राठौड़ वंश द्वारा की गई थी। 1194 में विदेशी आक्रमणकारी मोहम्मद गौरी द्वारा कन्नौज को विनाश की अग्नि को समर्पित करने की घटना के पश्चात 13 वीं शताब्दी के आरम्भ में दिल्ली सल्तनत द्वारा इसके कब्जे के बाद, राठौर पश्चिम भाग गए।

हमें अपने इतिहास के विषय में यह बात अवश्य समझनी चाहिए कि जब हमारे किसी भी क्षत्रिय राजवंश पर विदेशी आक्रमणकारियों की कोप दृष्टि हुई या वह किसी युद्ध में पराजित हुए तो उसके पश्चात भी उन्होंने अपने अस्तित्व को बचाए बनाए रखने के लिए उस स्थान से हटकर या दूर जाकर भी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ी। विदेशी इतिहासकारों ने हमारे ऐसे क्षत्रिय राजवंशों की इस प्रकार की संघर्षपूर्ण जीवन शैली का कहीं उल्लेख नहीं किया है। जिससे हमारे भीतर यह धारणा रूढ़ हो गई है कि एक बार पराजित होने के पश्चात फिर हमारे किसी क्षत्रिय राजवंश ने अपने अस्तित्व को बचाए रखने और देश धर्म की रक्षा के लिए कोई कार्य नहीं किया। यह धारणा पूर्णतया गलत है , क्योंकि हमारे राजाओं ने एक स्थान पर पराजित होकर ऐसा अनेकों बार किया है कि जब वह दूर जाकर फिर कोई राज्य खड़ा करने में या तो सफल हुए हैं या विदेशी आक्रमणकारी शासकों के विरुद्ध मोर्चा खोलने में सफल हुए हैं। हमारे देश में आज भी एक ही क्षत्रिय राज वंश परंपरा के लोग अलग-अलग प्रांतों में मिलते हैं, इसका एक ही कारण है कि देश काल परिस्थिति के अनुसार हमारे पूर्वजों ने इधर-उधर भागकर विदेशी आक्रमणकारी शासकों के विरुद्ध मोर्चा खोलने का काम किया। जिससे उनके वंशज भी देश में इधर-उधर बिखर गए हैं।

राठौड़ राजवंश के इतिहासकारों की मान्यता है कि कन्नौज के अंतिम गढ़वाला राजा जयचंद्र के पोते सियाजी गुजरात के द्वारका की तीर्थयात्रा पर मारवाड़ आए थे। पाली शहर में रुकने पर वह और उनके अनुयायी ब्राह्मण समुदाय की रक्षा करने के लिए वहां गए। पाली के ब्राह्मणों ने सियाजी से पाली में बसने और उनका राजा बनने का अनुरोध किया। राव चंदा, सियाजी से उत्तराधिकार में दसवीं, अंत में गुर्जर प्रतिहार शासकों की सहायता से मंडोर और तुर्कों से मारवाड़ का नियंत्रण छीन लिया गया। जोधपुर शहर, राठौड़ राज्य की राजधानी बना।
इस घटना को हमें विदेशी इतिहासकारों की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए बल्कि अपने विवेक का प्रयोग करना चाहिए और यह समझना चाहिए कि जब हमारे किसी एक राजवंश पर आपत्ति पड़ी तो दूसरे किसी राजवंश के शासक ने उसको स्थापित करने और तुर्क या किसी भी विदेशी शासक को उखाड़ कर अपने किसी राजवंशीय व्यक्ति का शासन स्थापित करने में भी सहयोग किया। हमारे पूर्वजों की इस प्रकार की सहयोग की भावना उनके भीतर भरे देश भक्ति के भाव को प्रकट करती है, साथ ही यह भी स्पष्ट करती है कि विदेशियों की अपेक्षा अपने लोगों के राज्य स्थापित करने को हमारे पूर्वजों ने प्राथमिकता दी। इससे पता चलता है कि उनके भीतर राष्ट्रवाद की भावना थी। हमारे पूर्वजों के इस प्रकार के सहयोग के भाव को इतिहास में स्थान नहीं दिया गया है। उनकी ऐसी भावनाओं का उपहास अवश्य उड़ाया गया है। जोधपुर रियासत को 1459 में राव चंदा के उत्तराधिकारी राव जोधा द्वारा एक प्रशासनिक केंद्र के रूप में स्थापित किया गया था।
जोधपुर राज्य से अकबर और मुगलों का इतिहास भी गहराई से जुड़ा है ।1561 में मुगल सम्राट अकबर द्वारा राज्य पर आक्रमण किया गया था। जैतारण और मेड़ता के परगना मुगलों द्वारा कब्जा कर लिया गया था। लगभग दो दशकों के युद्ध और 1581 में राव चंद्रसेन राठौड़ की मृत्यु के बाद, मारवाड़ को सीधे मुगल प्रशासन में लाया गया और 1583 तक ऐसा ही रहा।

इसी राजवंश में महाराजा जसवंत सिंह हुए। जिनके बेटे पृथ्वीसिंह को शेर से मरवाया था। औरंगजेब ने अपने क्रूर और षडय़ंत्रकारी स्वरूप का परिचय दिया। उसने महाराजा जसवंतसिंह को क्षति पहुंचाने के लिए और उसे अपने भाई दारा व शुजा का साथ देने के विरोध में दंडित करने के लिए षडय़ंत्र रचने आरंभ कर दिये। औरंगजेब  ने महाराजा के एकमात्र पुत्र पृथ्वीसिंह को अपने दिल्ली दरबार में बुला लिया। पृथ्वीसिंह अत्यंत शूरवीर था उसने औरंगजेब  के सामने भरे दरबार में एक शेर से द्वंद्व-युद्घ किया और नि:शस्त्र रहकर शेर को बीच से फाड़ दिया था। उस समय पृथ्वीसिंह की मां भी उसके साथ थी। 
जब औरंगजेब  ने पृथ्वीसिंह को मारने के उद्देश्य से शेर से भिडऩे की बात कही तो पृथ्वीसिंह अपने हाथ में कटार लेकर शेर की ओर बढ़ा। तब पृथ्वीसिंह की माता ने कडक़कर कहा-”वत्स! देखिए तो सही शेर पर तो कोई हथियार नही है, इसलिए नि:शस्त्र पर नि:शस्त्र रहकर ही हमला करो। यह वीरों के लिए उचित नही है कि नि:शस्त्र के साथ शस्त्र लेकर युद्घ करे।”
तब पृथ्वीसिंह बिना हथियार के ही शेर की ओर बढ़ा और उसने वह चमत्कार कर दिखाया जिसे केवल भारत माता का कोई पृथ्वीसिंह ही कर सकता था।
औरंगजेब  पृथ्वीसिंह की इस अप्रत्याशित वीरता और सफलता को देखकर दंग रह गया। वह सोचता था कि इस द्वंद्व युद्घ में वह अपने शत्रु को समाप्त कर देगा, परंतु उसकी आशाओं पर पानी फिर गया। 
तब उसने दूसरी युक्ति निकाली और पृथ्वीसिंह को विष देकर समाप्त करा दिया। इस प्रकार एक हिंदू वीर को क्रूर और सताने अपनी क्रूरता का निवाला बना लिया। इससे औरंगजेब  निश्चिंत हो गया कि अब महाराजा जसवंतसिंह जीवित रहकर भी मृतक के समान हो जाएंगे। क्योंकि उन्हें अपनी मृत्यु के पश्चात अपने राज्य का भविष्य नितांत भयावह दिखायी देने लगेगा और वह चाहकर भी कुछ नही कर पाएंगे। जब महाराजा जसवंतसिंह को इस  दुखद घटना की जानकारी हुई तो उन्हें इतना कष्ट हुआ कि उनकी मृत्यु  हो गयी। वह अटक के उस पार रहकर ही मृत्यु का ग्रास बन गये।  
भारत के तत्कालीन हिंदू समाज के लिए इन दोनों पिता-पुत्रों का इस प्रकार मृत्यु का ग्रास बन जाना बहुत दु:खद घटना है। सारे मारवाड़ और भारत के हिंदू समाज की दृष्टि तब दुर्गादास पर जाकर टिकी। सबको लगा कि इस संकट की घड़ी से दुर्गादास ही किसी प्रकार उबार सकता है। दुर्गादास राठौर ने तब मुगल बादशाह औरंगजेब की इस प्रकार की कृतघ्नता भरी राजनीति से खिन्न होकर शिवाजी के साथ संपर्क कर भारत के स्वाधीनता संग्राम को जिस प्रकार गति प्रदान की -वह भी अपने आप में भारत का एक गौरवशाली इतिहास है। इस प्रकार की गठबंधन वाली राजनीतिक सोच को हमें इस दृष्टिकोण से देखना व समझना चाहिए कि हमने पृथ्वी सिंह और महाराजा जसवंत सिंह को बड़े आराम से नहीं मरने दिया था, बल्कि उसका प्रतिशोध लेने के लिए तत्कालीन क्रूर हुकूमतों से जमकर संघर्ष करने की रणनीति पर देर तक कार्य किया था। दुर्गादास राठौर, शिवाजी, छत्रसाल, बंदा वीर बैरागी आदि सब उस समय के ऐसे भारत रतन थे जो कहीं ना कहीं मुगलों के लिए सिरदर्द बन कर मां भारती की स्वाधीनता के लिए कार्य कर रहे थे। महाराजा जसवंत सिंह ने स्वयं भी छत्रपति शिवाजी से संपर्क साध कर अपने अपमान का बदला लेने का कार्य किया था।

इस प्रकार राजस्थान की इस वीरभूमि से महाराजा जसवंत सिंह, उनके सुपुत्र पृथ्वी सिंह, दुर्गादास राठौर जैसे अनेकों वीर योद्धाओं की कहानी जुड़ी है। इसी कहानी से हमें बंदा बैरागी, छत्रसाल और शिवाजी के संघर्ष को भी जोड़ कर देखना चाहिए और यह समझना चाहिए कि उस समय के हमारे स्वाधीनता संग्राम के सेनानी एक दूसरे के प्रति पूर्णतया संवेदनशील थे और एक दूसरे का हाथ पकड़कर संघर्ष करने की भावना में विश्वास रखते थे। जिनके विषय में पूज्य पिताजी महाशय राजेंद्र सिंह आर्य जी हमें बचपन में ही बताया करते थे, यहां पर आकर उनकी विशेष याद आई। मैंने मन ही मन जहाँ इन वीर योद्धाओं का स्मरण कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की वहीं पूज्य पिताजी के प्रति भी कृतज्ञता ज्ञापित की जिन्होंने इन इतिहास पुरुषों का पावन स्मरण हमें हमारे जीवन की प्रभात में कराया। उनके विषय में विस्तार से मैंने “भारत के 1235 वर्षीय स्वाधीनता संग्राम” नामक अपनी इतिहास श्रंखला में लिखा है।
हमारे वीर योद्धा और पूर्वजों ने अपने राज्य खो दिए , अपनी सत्ता गंवा दी अपने राजसिक सुख वैभव को लात मार दी। उन्होंने जंगलों में जाकर यातना पूर्ण जीवन जिया, गुरिल्ला युद्ध को अपनाया और विदेशियों को भगाने के लिए संघर्ष करते रहे। इसका कारण केवल एक ही था कि उनके भीतर स्वतंत्रता का भाव कूट कूट कर भरा था। उन्होंने सब कुछ खोया लेकिन अपना धर्म और अपनी संस्कृति को बचाए रखा। आज यदि हम जीवित हैं तो उनके इस प्रकार के साहसिक कार्यों के कारण ही जीवित हैं या कहिए कि संसार में सभ्यताओं के संघर्ष में अपना अस्तित्व बचाए और बनाए हुए हैं।

हमें अपने देश के बारे में यह भी समझना चाहिए कि यहां पर कोई आदिवासी या जंगली जाति नहीं रहती है और ना ही अगड़े पिछड़े का कोई पचड़ा है। यह सारी कल्पनाएं अंग्रेजो के द्वारा बनाई गई हैं। भारतवर्ष में ऐसे अनेकों पिछड़े समुदाय या जातियां हैं जिन्होंने किसी काल विशेष में देश की एकता और अखंडता के लिए कार्य किए हैं और विदेशी सत्ता के के विरुद्ध मोर्चे खोले हैं। पर जब समय खराब आया तो वह अपने राज आदि ऐश्वर्यों को खोकर इधर-उधर जंगलों में चले गए। जंगलों में जाने के बाद बाद ये लोग शिक्षा से कट गए और उनके भीतर आर्थिक विपन्नता भी आती चली गई और समय ने उन्हें आज का पिछड़ा बना दिया। आज जब यह लोग अपने लिए आरक्षण की मांग करते हैं तो कई बार बड़ा गलत लगता है कि जो लोग कभी देश के मालिक रहे उन्हें ही आगे आने के लिए आरक्षण जैसे मार्ग को अपनाना पड़ रहा है। यदि इतिहास को सही ढंग से लिखा जाता या सही ढंग से समझा जाता तो अंग्रेजों द्वारा बनाए गए तथाकथित पिछड़ों, दलितों व शोषितों को आरक्षण के स्थान पर संरक्षण देना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता होती। क्योंकि तब सरकारें उनके प्रति किसी प्रकार की राजनीतिक दया का बर्ताव न करते हुए कृतज्ञता का भाव रखकर ऐसा करती।
अब हम भीनमाल को छोड़कर अपने घर के लिए चल दिए हैं गाड़ी में बैठकर चलते-चलते मैं यह पोस्ट लिख रहा हूं। बीच-बीच में श्रीमान तोरणसिंह जी व श्रीनिवास आर्य जी धार्मिक, राजनीतिक व इतिहास संबंधी चर्चा भी कर रहे हैं।
(शेष चर्चा कल )

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

Comment:

Kuponbet Giriş
betgaranti giriş
Teknik Seo
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
milanobet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
winxbet giriş
winxbet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
safirbet giriş
ikimisli giriş
ikimisli giriş
safirbet giriş
ikimisli giriş
safirbet giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
milanobet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
safirbet giriş
safirbet giriş
betpark giriş
ikimisli giriş
betnano giriş
betpas giriş
betpas giriş
safirbet giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betasus giriş
betasus giriş
betpark giriş
betpark giriş
hitbet giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
ikimisli giriş
savoybetting giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
grandpashabet giriş
betorder giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
betpas giriş
betpas giriş
betorder giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
betgaranti giriş
betnano giriş
betpark giriş
galabet giriş
galabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpas giriş
betpas giriş
betorder giriş
betorder giriş
betnano giriş
betnano giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
betnano giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betpas giriş
betorder giriş
betnano giriş
betnano giriş
mariobet giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betnano giriş
betnano giriş
betper giriş
rekorbet giriş
betnano giriş
betticket giriş
betnano giriş
betper giriş
betpark giriş
betpark giriş
savoybetting giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş