वेदों की प्रमुख देन ईश्वर ,जीव तथा प्रकृति विषयक तत्रैतवाद का सिद्धांत

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ओ३म्

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वेद संसार के सबसे पुराने ज्ञान व विज्ञान के ग्रन्थ है। वेदों का आविर्भाव सृष्टि के आरम्भ में इस सृष्टि रचयिता व पालक ईश्वर से हुआ है। ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अनादि तथा नित्य सत्ता है। वह निर्विकार, अविनाशी तथा अनन्त है। सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान होने से वह पूर्ण ज्ञानवान तथा सृष्टि की रचना व पालन करने आदि शक्तियों से युक्त है। जिस प्रकार ईश्वर ने अपनी सर्वव्यापकता, सर्वज्ञता तथा सर्वशक्तिमत्ता से इस संसार को बनाया है उसी प्रकार से उसने सृष्टि के आरम्भ में चार महान-आत्मा-ऋषियों को चार वेदों ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद का ज्ञान भी दिया है। ईश्वर यदि अमैथुनी सृष्टि के मनुष्यों को वेद के द्वारा ज्ञान देने का कार्य न करता तो मनुष्य ज्ञान से युक्त कैसे होते? अर्थात् नहीं हो सकते थे। जिस प्रकार कोई मनुष्य बिना माता, पिता और आचार्यों की शिक्षा के ज्ञानवान व भाषा बोलने योग्य नहीं होते इसी प्रकार से सृष्टि के आरम्भ में ही मनुष्यों के माता, पिता तथा आचार्य की भूमिका को निभाते हुए अपने अन्तर्यामी व जीवस्थ स्वरूप से परमात्मा चार ऋषियों को वेदों की संस्कृत भाषा सहित अपनी सभी सत्य विद्याओं का ज्ञान देते हैं। इस ज्ञान को प्राप्त होकर ही मनुष्य की सर्वांगीण उन्नति होती है। बिना वेद ज्ञान के मनुष्य ईश्वर, जीवात्मा तथा प्रकृति सहित अपने कर्तव्यों, व्यवहारों तथा जीवन की उन्नति के साधनों को नहीं जान पाता है।
आज भी वेदों का ज्ञान अपने आदि व शुद्ध स्वरूप में सुरक्षित एवं उपलब्ध है। वेदों के अध्ययन से आज भी मनुष्यों को ईश्वर व जीवात्मा आदि पदार्थों का सत्यस्वरूप प्राप्त होता है। वेद मनुष्यों को ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना का प्रयोजन व विधि भी बताते हैं जिसके आधार पर ही ऋषियों ने नाना प्रकार के कर्तव्यों सहित सन्ध्या व देवयज्ञ आदि के विधान किये हैं। वेदों से संसार में अनादि काल से विद्यमान ईश्वर, जीव व प्रकृति नामी सत्ताओं के अस्तित्व का बोध होता है। वेदाध्ययन से ज्ञात होता है कि ईश्वर ही इस सृष्टि का निमित्त कारण है जो ज्ञान व अपनी शक्तियों से अनादि उपादान कारण प्रकृति से इस सृष्टि की रचना कर इसे प्रकाशित करते हैं। ईश्वर इस सृष्टि की रचना व निर्माण अपनी अनन्त संख्या वाली चेतन जीवों की प्रजा व सन्तानों के लिए करते हैं। यह जीव रूपी प्रजा ही अपने पूर्वजन्मों के कर्मों का भोग करने तथा अपवर्ग की प्राप्ति के लिए आत्मा की उन्नति कर आनन्द से युक्त मोक्ष को प्राप्त करने के लिए संसार में जन्म लेती हैं और मोक्ष प्राप्ति तक आवागमन वा जन्म-मरण के चक्र में फंसी व बंधी रहती हैं।

संसार में तीन मूल, अनादि, नित्य, अविनाशी, अनन्त सत्ताओं में ईश्वर का मुख्य व प्रथम स्थान है। ईश्वर ही अपनी अनादि प्रजा जीवों के सुख व कल्याण, जिसे भोग व अपवर्ग कहते हैं, के लिए उपादान कारण प्रकृति से इस सूर्य, चन्द्र, पृथिवी, ग्रह, उपग्रह, नक्षत्रादि रूपी विशाल ब्रह्माण्ड की रचना करते व इसका पालन करते हैं। वेदाध्ययन से ईश्वर, जीव व प्रकृति के सत्य स्वरूप का यथार्थ ज्ञान प्राप्त होता है। वेदों पर आधारित आर्ष व्याकरण अष्टाध्यायी-महाभाष्य पद्धति का अध्ययन सहित उपनिषद तथा 6 दर्शन ग्रन्थों का अध्ययन कर भी मनुष्य इन तीनों सत्ताओं के ज्ञान में निर्भ्रांत होता है। ऋषि दयानन्द ने ईश्वर के सत्यस्वरूप का दिग्दर्शन आर्यसमाज के दूसरे नियम में कराया है। ईश्वर कैसा है, इस पर प्रकाश डालते हुए ऋषि दयानन्द ने बताया है कि ‘ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है। उसी की उपासना करनी योग्य है।’ इस नियम के आधार पर ईश्वर का सत्यस्वरूप ज्ञात होता है। यही एकमात्र ईश्वर का सत्यस्वरूप है। अन्य जो बातें इस स्वरूप से अविरुद्ध हैं वह सत्य व जो इसके विपरीत होती हैं, वह असत्य होती हैं। निराकार एवं सर्वव्यापक होने के कारण से ईश्वर की मूर्ति नहीं बन सकती। इसी कारण ऋषि दयानन्द की मान्यता है कि मूर्तिपूजा ईश्वर की उपासना का पर्याय नहीं है। ईश्वर की उपासना तो उसके गुणों, कर्मों व स्वभाव को जानकर उनकी स्तुति करने से ही हो सकती है। उपासना में ईश्वर के गुणों व उपकारों का ध्यान किया जाता है। ऐसा करने से मनुष्य के दुर्गुण छूटते हैं तथा ईश्वर के गुणों के समान मनुष्य के गुण, कर्म व स्वभाव बनने आरम्भ हो जाते हैं। हमारे ऋषि मुनियों का जीवन व गुण ईश्वर के समान व अनुकूल ही होते थे। ईश्वर का ध्यान करते हुए अपने गुणों को ईश्वर के समान बनाना तथा दूसरों के हित, कल्याण, परोपकार आदि के कार्य करना ही उपासना व साधना होती है। ऐसा करते हुए ही उपासक, साधक व भक्त को ईश्वर के सत्यस्वरूप का प्रत्यक्ष व साक्षात्कार होता है। ईश्वर का साक्षात्कार होने से मनुष्य ईश्वर के सत्यस्वरूप के विषय में निर्भ्रांत हो जाता है। उपासना में आत्मा का ईश्वर से सीधा सम्पर्क होने से आत्मा के दुर्गुण, दुःख व दुर्व्यसन भी दूर हो जातें हैं और श्रेष्ठ गुण, कर्म व स्वभाव की प्राप्ति होती है। ऐसा वेद में ईश्वर ने बताया है। इस लाभ व उपलब्धि को प्राप्त करने के लिए ही ईश्वर को जानना व उसकी उपासना करनी होती है। इसी से जीवात्मा व मनुष्य को आत्मा की श्रेष्ठतम गति मोक्ष जो कि सदा आनन्दमय होता है, प्राप्त होती है। इसी को प्राप्त करने के लिए योगी, महात्मा, तपस्वी, उपासक व साधक उपासना, साधना, वेदाध्ययन व वेदाचरण रूपी तप करते हैं।

ईश्वर से इतर संसार में जीव तथा प्रकृति अन्य दो मौलिक, अनादि, नित्य व अविनाशी पदार्थ हैं। इन पदार्थों को ईश्वर ने नहीं बनाया और न ही यह पदार्थ किसी अन्य कारण से बने हैं। जीव मनुष्य ज्ञान में संख्या में अनन्त सत्ता हैं। यह जीव चेतन व अल्पज्ञ हैं जो सूक्ष्म, एकदेशी, ससीम, जन्म व मरण धर्मा, पाप व पुण्य कर्मों को करने वाली व ईश्वर की व्यवस्था से उन कर्मों का फल भोगने वाली सत्ता हैं। वेदज्ञान से आत्मा को ईश्वर, आत्मा तथा प्रकृति के सत्यस्वरूप का बोध होता है तथा सत्कर्म उपासना व परोपकार आदि करने की प्रेरणा मिलती है। उपासना व परोपकार करने से ही आत्मा दुःखों, बन्धनों तथा अवागमन आदि से छूट कर मुक्त होती है और मोक्षावधि 31 नील 10 खरब 40 अरब वर्षों तक मोक्ष में रहकर अवागमन के दुःखों से मुक्त तथा मोक्ष के सुख व आनन्द से युक्त रहती है। संसार की तीसरा मौलिक अनादि पदार्थ प्रकृति है जो कि एक जड़ पदार्थ है। यह त्रिगुणों सत्व, रज व तम गुणों वाली होती है। प्रलयावस्था में यह इन्हीं तीनों गुणों वाली प्रकृति आकाश में सर्वत्र फैली रहती है। प्रलयावस्था में सूर्य आदि प्रकाश देने वाले ग्रहों का अस्तित्व न होने से सर्वत्र अन्धकार होता है। प्रकृति की इस अवस्था में सर्वव्यापक परमेश्वर आकाश में सर्वत्र व्याप्त इस प्रकृति में ईक्षण व प्रेरणा कर सृष्टि निर्माण की प्रक्रिया को आरम्भ करते हैं। हमारी यह स्थूल व जड़ सृष्टि इस प्रकृति में विकार होकर ही अस्तित्व में आयी है। सांख्य दर्शन में इसका वर्णन हुआ है। उसके अनुसार प्रकृति, सत्व=शुद्ध, रजः=मध्य, तमः=जाडय अर्थात् जड़ता तीन वस्तु मिलकर जो एक संघात है उस का नाम प्रकृति है। उस प्रकृति से महत्तत्व बुद्धि, उस से अहंकार, उस से पांच तन्मात्रा सूक्ष्म भूत और दश इन्द्रियां तथा ग्यारहवां मन, पांच तन्मात्राओं से पृथिव्यादि पांच भूत ये चैबीस और पच्चीसवां पुरुष अर्थात् जीव और परमेश्वर है। इनमें से प्रकृति अविकारिणी और महत्तत्व, अहंकार तथा पांच सूक्ष्म भूत प्रकृति का कार्य और यह ज्ञान व कर्म इन्द्रियों, मन तथा स्थूल भूतों का कारण हैं। पुरुष अर्थात् आत्मा व ईश्वर न किसी की प्रकृति, उपादान कारण और न किसी का कार्य है। इस प्रकार ईश्वर सृष्टि के उपादान कारण प्रकृति से अपनी सर्वज्ञता, सर्वव्यापकता तथा अपने सर्वशक्तिमान स्वरूप से सृष्टि का निर्माण करते हैं। अतः ईश्वर ही इस जगत के एकमात्र निमित्त कारण, जगत को बनाने वाले तथा इसके स्वामी सिद्ध होते हैं।

इन तीन ईश्वर, जीव तथा प्रकृति सत्ताओं के अतिरिक्त संसार में अन्य किसी चेतन व भौतिक सत्ता का अस्तित्व नहीं है। इन तीनों सत्ताओं का सत्यस्वरूप हमें वेदों व वैदिक साहित्य से ही विदित हुआ व होता है। अतः हमें श्रद्धपूर्वक वेद, उपनिषद, दर्शन आदि ग्रन्थों सहित ऋषि दयानन्द के सत्यार्थप्रकाश तथा ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका आदि ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिये। इससे हमारे सत्य ज्ञान में वृद्धि होगी और हम निशंक होकर अपने जीवन को भोग एवं अपवर्ग की प्राप्ति के अनुरूप ढालकर इन्हें प्राप्त होकर अपना कल्याण कर सकते हैं। हमने लेख में संसार की तीन अनादि व नित्य सत्ताओं का वर्णन किया है। इसे सभी मनुष्यों को जानना चाहिये और वेदविहित अपने कर्तव्य कर्मों को करना चाहिये। इसी से हमारा कल्याण होगा। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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