भारत की आर्थिक समृद्धि का स्वरूप : भाग -1

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द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की अवधि में तथाकथित तीसरी दुनिया के देशों के विकास का प्रश्न सामने लाया गया, तब तक इन बुनियादी विश्वासों की प्रामाणिकता पर प्रश्न उठाने की सोचना तक किसी के वश में नहीं बचा था। विद्वानों और राजनोताओं की इस दृष्टि का प्रमाण है-तीसरी दुनिया के देशों की विकास योजनाएँ। अधिक विस्मयप्रद एवं पीड़ाप्रद तथ्य यह है कि आज भी हमारे समाजवैज्ञानिकों के बीच ऐसी कोई जिज्ञासा एवं गवेषणा की वृत्ति सामान्यत: पाई नहीं जाती जो इन ‘स्वीकृत विश्वासोंÓ की प्रामाणिकता को जाँचने की दिशा में तत्पर हो। कुछेक अपवाद विद्वान हैं, जिनके विशिष्ट अध्ययनों द्वारा उपनिवेशीकरण से पहले की भारतीय व्यवस्थाओं के ऐसे तथ्य सामने आये हैं जो इन सर्वस्वीकृत हो चले विश्वासों पर प्रश्न खड़ा करते हैं। परन्तु अधिकांश समाजवैज्ञानिक तो उन धारणाओं की वैज्ञानिक दृष्टि से प्रामाणिकता जांचने की कभी इच्छा तक नहीं करते देखे जाते, जिन धारणाओं में वे दीक्षित हो चुके हैं।
*तत्कालीन भारत का समुद्रमार्गीय व्यापार*
उदाहरणार्थ, यहाँ 18वीं शती ईस्वी के भारत के केवल एक पहलू की चर्चा करें- उसके समुद्रमार्गीय व्यापार की। तत्कालीन तथ्य ये हैं कि-
(1) इस बात के प्रचुर साक्ष्य हैं कि 18वीं शताब्दी के एशियाई समुद्रमार्गीय व्यापार में यूरोप का हिस्सा नगण्य रहा है- यदि उसे समस्त व्यापार के अनुपात में तथा सही परिप्रेक्ष्य में रखकर देखा जाए।
(2) 17वीं-18वीं शती ई. में यूरोपीय जल मार्गीय व्यापारकर्ता (सरकारी और प्राइवेट दोनों ही प्रकार के) प्राय: एशियाई सौदागारों के मोहरे मात्र होते थे।
(3) वान ल्योर की टिप्पणी है कि एशिया में 18वीं शती पूरी तरह ‘एशियाई शताब्दीÓ थी, यूरोप की उसमें बहुत मामूली भूमिका थी।
(4) रादरमुंड बताते है कि भारत के समुद्र तटवर्ती इलाकों में उन दिनों पूरी तरह स्थानीय भारतीय शासकों का नियंत्रण रहता था। जलमार्गीय व्यापार पूरी तरह भारतीय व्यापारियों के नियंत्रण में ही था। यह व्यापार लगभग नि:शुल्क था और शांतिपूर्ण था। समुद्री डकैत यदा-कदा गड़बड़ी मचाते।
यूरोपीय लोग भी इन्हीं डकैतों के जैसे कार्य करते थे तथा उनकी हैसियत इन डकैतों जैसी ही थी। इसीलिए उस शताब्दी में जो यूरोपीय सक्रिय दिखते भी हैं, वे कुतूहल का ही विषय माने जाते हैं और उनके प्रति मैत्रीपूर्ण भाव और संदेह तथा अविश्वास का भाव सम्मिलित रूप में मौजूद दिखता है।
परंतु उस काल के बारे में लिखी गई इतिहास पुस्तकें तो ल्योर के शब्दों में ‘इन सभी ऐतिहासिक संदर्भों एवं तारतम्य को पूरी तरह अनदेखा करके लिखी गई हैं।Ó होल्डेन फर्बर भी यही कहते हैं कि ‘एशिया में यूरोप की दखलन्दाजी को यूरोप के आर्थिक इतिहास का अंग मानकर देखने की यूरोप में प्रथा है। परंतु एशिया के समुद्रमार्गीय व्यापार के इतिहास को भलीभाँति जाने बिना यूरोपीय दखलंदाजी का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। एशिया के समुद्रमार्गीय व्यापार का विषय इतना विराट है कि कई पीढिय़ों के सतत अध्यवसाय के बाद ही एशिया के व्यापार-वाणिज्य का इतिहास पूरी तरह समझा जा सकता है।Ó ‘उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद से गहरी संलग्नता के ही क्रम में यूरोप और पश्चिम को अति विकसित मानकर उसके समकक्ष एशिया को अल्पविकिसित या अविकसित मानने की धारणा सामने आई है।
वस्तुत: भारत के समुद्रमार्गीय व्यापार का यह दृष्टांत हमने सप्रयोजन चुना है इसके अनेक कारण हैं। मुख्य कारण तो यह है कि 18वीं शताब्दी के भारत पर काम करने वाले विद्वानों का इस विषय पर अत्यधिक ध्यान जाता रहा है, तथापि इसे सम्यक परिप्रेक्ष्य में रखकर नहीं देखा गया। इसका एक कारण यह है कि अगर इस एक मुद्दे को ही हम देख लें कि कैसे-कैसे विस्मयकारी विवरण उद्घाटित हो रहे हैं तो सम्बन्धित विषय-क्षेत्रों के समुद्र में गहरे गोता लगाने के परिणाम सहज ही सोचे जा सकते हैं।
यहाँ एक सजगता का आग्रह आवश्यक है। अधिकांश अनुसंधान जो इस विषय पर सामने आये हैं, वे विविध ईस्ट इंडिया कम्पनियों के अभिलेखों एवं पंजिकाओं में संग्रहीत सूचनाओं पर ही आधारित है। इन अभिलेखों एवं पंजिकाओं में वस्तुत: उन कम्पनियों के रोजाना के विचार-विमर्श, मुख्यालयों को भेजे गए ‘डिस्पैच,Ó खतो-किताबत, संस्मरण वगैरह ही है। अत: उन पर आधारित अध्ययनों की सीमाएॅं स्पष्ट है।
उदाहरणार्थ, के.एन. चौधरी की ‘टे्रडिंग वल्र्ड ऑव एशियाÓ तथा अन्य पुस्तकें अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी के अभिलेखों पर आधारित है। इसी प्रकार ए. दासगुप्ता की पुस्तकें ‘मलाबार इन एशियन ट्रेड 1740-1800 तथा ‘इंडियन मर्चेन्ट्स एंड द डिक्लाइन ऑव सूरत 1700-1750Ó भी (जो भारतीय सौदागरों की क्रियाशीलताओं को लेकर है) अंग्रेजों और डचों के स्रोतों पर आधारित हैं। इसी तरह, जे.सी. वान ल्योर की इंडोनेशियाई व्यापार एवं समाज संबंधी पुस्तक भी डच स्रोतों पर आधारित है। रादरमुंड ने अपनी कृति ‘एशियन टे्रड एण्ड यूरोपियन एक्सपेंशन इन द एज ऑफ मर्केंटाइलिज्मÓ में उनकी विस्तृत सूची प्रस्तुत की है। फर्बर के पूर्वोद्धृत शब्दों को यहां पुन: स्मरण कर लें: ‘यूरोपीय दृष्टिकोण एवं यूरोपीय प्रेक्षण अवस्थिति से विश्लेषित करने की प्रक्रिया प्रारंभ से ही रही। उसके कारण एशिया में यूरोप के अनधिकृत प्रवेश का सम्यक मूल्यांकन सम्भव नहीं। एशिया के व्यापार का इतिहास तो विराट है। वह पूरी तरह तो कई पीढिय़ों के अध्यवसाय के बाद ही समझा जा सकेगा।
स्पष्ट है कि ईस्ट इंडिया कम्पनियों के जिन अभिलेखों और रजिस्टरों, संस्मरणों आदि पर ये अध्ययन आधारित हैं उन सब दस्तावेजों का संदर्भ उन विदेशी सौदागरों, पर्यटकों, प्रशासकों आदि की एशिया में अपना व्यापार बढ़ाने की सम्भावनाएॅं एवं समस्याएँ ही है। स्वयं एशिया के जलमर्गीय व्यापार या आर्थिक स्थिति के विवरण प्रस्तुत करना उन दस्तावेजों का विषय ही नहीं। फिर, भारत जैसे विराट देश के जलमार्गीय व्यापार का इतिहास, रादरमुंड के शब्दों में, इन ‘फेरीवालों (पेडलर) के ब्यौरों से नहीं जाना जा सकता। यूरोपीय सौदागारों को इस विषय की जानकारी के एकमात्र स्त्रोत की तरह मानकर उन्हीं पर निर्भर हो जाने पर पर्याप्त प्राथमिक जानकारी तक सम्भव नहीं है। उनसे यथार्थ की एक झलक तो मिल सकती है, पर स्वयं यथार्थ की सम्यक जानकारी उनसे नहीं मिल सकती। वे उस विराट जानकारी को उस समय जान-समझ सकने की हैसियत में ही नहीं थे।
इस पर भी, उन विदेशी सौदागरों, पर्यटकों और प्रशासकों के आत्मकेन्द्रित एवं यूरोपीय नजरिए वाले ब्यौरों से भी, एशिया के जलमार्गीय व्यापार का, जिसमें भारत की निश्चय ही केन्द्रीय स्थिति थी जो चित्र उभर कर आता है वह एकजीवंत प्राणवान सुविकसित अर्थव्यवस्था का चित्र है, जिसमें विविध बंदरगाहों और भौगोलिक क्षेत्रों के बीच जलमार्ग से होने वाले माल और मनुष्यों के व्यापक तथा नियमित यातायात के प्रमाण मिलते हैं। इस प्रकार इन विदेशी फुटकर और सीमित संदर्भों के द्वारा भी 18वीं शताब्दी ईस्वी की भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में कतिपय बहुप्रचारित भ्रांत धारणाएँ ध्वस्त हो जाती हैं। आरंभ में जो यूरोपीय यात्री एशिया आए, उनमें से लगभग हर एक ने हिंद महासागर के आसपास व्याप्त अत्यन्त महत्वपूर्ण व्यापारिक वाणिज्यिक केन्द्रों की चर्चा की है और उनसे जुड़े व्यापार मार्गों, सौदागरों तथा सौदे के लिए लाई-ले जा रही वस्तुओं के पर्याप्त विवरण दिए हैं। उन पर्यटकों ने एशियाई बन्दरगाहों को जो वजन और महत्व दिया, वैसा ही वजन और महत्व डच और अंग्रेज ईस्ट इंडिया कंपनी के अफसरों-कर्मचारियों ने इन बातों के अपने विवरण में दिया।
यहाँ तक कि फ्रेंच कम्पनी- ‘द सेकंड कम्पेनी डेस इन्डेस ने भी देशी जलमार्गीय व्यापार के विवरण में खूब रुचि ली, यद्यपि यह कंपनी एशियाई व्यापार में उल्लेखनीय रूप में प्रवेश काफी देर से ही पा सकी थी। उस कंपनी के एक पदाधिकारी विन्सेन्स ने 1733 ई.में इस बारे में एक ज्ञापन तैयार किया। वह ज्ञापन 1730 के दशक में हिंद महासागर में चल रहे समुद्रमार्गीय व्यापार के सर्वाधिक विशद एवं व्यवस्थित विवरणों में से एक है।
इस विषय पर शोधकर्ताओं में से किसी ने भी मुगल रियासतों के दस्तावेजों का समुचित उपयोग नहीं किया है। जबकि कम्पनियों के ‘डिस्पैचÓ में स्पष्ट एवं निश्चित संदर्भ हैं कि सूरत, हुगली, बलसोर आदि बंदगाह से जुड़े शहरों के मुगल शाही अधिकारी बड़ी ही सावधानी से आयात-निर्यात के विशद अभिलेख सुरक्षित रखते थे। इन कम्पनियों के मुख्यालयों के स्थायी निर्देश थे कि कम्पनियॉं भारतीय बन्दरगाहों के मुगल शाही अधिकारियों द्वारा फारसी में नियमित लिखे जा रहे, जहाजों के यातायात रजिस्टरों के अनुवाद करके अपने-अपने (यूरोपीय) केंद्रीय मुख्यालयों को समय-समय पर लगातार भेजती रहें।
इन रजिस्टरों द्वारा ‘स्थानीय व्यापारÓ यानी भारत के विभिन्न क्षेत्रीय व्यापार की मात्रा और झुकाव यानी व्यापार की दिशा का ज्ञान होने की आशा थी। बंदरगाहों के मुगल अधिकारियों द्वारा फारसी में लिखित कस्टम रजिस्टर की डच प्रतियों में सूरत और हुगली बंदरगाहों के माल-जहाजों का विवरण है और हर जहाज के मूल बंदरगाह का नाम, जहाज का नाम, जहाज के मालिक का नाम आदि स्पष्ट ब्यौरेवार दर्ज है।
डच कम्पनियों के द्वारा जिनकी प्रतिलिपियाँ (नकलें) तैयार की गईं, ऐसा तत्कालीन राजकीय अभिलेखों में से कई आज भी हेग स्थिति अभिलेखगारों में सम्भत: अब भी सुलभ हैं। इन अभिलेखों को ध्यान से पढऩे पर 18वीं शताब्दी के भारत की समझ अधिक स्पष्ट हो सकती है। वे अभी भी सुरक्षित हैं या नष्ट कर डाली गईं?, पता नहीं। यदि नष्ट कर डाली गईं तब तो उन दिनों की सच्चाई का बड़ा उल्लेखनीय अंश हमारे लिए अज्ञात ही रह जायेगा।
बहरहाल, जो तथ्य उपलब्ध हैं वे भी तत्कालीन भारतीय एवं एशियाई जलमार्गीय व्यापार की विराटता, सुव्यवस्था एवं सामथ्र्य का प्रमाण हैं। उन अभिलेखों और विवरणों से ‘यूरोपीय जलमार्गीय उद्यमोंÓ के उस तथाकथित गतिशील विकास की सच्चाई प्रकट होती है जो एशियाई दृष्टि से वस्तुत: एक हाशिये की चीज भर थे परंतु आधुनिक यूरोपीय तो अपने जलमार्गीय व्यापार की गतिशीलता की चर्चा करते समय कभी-भी अरब, चीनी एवं अन्य एशियाई सौदागारों का कोई उल्लेख ही नहीं करते।
सार यह कि 18वीं शताब्दी ई. के भारत का ज्ञान, अब तक बहुत थोड़े से, चयनित दस्तावेजों पर आधारित और सीमित है। ये दस्तावेज जो तथ्य हमें सुलभ कराते है, उनके बारे में प्रसिद्ध इतिहास चिंतक ई.एच. कार द्वारा अपनी महत्वपूर्ण पुस्तक ‘वॉट इ•ा हिस्टॅरिÓ में कहे गए ये शब्द पूरी तरह लागू होते हैं-
‘तथ्य कोई मछुआरों की पटिया पर पड़ी हुई मछलियों जैसे नहीं होते। वे तो विराट और दुर्गम सागर में तैर रहीं मछलियों जैसे होते हैं। इतिहासकार उनमें से क्या कितना पकड़ पाता है, यह इस पर निर्भर है कि वह सागर के किस हिस्से में जाल डाल रहा है और किन कील-कांटों का इस्तेमाल कर रहा है। ये दोनों ही बातें, वस्तुत: इस पर निर्भर होती हैं कि वह सचमुच किस प्रकार की मछलियाँ पकडऩा चाहता है। मोटे तौर पर इतिहासकार वे ही तथ्य प्राप्त करता है जो वह पाना चाहता है।Ó

*अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार और भारत*
जलमार्गीय व्यापार के इसी क्रम में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में भारत की तत्कालीन स्थिति का प्रसंग उपस्थित हो जाता है। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को अर्थव्यवस्था का विशेष परिष्कृत पहलू माना जाता है। वस्तुत: अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मूल्य-विभेदक क्रियाकलाप है, जिसे दामों के चलन-कलन के रूप में देखा जा सकता है।

*इंग्लैंड की कंगाली से चिंतित व्यापारी*
यदि हम 17वीं एवं 18वीं शताब्दी ईस्वी में भारत के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के ब्यौरों का अध्ययन करें तो पाते है कि उस व्यापार की सर्वाधिक उल्लेखनीय विशेषता यह है कि भारत में सारे संसार से बहुमूल्य धातुओं का एक अंतहीन प्रवाह बहता चला आ रहा है। ये धातुएँ भारतीय व्यापारियों एवं बिचौलियों को भारत की श्रेष्ठ वस्तुएँ विश्व भर में बिक रही होने के कारण उनके दामों के भुगतान के रूप में मिल रही हंै। जहाँ तक यूरोप की बात है, यूरोप से प्राय: कोई वस्तु-विनिमय उस व्यापार में नहीं हो रहा था, बल्कि वे देश भारतीय माल का दाम-भुगतान नगद धन से ही कर रहे थे। वस्तुत: 17वीं-18वीं शती ईस्वी में एशिया के अधिकांश देश यूरोप का कोई माल नहीं खरीद रहे थे। अगर कोई एशियाई देश यूरोपियनों से उनके यहॉं अपनी चीजों के विनिमय में कुछ माल यानी वस्तुएँ खरीदता भी था तो वे एशिया के ही अन्य देशों में बनी वस्तुएॅं होती थीं। इग्लैंड के पुराने सर्राफा व्यापारी, जो सोना-चांदी आदि बहुमूल्य धातुओं को ही किसी देश की सच्ची सम्पदा मानते थे, इस बात से बेहद चिंतित थे कि एशिया समृद्धतर होता जा रहा है, जबकि इंग्लैंड और यूरोप इस तरह के (बहुमूल्य धातुओं के) हस्तांतरण के कारण कंगाल होते जा रहे हैं। 19वीं शताब्दी ईस्वी में भारत सहित एशियाई देशों के व्यापार के दो स्पष्ट विभाग थे, (1) निर्यात क्षेत्र (2) आंतरिक उत्पादक-क्षेत्र। 17वीं एवं 18वीं शती ईस्वी में भारत आदि एशियाई देश यूरोप की बनी किसी भी वस्तु को आयात के योग्य नहीं मानते थे अत: इंग्लैंड आदि से किसी भी वस्तु का आयात यहाँ किया ही नहीं जा सकता था।

*उन्नत समृद्ध भारत*
स्पष्टत: इससे एक जीवंत समृद्ध भारतीय अर्थव्यवस्था का स्वरूप उभरकर सामने आता है, जिसमें उत्पादन की प्रक्रियाएँ, तकनीकी दक्षता एवं कौशल तथा कम लागत के श्रेष्ठ संतुलन के कारण उत्कृष्ट गतिशीलता है। दूर-दूर के व्यापार की दृष्टि से भारतीय उपमहाद्वीप की पूरे इतिहास में सदा ही प्रमुख भूमिका रही है। स्वयं उपमहाद्वीप के अपने भौगोलिक एवं राजनैतिक इलाकों के बीच एक सक्रिय अंत: क्षेत्रीय व्यापार-वाणिज्य विद्यमान था, जो आर्थिक विशेषता की उन्नत स्थिति बनाये रखने में सहायक होता था। इसी के कारण राजाओं , सम्राटों और बादशाहों के सार्वजनिक व्यय भी उच्चस्तरीय होते थे। जिसके कारण आसपास या दूरदराज के भी उन योद्धा शासकों को, जो अपेक्षाकृत कम अच्छी स्थितियों में रह रहे थे, ईष्र्या होती थी, आकर्षण होता था और आक्रमण का लोभ भी होता था। वस्तुत: यूरोप के माल की बिक्री में कितनी मुश्किलें होती थीं, इसके ब्यौरे ईस्ट इंडिया कम्पनी के अभिलेखों में भरे पड़े हैं जो अपने ऊनी कपड़ों और धातुओं की कम बिक्री का बारम्बार रोना रोती हैं-
‘अनेक यूरोपीय फैक्टरियों के मालगोदाम की देख-रेख या प्रबंध का काम ऐसा था, जिससे सभी बचना चाहते थे। जब कभी कम्पनियों का माल फैक्टरी के गेट पर खुली बोली लगाकर बेचा जाता, तब प्राय: आखिर में फैक्टरी के चपरासी-चौकीदार आदि, भारी बोझ ढोकर ‘गोदामÓ में वापस ले जाने को विवश होते थे। यह काम इतना उबाऊ था कि प्राय: लागत-दाम पर या लागत से भी कम दाम पर स्थानीय प्रमुख सौदागरों को माल बेचने में फैक्टरी वालों को कोई झिझक नहीं होती थी, बशर्ते उसके एवज में इन प्रमुख व्यापारियों का ‘सद्भावÓ मिलने की आशा हो। घड़ी से लेकर शिकारी कुत्तों तक अनेक यूरोपीय माल प्राय: मुनाफे के लिए नहीं, बल्कि अनुग्रहदृष्टि पाने के लिए दिए जाते थे। स्थानीय सौदागर भी बदले में, यूरापीयों से ऐसी कई वस्तुएँ खरीद लेते थे, जो बिकती नहीं थीं, पर वे इस आशा से खरीद लेते कि मधुर सम्बन्ध रहने पर इन यूरोपीयों से भविष्य में कभी कुछ लाभ हो सकता है। यूरोपीय व्यापारियों के जो माल उन दिनों भारत में कुछ ठीक से बिक रहे थे, वे कम्पनियों के उत्पाद बिल्कुल नहीं थे, बल्कि एशियाई सामान ही थे। वे थे- चाकू, छुरे, सुइयाँ, कैंचियाँ, भोजन पकाने के बर्तन आदि घरेलू सामान तथा सर्वाधिक बिक्री होती थीं सामरिक एवं समुद्री व्यापार के काम की चीजें। तीन शताब्दियों तक तो यूरोपीय व्यापारी एशिया में थोड़ी-सी ऐसी ही चीजें तथा धातुएँ और बड़ी मात्रा में अमेरिकी चाँदी लेकर पहुँचते तथा कई तरह के भारतीय माल लेकर वापस जाते।Ó
कनिंघम ने लिखा है – ‘जैसा कि भूमध्य सागरीय देश अज्ञात काल से करते रहे हैं, अंग्रेज भी विवश हुए कि व्यापार करना है तो सोना-चाँदी का निर्यात भारत को करो और वहाँ से चीजें तथा रूपया लाओ।Ó
पुर्तगीजों के समुद्रमार्गीय भारतीय व्यापार के जो ब्यौरे हैं, उनसे ज्ञात होता है कि एशियाई, अफ्रीकी और अमेरिकी देशों के साथ भारत का व्यापार व्यापक, सघन तथा नियमित था और विविध प्रकार की वस्तुओं का व्यापार होता था। ‘पुर्तगीजों ने आश्चर्य के साथ यह देखा कि भारत का समुद्रमार्गीय व्यापार बहुत ही जीवन्त एवं सक्रिय था तथा वह व्यापार काली मिर्च-पीपरामूल जैसी चीजों तक सीमित नहीं था वरन बहुत सारी अन्य चीजों का भी व्यापार होता था।Ó

……क्रमशः,
कल भारत के महान व्यापारी और इस एशियाई व्यापार में यूरोप की भूमिका पर चर्चा…
✍🏻साभार – भारतीय धरोहर

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