images (39)

धन्वन्तरि का इतिहास-धन-त्रयोदशी को धन्वन्तरि-जयन्ती भी कहा जाता है। इतिहास में कई धन्वन्तरि हुये हैं, जिनमें २ कलियुग के पूर्व थे। धनु चाप के आकार का होता है जिससे बाण छोड़ते हैं। इसी प्रकार के यन्त्र द्वारा शरीर से शल्य निकालते हैं अतः शल्य चिकित्सक को धन्वन्तरि कहा गया है। शल्य चिकित्सा तथा आयुर्वेद कई विद्याओं का समन्वय है अतः चिकित्सक को वैद्य (विद्या युक्त) कहते हैं। आज भी डाक्टर का अर्थ चिकित्सक या शोध करने वाला भी होता है। इसी अर्थ में इसके अध्येता को सुश्रुत (श्रुति = वेद का विद्वान्) कहा गया है। कालक्रम से इन धन्वन्तरि का वर्णन है-


(१) समुद्र-मन्थन के समय-राजा बलि ने इन्द्र के ३ लोकों (रूस, चीन, भारत) पर अधिकार कर लिया था। मक्का (मख-मेदिनी = मक्का, मदीना) में उनका यज्ञ हुआ। यह राजसूय यज्ञ था जिसमें प्रजा से कर वसूल कर उसका पुनः लोकहित में प्रयोग होता है, जैसे मेघ समुद्र से जल लेकर उसे पुनः लोगों के लिये वर्षा करते हैं-
प्रजानामेव भूत्यर्थं स ताभ्यो बलिमग्रहीत्। सहस्रगुणमुत्स्रष्टुमादत्ते हि रसं रविः॥ (रघुवंश १/१८)
कृष्णं नियानं हरयः सुपर्णा आपो वसाना दिवमुत्पतन्ति।
त आववृत्रन् त्सदनादृतस्यादिद घृतेन पृथिवी व्युद्यते॥ (ऋक् १/१६४/४७)
देवों का यज्ञ भाग असुरों को जा रहा था जैसा पराधीनता में होता है। वामन अवतार विष्णु ने जब ३ पद भूमि मांगी तो बलि ने तुच्छ जानकर दे दिया। यहां विष्णु का १ पद विषुव से कर्क रेखा तक की गति है। उत्तरी ध्रुव तक इस पद से २ ही पद पूर्ण होते हैं। तीसरा पद ध्रुव-वृत्त में आयेगा, जो बलि का सिर (उनकी अधिकृत भूमि का उत्तरतम भाग) कहा गया है। देव उतने निर्बल नहीं थे। युद्ध से बचने के लिये बलि ने इन्द्र का राज्य वापस कर दिया। पर कई असुर सन्तुष्ट नहीं थे और युद्ध चलते रहे। कूर्म अवतार विष्णु ने समझाया कि युद्ध द्वारा दूसरे देशों पर कब्जा करने से की लाभ नहीं है। यदि उत्पादन नहीं बढ़ेगा तो किस सम्पत्ति पर अधिकार होगा? उनकी सलाह मान कर असुरों ने देवों के साथ खनिज निकालने में सहयोग किया। असुर खनिज निकालने में दक्ष थे अतः उन्होंने खान के भीतर काम किया जो वासुकि नाग का गर्म मुंह कहा गया है। यह मुख्यतः छोटानागपुर में हुआ जहां मन्दार पर्वत पर वासुकिनाथ तीर्थ है। बाद में राजा सगर ने उस क्षेत्र के यवनों को ग्रीस भगाया अतः आज भी ग्रीक भाषा में जो खनिजों के नाम हैं वही छोटानागपुर के पूर्व असुरों की उपाधि हैं। वासुकिनाग का क्षेत्र होने से नागपुर तथा अच्युच-च्युत इन्द्र का क्षेत्र होने से च्युत = चुतिया =छोटा (अंग्रेजी उच्चारण) नागपुर हुआ। देव विरल खनिजों से धातु निकालने में दक्ष थे अतः जिम्बाबवे का सोना (जाम्बूनद स्वर्ण) तथा मेक्सिको की चान्दी निकालने में योग दिया (माक्षिकः = चान्दी)। पुनः खनिज सम्पत्ति के वितरण को लेकर युद्ध हुये तब कार्त्तिकेय ने असुरों को पराजित कर क्रौञ्च द्वीप (उत्तर अमेरिका) पर अधिकार किया। इन सभी घटनाओं के समय असुर राजा बलि ही थे अतः उनको ७ चिरजीवियों में गिना गया है। कार्त्तिकेय का समय महाभारत वन पर्व (२३०/८-१०) में निर्दिष्ट है। उस समय उत्तरी ध्रुव की दिशा अभिजित् से दूर हट गयी अर्थात् अभिजित् का पतन हो गया। तब धनिष्ठा से वर्ष आरम्भ हुआ। यह १५,८०० ई.पू. का काल है जब धनिष्ठा आरम्भ से वर्षा आरम्भ होती थी अतः सम्वत्सर को वर्ष कहा गया। इसी समुद्र मन्थन के १४ रत्नों में एक अमृत है जिसका कलश लेकर धन्वन्तरि निकले थे। उस समय लगातार युद्ध हुये, उसके घायल चिकित्सा के बिना मर रहे थे अतः शल्य चिकित्सा का व्यापक प्रयोग कर आहत लोगों की प्राण रक्षा हुयी। यही अमृत कलश है। इस परम्परा में राजा ययाति काल के शुक्राचार्य भी मृत सञ्जीवनी विद्या जानते थे।
(२) धन्वन्तरि द्वितीय काशीराज दिवोदास थे जिनका उल्लेख सुश्रुत संहिता, अध्याय १ में हुआ है-
अथातो वेदोत्पत्तिमध्यायं व्याख्यास्यामः॥१॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः॥२॥
अथ खलु भगवन्तममरवरं ऋषिगण परिवृतमाश्रमस्थं काशिराजं दिवोदासं धन्वन्तरिं औपधेनव-वैतरणौरभ्रपौष्कलावत-
करवीर्य (र) गोपुर रक्षित सुश्रुत प्रभृतय ऊचुः॥३॥
एवमयमायुर्वेदोऽष्टाङ्ग उपदिष्यते, अत्र कस्मै किमुच्चतामिति॥९॥
त ऊचुः-अस्माकं सर्वेषामेव शल्यज्ञानं मूलं कृत्वोपदिशतु भगवानिति॥१०॥
त ऊचुर्भूयोऽपि भगवन्तम्-अस्माकमेककमतीनां मतमभिसमीक्ष्य सुश्रुतो भगवन्त प्रक्ष्यति, अस्मै चोपदिश्यमानं वयमप्युपधारिश्यामः॥१२॥
= काशीराज धन्वन्तरि ने शिष्यों के अनुरोध पर आयुर्वेद की ८ शाखायें पढ़ाई, जिसमें शल्य चिकित्सा पर अधिक जोर था।
सभी शिष्यों के विचारों का संकलन सुश्रुत ने किया, अतः इसे सुश्रुत संहिता कहा गया।
ब्रह्माण्ड पुराण में इनको समुद्र मन्थन काल के धन्वन्तरि का अवतार कहा गया है-
आयोः पुत्रा महात्मानः पञ्चैवासन् महाबलाः।१।
नहुषः प्रथमस्तेषां क्षत्रवृद्धस्ततः स्मृतः। रम्भो रजिरनेनाश्च त्रिषु लोकेषु विश्रुताः॥२॥
क्षत्रवृद्धात्मजश्चैव सुनहोत्रो महायशाः। सुनहोत्रस्य दायादस्त्रयः परमधार्मिकाः॥३॥
काशः शलश्च द्वावेतौ तथा गृत्समदः प्रभुः।४।
काश्यश्च काशिपो राजा पुत्रो दीर्घतपास्तथा। धन्वश्च दीर्घतपसो विद्वान्धन्वन्तरिस्ततः॥७॥
धन्वन्तरेः सम्भवोऽयं श्रूयतामिति वै द्विजाः। स सम्भूतः समुद्रान्ते मथ्यमानेऽमृते पुरा॥१०॥
उत्पन्नः कलशात्पूर्वं सर्वतश्च श्रिया वृतः। सद्यः संसिद्धकार्यं तं दृष्ट्वा विष्णुखस्थितः।।११॥
अब्जस्त्वमिति होवाच तस्मादब्जस्तु स स्मृतः॥१२॥ अथ वा त्वं पुनश्चैव ह्यायुर्वेदं विधास्यसि॥१८॥
द्वितीये द्वापरे प्राप्ते सौनहोत्रः स काशिराट्॥ पुत्रकामस्तपस्तेपे नृपो दीर्घतपास्तथा॥२०॥
तस्य गेहे समुत्पन्नो देवो धन्वन्तरिस्तदा॥२३॥ (ब्रह्मांड पुराण २/३/६७)
इस काल में दाशराज युद्ध हुआ था जिसका समय प्रायः ७३०० ई.पू. अनुमानित है। मान्धाता का पुत्र पुरुकुत्स, दिवोदास पुत्र सुदास का समकालीन था। मान्धाता का काल १५ वां त्रेता कहा गया है (वायु पुराण ९८/८८-९१)। ९१०२ ई.पू. तक १० त्रेता पूरे हो चुके थे। उसके बाद १ दिव्य वर्ष = ३६० वर्ष का १ युग-खण्ड लेने पर १५वें त्रेता का आरम्भ ९१०२-४x३६० = ७६६२ ई.पू. में होगा जो ७३०२ ई.पू. तक चलेगा। मान्धाता की १८ पीढ़ी बाद राजा बाहु यवन आक्रमण में मारा गया था जिसका काल मेगास्थनीज ने बाक्कस = डायोनिसस आक्रमण काल कहा है। यह जुलाई ३२६ ई.पू. के सिकन्दर आक्रमण से ६४५१ वर्ष ३ मास पूर्व अर्थात् ६७७७ ई.पू. अप्रैल में था। बाक्कस की १५ पीढ़ी बाद परशुराम (विष्णु अवतार) काल कहा है, जिनके देहान्त के बाद ६१७७ ई.पू. में कलम्ब सम्वत् आरम्भ हुआ जो आज भी केरल में चल रहा है। परशुराम काल १९वां त्रेता कहा है, जो ९१०२-८x३६० = ६२२२ ई.पू. में आरम्भ होकर ३६० वर्ष चला। इस काल में भी दाशराज नाम से व्यापक युद्ध हुये अतः शल्य चिकित्सा की बहुत आवश्यकता हुयी।
पारसी इतिहास में भी ९८४४ ई.पू. में यम-वैवस्वत काल में जल प्रलय का आरम्भ कहा है उसके बाद ४ वंशों का शासन २५९८ वर्ष तक चला (७२४६ ई.पू. तक)। तब विस्तास्प ने १२० वर्ष राज्य किया। इसे ऋग्वेद में दाशराज युद्ध का ऋज्राश्व कहा गया है (ऋक् १/१०० आदि)।
(३) कलियुग के धन्वन्तरि-
(क) परीक्षित को जब तक्षक नाग ने काटा था (३०४२ ई.पू.) तब भी एक धन्वन्तरि थे जो उनकी चिकित्सा करने में सक्षम थे। उनको घूस दे कर हटा दिया गया-
सप्ताहे समतीते तु गच्छन्तं तक्षकं पथि। धन्वन्तरिर्मोचयितुमपश्यद् गन्तुको नृपम्॥१०६॥
ब्रह्म वैवर्त पुराण (अध्याय २/४६)
(ख) भविष्य पुराण प्रतिसर्ग पर्व ३, अध्याय ९,२०,२१ में कहा है कि समुद्र-मन्थन काल के धन्वन्तरि का जन्म काशी के कल्प ब्राह्मण के पुत्र रूप में हुआ जिन्होंने क्षत्रिय शिष्य सुश्रुत को कल्प-वेद (व्यावहारिक शल्य विज्ञन) पढ़ाया जो उन्होंने १० अध्यायों में लिखा-
तदा प्रसन्नो भगवान् (सूर्य) देवानाह शुभं वचः। अहं काश्यां भवाम्यद्य नाम्ना धन्वन्तरिः स्वयम्॥१७॥
कल्पदत्तस्य विप्रस्य पुत्रो भूत्वा महीतले॥१९॥
सुश्रुतं राजपुत्रं च विप्रवृद्ध समन्वितम्। शिष्यं कृत्वा प्रसन्नात्मा कल्पवेदमचीकरत्॥ २०॥
सुश्रुतः कल्पवेदं तं धन्वन्तरि विनिर्मितम्।पठित्वा च शताध्यायं सौश्रुतं तन्त्रमाकरोत्॥२३॥
(भविष्य पुराण, प्रतिसर्ग पर्व ३, अध्याय ९)
(ग) उसके बाद कलि की २३वीं शताब्दी (९०२ ई.पू. से) में धन्वन्तरि ने आयुर्वेद का प्रसार किया। उनके शिष्य सुश्रुत थे किनके शिष्य पुनः धन्वन्तरि ही कहे गये-
त्रिविंशाब्दे (कलि २२०० = ईसापूर्व ९०२) च यज्ञांशेतत्र वासमकारयत्।३४।
धन्वन्तरिर्द्विजो नाम ब्रह्मभक्ति परायणः।३६।
इति धन्वन्तरिः श्रुत्वा शिष्यो भूत्वा च तद्गुरोः। सुश्रुतादपरे चापि शिष्या धन्वन्तरेः स्मृताः॥४५॥
(भविष्य पुराण, प्रतिसर्ग पर्व ३, अध्याय २०)
(घ) कलि की २७ वीं शताब्दी (५०२ ई.पू. से) में शाक्यसिंह गौतम बुद्ध (१८८७-१८०७ ई.पू. के सिद्धार्थ बुद्ध नहीं) ने वैदिक मार्ग को नष्ट करने के लिये यन्त्र स्थापित किये थे। प्रयाग के धन्वन्तरि ने उन यन्त्रों को हटा कर पुनः वेद मार्ग स्थापित किया तथा आयुर्वेद का उद्धार किया।
(भविष्य पुराण, प्रतिसर्ग पर्व ३, अध्याय २१-सप्तविंशच्छते भूमौ कलौ सम्वत्सरे गते॥२१॥
शाक्यसिंह गुरुर्गेयो बहु माया प्रवर्तकः॥३॥
स नाम्ना गौतमाचार्यो दैत्य पक्षविवर्धकः। सर्वतीर्थेषु तेनैव यन्त्राणि स्थापितानि वै॥ ३१॥
धन्वन्तरिः प्रयागे च गत्वा तद्यन्त्रमुत्तमम्। विलोमं कृतवांस्तत्र तदधो ये गता नराः॥७०॥
(ङ) अन्तिम धन्वन्तरि को विक्रमादित्य (८२ ई.पू.-१९ ई तक) के नवरत्नों में कहा गया है। विक्रमादित्य काल में भी शकों से व्यापक युद्ध हुये तथा सभी शास्त्रों का पुनः सम्पादन हुआ। इनका उल्लेख ३०६८ कलि (३४ ई.पू.) में कालिदास के ज्योतिर्विदाभरण में है-
धन्वन्तरि क्षपणकामरसिंह शंकु वेतालभट्ट घटखर्पर कालिदासाः॥
ख्यातो वराहमिहिरो नृपतेः सभायां रत्नानि वै वररुचिर्नव विक्रमस्य॥
वर्षः सिन्धुरदर्शनम्बरगुणैः (३०६८) र्याते कलौ सम्मिते।
मासे माधव संज्ञिते च विदितो ग्रन्थक्रियोपक्रमः॥ (ज्योतिर्विदाभरण, कालिदास)
✍🏻अरुण उपाध्याय

Comment:

betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking güncel giriş
betnano güncel giriş
betnano güncel giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
betpark giriş
meybet giriş
meybet giriş
norabahis giriş
betpark giriş
vdcasino giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
norabahis giriş
vdcasino giriş
betpark giriş
milanobet giriş
maritbet giriş
maritbet giriş
interbahis giriş
interbahis giriş
hiltonbet giriş
hiltonbet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
vipslot giriş
vipslot giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
meybet giriş
meybet giriş
aresbet giriş
aresbet giriş
betnano giriş
meritking giriş
meritking giriş
Grandpashabet Giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
hititbet giriş
meybet
meybet
vipslot giriş
vipslot giriş
orisbet giriş
orisbet giriş
bahiscasino giriş
bahiscasino giriş
perabet giriş
perabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş