इस्लाम साहित्य में शाकाहार-3

पर्यावरणगतांक से आगे….
पैगंबर साहब खलीफा और सूफी संतों के जीवन में झांककर देखते हैं तो वे शहद व दूध का बड़े पैमाने पर उपयोग करते थे और आज भी उनके अनुयायी करते हैं।
पवित्र कुरान में सूरा अन्नहल में शहद के लिए कहा गया है-व ओ हया रब्बोका इलन्नहले अनित्तखेजी मिनल जिबाले बुयूतन व मिनश्शजरे व मिम्मा यअरेशून सुम्मा कुल्ली मिन कुल्ले अस्समराते फसकिकी सोबोलरर रब्बिक जोलोलन यखरोजो मिंबतू नेहरा शराबुन मुखतलेफन अलवाननोह फीहे शिफाउन लिन्नास।
तुम्हारे रब ईश्वर ने शहद की मक्खी पर यह बात सिद्घ कर दी कि पहाड़ों और वृक्षों की डालियों पर चढ़ाई हुई बेलों में अपने छत्ते बना और हर तरह वे फलों का रस चूसकर अपने रब की बनाई हुई राहों पर चलती रह। इस मक्खी के अंदर से रंग बिरंगा एक शरबत निकलता है, जिसमें शिफा बीमारियों को ठीक करने की ताकत है। निश्चित रूप से इसमें भी एक चिंतन है उन लोगों के लिए जो सोचते समझते हैं।
संक्षेप में कहा जाए तो कुरान के शब्दों में फीहे शिफाउन लिन्नास यानी इसमें लोगों के लिए शिफा है। शहद की चर्चा हदीसों में भी मिलती है। हजरत पैगंबर साहब की पत्नी आइशा के कथनानुसार रसूलुल्लाह सल्ललाहो अलेहे व सल्लिम मुहिब्बुल हलवा वलअसल-यानी पैगंबर साहब हलवे और शहद से प्रेम करते थे। शहद एक स्वादिष्टï खाद्य पदार्थ तो है ही, वह अनेक बीमारियों के लिए दवा भी है। वर्षों तक पड़ा रहने के पश्चात भी वह अनेक बीमारियों के लिए दवा भी है। वर्षों तक पड़ा रहने के पश्चात भी वह खराब नही होता है। साथ ही उस वस्तु को भी खराब नही होने देता, जिसे उसमें सुरक्षित रखा ागया है। प्राचीन फेरो शासक की लाशों को शहद लगाकर ही रखा जाता था। एक शव को 3600 वर्ष ईसा पूर्व शहद लगाकर रखा गया, वह निकाले जाने पर ज्यों की त्यों प्राप्त हुई। मिस्र के पिरामिड में एक लाश को शहद के बड़े बरतन, जिसका आकार बरनी के समान था में रखाा गया था। सिकंदर महान के समय तक लोग शहद के अतिरिक्त किसी अन्य मीठी वस्तु से परिचित नही थे। शहद के लाभ और उसके महत्व को इससे समझा जा सकता है कि स्वर्ग में शहद और दूध की नहर बताई गयी है। वेदों में दी गयी जानकारी के अ नुसार, शहद पांच अमृतों में से एक है। शहद की चर्चा बाइबिल में भी की गयी है। हजरत अली चौथे खलीफा का यह स्वर्ण वाक्य भुलाया नही जा सकता, जिसमें उन्होंने कहा है-शहद की मक्खी पवित्र और शुद्घ चीज खाती है, मीठी चीज तैयार करती है और जिस डाल पर अपना छत्ता बनाती है उसे कभी नही तोड़ती। यूनानी दार्शनिक हकीम जालीनूस कहता है-इस दुनिया में जिस किसी ने कुदरत के इस खजाने को अपने भोजन में स्थान दिया, उसके पास बीमारियां नही फटकतीं। उसका तन और मन हमेशा पवित्र रहता है। इनसान ने संगठन में रहना मधुमक्खी के छत्ते से ही सीखा। इसलिए सभी धर्म इस मामले में एकमत हैं कि इनसान का पहला भोजन केवल और केवल शहद है। देश के प्रति वफादारी का पाठ पढ़ाने वाली ईश्वर कीओर से यह पहली देन है। यूनानी दवाओं का तो अधिकतम आधार ही शहद है। मरने के पश्चात अनेक समाजों में मुरदे को शहद चटाने का रिवाज है, ताकि वह मौत की कड़वाहट को भूल जाए। विचार कीजिए, क्या कोई पशु पक्षी का मांस शहद की बराबरी कर सकता है? जो मक्खी इनसान को इतना बड़ा लाभ पहुंचाती है, समय आने पर हिंसक मनुष्य उसके छत्ते को तोड देता है। क्या यह पाप नही है? इसलिए शहद कब प्राप्त करना चाहिए, इसका भी एक तरीका है। मनुष्य की हिंसा इस छोटे से जीव को भी नही छोडती। उसकी हिंसक वृत्ति हर स्थान पर घातक है।
शहद के पश्चात दूधा के महत्व का इसलामी साहित्य में भरपूर विवरण मिलता है। शहद को तो बाहर से लाकर देना पड़ता है। लेकिन दूध तो वह पहला भोजन है जो हर प्राणी जन्म लेते ही अपनी माता के शरीर से प्राप्त करता है। कुदरत उस जीव के लालन पालन की पहले चिंता करती है, इसलिए दुनिया में उसका अस्तित्व होते ही वह उसे मिल जाता है। अनेक दार्शनिक दूध को शहद से अधिक महत्व देते हैं। इसलिए मां के दूध को अमृत कहा गया है। पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब दूध पीने से पहले यह वाक्य दोहराते थे अल्लाहुम्म बारे कालना फीदे व जिदनामिनहो ऐ अल्लाह इसमें बरकत डाल और हमें अधिक दे। हजरत अब्दुल्ला बिन अब्बास कहते थे-पैगंबर साहब का मनभावन पेय दूध था। प्रसिद्घ जीवशास्त्री डा एली मेकनोफ ने लिखा है कि मैंने अमृत का नाम सुना है, लेकिन देखा नही है। मैं तो दूध को ही अमृत कहूंगा। जार्ज बर्नार्ड शॉ से किसी ने पूछा कि आपकी इतनी लंबी आयु का रहस्य क्या है, तो उन्होंने उत्तर दिया-क्योंकि दूध और फल मेरा भोजन है। मांस तो मैं बिलकुल खाता ही नही हूं। दुनिया में गाय का दूध सबसे अधिक उत्तम होता है, क्योंकि इसमें 87 प्रतिशत पानी और 3.5 प्रतिशत प्रोटीन होता है। क्रमश:

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