प्रधानमंत्री मोदी जी को इस घुन का इलाज करना ही होगा

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‘उत्तर प्रदेश सरकार भू माफियाओं के खिलाफ कठोर कानूनी कार्यवाही कर रही है -‘ ऐसे समाचार न केवल उत्तर प्रदेश सरकार के लिए बल्कि अन्य प्रदेशों की सरकारों के लिए भी हमें सुनने को मिलते रहते हैं।
‘भू माफिया’ कौन है या किसे माना जाएगा ? – यह कहीं स्पष्ट परिभाषा के रूप में उल्लेखित नहीं है ,परंतु फिर भी ऐसे लोग जो व्यक्तिगत स्तर पर या एक गिरोह के रूप में लोगों की भूमि पर अवैध कब्जे करते हैं या अनैतिक और अवैधानिक रूप से भूमि की खरीद-फरोख्त करते हैं , लोगों को डरा – धमकाकर उनके भौमिक अधिकारों का हनन करते हैं – उन्हें भू माफिया की श्रेणी में रखा जाता है।

इस प्रकार भू माफिया के यह केवल लक्षण हैं , उसकी परिभाषा नहीं । जिन्हें देखकर समझा जा सकता है कि कोई व्यक्ति भू माफिया है या नहीं ? इन लक्षणों से पता चलता है कि इनमें व्यक्ति स्वयं तो अवैधानिक और अनैतिक कार्य करता ही है कभी-कभी वह संगठित अपराध के रूप में भी इन्हें अंजाम देता दिखाई देता है।

भारत में ‘संगठित अपराध’ बहुत अधिक प्रचलित शब्द के रूप में हमें सुनने को मिलता है । इस पर भी चिंतन व चर्चा करते हैं कि यह ‘संगठित अपराध’ जैसा शब्द वास्तव में आया कहां से है ? बिना किसी लाग लपेट के यदि इस सच को खोजा जाए और उसे स्पष्ट रूप से स्वीकार किया जाए तो भारत में ‘संगठित अपराध’ जैसा शब्द राजनीतिक पार्टियों या उन अन्य सामाजिक संगठनों व संस्थाओं के आचरण से या कार्यशैली से प्रकट हुआ है जो अपने राजनीतिक या सांगठनिक दबदबे के आधार पर लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन करते हैं और उन्हें किसी न किसी प्रकार से हानि पहुंचाने का प्रयास करते पाए जाते हैं।
जी हां , हो सकता है बात आपको सुनने में अटपटी लगी हो, परंतु सच यही है कि भारत में विशेष रूप से प्रत्येक राजनीतिक दल अपनी गुंडई और सांगठनिक क्षमताओं के आधार पर अक्सर लोगों के अधिकारों का हनन करता है । राजनीतिक दलों में से कई दल अपने राजनीतिक कार्यकर्ताओं के माध्यम से जमीनों पर अवैध कब्जे भी करवाते हैं और न केवल ऐसे अनैतिक और आपराधिक व असंवैधानिक कार्य करते हैं , बल्कि लोगों की हत्याएं तक करा देते हैं । उसके पश्चात पूरा का पूरा एक राजनीतिक संगठन अक्सर अपने कार्यकर्ताओं को संरक्षण देता हुआ दिखाई देता है। पश्चिम बंगाल में देखें तो वहां पर तो अपने राजनीतिक विरोधियों की हत्या कराने का खेल तक ‘राजनीतिक संगठित अपराध’ के रूप में लंबे समय से देश देखता चला आ रहा है । जब वहां पर कम्युनिस्टों की सरकार थी तो उस समय दूसरे राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं को खत्म करने का सुनियोजित षड्यंत्र चलता रहा , उसी कार्य को अब ममता बनर्जी अपनाए हुए हैं।
अपने विरोधियों के मतदाताओं को डराना -धमकाना, उनके मतों को जहां पर किसी एक पार्टी के किसी जाति विशेष के मतदाताओं की अधिकता होती है , उस जाति के ऐसे मतदाता दूसरी कमजोर जातियों या समुदाय या संप्रदाय के लोगों के मतों को स्वयं डाल देते हैं अर्थात उन्हें अपने मताधिकार का प्रयोग तक नहीं करने देते हैं। हमारा मानना है कि राजनीतिक दलों की ऐसी कार्यशैली , कार्य व्यवहार या कार्यप्रणाली को भी :संगठित अपराध’ अथवा राजनीतिक माफिया की श्रेणी का अपराधी माना जाना चाहिए। जिन लोगों को हम गैंगवार में सम्मिलित करते हैं या मान लेते हैं , उनसे अधिक घातक किसी गुंडागर्दी दिखाने वाली राजनीतिक पार्टी के गुंडे कार्यकर्ता होते हैं। इन्हीं लोगों में से भूमाफिया पनपते हैं , इन्हीं में से नकल करवाकर छात्र छात्राओं को पास कराने वाले शिक्षा माफिया पनपते हैं , इन्हीं में से अच्छे लोगों को राजनीति से दूर हटाकर , उन्हें खत्म करके या डरा धमका कर चुनाव से हट जाने को बाध्य करने वाले राजनीतिक माफिया निकलते हैं । कुल मिलाकर सारे माफिया अपराधों की या गैंगवारों की या संगठित अपराधों की जननी राजनीति है। देश के विधानमंडलों में विधायी कार्य को रोकने में या जबरदस्ती अपनी ही बात को संख्या बल के आधार पर ठीक सिद्ध करने में जब ये राजनीतिक दल गुंडई पर उतरते हैं तो वहां के दृश्य को देखकर लगता है कि जैसे देश में लोकतंत्र नहीं बल्कि राजनीतिक माफियाओं का शासन है।
ऐसे में जो लोग यह मानते हैं कि यह राजनीति शिक्षा माफियाओं , भू-माफियाओं और राजनीतिक माफियाओं ,गैंगवारों या संगठित अपराध करने वाले लोगों पर अंकुश लगा सकेगी या उन्हें समाप्त करने का महाभियान चला सकेगी ,वे लोग सचमुच नादान ही हैं ।
हमारे देश में हजारों लाखों की संख्या में संगठन काम करते हुए दिखाई देते हैं । गली मोहल्ले तक में कोई न कोई संगठन पैदा हुआ दिखाई दे जाता है । उन संगठनों का काम केवल स्थानीय प्रशासनिक कर्मचारियों व अधिकारियों को डराना धमकाना या छोटे-मोटे रेहड़ी ठेली वाले लोगों को डरा धमकाकर उनसे अवैध वसूली करना है। जब राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों को अपने संगठन के बल पर संगठित अपराध करते हुए सरकारी कर्मचारी देखते हैं तो वे भी अपनी एसोसिएशन बनाते हैं । उनके ऑर्गनाइजेशन या संगठन भी मिलकर शासन पर अपनी मांगों को मनवाने का दबाव बनाते हैं । कई बार गुंडई पर उतर आते हैं । उससे उनके भीतर एक प्रवृत्ति जन्म लेती है जो उन्हें अपने कार्य के प्रति लापरवाह बनाती हैं । पहले वह शासन पर दबाव बनाकर उच्छृंखल बनते हैं , फिर जनता को आंखें दिखाना आरम्भ करते हैं । तब वे जनता के कार्यों में या तो रुचि नहीं लेते हैं या फिर लोगों से मनमाने पैसे रिश्वत के रूप में लेकर उनका काम करते हैं । यदि कोई कर्मचारी – अधिकारी ऐसे अनैतिक और अवैधानिक कार्य करते पकड़ा जाता है तो कई बार उसकी एसोसिएशन या संगठन के लोग उसे साफ-साफ बचाते हुए दिखाई देते हैं।
पत्रकारिता क्षेत्र में आइए तो वहां पर भी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है । कई पत्रकार पत्रकारिता की ओट में अवैध और अनैतिक कार्य करते रहते हैं। प्रशासनिक अधिकारी क्योंकि स्वयं चोर होते हैं, इसलिए ‘चोर चोर मौसेरे भाई’ का खेल पर्दे के पीछे चलता रहता है । उनका एक ‘कॉमन मिनिमम एजेंडा’ होता है कि तू मेरी नहीं कहेगा और मैं तेरी नहीं कहूंगा – मिलकर काम करते रहेंगे। इसी कॉमन मिनिमम एजेंडा पर इन लोगों की सरकार चलती रहती है व देश के जनमानस को ये अपने कोल्हू में पेरते रहते हैं।
अब आइए धार्मिक क्षेत्र में। यहां पर मुल्ला मौलवी, पंडे पुजारियों , तथाकथित बाबाओं गुरुओं , चर्च के पदाधिकारियों आदि सभी ने अपने अपने शिष्यों की लंबी चौड़ी जमात बना रखी है । यह तथाकथित भक्त अपने संख्या बल से दबाव बनाकर दूसरों के अधिकारों का हनन करते देखे जाते हैं ।तथाकथित गुरु , मौलवी आदि अपने – अपने शिष्यों की संख्या बल के आधार पर राजनीतिक पार्टियों और नेताओं से सौदा तय करते हैं , उन्हें थोक के भाव वोट देने के बदले में ‘अच्छी सुविधाएं’ प्राप्त करने में सफल हो जाते हैं।
जहां ‘हर शाख पर उल्लू बैठा हो – वहां अंजामे गुलिस्तां क्या होगा’ – यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है । माना कि प्रधानमंत्री मोदी जैसे लोग जब परिस्थितियों पर बहुत अधिक अंकुश लगाने का प्रयास करते हैं तो कुछ परिवर्तन आता हुआ दिखाई देता है , लेकिन व्यवस्था के भीतर जो कुछ हो रहा होता है ,उसमें कोई परिवर्तन होता दिखाई नहीं देता। माना कि व्यक्ति साफ सुथरा हो सकता है , लेकिन व्यवस्था कितनी साफ-सुथरी हो पाई ? – देखने वाली बात यह है। साफ-सुथरे तो मनमोहन सिंह भी थे,पर व्यवस्था उस समय जितनी दागदार थी ,उतनी ही आज भी है । दागदार व्यवस्था से माफियाओं के विरुद्ध कोई कार्रवाई करने की अपेक्षा नहीं की जा सकती । क्योंकि दागदार व्यवस्था का मनोबल कमजोर होता है और यह सच है कि ‘छोटी सोच और पैर की मोच’ – कभी आगे नहीं बढ़ने देती । जिनकी सोच संकीर्ण है, छोटी है , जिनका मनोबल टूटा हुआ है , जो संकीर्ण और छोटी हरकतों में लगे हुए हैं , उनसे व्यवस्था में परिवर्तन की अपेक्षा नहीं की जा सकती।
कहने का अभिप्राय है कि देश में भूमाफिया शब्द के साथ-साथ संगठित अपराध की परिभाषा भी सुनिश्चित की जानी चाहिए। इसके अतिरिक्त जितने भर भी राजनीतिक दल हैं , उनके कार्य व्यवहार को नैतिक और वैधानिक बनाने के उपाय किए जाने चाहिए । साथ ही सामाजिक संगठनों के कार्यों पर भी नजर रखने के लिए समुचित व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए । ये सारे के सारे दल या संगठन जनसाधारण का खून चूसने के लिए नहीं हैं और यदि ये ऐसा करते पाए जाते हैं तो कानून को सबसे पहले कठोरता इन्हीं के विरुद्ध दिखाने का अधिकार देना चाहिए । जब कानून में इतना साहस आ जाएगा कि वह इन सभी दलों , सामाजिक संगठनों के विरुद्ध कठोर कार्यवाही कर सकेगा तभी जनसाधारण को लगेगा कि देश में वास्तव में लोकतंत्र है।
निश्चय ही प्रधानमंत्री मोदी से देश के लोगों को बहुत सारी आशाएं और अपेक्षाएं हैं । यह भी मानना पड़ेगा कि उन्होंने देश का सम्मान बढ़ाने के लिए बहुत अधिक कार्य किया है , लेकिन देश की व्यवस्था में जिस प्रकार घुन पहले लग रहा था , वैसे ही आज भी लग रहा है । प्रधानमंत्री मोदी के रहते व्यवस्था में कुछ सुधार भी हुआ है – यह भी कहा जा सकता है ,परंतु उल्लेखनीय सुधार नहीं माना जा सकता। इस घुन का इलाज प्रधानमंत्री को करना ही होगा।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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