उत्तिष्ठत जाग्रत : कहां तक चलोगे किनारे किनारे

images (59)

मानव का खानपान बदल गया। रहन-सहन बदल गया। चाल चलन बदल गया। मानव की मान्यताएं बदल गईं ,और बदल गया मानव का स्वभाव । जैसे-जैसे मानव मूल्यों में अवमूल्यन हुआ ,मानव पतनोन्मुख होता चला गया ।मानव नामक प्राणी के अजीब गरीब चेहरे मिलते हैं । मानव के पतन का सिलसिला अभी भी और चलना चाहिए या इसको विराम देना है – यह सोचना होगा ,इसे रोकना होगा । हमे इनके ऊपर अपना ध्यान केंद्रित करना होगा।

क्योंकि बकौल शायर :-

अभी तलक कुछ लोगों ने बेची न अपनी आत्मा ।
यह पतन का सिलसिला कुछ और चलना चाहिए।।

जिन लोगों की आत्मा नहीं बिकी उनकी भी यदि बिक जाएगी तो मानव पूर्णत: नग्न हो जाएगा। इसलिए द्वितीय पंक्ति के भावार्थ पर रोक लगे।
मानव को उठना होगा , मानव को जागना होगा और ‘उत्तिष्ठत जागृत:’ की पंक्तियों पर विशेष ध्यान देना होगा ।मानव को वास्तविक रूप में निद्रा से उठना होगा । आज यह जागता हुआ भी सो रहा है। उठने का तात्पर्य यहां चारपाई से उठना नहीं है , अगर मानव यही सोचता है तो ऐसा सोचना उसकी तंग सोच है। मानव को जागते हुए जो नींद आ रही है, उसको उस रूप को त्यागना होगा ।साथ ही अपने असली स्वरूप को पहचानना होगा। अपने मंतव्य एवं गंतव्य तथा जीवन के महत्व को समझना होगा।
मानव का निरंतर एवं उत्तरोत्तर उन्नति की तरफ अग्रसर होना ही उसका वास्तविक अर्थों में उठना है। मानव का प्रगति पथ पर आरूढ़ होना ही उठना है। एवं मानव का ऊंचाइयों की बुलंदियों पर पहुंचना ही उठना है।

मानव को अपनी अकर्मण्यता एवं निकम्मेपन को छोड़कर अपने आपको आदर्श रूप में स्थापित करना ही उसका उठना है। मानव को निम्न पंक्ति को जीवन में आत्मसात करना ही उठना है :-
टुक नींद से अखियां खोल जरा और रब अपने से ध्यान लगा ।
यह प्रीति करण की रीत नहीं प्रभु जागत है तू सोवत है।।

मानव तू उसकी तरफ बढ़ चल , तेरा कारवां रुक ना जाए ।गति का क्रम टूट न जाए ।गंतव्य एक दिन मिल ही जाना ,लेकिन हताश नहीं होना है ।क्योंकि बकौल शायर :–

मंजिल मिले ना मिले इसका गम नहीं ।
मंजिल की जुस्तजू में मेरा कारवां तो है।।

मानव को उत्थान के लिए संघर्ष करना होगा। अनेक प्रकार की बाधाओं को पार करना होगा। मानव को अपनी नियंत्रण शक्ति इतनी बढ़ानी एवं इतनी सशक्त करनी होगी कि उसके मन में केवल वही संकल्प उत्पन्न हो, जिन्हें वह चाहता है । ना इससे अधिक हो ना कम हो। मानव को अपने मंतव्य एवं गंतव्य में सफलता प्राप्ति के लिए पूर्ण मनोयोग से, पूर्ण आवेग एवं पूर्ण आवेश से आगे बढ़ना होगा। तभी उन्नति मिला करती है। मानव को सफलता प्राप्ति के मार्ग में बने अवरोधों को दूर करना होगा। क्योंकि बकौल शायर :-

भवरों से लड़ो तुंद लहरों से उलझो
कहां तक चलोगे किनारे किनारे।।

मानव को इस महासंग्राम में उतरना ही होगा, नहीं तो पतन के सिलसिले को कोई रोक नहीं सकता । मानव को निम्न प्रवृत्ति छोड़नी होगी :–

यही बहुत है कि तुम देखते हो साहिल से।
सफीना डूब रहा है तो कोई बात नहीं।।

नहीं ,मानव को साहिल से कूदना है ,और सफीना को बचाना है। सफीना को बचाना ही तो धर्म है, सफीना बचाना ही तो कर्म है ।सफीना बचाते – बचाते यदि न बचे तो कोई पश्चाताप नहीं होगा ,क्योंकि मानव अपना कर्म करता है, तो नियति अपना कार्य करती है ।फिर भी कवि दिनकर की यह पंक्तियां कितनी सार्थक हैं :–

न हार में न जीत में।
किंचित नहीं भयभीत मैं ।
कर्तव्य पथ पर जो मिले
यह भी सही वह भी सही।।

इसलिए हार जीत की परवाह किए बिना अपने कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ते चलो ,ऐसा होगा तो एक दिन अवश्य सफलता की बुलंदियों को प्राप्त करेंगे।
मानव की मान्यताएं कैसे बदली उसका एक छोटा सा उदाहरण है ।हमारे वेद शास्त्रों में ब्रह्म मुहूर्त में उठकर नित्य कर्मों से निवृत्त होकर ईश उपासना करने को कहा गया तथा सायं को भोजन जल्दी करके जल्दी सो जाना लिखा गया है। जो अच्छे स्वास्थ्य के लिए जरूरी है ।अंग्रेजी की कविता के भाव भी कुछ ऐसे ही हैं कि :–

अर्ली टू बेड एंड अर्ली टू राइज
दिस इज द वे टू बी हैप्पी एड वाइस

लेकिन मानव ने क्या प्रारंभ कर दिया ?
रात को देर तक जागना, सुबह 8,9 बजे तक सोना। भोजन करने व सोने के बीच में कम से कम 3 घंटे का अंतराल नियमानुसार रहना चाहिए , वह नहीं रहा। भोजन देर से बनाया गया , देर से खाया गया ।आमाशय ,लीवर पर दबाव नींद के दौरान बना रहा। मनुष्य के स्वास्थ्य में विकार आते रहे । क्योंकि भोजन के उपरांत 3 घंटे तक भोजन आमाशय में रहता है और इतने समय तक सोना नहीं चाहिए ।हम जागते रहेंगे , घूमते फिरते भी रहेंगे जो हमारे भोजन को पचाने में सहायक होगा।
ऋषि ,मनीषियों ,वैज्ञानिकों का चिंतन लेखन बहुत ही महत्वपूर्ण है , जो काफी शोध करने के उपरांत लिखा गया है ।इस प्रकार जब से मानव ने मनन करना छोड़ा है,वह मनुष्य नहीं रहा है । तभी से उसने नाना प्रकार की व्याधियों को निमंत्रण दिया है। मनीषियों का चिंतन आज भी प्रासंगिक है। मानव को सुधरना होगा ।अपना पतन रोकना होगा। पतन का सिलसिला बंद होना चाहिए। क्योंकि यह मानवीय गुण नहीं है बल्कि मानवीय गुण उत्थान है।

कठोपनिषद का एक मंत्र है :-

‘उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।’

अर्थात उठो, जागो और तब तक मत रुको, जब तक कि अपने लक्ष्य तक न पहुंच जाओ।’

देवेंद्र सिंह आर्य
चेयरमैन : उगता भारत

Comment:

grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
betvole giriş
betvole giriş
fenomenbet
betvole giriş
betkanyon
betvole giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
imajbet giriş
vaycasino giriş
imajbet giriş
vaycasino giriş
safirbet giriş
safirbet giriş
betvole giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
timebet giriş
timebet giriş
maxwin
realbahis giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
timebet giriş
timebet giriş
betpuan giriş
betpuan giriş
vaycasino giriş
meritking giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
kulisbet giriş
mariobet giriş
mariobet giriş
realbahis giriş
vaycasino giriş
grandbetting giriş
hititbet giriş
superbahis giriş
süperbahis giriş
norabahis giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
betvole giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
betnano giriş
norabahis giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
betwild giriş
betwild giriş
imajbet giriş
damabet
betnano giriş
betnano giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
vaycasino giriş
betvole giriş
betpark giriş
betvole giriş
betpark giriş