अधिकार से पहले कर्तव्य – अध्याय– 12 , बहन और भाई के एक दूसरे के प्रति कर्तव्य

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भाई और बहन के परस्पर कर्तव्य

भाई और बहन का सम्बन्ध भारत की वैदिक संस्कृत में बहुत ही पवित्र माना जाता है। संसार के अन्य देशों में भी यदि भाई बहन के संबंध को सबसे अधिक पवित्र माना जाता है तो इसके पीछे कारण केवल वैदिक संस्कृति का वह चिन्तन है जिसके कारण ये दोनों ही एक दूसरे के प्रति आत्मिक भाव से जुड़े होते हैं एक दूसरे के प्रति असीम निश्छल प्रेम हृदय में रखते हैं। भारतवर्ष में ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जब भाई ने बहन के लिए और बहन ने भाई के लिए अपना प्राण तक लुटा दिये । यदि एक दूसरे को कहीं एक दूसरे के खून की भी आवश्यकता पड़ी तो उसे देने में भी कोई से ने संकोच नहीं किया । भारत के देहात में हम अपने देशवासियों को इस परम्परा को आज भी यथावत निभाते हुए देख सकते हैं ।

यदि राखी के त्यौहार की बात करें तो उस पर तो भाई – बहन का यह प्रेम सारे भारतवर्ष में और संपूर्ण विश्व में जहां – जहां भी भारतीय पर्व परम्पराएं आज भी मनाई जा रही हैं , वहां पर अपना अलग ही प्रभाव दिखाता है । उसे देखने से पता चलता है कि बहन – भाई के प्रति अपने हृदय में कितना स्नेह रखती है और भाई भी बदले में बहन के प्रति कितना सम्मान प्रकट करता है ? यद्यपि आज कहीं – कहीं इस स्नेह अथवा सम्मान को या प्रेम की भावना को लोग पैसे से आंक कर देखने लगे हैं । परंतु सच यह है कि इस स्नेह , सम्मान और प्रेम की भावना का पैसों में कोई मोल नहीं आंका जा सकता। आत्मिक सम्बन्ध का सचमुच कोई मोल नहीं हो सकता।
राखी के पर्व पर भाई और बहन का पारस्परिक प्रेम , कर्तव्य और दायित्वबोध फलता – फूलता हुआ दिखाई देता है। उसकी मीठी- मीठी सुगंध परिवार के सारे वातावरण को सुगंधित कर डालती है। सर्वत्र ऐसा अनुभव होता है जैसे हम किसी आनन्द लोक में आ गए हैं ।
इस त्यौहार पर घर में खेलने वाली एक नन्ही सी छोटी सी गुड़िया सी बहन भी जब अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती है तो वह भी जानती है कि मुझे अपने भाई के प्रति आज किस प्रकार का स्नेहपूर्ण प्रेम प्रकट करना है ? जिसे उस दिन उसकी मुखमुद्रा को देखने से सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। वह भाई को जब इस त्यौहार पर मिठाई खिलाती है तो उसे देखकर यही लगता है कि आज वह अपनी मिठाई के दो ग्रास से भाई को सदा के लिए मीठा और पूर्णतया मीठा बना देना चाहती है। वह अपने आत्मिक प्रेम से भाई को जिस दौर में बनती है वह संपर्क अटूट होता है राखी के वह दिखने वाले दो धागे भाई को भी भावनात्मक रूप से इतना हर्षित करते हैं कि वह भी आजीवन बहन के लिए नए-नए संकल्पों से संकल्पित हो जाता है। भावों से भर जाता है । उसके प्रति समर्पण के भाव से भर जाता है।

राखी के धागों का मोल

भारत में युग – युगों से राखी के पर्व की यह पवित्र परम्परा चली आ रही है । यद्यपि प्रारम्भ में इसका स्वरूप कुछ दूसरा था , परन्तु कालान्तर में इसे भाई – बहन के स्नेहपूर्ण सम्बन्धों के साथ जोड़ दिया गया। परम्पराएं चाहे जो रही हैं , परंतु यह सच है कि इस पर्व ने भाई और बहन को एक दूसरे के प्रति कर्तव्यों की एक ऐसी पवित्र डोर से बांधने का काम किया जिसका उदाहरण संसार में अन्यत्र मिलना दुर्लभ है।
राखी के धागे का कलाई पर बांधने का भी चमत्कारिक प्रभाव होता है। जिस बहन से एक बार भाई कलाई पर राखी बंधवा लेता है , जीवन भर उसके प्रति वह एक अदृश्य आत्मिक प्रेम से जुड़ जाता है । वह संकल्प ले लेता है कि बहन के लिए जीवन में जब भी मेरे किसी त्याग की आवश्यकता पड़ेगी तो मैं उसे अवश्य करने का प्रयास करूंगा।
जब भी कभी भारत की पाकिस्तान से युद्ध की संभावनाएं प्रबल होती हैं या हमारे देश की सीमाओं के लिए हमारे जवान सैनिक भाई जा रहे होते हैं तो हमारी बहनें अक्सर उन्हें रेलवे स्टेशनों पर जाकर राखियां बांधती हुई देखी जा सकती हैं। वह दृश्य भी बड़ा मार्मिक होता है। राखी के वे दो धागे हमारे सैनिकों में नया जोश भर देते हैं । राखी कलाई पर बंधते ही उन धागों को देखकर हमारे वीर सैनिकों में देशभक्ति का उत्साह और भी अधिक बढ़ जाता है। वे सोचने लगते हैं कि चाहे मेरे प्राण चले जाएं – पर मेरी इन बहनों की लाज न जाए , मेरी मां भारती का सम्मान न जाने पाए और चाहे हमें कुछ भी कष्ट हो जाए पर हमारे देशवासियों को कोई कष्ट न होने पाए । सचमुच राखी के दो धागों का मोल नहीं ।
संसार हमारे देश में भाई और बहन के इस आत्मिक प्रेम को समझ नहीं पाया । जहां दो अजनबी लड़के और लड़कियां परस्पर मिलते हैं और लड़की के द्वारा लड़के की कलाई पर राखी बांधते ही वे दोनों भाई और बहन के पवित्र संबंध में सदा के लिए बन्ध जाते हैं । इसके उपरांत भी यदि कोई लड़का किसी ऐसी लड़की के प्रति वासनात्मक या दुराचरण का कोई भाव अपने हृदय में रखता है तो उसे समाज भी पापी कहता है । हमारे लिए दूसरे की बेटियां भी उस समय बहन बन जाती हैं जब वे हमारी कलाई पर राखी बांध देती हैं । तब हम भारत के लोग भी उन्हें जीवन भर उसी दृष्टि और दृष्टिकोण से देखने का प्रयास करते हैं जैसे एक भाई बहन को देखता है। संसार के अन्य देशों में कोई भी लड़की किसी दूसरे लड़के के लिए ‘मैडम’ हो सकती है ,लेकिन हमारे यहां जो लड़की एक बार किसी लड़के को राखी बांध देती है वह जीवन भर के लिए उसकी बहन हो जाती है। संभवत: अपनी इन्हीं महान परंपराओं के कारण ‘मेरा भारत महान है।’ राखी के ये दो धागे मेरे भारत को भी महान बना देते हैं।

याद आती हैं प्रेमपूर्ण अनुभूतियां

वैदिक संस्कृति के संस्कारों में पलने वाले भाई बहन सम्बन्धों की पवित्रता के प्रति कब समर्पित हो जाते हैं और कब उन्हें जीवन भर निभाने का संकल्प ले लेते हैं ? – यह पता ही नहीं चलता । पवित्र सम्बन्धों को जीवन भर निभाने के इस संकल्प का पता इस बात से चलता है कि आगे चलकर जीवन के किसी भी पड़ाव पर यदि भाई – बहन मिल बैठकर बातें कर रहे हों तो उनके बीच बचपन की बातें अवश्य चल जाती हैं। बचपन के वह सुनहरे दिन और सुनहरी यादें उन्हें आ घेरती हैं जिनमें वे संबंधों को निभाना तो नहीं जानते थे पर संबंधों को निभाने का संकल्प ले रहे थे ।
जीवन की यह अनुभूतियां दोनों के मानस में गुदगुदी करती हैं। इस गुदगुदी को ऊंचाई उस समय मिलती है , जब संयोग से माता-पिता संसार में न हों पर बचपन में जब वे साथ रहे थे तो वह कैसे दोनों भाई बहनों के झूठे झगड़ों का निस्तारण कराया करते थे ? जब उन पलों को भाई और बहन याद करते हैं तो परिवेश बहुत भावपूर्ण हो जाता है। तब ऐसा लगता है कि जैसे सावन की रिमझिम बारिश हो रही है और वे दोनों मीठी यादों की उन बौछारों से भीग रहे हों।
बचपन की अनुभूतियां जीवन भर हमारे मानस पटल पर अंकित रहती हैं । उचित परिवेश और परिस्थिति बनते ही वे हमारे सामने साक्षात रूप लेकर खड़ी हो जाती हैं । यदि इन अनुभूतियों को साक्षात रुप लेते हुए देखा जा सकता है तो वह बहन – भाई की बातों में देखा जा सकता है । जहां केवल बचपन होता है। बचपन की चर्चा होती है । माता-पिता की चर्चा होती है । अपने झूठे लड़ाई झगड़ों की चर्चा होती है । इन सबके बीच बार-बार हंसी का फव्वारा जब फूटता है तो वह परिवेश को और भी अधिक रोचक , सहज ,सरस और अनुभूतिपूर्ण बना देता है।
आज जीवन शैली और जीवन मूल्यों में बड़ी तेजी से भारी परिवर्तन आ रहे हैं । भाई और बहन के बीच भी संबंधों में अर्थ आ घुसा है । संबंधों का व्यापारीकरण हमारी जीवनशैली और जीवन मूल्यों को बहुत अधिक प्रभावित कर रहा है । ऐसी परिस्थितियों में माता-पिता को परिवार में ऐसा परिवेश सृजित करना चाहिए कि बचपन में ही भाई बहन एक दूसरे के प्रति सहनशील बनना सीख लें । वे परस्पर मर्यादा व संतुलन का व्यवहार करें। एक दूसरे की संवेदनाओं को समझें और एक दूसरे की भावनाओं के अनुरूप कार्य करने वाले बनें । इसके लिए भारत के वैदिक संस्कारों को छोटे – छोटे भाई बहनों के भीतर डालने की आवश्यकता है । क्योंकि जीवन में ऐसे संस्कार ही बाद में याद आने वाली अनुभूतियों में परिवर्तित होते हैं । जिनसे मन को सहज आनंद प्राप्त होता है।

बहन भाई की हमारी आदर्श परम्परा

यह बात समझने की है कि सृष्टि के प्रारम्भ में जब कोई यह बताने वाला नहीं था कि अमुक महिला अमुक पुरुष की बहन है इसलिए वह उससे विवाह नहीं करेगा या नहीं करेगी , तब हमारे ऋषि पूर्वजों ने भाई-बहन के मध्य विवाह संबंध न होने की परम्परा को कैसे विकसित किया होगा ? सगे भाई – बहन के बीच यह संबंध न हो , इससे भी अधिक कठिनाई इस बात में आई होगी कि सगे चाचा , ताऊ के भाई-बहन या मामा और फूफी के भाई-बहन भी इस रिश्ते में नहीं बंधेंगे । इसी प्रकार एक ही गोत्र के लोग भी इस व्यवस्था में न बंधकर परस्पर एक दूसरे को भाई-बहन के रूप में देखेंगे । वास्तव में इस सारी व्यवस्था के पीछे भारत के ऋषियों का वैज्ञानिक चिंतन काम कर रहा था । जिसमें सगोत्रीय विवाह या सपिंड विवाह को इसलिए निषेध किया गया था कि इससे व्यक्ति के कद – काठी , रंग – रूप , शारीरिक व मानसिक विकास आदि पर विपरीत प्रभाव पड़ना निश्चित था। इसके उपरांत भी उस व्यवस्था को लागू करना और भारत में इस व्यवस्था को सृष्टि प्रारंभ से लेकर आज तक यथावत स्थापित किये रखना सचमुच भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बहुत बड़ी जीत है। यह जीत तब और भी अधिक प्रशंसनीय हो जाती है जब हम पश्चिमी देशों की संस्कृति में आज तक भी इन सम्बन्धों की पवित्रता को भंग होते हुए देखते हैं। जिन्हें देखकर स्पष्ट पता चलता है कि पश्चिमी जगत आज तक भी भाई-बहन के पवित्र सम्बन्धों को समझ नहीं पाया है।
भारत में भाई-बहन के बीच की यह मर्यादा किस प्रकार विकसित हुई और क्यों विकसित की गई ? – इस पर प्रकाश डालते हुए श्रीपाद अमृत डांगे अपनी पुस्तक “Origin of Marriage”में लिखते हैं : — “इस प्रकार के गुणों में परस्पर भिन्न नातों तथा स्त्री पुरुष संबंधों की जानकारी ना होना स्वाभाविक ही था , परन्तु इस प्रकार का अनियंत्रित सम्बन्ध संतति विकसन के लिए हानिकारक होने के कारण सर्वप्रथम माता-पिता एवं उनके बाल बच्चों के बीच सम्भोग पर नियंत्रण उपस्थित किया गया और इस प्रकार कुटुंब व्यस्था की नींव रखी गयी । यहाँ विवाह की व्यवस्था कुटुंब के अनुसार होनी थी, अर्थात समस्त दादा – दादी परस्पर एक दूसरे के पति पत्नी हो सकते थे । उसी प्रकार उनके लड़के – लड़कियां अर्थात समस्त माता पिता एक दूसरे के पति पत्नी हो सकते थे । सगे व चचेरे भाई-बहिन सब सुविधानुसार एक दूसरे के पति पत्नी हो सकते थे ।
आगे चलकर भाई और बहिन के बीच निषेध उत्पन्न किया गया , परन्तु उस नवीन सम्बन्ध का विकास बहुत ही मंदगति से हुआ और उसमें अड़चन भी बहुत हुई, क्यूंकि समान वय के स्त्री पुरुषों के बीच यह एक अपरिचित सम्बन्ध था । एक ही माँ के पेट से उत्पन्न हुई सगी बहिन से प्रारंभ कर इस सम्बन्ध का धीरे धीरे विकास किया गया ।”
हम उपरोक्त लेखक के इस मंतव्य से सहमत नहीं हैं कि प्रारंभ में वैदिक संस्कृति को अपनाने वाले लोगों में भी निकट के संबंधों में विवाह होते रहे। फिर धीरे-धीरे इनमें विवाह निषेध की प्रक्रिया अपनाई गई। इस पर हमारा स्पष्ट मानना है कि भारत में वैदिक व्यवस्था में किसी प्रकार का कोई दोष नहीं था । वह पहले दिन से सोने सी खरी थी । उसके संबंधित नियमों और व्यवस्थाओं को समझकर ऋषियों ने जिस व्यवस्था का विकास किया उसी से भारत की वैदिक संस्कृति का निर्माण हुआ। ऐसा नहीं हो सकता कि हमारे ऋषियों ने प्रारंभ में कुछ मूर्खताएं परीक्षण के रूप में की हों और बाद में उनमें समय के अनुसार संशोधन कर लिया हो। इसके साथ यह भी समझना चाहिए कि सृष्टि का निर्माण ईश्वर ने वैज्ञानिक नियमों से किया है। ईश्वर की बनाई सृष्टि और व्यवस्था में कोई दोष नहीं था । दोष मानव बुद्धि ने बाद में पैदा किए । ऐसा नहीं हो सकता कि ईश्वर अपनी बनाई व्यवस्था में कोई दोष छोड़ दे ।
वास्तव में भाई-बहन के इन पवित्र संबंधों को बनाकर भारत ने परिवार से लेकर राष्ट्र तक की एक सुंदर व्यवस्था को विकसित किया । जिसका लोहा संसार के अन्य देशों ने भी माना और धीरे-धीरे उन्होंने भी भारत की परंपराओं का अनुकरण करना आरंभ किया। हमारा मानना है कि यद्यपि संसार के समस्त देशों पर भारत की परंपराएं शासन करती रहीं , परंतु जब भारत का उनसे किसी भी कारण से संपर्क टूटा तो वहां पर नई परंपराओं ने जन्म लिया ।
यह प्रसन्नता का विषय है कि भारत अपनी परंपराओं का आज भी निर्वाह कर रहा है और उसे अपने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मूल्यों को अपनाने में गर्व और गौरव की अनुभूति होती है।

भाई के बहन के प्रति कर्तव्य

एक भाई के वैदिक संस्कृति में अपनी बहन के प्रति बहुत महत्वपूर्ण कर्तव्य निर्धारित किए गए हैं । बहन यदि छोटी है तो उसके प्रति भाई पिता के समान व्यवहार करता है और यदि बड़ी है तो उसे वह माता के समान सम्मान देता है। किसी भी स्थिति में बहन को हमारे यहां पर छोटा नहीं माना गया है । भाई के लिए वह यदि छोटी है तो भी सम्मानित है और बड़ी है तो भी सम्मानित है। यही कारण है कि बहन के सम्मान की रक्षा करना भाई का पवित्र कर्तव्य है । इतना ही नहीं , जीवन में जब भी कभी बहन किसी समस्या से दुःखी हो रही हो या किसी प्रकार की आपदा उस पर आई हो तो उस समय भी भाई का यह परम कर्तव्य हो जाता है कि उसे उस आपदा से उभारे और उसकी हर प्रकार की सहायता करने के लिए आगे आए।
समाज के किसी भी अनाचारी और दुराचारी व गलत सोच रखने वाले व्यक्ति से बहन का सम्मान सुरक्षित रखना भी भाई का कर्तव्य है । यही कारण है कि एक बहन यदि अपने भाई के साथ है तो समाज उसे पूर्ण सुरक्षित मानता है। भारतीय समाज में यह भी माना जाता है कि बहन के लिए भाई अवश्य होना चाहिए । उसका कारण भी यही है कि बहन की रक्षा जितनी एक भाई कर सकता है उतना अन्य कोई नहीं कर सकता । साथ ही जीवन में उसकी सहायता करने के लिए भी पति के बाद यदि कोई सबसे पहले आएगा तो वह भी उसका भाई ही होगा। जिन बहनों के भाई नहीं होते वह जीवन भर इस बात को अनुभव करती रहती हैं कि यदि आज मेरे भी भाई होता तो कितना अच्छा होता ?
एक अच्छा भाई अपनी बहन का एक अच्छा मित्र भी होता है । वह मित्रवत उसे अच्छी सलाह , अच्छी प्रेरणा और अच्छी सोच प्रदान करता है । जो उसे ऊंचा सोचने , ऊंचा बनने और ऊंचा करने की प्रेरणा देता रहता है । कई बार अच्छे भाई – बहन परस्पर अपने मन की बात को एक दूसरे से सांझा कर लेते हैं , जिन्हें वह माता – पिता के साथ भी सांझा नहीं कर पाते हैं। भाई का यह भी कर्तव्य है कि बहन को संसार में कोई व्यक्ति किसी प्रकार से चोट न पहुंचा सके ।

बहन के भाई के प्रति कर्तव्य

यदि किसी कारण से माता संसार में नहीं रही है तो उस समय पिता के रहते हुए भी बड़ी बहन स्वाभाविक रूप से भाई की संरक्षक हो जाती है । यद्यपि सांसारिक दृष्टिकोण से देखने पर तो यही कहा जाएगा कि उस समय भी स्वाभाविक नैसर्गिक संरक्षक पिता ही है , परंतु व्यावहारिक दृष्टिकोण कुछ दूसरा होता है । जब हम देखते हैं कि पिता बाहरी जिम्मेदारियों को निभाता है और बहन उन सारी जिम्मेदारियों को घर में निभाती है जिन्हें माँ निभाती रही थी। कहीं-कहीं ऐसा भी देखा जाता है कि जहाँ पिता भी संसार से चले जाते हैं तब बड़ी बहन यदि है तो वह अपने शेष भाई बहनों के लिए माता और पिता दोनों की भूमिका का निर्वाह करते देखी गई है ।भारत में ऐसे अनेकों उदाहरण रहे हैं जब बड़ी बहन ने छोटे भाई बहनों का संरक्षक के रूप में पालन पोषण किया है । आज भी ऐसी अनेकों बहनें हैं जिन्होंने अपना कर्तव्य निभाते हुए अपना जीवन भाइयों के लिए समर्पित कर दिया है।
बड़ी बहन के रूप में आज भी बहनों का विशेष कर्तव्य है कि वह अपने छोटे भाई बहनों का संरक्षक के रूप में ही मार्गदर्शन करती रहें । वह स्वयं आदर्श व्यवहार करके दिखाएं । जिससे छोटे भाई-बहन उसका अनुकरण करें। यदि बहन छोटी भी है तो भी वह भाई की आज्ञा का पालन करे । माता पिता के सपनों को साकार करने के लिए स्वयं भी पढ़ाई लिखाई पर ध्यान दे ।अच्छे गुणों को अंगीकार करने पर ध्यान दे। शुभ संस्कारों को अपनाने पर ध्यान दे और भाइयों को भी वैसा ही करने की प्रेरणा दे ।
उसका कर्तव्य है कि वह जीवन भर भाई के प्रति आत्मिक प्रेम को प्रदर्शित करती रहेगी । पिता कीसंपत्ति के वाद विवाद में अपने आपको न डालकर उस आत्मिक संपत्ति में सांझा रहने का प्रयास करेगी जो उसे शुभ संस्कारों से प्राप्त हुई है । इसके लिए भाई भी यही प्रयास करे कि वह भी बहन को पिता की संपत्ति में एक उत्तराधिकारी मानते हुए उसके प्रति अपने सभी कर्तव्यों का निर्वाह ईमानदारी से करेगा।
कोई सा भी कोई से के प्रति बेईमानी का भाव ना रखे और यदि ऐसा देखा जा रहा है कि एक पक्ष बेईमानी की बात कर रहा है तो दूसरा उसे उपेक्षित कर दे ,उसके बेईमानी के भाव को अनदेखा कर दे। छोटे-छोटे स्वार्थों को अपने संबंधों के लिए तलवार नहीं बनाना चाहिए । यदि यह भाव रखकर दोनों चलेंगे तो संसार में जीते हुए जीवन का वास्तविक आनंद प्राप्त कर सकेंगे।

राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

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