हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वीन के जनक आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय

prafulla-chandra-ray_1586510830

“हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वीन” के अविष्कारक “आचार्य प्रफुल्ल चन्द्र राय” ( 2 अगस्त 1861 — 16 जून 1944)
*************************

हम फिल्मी सितारों की कैमेस्ट्र्री में खुश रहने वाले लोग हैं। इससे क्या फर्क पडता है कि भारत की अपनी एक कैमेस्ट्री है, रसायनों का इतिहास है। देश में रसायानों का प्रयोग आधुनिक रसायन शास्त्र के उद्भव से शताब्धियों पहले होता रहा लेकिन हमारे ढाक के तीन पात हैं – हम पिछडे लोग, हमें कुछ न आया, हमें अंग्रेजों ने सभ्य बनाया। यह ठीक है कि एंटोनी लेवईज़िएयर रसायन विज्ञान के पिता मानें जाते हैं चूंकि उनकी पुस्तक ‘‘तत्वों के रसायन’’ में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन तत्वों पता लगाने वर्णन हैं। तथापि तत्वों और रसायनों के मध्यकालीन पश्चिमी अंवेषणों और प्राचीन भारतीय अनुसंधानों की उनसे समानता अथवा विभिन्नता पर मौन क्यों पसरा रहता है? केमिस्ट्री शब्द की उत्पत्ति मिस्र देश के प्राचीन नाम कीमिया से हुई है इसका अर्थ है- कालारंग। भारतीय रस और रसायनों में जितना रंग-बिरंगापन है उसकी सुध लेना वाला कोई क्यों नहीं?

औपनिवेशिक ब्रिटिश-भारत के दौर में कोलकाता के एक रसायान शास्त्री आचार्य प्रफुल्ल चन्द्र राय, ब्रिटेन के प्रेसिडेंसी कालेज में प्राध्यापन कर रहे थे। इसी दौरान उन्होंने फ्रांसीसी रसायन शास्त्री बर्थेलो की पुस्तक “द ग्रीक अल्केमी” पढी तो अनुभव हुआ कि भारतीय ज्ञान को दुनिया के समक्ष इसी प्रकार लाया जाना चाहिये। श्री राय ने अभिप्रेरित हो कर आचार्य नागार्जुन की कृति “रसेन्द्रसारसंग्रह” पर आधारित ‘प्राचीन हिन्दू रसायन’, विषयक लेख लिखकर बर्थेलो को भेजा। फ्रांसिसी वैज्ञानिक स्तब्ध रह गये, कितना अथाह ज्ञान भारतीय पुराग्रंथों में पसरा पड़ा है और उनकी कोई सुध लेने वाला भी नहीं? बर्थेलो ने आलेख की विस्तृत समीक्षा की जो जर्नल डे सावंट में प्रकाशित हुई और तब यूरोप भौचक्का रह गया कि रसायन शास्त्र के ज्ञान का वास्तविक आधार तो भारत के पुरा-शास्त्रों में हैं। अपनी इस उपलब्धि से उत्साहित आचार्य प्रफुल्ल चन्द्र राय ने “हिस्ट्री ऑफ हिन्दू केमिस्ट्री” नाम से पुस्तक लिखी जिसे तत्कालीन विद्वानों ने हाथो-हाथ लिया। भारतीय रसायनों की विकास कथा को सामने रखती कुछ बाद की पुस्तक – प्राचीन भारत में रसायन का विकास (लेखक – सत्यप्रकाश सरस्वती) भी उल्लेखनीय है जो हिंदुस्तानी होने के गर्व को बढाने में सक्षम है।

डाक्टर प्रफुल्लचन्द्र राय ( 2 अगस्त 1861 — 16 जून 1944) भारत के महान रसायनज्ञ, उद्यमी तथा महान शिक्षक थे। आचार्य राय केवल आधुनिक रसायन शास्त्र के प्रथम भारतीय प्रवक्ता (प्रोफेसर) ही नहीं थे बल्कि उन्होंने ही इस देश में रसायन उद्योग की नींव भी डाली थी। ‘सादा जीवन उच्च विचार’ वाले उनके बहुआयामी व्यक्तित्व से प्रभावित होकर महात्मा गांधी ने कहा था, “शुद्ध भारतीय परिधान में आवेष्टित इस सरल व्यक्ति को देखकर विश्वास ही नहीं होता कि वह एक महान वैज्ञानिक हो सकता है।” आचार्य राय की प्रतिभा इतनी विलक्षण थी कि उनकी आत्मकथा “लाइफ एण्ड एक्सपीरियेंसेस ऑफ बंगाली केमिस्ट” (एक बंगाली रसायनज्ञ का जीवन एवं अनुभव) के प्रकाशित होने पर अतिप्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय विज्ञान पत्रिका “नेचर” ने उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए लिखा था कि “लिपिबद्ध करने के लिए संभवत: प्रफुल्ल चन्द्र राय से अधिक विशिष्ट जीवन चरित्र किसी और का हो ही नहीं सकता।”
डॉ॰ राय को ‘नाइट्राइट्स का मास्टर’ कहा जाता है। उन्हें रसायन के अलाव इतिहास से बड़ा प्रेम था। फलस्वरूप, इन्होंने १०-१२ वर्षो तक गहरा अध्ययन कर हिंदू रसायन का इतिहास नामक महत्वपूर्ण ग्रन्थ लिखा, जिससे आपकी बड़ी प्रसिद्धि हुई। इस पुस्तक द्वारा प्राचीन भारत के अज्ञात, विशिष्ट रसायन विज्ञान का बोध देश और विदेश के वैज्ञानिकों को हुआ, जिन्होंने डॉ॰ राय की बहुत प्रशंसा की। यूरोप की कई भाषाओं में इस पुस्तक के अनुवाद प्रकाशित हुए हैं तथा इसी पुस्तक के उपलक्ष्य में डरहम विश्वविद्यालय ने आपको डी. एस-सी. की सम्मानित उपाधि प्रदान की।

आचार्य प्रफुल्ल चन्द्र राय भारत में केवल रसायन शास्त्र ही नहीं, आधुनिक विज्ञान के भी प्रस्तोता थे। वे भारतवासियों के लिए सदैव वन्दनीय रहेंगे।
डाक्टर राय ने अपना अनुसंधान कार्य पारद के यौगिकों से प्रारंभ किया तथा पारद नाइट्राइट नामक यौगिक, संसार में सर्वप्रथम सन् 1896 में, आपने ही तैयार किया, जिससे आपकी अन्तरराष्ट्रीय प्रसिद्धि प्रारम्भ हुई। बाद में आपने इस यौगिक की सहायता से 80 नए यौगिक तैयार किए और कई महत्वपूर्ण एवं जटिल समस्याओं को सुलझाया। आपने ऐमोनियम, जिंक, कैडमियम, कैल्सियम, स्ट्रांशियम, वैरियम, मैग्नीशियम इत्यादि के नाइट्राइटों के संबंध में भी महत्वपूर्ण गवेषणाएँ कीं तथा ऐमाइन नाइट्राइटों को विशुद्ध रूप में तैयार कर, उनके भौतिक और रासायनिक गुणों का पूरा विवरण दिया। आपने ऑर्गेनोमेटालिक (organo-metallic) यौगिकों का भी विशेष रूप से अध्ययन कर कई उपयोगी तथ्यों का पता लगाया तथा पारद, गंधक और आयोडीन का एक नवीन यौगिक, (I2Hg2S2), तैयार किया तथा दिखाया कि प्रकाश में रखने पर इसके क्रिस्टलों का वर्ण बदल जाता है और अँधेरे में रखने पर पुनः मूल रंग वापस आ जाता है। सन् 1904 में बंगाल सरकार ने आपको यूरोप की विभिन्न रसायनशालाओं के निरीक्षण के लिये भेजा। इस अवसर पर विदेश के विद्धानों तथा वैज्ञानिक संस्थाओं ने सम्मानपूर्वक आपका स्वागत किया।
आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय एक जन्मजात देशभक्त थे। उनकी आत्मकथा में इसके प्रमाण स्थान-स्थान पर प्रकट हुए हैं। एडिनबरा में आधुनिक रसायन शास्त्र की शिक्षा ग्रहण करते समय वे बराबर इस बात की चिन्ता करते रहते थे कि विज्ञान के क्षेत्र में भारत योगदान क्यों नहीं कर रहा है। यहां १८८५ में उन्होंने एक निबन्ध प्रतियोगिता में भाग लिया जिसका विषय था- “भारत-गदर के पहले और बाद”। उन्होंने अपने लेख में अंग्रेजी राज की कटु आलोचना की। प्रतियोगिता के पश्चात उन्होंने यह लेख भारत के मित्र समझे जाने वाले ब्रिटिश सांसद जॉन ब्राइट को भेज दिया। ब्राइट ने लेख की बहुत प्रशंसा की। बाद में आचार्य ने इसे एक लघु पुस्तिका के रूप में प्रकाशित करवा दिया। प्रेसीडेन्सी कालेज में विद्यार्थियों को रसायन की कक्षा में व्याख्यान देते समय भी आचार्य प्रफुल्ल चन्द्र राय यह कहना नहीं भूलते थे कि “साइंस कैन वेट बट स्वराज कैन नाट” अर्थात्‌ विज्ञान प्रतीक्षा कर सकता है परन्तु स्वराज नहीं। १८९२ में उन्होंने इस देश की प्रथम रासायनिक उद्योग कम्पनी “बंगाल केमिकल्स एण्ड फार्मास्युटिकल्स वर्क्स” की स्थापना की जो आज भी बंगाल केमिकल्स के नाम से कार्यरत है। उन्हें भारतीय समाज से भी अत्यधिक प्रेम था। १९२२ के बंगाल के भीषण अकाल में आचार्य राय अपने सभी कार्यों को छोड़कर पीड़ितों की सहायता के लिए निकल पड़े। व्यक्तिगत प्रयासों से उन्होंने तीन लाख रुपये की सहायता राशि एकत्रित की। उनके आह्वान पर बंगाली ललनाओं ने महंगे रेशमी वस्त्र और आभूषण आदि सभी कुछ उनकी झोली में डाल दिए। उनके अथक प्रयासों को देखकर किसी ने सच ही कहा था कि यदि महात्मा गांधी दो प्रफुल्ल चन्द्र और उत्पन्न कर सकते तो भारत को स्वराज शीघ्र ही मिल जाता।

#ग्रंथावली
A history of Hindu chemistry from the earliest times to the middle of the sixteenth century, A.D
India Before and After the Sepoy Mutiny (सिपाही बिद्रोह के पहले एवं बाद का भारत)
सरल प्राणीबिज्ञान, बांगाली मस्तिष्क ओ तार अपब्यबहार
हिन्दु रसायनी बिद्या
मोट गबेषणापत्रेर संख्या १४५

जबसे यह साबित हुआ है कि – “चायना वायरस” ( COVID-19) महामारी से लड़ने में “हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वीन” नाम की मलेरिया की दवा लड़ने में सहायक साबित हो रही है तब से इस दवा की चर्चा भी बढ़ गई है और लोग इसके बारे में जानना चाह रहे है.

आपको शायद जानकर आश्चर्य होगा कि – इस दवा का आविष्कार भी भारत में ही हुआ था और इसका आविष्कार और उत्पादन महान रसायनविद “आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय” और उनकी कम्पनी “बंगाल केमिकल्स ऐण्ड फार्मास्यूटिकल वर्क्स” ने किया था.

प्रफुल्लचंद्र राय का जन्म 2 अगस्त, 1861 ई. में जैसोर ज़िले के ररौली गांव में हुआ था. यह स्थान अब बांग्लादेश में है तथा खुल्ना ज़िले के नाम से जाना जाता है. उनके पिता हरिश्चंद्र राय इस गाँव के प्रतिष्ठित ज़मींदार थे, उनका का अपना पुस्तकालय था

प्रफुल्लचंद्र राय ने अपनी प्राथमिक शिक्षा अपने पिता के बनाये स्कूल में की. 1879 में उन्होंने दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की उसके बाद आगे की पढ़ाई मेट्रोपोलिटन कॉलेज (अब विद्यासागर कॉलेज) में शुरू की. यहाँ इनका झुकाव रसायन विज्ञान में हुआ.

इसके बाद उन्हे लंदन में छात्रवृत्ति मिली और वे उच्च शिक्षा के लिए लन्दन चले गए. वर्ष 1885 में उन्होंने पी.एच.डी का शोधकार्य पूरा किया. उनके उत्कृष्ट कार्यों के लिए उन्हें एडिनबरा विश्वविद्यालय की रसायन सोसायटी ने उनको अपना उपाध्यक्ष चुना.

कुछ समय बाद वे भारत आ गए. 1889 में प्रेसिडेंसी कॉलेज में रसायनविज्ञान के सहायक प्रोफेसर के पद पर नियुक्त हुए और 911 में वे प्रोफेसर बने. 1916 में वे प्रेसिडेंसी कॉलेज से रसायन विज्ञान के विभागाध्यक्ष के पद से सेवानिवृत्त हुए.

अपने अध्यन अध्यापन के समांतर में उन्होंने 1892 में अपने रहने के कमरे में ही, विलायती ढंग से अंग्रेजी एवं देशी ओषधियाँ को तैयार करने के लिये “बंगाल कैमिकल ऐंड फार्मास्युटिकल वक्र्स” का कार्य आरंभ किया. यह भारत में दवा उद्योग का प्रारम्भ था.

उन्होंने आधुनिक विज्ञान के साथ, आयुर्विज्ञान की प्राचीन भारतीय पुस्तकों का अध्यन किया. उन्होंने नागार्जुन की पुस्तक “रसेन्द्रसारसंग्रह” पर आधारित “प्राचीन हिन्दू रसायन” के विषय में एक लम्बा लेख लिखा जिसे “जर्नल डे सावंट” ने प्रकाशित किया.

इससे उत्साहित होकर आचार्य ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “हिस्ट्री ऑफ हिन्दू केमिस्ट्री” को लिखा. उनकी यह किताब विश्वविख्यात हुई. इस किताब के माध्यम से ही सारी दुनिया प्राचीन भारत के समृद्ध रसायन ज्ञान और चिकित्सा ज्ञान से पहली बार परिचित हुई.

इस किताब का दुनिया की अनेकों भाषाओं में गया. इसके बाद सारी दुनिया के रसायन विद और चिकित्सा विद प्राचीन हिन्दू ग्रंथो को मंगवाकर उनका विटार से अध्ययन करने लगे. रसायन के क्षेत्र में आचार्य के लगभग 120 शोध-पत्र प्रकाशित हुए.

उन्होने मरक्यूरस नाइट्रेट एवं अमोनियम नाइट्राइट नामक नए यौगिकों का निर्माण किया और इनकी मदद से 80 नए यौगिक तैयार किए. रिटायर होने के बाद उन्होंने अपना सारा समय “बंगाल कैमिकल ऐंड फार्मास्युटिकल वक्र्स” को देना प्रारम्भ कर दिया.

यहाँ उन्होंने आयुर्वेद और एलोपैथी का मिश्रण करते हुए दवाइयों का निर्माण शुरू कर दिया, इनकी यह कम्पनी सफलता के नए आयाम स्थापित करने लगी. उनकी कम्पनी द्वारा “हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वीन” के अविष्कार ने बड़ी कम्पनी बना दिया था.

वे गांधी जी और मालवीय जी का भी बहुत सम्मान करते थे. जब BHU द्वारा उन्हें डी.एस-सी की मानद उपाधि से विभूषित किया गया, तो उन्होंने कहा था कि – यह मेरे जीवन का सर्वश्रेष्ठ पुरुष्कार है, जबकि उन्हें देश विदेश के अनेकों सम्मान मिल चुके थे.

सन् 1922 में उन्होंने नागार्जुन के नाम पर वार्षिक पुरस्कार शुरू करने के लए दस हज़ार रुपये दिए. उन्होंने 1936 में डा. आशुतोष मुखर्जी के नाम पर भी शोध-पुरस्कार शुरू करने के लिए उनके डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को भी दस हज़ार रुपया दिए थे.

उन्होंने आजीवन विवाह नहीं किया था. संयमित तथा कर्मण्य जीवन जीने के कारण, उन्होंने 83 वर्ष की दीर्घ आयु पाई. 16 जून 1944, को आपका निधन हो गया. उनका कोई उत्तराधिकारी न होने के कारण उनकी कम्पनी राष्ट्र की सम्पत्ति घोषित हो गई.
✍🏻रूही पाठक

Comment:

Kuponbet Giriş
betgaranti giriş
Teknik Seo
betnano giriş
betpark giriş
betnano giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
betnano giriş
vdcasino giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betebet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
betebet giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
parmabet giriş
grandpashabet giriş
betpas giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
pusulabet giriş
parmabet giriş
parmabet giriş
betnano giriş
betparibu giriş
grandpashabet giriş
betlike giriş
safirbet giriş
safirbet giriş
betparibu giriş
betlike giriş
parmabet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
parmabet giriş
betlike giriş
vaycasino giriş
betparibu giriş
klasbahis giriş
madridbet giriş
madridbet giriş
mariobet giriş
mariobet giriş
grandpashabet giriş
betlike giriş