अग्निहोत्र : जिंदगी एक नियामत हजार

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वेद के मन्त्र ‘ओ३म् समिधाग्निं दुवस्यत घृतैर्बोधयतातिथिम्। आस्मिन् हव्या जुहोतन स्वाहा।। इदमग्नयेे-इदन्न मम।।’ में कहा गया है कि विद्वान लोगों ! जिस प्रकार प्रेम और श्रद्धा से अतिथि की सेवा करते हो, वैसे ही तुम समिधाओं तथा घृतादि से व्यापनशील अग्नि का सेवन करो और चेताओ। इसमें हवन करने योग्य अच्छे द्रव्यों की यथाविधि आहुति दो। एक अन्य मन्त्र ‘सुसमिद्धाय शोचिषे घृतं तीव्रं जुहोतन। अग्नये जातवेदसे स्वाहा। इदमग्नये जातवेदसे-इदन्न मम।।’ में विधान है कि हे यज्ञकर्ता ! अग्नि में तपाये हुए शुद्ध घी की यज्ञ में आहुति दो, जिससे संसार का कल्याण हो। यह सुन्दर आहुति सम्पूर्ण पदार्थों में विद्यमान ज्ञानस्वरूप परमेश्वर के लिए है, मेरे लिए नहीं।

यदि यज्ञ में जलती हुई अग्नि में शक्कर डाल दी जाए तो उससे वायु बहुत अधिक मात्रा में शुद्ध हो जाती है। जिससे चेचक , हैजा 6 आदि बीमारियां तुरंत नष्ट हो जाती हैं । मुनक्का , किशमिश आदि फलों को यज्ञ में जलाकर देखा तो पता चला कि इनके धुंए से टाइफाइड के रोगाणु आधा घंटे में और दूसरे रोगों के विषाणु आधा घंटे के बाद नष्ट हो गए।

वैज्ञानिक ट्रिल्वर्ट और वैदिक यज्ञ विज्ञान

केसर तथा चावल को मिलाकर हवन करने से प्लेग के कीटाणु भी समाप्त हो जाते हैं — डॉक्टर कर्नल किंग।
विदेशों में यज्ञ की लोकप्रियता नित्य प्रति बढ़ रही है चिल्ली , पोलैंड, जर्मनी , अमेरिका आदि देश इस तथ्य को स्वीकार करने लगे हैं। 1857 की क्रांति के जनक स्वामी दयानंद सरस्वती ने बलि प्रथा बंद कर के यज्ञों का पुनरुद्धार किया तथा यज्ञ से संबंधित सभी गुत्थियों का वेदों के अनुसार निवारण कर इसके अनेक वैज्ञानिक व औषधीय लाभों से संपूर्ण विश्व को अवगत कराया । ऋषि दयानंद कहते हैं कि जो व्यक्ति यज्ञ से शुद्ध किए हुए अन्न , जल आदि पदार्थों का सेवन करते हैं वे निरोग होकर बुद्धि , बल , आरोग्य और दीर्घायु वाले होते हैं।
इस प्रकार यज्ञ कार्बन डाई ऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड इत्यादि प्रदूषण फैलाने वाले तत्वों को वातावरण से दूर करके उसको शुद्ध करता है।
‘सत्यार्थ प्रकाश’ के तृतीय समुल्लास में महर्षि दयानंद ने होम से क्या उपकार होता है ? – इसका वर्णन निम्न प्रकार किया है :–
“सब लोग जानते हैं कि दुर्गंध युक्त वायु और जल से रोग ,रोग से प्राणियों को दुख और सुगंधित वायु तथा जल से आरोग्य और रोग के नष्ट होने से सुख प्राप्त होता है।
जहां होम होता है वहां से दूर देश में स्थित पुरुष के नासिका से सुगंध का ग्रहण होता है , वैसे दुर्गंध का भी इतने ही से समझ लो कि अग्नि में डाला हुआ पदार्थ सूक्ष्म होकर फैलके वायु के साथ दूर देश में जाकर दुर्गंध की निवृत्ति करता है और यह अग्नि का सामर्थ्य है कि उस वायु और दुर्गंधयुक्त पदार्थों को छिन्न-भिन्न और हल्का करके बाहर निकाल कर पवित्र वायु का प्रवेश करा देता है।”
यज्ञ में मंत्र पढ़ने का क्या प्रयोजन है ?
इस विषय में स्वामी दयानंद बताते हैं कि मंत्रों में वह वाक्यम है कि जिससे होम करने के लाभ विदित हो जाएं और मंत्रों की आवृत्ति होने से कंठस्थ रहे वेद पुस्तकों का पठन-पाठन और रक्षा भी होवे।”
क्या इस होम करने के बिना पाप होता है ?
उत्तर : हां , क्योंकि जिस मनुष्य के शरीर से जितना दुर्गंध उत्पन्न होकर वायु और जल को बिगाड़ कर रोग उत्पत्ति का निमित्त होने से प्राणियों को दुख प्राप्त करता है , उतना ही पाप उस मनुष्य को होता है। इसलिए उस पाप के निवारण हेतु उतना सुगंध हुआ उससे अधिक वायु और जल में फैलाना चाहिए और खिलाने – पिलाने से उसी एक व्यक्ति को सुख विशेष होता है । जितना जल और सुगंध आदि पदार्थ एक मनुष्य खाता है , उतने द्रव्य के होम से लाखों मनुष्य का लाभ होता है । परंतु जो मनुष्य लोग जल आदि उत्तम पदार्थ न खावें तो उनके शरीर और आत्मा के बल की उन्नति न हो सके । इससे अच्छे पदार्थ खिलाना पिलाना भी चाहिए , परंतु उससे होम अधिक करना उचित है , इसलिए होम करना अत्यावश्यक है।

प्रत्येक मनुष्य कितनी आहुति करें और आहुति का परिमाण क्या है ?

प्रत्येक मनुष्य को 16 – 16 आहुति और छह – छह माह से व्रत आदि 11 आहुति का परिमाण न्यून से न्यून् होना चाहिए और जो इससे अधिक करें तो वह बहुत अच्छा है । इसलिए आर्य शिरोमणि महर्षि – ऋषि , राजे – महाराजे लोग बहुत सा होम करते और कराते थे। जब तक होम करने का प्रचार रहा , तब तक आर्यावर्त देश रोगों से रहित और सुखों से पूरित था । अब भी प्रचार हो तो वैसा ही हो जाए । यह दो यज्ञ अर्थात ब्रह्म यज्ञ तो पढ़ना पढ़ाना समझो । ईश्वर की स्तुति – प्रार्थना -उपासना करना दूसरा , देव जो अग्निहोत्र से लेकर अश्वमेध पर्यंत यज्ञ और विद्वानों की सेवा संग करना परंतु ब्रह्मचर्य में केवल ब्रहमयज्ञ और अग्निहोत्र का ही करना होता है।

ब्रहमयज्ञ क्या है ?

ब्रह्म यज्ञ के विषय में ‘सत्यार्थप्रकाश’ में स्वामी दयानंद ने निम्न प्रकार व्यवस्था दी है – “संध्योपासन जिसको ब्रह्म यज्ञ भी कहते हैं , आचमन उतने जल को हथेली में लेकर उसके मूल और मध्य देश में ओष्ठ लगाकर करें कि वह जल कंठ के नीचे हृदय तक पहुंचे , न उससे अधिक ना न्यून । उससे कंठस्थ कफ और पित्त की निवृति थोड़ी सी होती है , पश्चात मार्जन अर्थात मध्यमा और अनामिका अंगुली के अग्रभाग से नेत्र आदि अंगों पर जल छिड़ककर उससे आलस्य दूर होता है , जो जल प्राप्त न हो तो न करे। पुनः प्राणायाम , मनसा परिक्रमण उपस्थान , पीछे परमेश्वर की स्तुति – प्रार्थना और उपासना की रीति सीखना है। पश्चात अघमर्षण अर्थात पाप करने की इच्छा कभी भी न करे । यह संध्योपासना एक देश में एकाग्रचित्त से करें अर्थात एकांत देश में जंगल में सावधान होकर जल के समीप नित्यकर्म को करता हुआ , सावित्री अर्थात गायत्री मंत्र का उच्चारण अर्थ ज्ञान और उसके अनुसार अपने चाल – चलन को करे परंतु यह जप मन से करना उत्तम है।

देव यज्ञ क्या है ?

संध्या और अग्निहोत्र सायं प्रातः दो ही काल में करें ।दो ही रात दिन की संधि बेला है , अन्य नहीं । न्यून से न्यून एक घंटा ध्यान अवश्य करें । जैसे समाधिस्थ होकर योगी लोग परमात्मा का ध्यान करते हैं वैसे ही संध्योपासन भी किया करें तथा सूर्योदय के पश्चात और सूर्यास्त के पूर्व अग्निहोत्र करने का समय है।
संक्षिप्त में हम ऐसा कह सकते हैं कि यज्ञ परोपकार का इस श्रेष्ठतम कर्म है , जो इस समस्त संसार का नाभि केंद्र भी कहा जा सकता है।

तपोबल

जब मनुष्य अपने धर्म का पालन करता है तो उसके मार्ग में अनेक प्रकार की शारीरिक , मानसिक बाधाएं एवम् कष्ट आते हैं । जिनको सहना पड़ता है। कष्टों व क्लेशों को सहते हुए भी जो अपने धर्म के मार्ग को न छोड़े उसी का तपोबल उत्तम श्रेणी का होता है।
तप से हमें अनंत ऊर्जा और आंतरिक बल प्राप्त होता है । संक्षेप में एक मनुष्य के जीवन को सफल बनाने के लिए अनेक यत्न संभालने और संवारने के किए गए हैं ।आज से करीब 30 वर्ष पूर्व मैं अपने गाजियाबाद कचहरी के कार्यालय से अपने घर दादरी के लिए बस अड्डे पर बस पकड़ने के लिए गया हुआ था। मुझे एक बस के पीछे एक बात लिखी हुई बहुत अच्छी लगी , लेकिन मैं उसको अच्छे लगने के अलावा गहराई से नहीं समझ पाया और उस पर विचार करता रहा कि यह क्यों कहा गया ? परंतु जीवन के इस पड़ाव पर पहुंचते-पहुंचते बहुत सारे अध्ययन , अभ्यास,अनुभव होते – होते उस शीर्षक का अर्थ मालूम पड़ा है । वह शीर्षक था –
जिंदगी एक नियामत हजार।
अब यह समझ में आया कि जिंदगी को सुखद व सफल बनाने के लिए हजार नियमों का पालन करना होता है । तब कहीं जाकर के एक जिंदगी सुधरती और संवरती है । सफल व सुफल होती है।
जैसे उदाहरण के लिए सामाजिक कर्म, राग मय जीवन, अध्यात्म, मन की ऊर्जा शक्ति, वास्तविक गुरु कौन ,दुख के पार, वास्तविक संत ,आत्मबोध, संवाद का महत्व, परोपकार का महत्व ,नैतिकता ,प्रणाम का प्रभाव ,सह अस्तित्व, पूजा का महत्व ,सफलता का मंत्र, श्रद्धा और विश्वास योग साधना ,वेद और जीवन, ज्योति शक्ति ,त्याग और विरक्ति, मौन की शक्ति, प्रेम और मोह, दिव्य उपहार, भाव ही भक्ति है, सेवा साधना ,मन और आत्मा ,श्रेय व आत्म कल्याण, निसाधनता, अनुशासन, माया मोह, सदाचरण, आनंद प्राप्ति, ब्रह्म ज्ञान ,प्रेम का महत्व, प्रार्थना का प्रभाव, प्रेम और ईश्वर, प्रतिभा ,धर्म और संस्कृति, विद्या और मानव, साधना, प्रेम का अर्थ ,शुभ संकल्प, व्यवहारिक शिक्षा, सात्विक जीवन ,विद्या अविद्या ,संयम का ज्ञान, ब्रह्मचर्य, दिव्य व्यक्तित्व ,संत की महिमा, सुचिता, यज्ञ का महत्व, नारी का सम्मान, कर्म और भाग्य, तपोबल, परिवर्तन, कृतज्ञता, कर्म पथ, जीवन की पहेली, वास्तविक धर्म, आत्म ज्ञान, मन का स्वास्थ्य, प्रशंसा और निंदा, धर्म और प्रकृति,आत्मा का साक्षी भाव, शुद्धि का महत्व, कर्म का महत्व, रहस्यवाद, अहिंसा की महिमा, प्रायश्चित, मनोबल, मन को संवारना, धैर्य का गुण,कर्मफल , असली प्रयोजन, पात्रता, एकता बल, संतोष का महत्व, सुनने की योग्यता, आत्मविश्वास, अज्ञानता, इच्छाएं, व्यक्तित्व का निर्माण, धर्म का स्वरूप, दान का महत्व, चरित्र, सुख दुख, निराश न होना, आशीर्वाद, रचना परक धर्म, गुरु की गुरुता, गुरुओं के गुरु, गुरु अनुग्रह,आस्था के आयाम, वास्तविक आनंद, भ्रष्टाचार, क्षमा की क्षमता, आध्यात्मिक प्रगति, स्वाभिमान, त्याग की महिमा, योग रहस्य, ईर्ष्या, अपना पराया, मन की यात्रा, स्वास्थ्य और भक्ति, चलते रहो – चरैवेति, अनासक्ति, वास्तविक वैराग्य, ममता, संकल्प शक्ति, आलस्य का रोग, मन की शक्ति, भगवान का आशय, शक्ति का महत्व, अनुकरण, शब्द शक्ति, सीखने की आदत, भक्ति की शक्ति, क्रोध का शमन, चरित्र का महत्व, शक्ति का आदि स्रोत, परछिद्रान्वेषी , जीवन रूपी अग्नि, सफलता का मार्ग, दिव्य संपदा, मित्रता, चिंतन चिंता, कामना ,उपासना, मर्यादा की महिमा, इंद्रिय निग्रह, धन का उपयोग, वैचारिक शक्ति, सज्जनता, जीवन का सुख, परमपिता का संदेश, करुणा, विवेकशीलता, कर्मों का रहस्य, संयम और सहजता, राजधर्म, सादगी, आत्मिक चेतना, आनंद परमानंद, बंधन से मुक्ति, सत्य असत्य, संस्कार, लोभ निवृत्ति, सदाचरण, त्याग साधना, मानवीय गुण, मौन की शक्ति, मन की चंचलता, ईश्वर अनुभूति, मन की शक्ति, मदांध व्यक्ति, साहस, नैतिकता, सत्य का ज्ञान, धैर्य, दुख का रहस्य, भक्ति मुक्ति, एकाग्रता, समाधि, सत्य का मार्ग, सत्य का सामना, अक्षय सुख, सहजता, शाश्वत संदेश, प्रकृति का विधान, दुख से मुक्ति, क्रोध से बीमारी, विनम्रता, भक्ति के रूप, सम्मान आदर, राष्ट्रधर्म, उद्देश्य पूर्ण जीवन, अहंकार और लोभ, आत्मपरीक्षण, मौन साधना, सुख की उपलब्धि, कर्म का सिद्धांत, शरीर और साधना, नैतिक मूल्य, सेवा भावना, समय प्रबंधन, अनुकरण, प्रकृति का रहस्य, अहंकार, पंचतत्व, मानव धर्म, शाश्वत मूल्य, सफलता के सोपान, समाधि की ओर, सार्थक व्यस्तता, झूठा सम्मान, विज्ञान और योग, सच्ची प्रार्थना, सद कर्तव्य, उपेक्षा, परमात्म सत्ता, परमात्म तत्व , परमात्मा शक्ति, परमात्म सत्ता, समर्पण भाव, मुक्ति का मार्ग, उपासना का तत्व,ईश्वर बोध, ईश्वर के उपहार, ईश्वर सृष्टिकर्ता से संबंध,महाशून्य,सत्य बोध, जीवन मृत्यु, संसार – संगसार, धर्म का निहितार्थ, प्रशंसा, संस्कार, विषमता, आत्मतत्व,सद संकल्प, व्यक्तित्व, भाग्य का अरुणोदय, अहिंसा, भावना प्रवाह, प्रभु प्रेम, स्थिति प्रज्ञ, आशा, पारमार्थिक जीवन, सच्ची शक्ति, संयम, सहचर्य ,समभाव ,सद्भाव, सहानुभूति, सरलता, आदि अनेक गुण जीवन को सफल बनाने के लिए आवश्यक हैं । यह सूची यहीं समाप्त नहीं हो जाती।

देवेंद्र सिंह आर्य
चेयरमैन : उगता भारत

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