जहां बबूल वहां मारवाड़ जहां आम वहां मेवाड़

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    मेवाड़ और मारवाड के बीच स्थायी सीमा निर्धारण महाराणा कुम्भा और जोधा के वक़्त हुआ. पर इसके पीछे की कहानी बहुत रोचक है. सीमा तय करने के लिए जोधा और कुम्भा के मध्य संधि हुई. “जहाँ बबूल वहाँ मारवाड और जहाँ आम-आंवला वह मेवाड़” की तर्ज पर सीमा निर्धारण था. क्या था बबूल और आम का अर्थ. इसे समझने के लिए संक्षिप्तता में रहते हुए इतिहास में चलते ह
  • मंडोर के राठोड़ चूंडा ने अपने छोटे बेटे कान्हा को युवराज बनाना चाहा, जो उस वक़्त की शासन परंपरा के खिलाफ था. चूंडा का ज्येष्ठ पुत्र रणमल नाराज होकर राना लाखा की शरण में मेवाड़ आ गया. रणमल के साथ उसकी बहन हंसाबाई भी मंडोर से मेवाड़ आ गयी. रणमल ने बहन हंसाबाई की शादी लाखा के बड़े बेटे “चूंडा” से करवाने की चाह में राणा के पास शकुन का नारियल भेजा. राणा उस वक्त दरबार में थे और उन्होंने ठिठोली में कह दिया कि उन्हें नहीं लगता कि उन जैसे बूढ़े के लिए ये नारियल आया है सो चूंडा आकर ये नारियल लेगा. मजाक में कही गयी बात से लाखा के बेटे को लगा कि राणा की अनुरक्ति हंसाबाई की ओर है. उन्होंने आजीवन कुंवारा रहने और हंसाबाई का विवाह अपने पिता से करवाने की भीष्म प्रतिज्ञा की. यह भी प्रण किया कि राणा और हंसाबाई की औलाद ही मेवाड़ की शासक बनेगी.
    राणा लाखा और हंसाबाई के पुत्र मोकल को मेवाड़ की गद्दी मिली. मरते वक़्त लाखा ने ये व्यवस्था की कि मेवाड़ के महाराणाओ की ओर से जो भी नियम पट्टे जारी किये जायेंगे उन पर भाले का राज्य-चिन्ह चूंडा और उसके वंशधर करेंगे, जो बाद में सलूम्बर के रावत कहलाये.
    चूंडा ने मोकल के साथ मिलकर मेवाड़ को मजबूत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी किन्तु मामा रणमल को यह डर था कि चूंडा मौका मिलने पर मोकल को मरवा देगा. उसने बहन हंसाबाई के कान भरे. हंसाबाई ने चूंडा को विश्वासघाती बताकर मेवाड़ से चले जाने का आदेश दे दिया. व्यथित चूंडा ने मेवाड़ छोड़ने का निश्चय किया किन्तु इतिहासकार लिखते है कि उसने राजमाता से कहा था कि अगर मेवाड़ में कुछ भी बर्बादी हुई तो वह पुनः लौटेगा. चूंडा अपने भाई राघवदेव को मोकल की रक्षार्थ मेवाड़ में छोड़ दिया.
    चूंडा के जाते ही रणमल अपने भांजे मोकल का संरक्षक बन गया. वह कई बार मोकल के साथ राजगद्दी पर बैठ जाता, जो मेवाड़ के सामंतो को बुरा लगता. रणमल स्वयं मेवाड़ का सामंत तो हो गया पर उसका पूरा ध्यान अपने मूल राज्य मंडोर की तरफ था. उसने मंडोर से राठोडों को बुलाकर मेवाड़ के मुख्य पद उन्हें दिए. राजा श्यामलदास “वीर विनोद” में लिखते है कि मेवाडी सामंतों को यह नागवार गुज़रा. उन्हें लगता था कि मेवाड़ अब मारवाड का हिस्सा हो जायेगा ! इसी दौरान जब मारवाड में उत्तराधिकार का संकट आया तो रणमल ने मेवाड़ की सेना के सहारे मंडोर पर कब्ज़ा कर लिया. एक बार मौका पाकर रणमल ने भरे दरबार में चूंडा के भाई राघवदेव की हत्या कर दी. इस दौरान गुजरात के सुल्तान अहमदशाह से युद्ध के दौरान मोकल के साथ स्व. राणा लाखा की पासबान (रखैल ) के दो बेटे चाचा और मेरा, भी मोकल के साथ हुए. युद्ध जीत लिया गया किन्तु चाचा और मेरा को यथोचित सम्मान नहीं मिला. कारण था रखैल के पुत्र होना. बाद में इन दोनों ने मोकल को धोखे से मार डाला. विविध घटनाक्रम के बाद मोकल का बेटा कुम्भकर्ण (कुम्भा) राणा बना.
    कुम्भा को भी रणमल का साथ मिला. किन्तु एक बार रणमल ने नशे में किसी पासबान दासी को कह दिया कि वह कुम्भा को मार कर मेवाड़ और मारवाड का शासक बनेगा. बात जब कुम्भा तक पहुंची तो उन्हें यह नागवार गुज़रा. रणमल स्थिति भांपकर चित्तोड़ दुर्ग छोडकर तलहटी में आकर रहने लगा. इसी दौरान रणमल की हत्या कर दी गई. उसका बेटा जोधा मेवाड़ से भाग निकला.
    बाद में मंडोर, लूनकरनसर, पाली, सोजत, मेड़ता आदि राज्य भी मेवाड़ के अंतर्गत हो गए. ऐसे में जोधा छिपते छिपाते बीकानेर के पास जाकर छिप गया. कालांतर में राजमाता हंसाबाई ने अपने पौत्र कुम्भा से भतीजे जोधा के लिए अभयदान माँगा. महाराणा कुम्भा ने वचन दिया. उसी से अभय होकर जोधा ने मडोर पुनः अपने कब्ज़े में किया. किन्तु अभयदान के चलते वह धीरे धीरे सोजत, पाली तक बढ़ आया. किन्तु जब वह मेवाड़ के परगनो पर आक्रमण करने लगा तो बात ज्यादा बढ़ गयी. कुम्भा वचन में बंधा था. यहाँ गौरीशंकर ओझा लिखते है कि एक बार जोश में आकर जोधा ने चित्तोड़ तक पर आक्रमण का फैसला लिया. वह अपने पिता की हत्या का बदला लेना चाहता था. जोधपुर के चारण साहित्य में तो यहाँ तक कहा गया है कि जोधा ने चित्तोड़ पर आक्रमण कर उसके दरवाज़े जला दिए. किन्तु इतिहासकार इसे सच नहीं मानते. क्योंकि उस दौर में कुम्भा ने गुजरात, मंदसौर, सिरोही, बूंदी, डूंगरपुर आदि शासकों को हराया था. उस वक़्त मेवाड़ की सीमा सीहोर (म.प्र.) से हिसार (हरियाणा) तक थी. केवल हाडोती के रावल (हाडा) और मेरवाडा (अजयमेरू अथवा अजमेर) अपनी स्वतंत्रता अक्षुण बनाये हुए थे.
    जोधा द्वारा बार बार मेवाड़ के परगनो पर आक्रमण और कुम्भा द्वारा उसे कुछ नहीं कहे जाने को लेकर दोनों पक्षों के बीच संधि हुई. इतिहासकार लिखते है कि इस वक़्त जोधा ने अपनी बेटी “श्रृंगार देवी” का विवाह कुम्भा के बेटे रायमल से किया. अनुमान होता है कि जोधा ने मेवाड़ से अपना बैर बेटी देकर मिटाने की कोशिश की हो. किन्तु मारवाड के इतिहास में इस घटना का उल्लेख नहीं मिलता. मेवाड़ के इतिहास (वीर विनोद एवं कर्नल जेम्स टोड) में इस विवाह के बारे में लिखा गया है. बाद में इसी श्रृंगार देवी ने चित्तोड़ से बारह मील दूर गौसुंडी गांव में बावडी बनवाई,जिसके शिलालेख अब तक विद्यमान है.
    मेवाड़ और मारवाड में हुई संधि में सीमा निर्धारण की आवश्यकता हुई. तय किया गया कि जहाँ जहाँ तक बबूल के पेड है, वह इलाका मारवाड में और जहाँ जहाँ आम-आंवला के पेड हो, वह स्थान हमेशा के लिए मेवाड़ का रहेगा. यह सीमांकन प्रायः स्थायी हो गया. इस सीमांकन के बाद सोजत (मेरवाडा-अजमेर के ब्यावर की सीमा तक) से थार (वर्तमान पाकिस्तान के सिंध की सीमा तक) तक और बीकानेर राज्य से बाड़मेर तक का भाग मारवाड के पास तथा बूंदी से लेकर वागड़ (डूंगरपुर) तथा इडर से मंदसौर तक का भाग मेवाड़ कहलाया. यद्यपि मेवाड़ इस से भी बड़ा था किन्तु आम्बेर (जयपुर), झुंझुनू, मत्स्य नगर, भरतपुर आदि मेवाड़ के करदाता के रूप में जाने जाते थे. उस वक़्त मेवाड़ मुस्लिम त्रिकोण (नागौर- गुजरात-मालवा) के बीच फंसा राजपूती राज्य था. एक समय में जब कुम्भा ने मालवा की राजधानी मांडू और गुजरात की राजधानी “अहमद नगर’ पर हमला किया तो दोनों मुस्लिम शासकों ने कुम्भा को “हिंदू-सुरत्राण” की उपाधि से नवाजा. इसके शिला लेख कुम्भलगढ़ और राणकपुर के मंदिरों में मिलते है.
    बाद में कुम्भा के वंशज महाराणा सांगा ने जब खानवा में बाबर से युद्ध किया तो मारवाड ने मेवाड़ का बराबर साथ दिया. इस से पता चलता है कि बैर सदा नहीं रहता. जोधा ने भी मेवाड़ की ओर से आक्रमण के आशंकाएं खत्म होते ही जोधपुर नगर बसाया.
    कर्नल जेम्स टोड ने लिखा है, “इन राज्यों की गाथाओं में अनेक प्रकरण ऐसे है, जिसमे दोनों अपना उतावलापन और हर बात में अहंकार दिखाकर आपस में जूझने लगते है और बदला लिए बिना चैन से नहीं बैठते. परन्तु उसे पा जाने पर आपसी बैर भूल कर फिर एक हो जाते है.”

    जहं पीपल तहं तिय परिणीता…
    #दशामाता_पूजन_पर्व
    मेवाड़-वागड़ में चैत्र कृष्णा दशमी को दशामाता पर्व के रूप में मनाया जाता है। यह पीपल पूजा का दिन है। इस अवसर पर नल राजा दमयंती रानी की कहानी कही सुनी जाती है जिसमें दशा के कुदशा होने पर मिले फल और सुदशा होने पर बेहतर परिणाम की चर्चा होती है। यह कथा जितनी पुरानी, उतना ही पुराना यह व्रत। महाभारत में यह कथा पुराने आख्यान के रूप में अाई है।

    वयोवृद्ध महिलाओं से लेकर नव ब्याहताओं द्वारा भी यह व्रत किया जाता है। सास नव वधू को यह व्रत दिलाती है। सुख, सुहाग और समृद्धि की कामना इसके मूल में है। कहीं कहीं पुरुष केवल व्रत रखते हैं। महिलाएं तो निर्जल, निराहार ही पूजा करती है :

    जहं पीपल तहं तिय परिणीता।
    व्रत धरी कथा सुनहु बहुप्रीता।।

    सुबह सुबह जागकर महिलाएं पीपल को निवेदित करने को हल्दी मिलाकर गूथे गए आटे के गहने बनाती हैं और फिर कुमकुम, मेहंदी, कच्चे सूत, वलय वगैरह सुहाग सामग्री सरीखा थाल सजाकर पीपल पूजने जाती है।
    गीतों के गान, वारताओं के बखान, बुजुर्गों के सम्मान के संकल्प के बीच पीपल की छाल का कुछ टुकड़ा घर लाकर कुमकुम के पंचांगुलिक थापे के साथ ही देव के आले में विराजमान करती हैं। यह दशा की साधना भी है और प्रतिष्ठा भी। कितनी रोचक परंपरा है, पीपल पूजने से क्या होता है ? गीत में गाया जाता है :

    पीपळ पूजां कांई फल मिलसी,
    अन होसी, धन होसी,
    पूतां रो परिवार होसी,
    सायब जी रो राज होसी,
    अपरौ सन्मान होसी,
    लाव होसी, लसकर होसी,
    हाथी हजार होसी, घोड़ा घूम्मतदार होसी,
    उठो रानी रुकमण पूजौ दसामाता…

    पेड़ पूजन से यह सब मिलता है ? यह यकीं क्यों नहीं होता। सारा वैभव ही वर्षा, वायु और वनस्पति का अवदान है। हां, यदि हर पेड़ पूजा जाने लगे तो ! तो क्या, नौ आनंद हो जाए। विचार करें और बतायें कि आपके आसपास वृक्ष पूजन की कौनसी परंपरा है ?

    चौरा की रचना : पेड़ की साक्षी

    देहात की अपनी परंपराएं अौर नियोजनाएं होती है।
    किसी सामूहिक मुद्दे, मसले पर विचार करने और सह
    निर्णय के लिए जन जातीय इलाकों, लोकांचलों में जो जगह तय होती है, वह हामेती (सहमति, समिति) और उसमें राय रखने वाले गमेती या गामेती होते हैं।

    जगह पर कुलगत आस्था का सूचक पेड़ होता है। यह नीम, लिसौड़ा, पीपल, बरगद, करंज आदि का हो सकता है। पेड़ वही होगा जो ग्राम्य वृक्ष हो, जंगली पेड़ नहीं। जैसे कि इमली, जिसके नीचे बैठने से सुस्ती आती है। इसलिए वृक्ष सचेत रखे, चैतन्य रखे। वह चैत्य वृक्ष इसीलिए कहलाता है। इसे कोई काटता नहीं। काटने की मनाही होती है, जरूरी होने पर छंटाई हो सकती है।

    शास्त्रों में चैत्य वृक्ष का नाम मिलता है और उसे श्मशान का पेड़ लिखा जाता है जबकि असल में वह समूह के बैठने व निर्णय के साक्षी होने से महत्व का है और इसीलिए अकाट्य है। पेड़ की गवाही जैसा आख्यान और मुहावरा भी तो है। वास्तु में लकड़ी के चुनाव के प्रयोजन से चैत्य वृक्ष के काटने का निषेध किया गया है। चाणक्य आदि ने चैत्य से कृत गतिविधियों का जिक्र किया है। ( अन्य सूचनाएं : समरांगण सूत्रधार, विश्वकर्मा संहिता)

    पेड़ की छाया के नीचे आलवाल की तरह विस्तृत जगह बैठकी है। यहां एकी-बेकी, गंगाजली उत्त्थापन, शपथ, देव चौखट गमन, जल संकल्प आदि विधियों से सामाजिक पक्षों पर निर्णय आदि होते हैं। अधिक समय नहीं हुआ, जब चौरों या चवरों का इतना सम्मान था कि कोई उस पर जूते पहने नहीं जाता। यकीन नहीं होता है कि नारियां उधर से गुजरती तो पर्दा रखती…।
    एक प्रकार से यह प्रणाली गण व्यवस्था की सूचक है और इसकी जड़ें बहुत गहरी और हरी है… है न।

    बरगद में पीपल…

    बांदा या संयुक्त वृक्ष कहीं-कहीं दिखाई दे जाते हैं। बरगद, बड़, वट एेसा पेड़ है जिसके लिये कहा तो यह भी जाता है कि उसके तले कोई दूसरा पेड़ नहीं पनपता। खुद ही अपनी जटाओं के बल पर अपना साम्राज्य बढ़ाता जाता है।
    यहां, बरगद से गलबहियां करते पीपल को देखा जा सकता है। पीपल और बरगद एक ही तरह की प्रकृति के पेड़ हैं। बरगद को “न्यग्रोध” नाम से पुरुष प्रमाण का पेड़ कहा गया तो संसार की रचना करने वाली शक्ति या स्वरूप की तुलना “अश्वत्थ” या पीपल से की गई है।
    “चित्रलक्षणम्” के साथ ही प्रतिमा मान लक्षणं, मानसोल्लास, बृहत्संहिता में न्यग्रोध का इसी तरह प्रसार्यमान प्रमाण मिलता है और बौद्धग्रंथों व उपनिषद से लेकर गीता तक पीपल की यही सत्ता स्थापित है।
    और हां, पीपल के गलहार खर्जूर पर भी कम नहीं मिलते। परागण प्रक्रिया में पीपल और भी कुछ पेड़ों का साथी बना दिखाई दे जाता है।
    हां, जहां एेसी जोड़ी मिल जाती है, तंत्र वाले अपना मत कहते भी पीछे नहीं रहते… और वनस्पति शास्त्र वाले अपनी बात कहेंगे।
    मगर, हम जरूर कहेंगे कि पेड़ भी सहजीवन सिखाते हैं और जीवन के मायने बताते हैं ….।
    है न यह जीव-जोड़ा खास…
    जय जय
    ✍🏻श्रीकृष्ण जुगनू की पोस्टों से संग्रहित
    ||वृक्षारोपण||
    भैया का ससुराल गया रहा दीवाली के वक़त .. भैया के साले सब खूब बाँस काट के लाये रहे और चीड़-फाड़ काट रहे थे.. हमने पूछा ‘घर बना रहे हो क्या जो इतना बाँस काट के लाये हो!!?” .. जवाब मिला “अरे नहीं बोहने .. ई बाड़े के लिए टाटी बना रहे है !!”
    “कौन सा बाड़ा और किसके लिए??”
    “अरे वन विभाग वाला सड़क किनारे-किनारे वृक्षारोपण कर रहे हैं न तो लगाए जाने वाले वृक्षों को घेरने के लिए ये बाड़े बना रहे हैं.. एक बाड़े का 25 रुपया देते है वन विभाग वाले!!”
    “अरे वाह!! … बहुत खूब.. बनाओ.. बनाओ.. पैसे कमाओ !!”
    .
    मैं वृक्षारोपण को बहुत ही पुनीत और पुण्य काम के तौर पे देखता आया हूँ,जैसा कि आज हर इंसान सोचने लगा है व अस्तित्व के लिए ये एक गहरा विषय बनता जा रहा है … जब भी इन सब कार्यों को देखता था तो नमन करता था।.. सड़क किनारे लहलहाते सरसराते पेड़ों को देखकर बड़ा सुखद अहसास मिलता था।…

    लेकिन एक दिन जरा ध्यान खींचा.. कि ये जो पेड़ वन विभाग द्वारा लगाए जा रहे हैं क्या वे हमारी जंगलों के पेड़ से मेल खा रहे हैं?? दिमाग कौंधा.. क्या ये हमारे पेड़ हैं?? .. ये तो एकदम से ही अलग दिखते हैं!! . दूसरी बात ये कि इन लगाए पेड़ों की उपयोगिता क्या हैं ?? .. इनके पत्ते,बीज,तना के कुछ लाभ हैं?? या बस यूं ही रोप दिए गए हैं??
    जो खाली जगहें हैं और जहाँ अभी ये वृक्षारोपण का कार्यक्रम चल रहा है वहाँ पहले कोई न कोई तो पेड़ होंगे ही!! .. कौन से पेड़ रहे होंगे जरा अनुमान लगा सकते हैं!? .. नीम,करंज,अर्जुन,सखुआ,महुआ,पियार,भेलवा,पलाश,इमली,कटहल,सिमर आदि आदि.. लेकिन अब इनके स्थान पे कौन से वृक्ष हैं?? .. युकलिप्टुस, छतनी, और सब का तो नामे नहीं पता.. बस लगा दिए गए हैं मतलब लगा दिए गए हैं… इनकी दैनिक जीवन में कुछ उपयोगिता!? उत्तर है अ बिग घण्टा!!

    वृक्षारोपण पहले भी करते थे हमारे बाप-दादा लोग.. जब कोई भी वृक्ष लगा रहे है तो उनका कोई खास मकसद रहता था.. हम बच्चे रहते थे तो पूछते थे कि ये गाछ क्यों लगा रहे है!!? .. तब हमें उसकी गुणवत्ता और उपयोगिता गिनाई जाती थी! .. नीम लगा रहे है तो उसके नवीन पत्ते के साग,उसका दातुन,उसका काढ़ा,उसका तेल आदि-आदि.. कटहल लगा रहे है तो उसके फल व उसका लकड़ी.. आम के केस में भी ऐसा ही है.. कोनार गाछ लगा रहे है तो उसका साग, मुनगा गाछ लगा रहे हैं तो उसका साग, फूल,फल,बीज .. इमली के पेड़ लगा रहे हैं तो उसके औषधीय गुण.. और अगर कोई सामान्य पेड़ भी लगा रहे है तो उसके पत्ते हमारे काम न सही बल्कि मवेशियों के काम आए तो भी लगाया जाता था!!
    और अब …
    कैमरे के सामने फोटू खिंचवाते कुल डुड्स ‘प्लांटेशन’ करते हुए और उसके फायदे गिनाते हुए आर्टिकल लिखने वाले.. जब उनसे पूछो कि बेटा कौन से पेड़ का रोपण कर रहे हो ?? ..तो जवाब मिलेगा, ‘नहीं मालूम सर.. वैसे क्या फर्क पड़ता है, है तो प्लांट ही न.. एनवायरनमेंट के लिए तो अच्छा ही है न!!’
    “ओह अच्छा!! .. इसके और भी कुछ फायदे गिना सकते हो बेटा !!?”
    “नहीं सर.. लेकिन इतना है कि ये एनवायरनमेंट के लिए अच्छा है!!”
    “अगर इसके जगह कटहल,ईमली, सखुआ लगा देते तो एनवायरनमेंट के लिए कुछ नुकसान हो जाता क्या??”
    “अरे छोड़ो न सर.. जो पौधे हमें नर्सरी से मिलेंगे वही लगाएंगे न.. वहाँ यही पौधे मिल रहे थे तो उठा ले आया.. अगर आपने जो पौधे बोले है वो वहाँ अवेलेबल रहता तो हम उसको भी लगाते!!”

    ये बात तो कुल डूड ने एकदम सही कही.. कि उन्हें नर्सरी में जो पौधे मिलेंगे वही लगाएंगे न!!

    एक दिन खरपीटो और केशधरी गाँव में खाली पड़े मैदानों में वन विभाग द्वारा लगाये गए वृक्षों को देख रहा था.. पूरा बाँस के पेड़ लगाये हुए थे.. क्या वे बाँस थे !!? घण्टा! .. हाइब्रिड किस्म का बाँस है.. झाड़-झुरमुट के आकार के.. जो हमारे होते हैं उसकी क्या उपयोगिता है!? .. घर बनाने में उपयोग होते है, टुपला,सुप,दौरी, खेचला, टोकरी आदि बनाये जाते हैं.. लेकिन क्या वनविभाग के द्वारा लगाए गए पेड़ से आप ये कुछ बना सकते हैं!!? .. जवाब है घण्टा!! .. टोटली यूजलेस .. केवल जगह माड़ के रखा हुआ है!! .. छतनी के पेड़ थोक के भाव लगा दिए गए हैं! उपयोगिता? घण्टा!! .. न पत्ते,न फल और न लकड़ी ही काम की! .. तो फिर ऐसे वृक्ष लगाने का तुक ?? .. इनके नर्सरियों से हमारे भारतीय पेड़ लुप्त क्यों हो रहे हैं या उगाए ही क्यों नहीं जा रहे हैं!!? उजड़ते तो हैं हमारे अपने भारतीय पेड़ ही लेकिन जब बसाने की बारी आती है तो हाइब्रिड किस्म के विदेशी पेड़ क्यों थोप दिए जाते हैं जिसकी कोई उपयोगिता ही नहीं!? .. अगर कोई गांव केवल मुंह उठा के भी चले गए तो मुँह धोने की कोई चिंता नहीं.. नीम, करंज,सखुआ,महुआ,तितभेखवा मुंह धोने के लिए मिल ही जाते हैं.. लेकिन अब न मिलने वाले.. अगर बिना ब्रश के गए तो आपको नई ब्रश खरीदना ही माँगता।.. आज इमली के पेड़ लगभग उजड़ने को आये.. पारंपरिक गुण महत्व न बता पाने के कारण आज हम मेडिकलों के एलोपैथिक दवाओं पे निर्भर होने लगे हैं .. और जब वृक्षारोपण की बारी आती तो हमें ‘हिजड़े’ पेड़ थमा दिए जाते हैं जिसकी कोई उपयोगिता नहीं!! और जमीन की उर्वरा शक्ति को भी छिन कर रहे हैं। और इन यूजलेस पेड़ों की घेराबंदी के लिए हमारे उपयोगी बाँस पचीस रुपये में काट कर बाड़े बनाये जा रहे हैं।

    अरे जब वृक्षारोपण की ही बात है और सरकार इतने ही पैसे खर्च कर रही है तो फिर आलतू-फालतू के पेड़ क्यों ?? … भारतीय औषधीय गुण से भरपूर और फलदार पेड़ों का वृक्षारोपण क्यों नहीं?? .. क्या नीम, करंज,ईमली,पियार,भेलवा,महुआ,कटहल,सखुआ,कोयनार,गुरमन,बेर,मुनगा,डोका, गरनीम,बेल,जामुन आदि पेड़ नर्सरी में नहीं उगाए जा सकते ?? या इनके लिए ज्यादा पैसे खर्चने पड़ते हैं !!? तो फिर ऐसे पेड़ सड़क किनारे क्यों नहीं देखने को मिलते हैं!!?
    जरा विचार कीजियेगा… !!

    पहले श्वेत क्रांति के नाम पे देसी गायों के नस्लों पे प्रहार किया गया और अब ये अस्तित्व को लड़ रहे हैं .. और अब ये सरकारी प्रायोजित कथित वृक्षारोपण के नाम पे औषधीय और व्यापारिक गुणों से भरपूर देसी पेड़ों को उखाड़ने का सुनियोजित षड्यंत्र रचा जा रहा है.. और हम ‘वृक्षारोपण’ के नाम से लहालोट हुए जा रहे हैं.. वृक्ष अपने देसी वाले भी होते हैं.. कभी आस-पास नजरें दौड़ाइये कहीं ये पेड़ हमसे दूर तो नहीं जा रहे हैं न ?? .. इनकी उपलब्धता और सुलभता धीरे-धीरे हमसे खिसकते नहीं जा रहे है क्या !!? … विचार कीजिये!!
    ✍🏻गंगवा, खोपोली से।

    ऐसा #व्यक्ति #नर्क में नहीं जाएगा जो एक #पीपल, एक #नीम, एक #बरगद, दस #फूल वाले #पौधे अथवा #लताएं, दो #अनार, दो #नारंगी और पांच #आम के वृक्ष लगाता है।
    #अश्वत्थमेकं पिचुमन्दमेकं न्यग्रोधमेकं दश पुष्पजातीः।
    द्वे द्वे तथा दाडिममातुलिंगे पंचाम्ररोपी नरकं न याति।।
    #वराहपुराण (172.39)

    दस कुओं के बराबर एक #बावड़ी होती है, दस बावड़ियों के बराबर एक #तालाब, दस तालाबों के बराबर एक #पुत्र है और दस पुत्रों के बराबर एक #वृक्ष होता है
    #दशकूपसमावापी दशवापी समो ह्रदः।
    दशह्रदसमः पुत्रो दशपुत्रसमो द्रुमः।।
    #मत्स्यपुराण (154.511-512)

    किसी दूसरे के द्वारा रोपित वृक्ष का #सिंचन करने से भी महान् फलों की प्राप्ति होती है, इसमें विचार करने की आवश्यकता नही है
    #सेचनादपि वृक्षस्य रोपितस्य परेण तु।
    महत्फलमवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा।। #
    #विष्णुधर्मोत्तरपुराण (3.296.17)

    #पर्यावरण की दृष्टि से वृक्ष हमारा परम रक्षक और मित्र है। यह हमें अमृत प्रदान करता है। हमारी दूषित वायु को स्वयं ग्रहण करके हमें प्राणवायु देता है। वृक्ष हर प्रकार से #पृथ्वी के रक्षक हैं, जो #मरुस्थल पर नियंत्रण करते हैं, नदियों की #बाढ़ की रोकथाम करते हैं व जलवायु को स्वच्छ रखते हैं। ये समय पर वर्षा लाने में सहायक हैं, धरती की #उपजाऊ_शक्ति को बढ़ाते हैं। वृक्ष ऐसे दाता हैं, जो हमें निरंतर सुख देते हैं।

    हमारे ऋषि-मुनि जानते थे कि #प्रकृति जीवन का स्रोत है और पर्यावरण के समृद्ध और स्वस्थ होने से ही हमारा जीवन भी समृद्ध और सुखी होता है। वे प्रकृति की #देवशक्ति के रूप में उपासना करते थे और उसे #परमेश्वरी भी कहते थे। उन्होंने जीवन के आध्यात्मिक पक्ष पर गहरा चिंतन किया, पर पर्यावरण पर भी उतना ही ध्यान दिया। जो कुछ पर्यावरण के लिए हानिकारक था, उसे आसुरी प्रवृत्ति कहा और जो हितकर है, उसे दैवीय प्रवृत्ति माना।

    सम्राट अशोक, हर्षवर्धन और शेरशाह सूरी ने जो राजमार्ग बनवाए थे, उनके लिए कितने ही वृक्षों की बलि चढ़ानी पड़ी थी। परंतु उन्होंने उन सड़कों के दोनों तरफ सैकड़ों नए वृक्ष भी लगवाए थे, ताकि पर्यावरण में कोई दोष न आ जाए। आज भी आप पाएंगे कि ग्रामीण समाज अपने घरों व खेतों के आसपास वृक्ष लगाते हैं। यहां वृक्षों के थाल बनाना, उनकी जड़ों पर मिट्टी चढ़ाना, सींचना, वृक्षों को पूजना अथवा आदर प्रकट करना आज भी पुण्यदायक कार्य मानते हैं। ये सारी प्रथाएं इसीलिए शुरू हुईं ताकि वृक्षों-वनस्पतियों की रक्षा होती रहे और मनुष्य इनसे मिलनेवाले लाभ का आनंद उठाता रहे।

    हमारे शास्त्रों में पर्यावरणीय घटकों की शुद्धता के लिए हमें एक अमोघ उपाय प्रदान किया गया है। वह उपाय हैं यज्ञ। आध्यात्मिक उपासना का साधन होने के साथ साथ यज्ञ पर्यावरण को शुद्ध करने, उसे रोग और कीटाणुरहित रखने तथा प्रदूषणरहित रखने का भी साधन है।
    ✍🏻भारतीय धरोहर

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