सारी दुनिया को खुशियों का पाठ पढ़ाने वाला भारत क्यों पिछड़ रहा है खुशियों के मामले में ?

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राकेश राणा

वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट में भारत लगातार पिछड़ रहा है. 2020 की हैप्पीनेस रिपोर्ट में दुनिया के मात्र 12 देश ही भारत से पीछे हैं. संयुक्त राष्ट्र महासभा के नेतृत्व में ’संयुक्त राष्ट्र सतत् विकास समाधान नेटवर्क (यूएनएसडीएसएन) द्वारा 20 मार्च, 2020 को जारी आठवीं ‘विश्व प्रसन्नता रिपोर्ट’ (वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट-2020) में भारत 156 देशों की सूची में 144वें स्थान पर पहुंच गया है.

रिपोर्ट में फिनलैंड लगातार तीसरे वर्ष शीर्ष स्थान पर कायम है. वहीं क्रमशः डेनमार्क, स्विट्ज़रलैंड, आइसलैंड, नार्वे और नीदरलैंड भी अपने वासियों को खुशनुमा माहौल देने में बढ़त बनाए हुए हैं. विश्व में विकसित समझे जाने वाले देशों में यूनाइडेट किंगडम 13वें, जर्मनी 17वें और अमेरिका 18वें स्थान पर हैं.

अपने पड़ोसी देशों से ज्यादा दुखी हैं हम

कहा जाता है कि आदमी अपने दुख से नहीं, पड़ोसियों के सुख से भी कई बार दुखी होता है. तो हमारे लिए कष्ट की बात ये है कि अफगानिस्तान के अलावा दक्षिण एशिया के सभी देश यानी श्रीलंका और बांग्लादेश ही नहीं पाकिस्तान, भूटान तथा नेपाल भी इस इंडेक्स में भारत से ऊपर हैं. हैप्पीनेस इंडेक्स में पाकिस्तान का 66वें नंबर पर होना हमारे लिए विशेष चिंता का कारण होना चाहिए. दक्षिणी सूडान, जिम्बाब्वे, तंजानिया और रवांडा जैसे चंद देश ही भारत से नीचे हैं.

चिंताजनक यह है कि भारत इस सूची में लगातार पिछड़ता जा रहा है. 2018 में भारत इस सूची में 133वें स्थान पर था. 2019 में हमारा स्थान 140वां था.

संयुक्त राष्ट्र द्वारा दुनिया में खुशियों के स्तर को देखने का मकसद विभिन्न देशों को अपने नागरिकों की खुशहाली को ध्यान में रखकर नीति निर्माण की ओर प्रेरित करना है. खुशहाली का एक मोटा खाका खींचती यह रिपोर्ट किसी देश की प्रति व्यक्ति आय, स्वास्थ्य का स्तर, सामाजिक सहयोग की स्थिति, आपसी विश्वास, अपने जीवन संबंधी निर्णय लेने की स्वतंत्रता तथा समाज में उदारता जैसे संकेतकों को सामने रख कर बनाई जाती है.

खुश रहना क्यों महत्वपूर्ण है?

खुश रहना हर किसी के जीवन का लक्ष्य है. खुशियों की खोज ही अक्सर मनुष्य को सक्रिय, सृजनात्मक व सकारात्मक बने रहने को प्रेरित रखती है. प्रसन्नता मानवीय इच्छाओं की तृप्ति की मनःस्थिति है. मानवीय इच्छाओं और अहम् की तृप्ति की यह प्रक्रिया ही सामाजिक जीवन का सृजन और विस्तार है, जिसके चलते पीढ़ी-दर-पीढ़ी मनुष्य अपनी सृजनात्मक प्रवृत्ति से कुछ न कुछ रचता है.

अपनी खुशियों का दर्शन और प्रदर्शन मनुष्य आयोजनों, उत्सवों, त्योहारों और परम्पराओं के जरिए करता है. इन आयोजनों में सामूहिकता होती है. यानी आदमी एक दूसरे के साथ रहकर ही खुश होता है. समूह में जीना मानवीय स्वभाव हैं क्योंकि समूह ही उसकी खुशियों के प्रदर्शन का स्थल है. हंसने के लिए हमें साथ चाहिए, खुश रहने की इसी जरूरत ने इंसान को समूह में रहना सिखाया.
अच्छी जिंदगी और खुशी का सीधा संबंध है. जीवन में कष्ट हो तो आदमी खुश नहीं रह सकता. सृष्टि के प्रारम्भ से ही मनुष्य अपनी खुशियों के लिए नई-नई ख्वाइशें पालता रहा है. यह इंसानी स्वभाव है. सबके खुश होने और खुश रहने के अपने-अपने लक्ष्य है. किसी के लिए खुशी का आधार उसके सामाजिक संबंध है. तो किसी के लिए पैसा बहुत महत्वपूर्ण है और कोई ज्ञान-ध्यान में ही रमा हुआ खुश है.

हमारी खुशी में सरकार की भूमिका

दरअसल जैसे-जैसे समाज कमजोर होता गया और हमारे जीवन में सामाजिक संस्थाओं का महत्व कम हुआ, वैसे-वैसे हमारी खुशियां सरकार और बाजार के हवाले होती चली गईं. सरकार जब चाहे हमारी खुशियों के मीटर को अपने हिसाब से घूमाती-फिराती रहती है. कभी बज़ट के बहाने, कभी सेंसेक्स के उतार-चढ़ाव की चकरी में बाजार हमें चौंकाता रहता है. कभी खुशी-कभी गम का यह खेल आधुनिक मनुष्य के जीवन का इन्द्रजाल सा बन गया है. उठती-गिरती अर्थव्यवस्थाओं का सीधा प्रभाव अब आम इंसान के जीवन से जुड़ी खुशियों पर पड़ता है. महंगाई भत्ते जैसी घोषणाएं हमारे जीवन को खुशनुमा या दुख से भरा बना सकती हैं.

गैरबराबरी है दुख की प्रमुख वजह

जिस तरह गैरबराबरी का साम्राज्य सरकार और बाजार के संरक्षण में फल-फूल रहा है, वह अशांति और दुख के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार है. लोग खुश कैसे रह पायेगें, जब समाज में गैरबराबरी और उससे उपजी अशांति होगी. शांति सुख की पूर्व शर्त है. शांति वह स्थिति है, जिसमें समाज के सब लोग रहना पसंद करते है. इसमें बड़ी भमिका आधुनिक राज्य की बनती है. भारत जैसे देश में राज्य और नीतियां असमानता की बड़ी वजह है. जबकि उसकी जवाबदेही है कि वह अपने नागरिकों की समग्र ढंग से रक्षा-सुरक्षा करे, सबको तरक्की का मौका दे.

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सामाजिक जीवन में अन्याय और अशांति की वजह कहीं-न-कहीं हमारा नेतृत्व ही है, जो हमें तरह-तरह की अनिश्चिताओं के तनावों में धकेलता है. हमारी राजव्यवस्थाएं हमें खुश और आश्वस्त जीवन की ओर बढ़ने का वातावरण देने में असफल रही है. नतीजतन, आम जन निराश और हताश है. उसका जीवन खुशियों से कोसों दूर है. लोग मानसिक तनावों में जीने को अभिशप्त हैं.

हमारे शहर संकीर्ण सांप्रदायिक भावनाओं की भेंट चढ़ रहे हैं. 21वीं सदी में भी अस्पृश्यता और जाति व धर्म के भेदभाव झेलना कैसे किसी समाज को स्वस्थ और तनाव मुक्त रख सकता है? देश की अर्थव्यवस्था का आधार स्तम्भ किसान आत्महत्या कर रहे हैं. नौजवान रोजगार को लेकर परेशान है, अवसाद में जीने को अभिशप्त है. इन सब स्थितियों-परिस्थितियों का जमा-जोड़ ही हमारी मानसिक स्थिति को बनाता है.

2020 की वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट हमें इस दिशा में बहुत कुछ सोचने को मजबूर करती है. ‘प्रसन्नता प्रतिवेदन’ का वार्षिक प्रकाशन दुनिया के लिए प्रगति का प्रस्थान बिन्दु है, जिसकी रोशनी में विश्व का हर देश अपने विकास की नीतियों, रणनीतियों, योजनाओं और कार्यक्रमों को लेकर आगे बढ़े. भारत के लिए इस रिपोर्ट में कई सबक हैं.

(लेखक समाजशास्त्री हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)

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