‘यमस्य लोका दध्या बभूविथ’ : राही तू आनंद लोक का

vijender-singh-arya111गतांक से आगे….
आहुतियां कौन सी हैं? वे हैं-उज्जवन्ति प्रदीप्त हो उठने वाली, अतिनेदन्ते-चट चटाने वाली, अधिशेरते-हवन कुण्ड की तलहटी में जा सोने वाली। घी अग्नि में पड़ते ही उसे प्रदीप्त कर देता है, सामग्री समिधाओं पर पड़ी चट चटाती है। कुछ आहुति कुण्ड के तले में जाकर आराम से पड़ी रहती है। ठीक इसी प्रकार मानव जीवन भी एक यज्ञ है जिसमें हमारे काम ही आहुतियां हैं। जिन कामों की आहुतियों से मनुष्य देवों की भांति प्रदीप्त हो उठता है, उनसे देवलोक को जीत लेता है, अर्थात भले लोगों में उस का यश छा जाता है। जिन कर्मों की आहुतियों से जीवन के संघर्ष में पड़कर चट चटाता है अर्थात राजनीतिक अथवा सामाजिक जीवन में अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ता है, उनसे पितृलोक को जीत लेता है यानि कि अपना वर्चस्व कायम करता है, जिन कर्मों की आहुतियों से साधारण सा मनुष्य बना रहता है, जो आहुतियां न उसे दीप्ति देती है, न संघर्ष में डालकर उसे पितरों की श्रेणी में ही ले जाती हैं, उनसे वह मनुष्य लोक को जीत लेता है। अर्थात अपनी जिम्मेदारियों को कुल मिलाकर पूरी करता है। ध्यान रहे देवलोक में दीप्ति अर्थात यश है, पितृलोक में संघर्ष है अर्थात अपने वजूद को स्थायित्व देना है जबकि मनुष्य लोक में आलसी और प्रमादियों की तरह सिर्फ पड़े रहना है, यह सबके नीचे है।
कामनाओं का करले अंत तू।
ऐसा रे बन जा सच्चा संत तू।।
करना, एक दिन है प्रयाण,
रे मत भटकै प्राणी……..(10)
प्रथम पंक्ति की व्याख्या :-
भगवान कृष्ण गीता के तीसरे अध्याय में पृष्ठ 221 पर अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं-हे कुंतीनंदन! कामना (तृष्णा) संपूर्ण पापों, संतापों, दु:खों आदि की जड़ है।
कामना वाले अर्थात तृष्णा से पीडि़त व्यक्ति को जाग्रत अवस्था में सुख मिलना तो दूर स्वप्न में भी कभी सुख नही मिलता है। इस संदर्भ में रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी कितना सुंदर कहते हैं-
काम अछत सुख सपनेहुं नाहि
जो चाहते हैं वह न हो, और जो नही चाहते हैं वह हो जाए इसी को दु:ख कहते हैं। यदि चाहते और नही चाहते को छोड़ दे तो फिर दुख है ही कहां?
हे पार्थ! कामना पूर्ति होने पर लोभ उत्पन्न होता है और कामना में बाधा उत्पन्न होने पर क्रोध उत्पन्न होता है। यदि बाधा पहुंचाने वाला अपने से अधिक बलवान है तो भय उत्पन्न होता है। इसलिए कामनाओं (तृष्णाओं) को सर्वदा नियंत्रण में रखो।
संसार में कोई बैरी ऐसा होता है जो भेंट पूजा अथवा अनुनय विनय से शांत हो जाता है। किंतु कामना (तृष्णा) ऐसा शत्रु है जो किसी से भी शांत नही होता अर्थात इसकी तृप्ति नही होती और यह बढ़ती ही चली जाती है, इसका कोई अंत नहीं। जैसे धन मिलने की कामना बढ़ती है, ऐसे ही ज्यों-ज्यों भोग मिलते हैं त्यों-त्यों ही कामना (तृष्णा) बढ़ती ही चली जाती है। इसीलिए कामना को गीता में भगवान कृष्ण ने महाशन: कहा है अर्थात (बहुत खाने वाला, तृप्त न होने वाला)
दो अक्षरों का मम (यह मेरा है-ऐसा भाव) मृत्यु है और तीन अक्षरों का न मम (यह मेरा नही है-ऐसा भाव) अमृत है-सनातन ब्रह्म हैं।
इसलिए संसार की वस्तु घटना, परिस्थिति के प्रति निर्ममता, निष्कामता और असंगतता का भाव रखो तब चित्त में निर्विकारता, शांति और स्वाधीनता स्वत: ही आने लगती है। इस अवस्था को ही गीता में समता में रहना कहा गया है, इसे ही स्थितप्रज्ञ भी कहा गया है। कठो- पनिषद की षष्ठी बल्ली के चौदहवें श्लोक में तो यहां तक कहा गया है कि मनुष्य के हृदय में जो कामनाएं हैं वे जब छूट जाती हैं तब मत्र्य अमृत हो जाता है और यहीं, इस जन्म में ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है। कामना शब्द की विशद व्याख्या करते हुए, इसकी विवेकपूर्ण विवेचना द्वारा यह बताना आवश्यक हो जाता है, कि कुछ सज्जन कामना और आवश्यकता को एक ही श्रेणी में रखकर इसकी गलत व्याख्या करते हैं, अर्थ का अनर्थ करते हैं।
उपरोक्त विषय को मोटे तौर पर समझाने के लिए-कहा जा सकता है कि अंग्रेजी के दो शब्द-Want और Need में जितना अंतर है उतना तृष्णा (कामना) और आवश्यकता में अंतर है। Want से अभिप्राय है तृष्णा (कामना) के पीछे दौडऩे वाला व्यक्ति कभी शांत नही रहता है, वह सर्वदा अशांत रहता है। उसके चेहरे पर चिंता की लकीरें होती हैं।
Need से अभिप्राय-आवश्यकता से है, जो प्राय: पूरी होती है। इसलिए Need अर्थात आवश्यकता के पीछे दौडऩे वाला व्यक्ति अपेक्षाकृत संतुष्ट होता है, शांत होता है। उसके चेहरे पर चिंता की लकीरें नही अपितु सौम्यता का सुहावना वास होता है उसका आभामंडल दूसरों को प्रभावित करने वाला होता है। अत: हे मनुष्य! तेरी जीवन-यात्रा सुहावनी हो, इसके लिए जितना हो सके समय रहते कामनाओं का (तृष्णा का) अंत कर ले अर्थात कामनाओं को नियंत्रण में रख।
सत्-चर्चा सत्-कर्म कर।
सत्-चिंतन का भी ध्यान कर।।
कह रहे गीता में भगवान,
रे मत भटकै प्राणी……11
गीता के पंद्रहवें अध्याय के पंद्रहवें श्लोक में पृष्ठ 971 पर भगवान कृष्ण अर्जुन को परमात्मतत्व प्राप्ति के संदर्भ में समझाते हुए कहते हैं-हे पार्थ! परमात्मा सर्वव्यापी अर्थात सब जगह समानरूप से परिपूर्ण होने पर भी हृदय में प्राप्त होते हैं। जैसे गाय के संपूर्ण शरीर में दूध व्याप्त होने पर भी वह उसके स्तनों से ही प्राप्त कर लेता है। अथवा पृथ्वी में सर्वत्र जल रहने पर भी वह कुएं से प्राप्त होता है, ऐसे ही सूर्य , चंद्र, पृथ्वी वैश्वानर आदि सब में व्याप्त होने पर भी परमात्मा हृदय में ही प्राप्त होते हैं।
हृदय शरीर का प्रधान अंग है। सब प्रकार के भाव हृदय में ही होते हैं। समस्त कर्मों में भाव ही प्रधान होता है। भाव की शुद्घि से समस्त पदार्थ, क्रिया आदि की शुद्घि हो जाती है। अत: महत्व भाव का ही है, वस्तु, कर्म आदि का नही। भावों का पुंज हृदय होने से हृदय की बहुत प्रसन्नता है। क्रमश:

Comment:

Latest Posts

hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
hititbet giriş
hititbet güncel giriş
vdcasino giriş
vdcasino güncel giriş
vdcasino giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hitit medya
Hititbet Giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
tuzla cilt bakım merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet
hititbet güncel adres
hititbet 2026
hititbet giriş
hititbet giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
solobet giriş
hititbet giriş
kralbet
betnano
betnano
betnano
kralbet
kralbet
kralbet
setrabet
setrabet
kralbet
hititbet
hititbet
Tuzla Cilt Bakım
İstanbul Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet Giriş
Hititbet Giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla İpek Kirpik
Tuzla Lenf Drenaj
Kolaybet Giriş
Betgaranti Giriş
kralbet
kralbet
betnano
betnano
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
Hititbet Giriş
kralbet
betnano
kralbet
Hititbet App
hititbet giriş
hititbet
meritking giriş
matbet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
kralbet
kralbet
betnano
betnano
kralbet
kralbet
imajbet giriş
xslot giriş
betvole giriş
betvole giriş
betvole giriş
betvole giriş
gobahis giriş
betpark giriş
betpark giriş
sahabet giriş
onwin giriş
sahabet giriş
grandpashabet
grandpashabet
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
xslot giriş
xslot giriş
sahabet
sahabet
xslot giriş
xslot giriş
betorder giriş
betgaranti giriş
Hititbet Giriş
kralbet
kralbet
betnano
betpark giriş
betgaranti giriş