होली का पावन त्यौहार, बरसे उमंगों की फौहार।

मेरा मन कहता है, मैं किससे होली खेलूं।।

क्या उनसे जो ऊपर से हंसते हैं,

और भीतर से खंजर कसते हैं?

क्या उनसे जो दारू का भंगड़ा करते हैं,

और भीतर से ईष्र्या भाव से जले मरते हैं?

क्या उनसे जो गले मिलकर भी नही मिलते,

और जिनके हृदय कमल कभी नही खिलते?

क्या उनसे जो मन की कीचड़ में लथपथ हैं,

और खूनी जिनके दामन और भाव विकृत है?

क्या उनसे जो कुत्सित भावों की फसल उगाते हैं

और कलुषित भावों को हृदय में उसे बसाते हैं?

क्या उनसे जो बने बारूद के व्यापारी हैं,

और चारों ओर आतंक की बो रहे क्यारी हैं?

क्या उनसे जो हर तरह से भ्रष्ट हैं,

और जिनके कार्य एकदम निकृष्ट हैं?

नही? मेरा मन कहता है,

ना मैं उनसे होली खेलूं………………

फिर……

मैं उनको नमन करूं,

मैं उनका वंदन गाऊं,

जो मुझे गुलाल तो नही लगाते पर रोज गले लगाते हैं,

जिनका सरल हृदय है जो छल कपट को दूर भगाते हैं।

प्रभु भजन से शुरू होती है जिनकी हर प्रात:,

हर प्राणी का कल्याण चाहता है जिनका हृदय।

हर रोज मेरे लिए ही नही अपितु सबके लिए,

जिनका हृदय झुकता है उस रब के लिए।

वो इंसान इस धरा पर कहीं हो किसी वेश में हो,

दुनिया के किसी कोने में या हों किसी देश में हो।

मैं उनको शीश झुकाऊं मैं उनका वंदन गाऊं

मेरा मन कहता है…..मैं उनसे होली खेलूं

 

-राकेश कुमार आर्य

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