भगत सिंह और आर्य समाज
  • प्रस्तुति: राजेश आर्य, गुजरात

काकौरी की घटना के बाद भारतीय स्वाधीनता संग्राम के क्षेत्र में यदि किसी का नाम चमकता दिखाई देता है तो वह है क्रान्ति का प्रतिक, अमर हुतात्मा भगत सिंह। उत्तर भारत में उस समय इस वीर की ख्याति इतनी फैल गई थी कि सशस्त्र क्रान्ति और भगतसिंह दोनों शब्द पर्यायवाची बन गए थे। यह अमर हुतात्मा भगत सिंह भी एक आर्यसमाजी परिवार की ही देन थे।

वीरेन्द्र सिन्धु जी अपनी पुस्तक ‘युगदृष्टा भगत सिंह और उनके मृत्युंजय पुरखे’ में लिखती है, “सरदार अर्जुन सिंह (भगतसिंह के दादा) ने ऋषि दयानन्द के दर्शन किये तो मुग्ध हो गये और उनका भाषण सुना तो नवजागरण की सामाजिक सेना में भरती होकर आर्यसमाजी बन गये। वे उन थोड़े से लोगों में थे, जिन्हें स्वयं ऋषि दयानन्द ने दीक्षा दी थी; यज्ञोपवीत अपने हाथ से पहनाया था। यह सरदार अर्जुन सिंह का सांस्कृतिक पुनर्जन्म था। हवन कुण्ड उनका साथी हो गया और संध्या प्रार्थना सहचरी। अर्जुन सिंह का आर्यसमाजी बनना एक क्रान्तिकारी कदम था। कई शास्त्रार्थों में वे ही आर्यसमाज के प्रमुख वक्ता रहे, आर्यसमाज के उत्सवों में दूर दूर भाषण के लिए जाते रहे। वे अपने क्षेत्र में प्रमुख आर्यसमाजियों में गिने जाते थे। अब वे किसान भी थे, हकीम भी थे, आर्यसमाजी भी थे।” (पृ. ३-६)

सत्यप्रिय शास्त्री जी अपनी पुस्तक ‘भारतीय स्वातन्त्र्य संग्राम में आर्यसमाज का योगदान’ में लिखते है, “सन्‌ १९५० ई. में दिल्ली के विभिन्न क्षेत्रों के अन्तर्गत स. भगत सिंह की बरसी मनाई जा रही थी। एक जल्से में मैं पं. लोकनाथ जी तर्कवाचस्पति (पूर्व महोपदेशक, आर्यप्रतिनिधि सभा पंजाब) के साथ जा रहा था। रास्ते में स. भगत सिंह की चर्चा प्रारम्भ हो गई, तो पं. लोकनाथ जी ने मुझे बताया कि स. भगत सिंह तो मेरा शिष्य था। मैंने पूछा – यह कैसे? तो पं. जी ने उत्तर दिया कि मैं अपनी प्रचार यात्रा में मुलतान से लाहौर आर्य समाज के कार्यक्रम पर आया था, बच्छोवाली आर्य समाज मन्दिर में मेरा व्याख्यान हुआ। जब मैं समाज मन्दिर से विदा होकर बाहर निकलने लगा तब एक सोलह वर्षीय नवयुवक ने मेरे चरणों को स्पर्श किया और कहा – पूज्य पण्डित जी! मैं आपके करकमलों से यज्ञोपवीत की दीक्षा लेना चाहता हूँ। मैंने पूछा, तुम्हारा नाम क्या है? क्या काम करते हो? तो उस नवयुवक ने बताया कि मैं स. किशन सिंह का पुत्र हूँ, भगत सिंह मेरा नाम है, और दयानन्द कालेज में पढ़ता हूँ। मैंने अपने घर में और अपने मित्रों में आप की विद्वत्ता की बड़ी प्रशंसा सुनी हैं, अतः मैंने मन में निश्चय किया हुआ है कि यज्ञोपवीत की दीक्षा आपके ही हाथों से लूँ। पं. लोकनाथ जी ने बताया कि मुझे अपनी इच्छा के विरुद्ध उस दिन लाहौर में रुकना पड़ा और दूसरे दिन मैंने स. भगत सिंह का विधिवत् यज्ञोपवीत संस्कार कराया। जब मैने गायत्री का उपदेश किया तो वह प्रस्तर मूर्ति के सदृश बड़ी श्रद्धा और प्रेम से उपदेश को श्रवण करता रहा; उसने जीवनपर्यन्त गायत्री का जप करने की प्रतिज्ञा की। पं. जी ने कहा मुझे क्या पता था कि यह साधारण सा युवक भारत माता की परतंत्रता की बेड़ियाँ काटने के निमित्त अपना जीवन समर्पण कर देगा। पं. जी ने आंखों में आँसू भरकर कहा कि भगत सिंह मेरा परम शिष्य था।” (पृ. १०१-१०२)

सरदार अर्जुन सिंह के किशन सिंह, अजीत सिंह और स्वर्ण सिंह ये तीन पुत्र थे। इनमें से किशन सिंह हुतात्मा भगत सिंह के पिताजी थे। वीर भगत सिंह की आरम्भिक शिक्षा ‘दयानन्द एंग्लो वेदिक स्कूल’ में हुई थी। बाद में नेशनल कॉलेज में गुरुकुल कांगड़ी के स्नातक श्री पं. जयचन्द्र विद्यालंकार के सम्पर्क से इनकी राष्ट्रीय भावना में निखार आया। इस वीर के विदेशी अंग्रेजी राज्य के विरुद्ध क्रान्तिकारी जीवन का प्रारम्भ महर्षि दयानन्द के मानसपुत्र लाला लाजपत राय के बलिदान से ही हुआ था।

आर्यसमाज हमेशा स्वदेशी, स्वतन्त्रता और स्वाभिमान का आन्दोलन रहा है। उस समय सम्पूर्ण भारत में आर्यसमाज स्वतन्त्रता, स्वदेशप्रियता और नवजागरण का शंखनाद कर रहा था। भारत की अंग्रेज सरकार को आर्यसमाज और आर्यसमाजियों पर बहुत सन्देह हो गया था। पाठकों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि अमर हुतात्मा भगत सिंह आर्यसमाज कलकत्ता में दो बार आकर ठहरे थे।

आर्यसमाज कलकत्ता में भगत सिंह का प्रथम प्रवास :

प्रथम बार सान्डर्स वध से पूर्व भगत सिंह कुछ केमिकल्स खरीदने के लिए कलकत्ता आये थे। सान्डर्स वध १९२८ ई० की घटना है। उस समय भगत सिंह की कलकत्ता यात्रा में श्री कमलनाथ तिवारी (बाद में संसद सदस्य) उनके साथ इस खरीद्दारी में थे। श्री कमलनाथ तिवारी जी कहते हैं कि सान्डर्स हत्याकाण्ड से कुछ दिन पहले भगत सिंह देशी बम बनाने के लिये कुछ केमिकल्स खरीदने के उद्देश्य से कलकत्ता आये थे। यह काम मुझे सौंपा गया। उनका बाज़ार में जाना सन्देहास्पद हो सकता था। मैं बहुत-सी दुकानों पर गया। अधिकतर दुकानदारों ने सरकारी प्रतिबन्ध के कारण केमिकल्स देने से इन्कार कर दिया। बाद में क्रान्तिकारी दल से सहानुभूति रखनेवाले दुकानदारों के यहाँ मैं भाई बैजनाथ सिंह ‘विनोद’ के साथ गया। आवश्यक केमिकल्स मिल गये। उन केमिकल्स को एक मज़दूर के सिर पर रखवा कर हम दोनों आर्यसमाज (आर्यसमाज कलकत्ता उस समय क्रान्तिकारियों का केन्द्र था) लौट रहे थे कि मज़दूर की टोकरी उसके सिर से गिरने को हुई। हमने उसको ऐसे डाँट-डपट करनी शुरू कर दी जैसे कि हमारा उससे कोई सम्बन्ध ही न हो। बात यह थी कि सामने ही एक सर्जेन्ट खड़ा था, हमें भय हुआ कि यदि कहीं उसको केमिकल्स के बारे में सन्देह हो गया तो हम दोनों उसके चंगुल से बच न सकेंगे। हमारी डाँट-डपट काम आ गयी। मज़दूर संभलकर आगे बढ़ गया और सर्जेन्ट का ध्यान उसकी ओर से हटकर हम पर लग गया। उसने हमको समझाया कि उस मामूली सी बात पर गरीब मज़दूर को डाँटने की क्या ज़रूरत थी। थोड़ी दूर जाकर सामान रिक्शा पर रख दिया और हम दोनों सकुशल सामान के साथ आर्यसमाज पहुँच गये। दूसरे दिन सवेरे भगत सिंह, फणीन्द्रनाथ घोष (बाद में सरकारी गवाह) और यतीन्द्रनाथ दास (बाढ़ में शहीद) तीनों ने मिलकर देशी बम में काम आने वाली देशी गन काटन तैयार की। शेष केमिकल्स और गन काटन लेकर भगत सिंह आगरा के लिए रवाना हो गये। (‘आर्यसमाज कलकत्ता का इतिहास’, ले. उमाकान्त उपाध्याय, पृ. ७७-७८)

जनश्रुतियों में यह बात तो है कि सरदार भगत सिंह एसेम्बली बमकाण्ड से पूर्व दुर्गा भाभी के साथ कलकत्ता आये थे और आर्यसमाज मन्दिर में रहे थे, किन्तु सान्डर्स वध से पूर्व केमिकल्स खरीदने के उद्देश्य से कलकत्ता आने पर भी भगत सिंह आर्यसमाज मन्दिर में रुके थे, यह कलकत्ता के लोग भी कम जानते हैं। इससे एक बात सुस्पष्ट हो जाती है कि आर्यसमाज उस समय क्रान्तिकारियों का केन्द्र था। इस पवित्र वेदमन्दिर में क्रांतिकारी न केवल निवास की दृष्टि से अपने को निरापद समझते थे, अपितु कई-कई क्रान्तिकारी एक साथ इकट्ठे होकर क्रान्ति के कुछ कार्यों की योजना भी यहाँ कार्यान्वित करते थे। क्रान्तिकारियों के इस केन्द्र में और भी बहुत कुछ होता रहा होगा।

आर्यसमाज कलकत्ता में भगत सिंह द्वितीय प्रवास :

सरदार भगत सिंह दूसरी बार सान्डर्स वध के पश्चात् फरार होकर पुलिस की निगाहों से बचते हुए कलकत्ता आये थे। उस समय दुर्गा भाभी अपने पुत्र को लेकर भगत सिंह के साथ दिखावे के लिए उनकी पत्नी का रूप धारण किये हुए कलकत्ता स्टेशन पर उत्तरी थीं। यह इतिहास-प्रसिद्ध घटना है कि पुलिस भगत सिंह को एक अविवाहित सिख नौजवान के रूप में ही पहचानती थी। पुत्र सहित दुर्गा भाभी जब उसके साथ लग गयी तो पुलिस की निगाहें यह दूर की भी सम्भावना न कर सकती थी कि यह नौजवान भगत सिंह हो सकता था।

उन दिनों सुशीला दीदी कलकत्ता में थी और सर सेठ छाजूराम से उनका परिचय था। सुशीला दीदी ने छाजूराम जी की पत्नी श्रीमती लक्ष्मीदेवी से वात की और भगत सिंह तथा दुर्गा भाभी को छाजूराम के बंगले में अतिथि के रूप में ले आयी। सर छाजूराम उन दिनों आर्यसमाज के कर्णधारों में थे। वे आर्यसमाज के ट्रस्टी और उस के प्रतिष्ठित अधिकारी भी थे। एक सप्ताह से अधिक वे वहीं रहे। भगत सिंह को वहाँ रखने की और निश्चिन्त रहने की स्वीकृति सेठ जी की पत्नी लक्ष्मीदेवी ने ही सुशीला दीदी को दी थी। इन लोगों को ऊपर की मंजिल में ठहराया गया था और उनके भोजन इत्यादि की व्यवस्था स्वयं लक्ष्मी देवी ही करती थी।

आगे इतिहास इतना ही बताता है कि छाजूराम जी की कोठी में एक सप्ताह रहने के बाद भगत सिंह को और अधिक सुरक्षित स्थान में स्थानान्तरित कर दिया गया। भगत सिंह कलकत्ता में ‘हरि’ नाम से अपना परिचय देते थे। भगत सिंह और दूसरे साथियों के लिये बाद में दूसरे सुरक्षित मकान का प्रबन्ध हो गया। कुछ दिन वे उसमें रहे और तब आगरा चले गये। इस से एक बात यह सुस्पष्ट हो जाती है कि कलकत्ता आकर भगत सिंह क्रान्तिकारी साथियों के सम्पर्क में आये थे। एक अतिथि तो छाजूराम जी की कोठी में अतिथि बनकर रह सकता था, किन्तु यह सेठ जी की कोठी क्रान्तिकारियों का अड्डा तो नहीं बन सकती थी। इसके लिये तो कोई अन्य स्थान ही उपयुक्त हो सकता था और वह स्थान क्रान्तिकारियों का केन्द्र आर्यसमाज मन्दिर ही था।

कलकत्ता आर्यसमाज मन्दिर की छत पर दो कोनों पर गुम्बजनुमा दो कोठरियाँ थीं। इन्हीं दोनों में से एक कोठरी में भगत सिंह रहते थे। छत की कोठरी होने के कारण इनमें सुरक्षित होने का आश्वासन अधिक था। भगत सिंह का फ्लैट हैट वाला प्रसिद्ध चित्र यहीं आर्यसमाज कलकत्ता है। इसी रूप में भगत सिंह ‘हरि’ नाम से यहाँ रहते थे। यहाँ से जाने से पूर्व एसेम्बली बमकाण्ड की मानसिक तैयारी भगत सिंह के मस्तिष्क मैं पूर्ण हो चुकी थी। अतः वे जब कलकत्ता से चले तो सुशीला दीदी ने तो उन्हें अपने रक्त से टीका किया था और आर्यसमाज मन्दिर की छत की कोठरी ने एक बलिदानी वीर को जीवन के अन्तिम किन्तु अद्भुत कार्य के लिये मौन विदा दी थी।

भगत सिंह भी इस यात्रा के गौरव को समझते थे। उन्होंने आर्यसमाज के तात्कालीन सेवक तुलसीराम को अपना थाली और लोटा स्मृति के रूप में दिया था, पर सरल तुलसीराम उस रहस्यमय संकेत को कैसे समझ सकता! यहाँ से जाने पर एसेम्बली बमकाण्ड के पश्चात् जब सरदार भगत सिंह पकड़े गये और उनका फोटो समाचारपत्रों में छपा तब कलकत्ता के लोगों ने पहचाना कि यह वही नौजवान है जो यहाँ आर्यसमाज मन्दिर की छत पर रह कर गया है। तुलसीराम तो उस थाली-लोटे को अपनी अमूल्य निधि और पवित्र धरोहर मानकर रखता था। वह उसे दिखा तो देता था पर किसी को देने के लिये तैयार न था। तुलसीराम जब कलकत्ता छोड़ कर जाने लगा तब भी इस पवित्र स्मारक को अपने साथ लेता गया।

यहाँ एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि अमर हुतात्मा भगत सिंह दोनों बार कलकत्ता के आर्यसमाज मंदिर में ही क्यों ठहरे? पहली बार बम बनाने हेतु केमिकल्स खरीदने आये तो इस आर्यसमाज भवन में केवल ठहरे ही नहीं, अपितु क्रान्तिकारियों का मिलना-जुलना भी यहीं होता रहा, गन काटन भी यहीं बनायी गयी। इसका एक सहज-सा उत्तर यह हो सकता है कि सरदार भगत सिंह का तो परिवार ही आर्यसमाजी था और आर्यसमाज के वातावरण में ही स्वदेशभक्ति का नशा था। किन्तु यहाँ फणीन्द्रनाथ घोष और यत्तीन्द्रनाथ दास जैसे बंगाली क्रान्तिकारी भी गन-काटन आदि बनाने के लिये इकट्ठे हुए थे। ऐसा लगता है कि ये बंगाली युवक भी इस क्रान्ति-केन्द्र में सुरक्षा की दृष्टि से आश्वस्त थे।

द्वितीय बार चौधरी छाजूराम जी के आतिथ्य के पश्चात् अधिक सुरक्षा की दृष्टि से भगत सिंह आर्यसमाज मन्दिर में आ गये। यह आसानी से समझ में आ जाता है कि भगत सिंह स्वयं भी अपने पूर्व परिचित क्रान्ति केन्द्र में अधिक विस्तृत रूप में क्रान्ति-कार्य कर सके होंगे जो चौधरी छाजूरामजी की कोठी से सम्भव नहीं हो सकता था। आर्यसमाज कलकत्ता के तत्कालीन अधिकारी भी जानते होंगे कि कोई युवक समाज मन्दिर में आकर रुका है, दूसरे युवक उससे मिलते हैं, और वहाँ क्रान्ति के परामर्श ही नहीं, क्रान्तिकारियों की गतिविधियाँ भी सक्रिय हैं!

इस अनुमान से यह सहज ही बोधगम्य है कि आर्यसमाज मन्दिर और आर्यसमाजी सभी स्वतन्त्रता के रंग में पूर्णरूप से सराबोर थे। यही स्थिति प्रायः सम्पूर्ण भारतवर्ष में थी। कलकत्ता का अपना राजनीतिक और प्रशासनिक महत्त्व था। भगत सिंह जैसे क्रान्तिकारी का इस आर्यसमाज मन्दिर में दो बार निवास करना, यह बताता है कि आर्यसमाज कलकत्ता इस कड़ी में किसी अन्य स्थान से पीछे नहीं था। मन्दिर यदि क्रान्ति-केन्द्र बना हुआ था तो अधिकारियों की सहमति से ही। परवर्ती काल में भी आर्यसमाज कलकता स्वदेशी गतिविधियों का केन्द्र बना रहा। प्रसिद्ध क्रान्तिकारी राजा महेन्द्र प्रताप, जयप्रकाश नारायण आदि नेतागण इस आर्यसमाज के ऐतिहासिक सभाकक्ष में अपने क्रान्तिकारी विचार प्रकट करते रहे।

प्रस्तुति: राजेश आर्य, गुजरात

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