क्या है सबसे घाटे का सौदा ?

बिखरे मोती

कभी खाई कभी शिखर पै,
जीवन गया ये बीत ।
अहंता-ममता में फंसा,
करी ना हरि से प्रीत॥2752॥

भावार्थ :- देखो, हिमालय की प्राकृतिक सौन्दर्य और रचना को देखो। कहीं ऊँचे-ऊँचे शिखर हैं तो कहीं गहरी और घुमावदार खाइयाँ है, कहीं फूलों की मनभावन और रमणीक घाटियाँ हैं। कहीं बीहड़, वन है जिनमें हिंसक जानवर हैं,कहीं दूर तक बर्फ की चादर फैली हुई हैं, कहीं झरने सरिता को धारा कलकल करती अपने गन्तव्य की और और प्रवाहित हो रही है,कहीं कोयल मीठी तान सुनाती है, कहीं विभिन्न प्रकार के पक्षियों का कलरव सुनाई देता है। कहीं देश और विदेश के पर्वतारोही इन सबके बीच से गुजरते दृष्टिगोचर होते हैं। उनके कदम कभी शिखर पर होते हैं, कभी खाई में होते हैं। ठीक इसी प्रकार हमारा मानवीय जीवन है। इसमें कभी सुखों के शिखर आते हैं तो कभी दारुण दुःखों की खाइयाँ भी आती हैं। अहंता अर्थात् अहंकार, ममता अर्थात, आसक्ति ये दो बड़ी बाधाएँ अपने भँवर में मनुष्य को ऐसा फंसाती है कि मनुष्य प्रभु-प्राप्ति के मूल लक्ष्य को भूल जाता है और मानव का हीरा- जन्म जो अनमोल था, प्रभु- प्रदत्त उपहार था, वह व्यर्थ चला जाता है। मनुष्य की यही भूल सबसे अधिक घाटे का सौदा है।

क्रमशः

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