योग दर्शन पर व्याख्यान/ प्रवचन

योग दर्शन

योग दर्शन से आप सभी लोग परीचित हैं इसको जितना पढ़े उतना भी हमें लगता है कि हम बहुत कम जानते हैं और जीवन को सुंदर बनाने के लिए योग से बढ़कर और कोई दूसरा मार्ग हमारे पास नहीं है, विकल्प नहीं है । मनुष्य अपने जीवन को सुंदर बनाना चाहे तो योग मार्ग पर चलकर के ही इहलौकिक सुख और पारलौकिक सुख को प्राप्त कर सकता है तो लिए हम सबसे पहले मंत्र पाठ करते हैं –

ॐ सहनाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवाव है।
तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषाव है॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।।

योग दर्शन जो चार-पाद है इसमें पहला पाठ समाधि पद और दूसरा साधना तीसरा विभूति और चौथा कैवल्य इन चार पाद को हम लेकर के चलेंगे और चारों पाद तो इन सात दिनों में नहीं होंगे हां कुछ विशेष सूत्रों की चर्चा हम करेंगे जो हमें पुनः पुनरावृति हो और उसको हम अपने जीवन में कुछ एप्लाई कर सके लागू कर सकें जिससे कि हमारा जीवन मनुष्यता की तरफ आनंद की तरफ बढ़ पाए । तो पहला सूत्र है –

“अथ योगानुशासनम्”

तो योग दर्शन का यह प्रथम सूत्र अथ योग अनुशासनम् अथ शब्द मंगलार्थ हैं और मंगलाचरण है महर्षि पतंजलि ने अथ शब्द का प्रयोग किया है यहां पर शुभ के लिए और आप सब ईश्वर स्तुति के मंत्र का जब पाठ करते हैं तो वहां पर आता है अथ : ईश्वर स्तुति प्रार्थना उपासना मंत्र अथ स्वस्तिवाचनम् अथ शांतिप्रकरणम् अथ शब्दाम् इति आरंभ वाची, मंगलार्थ, शुभ । तो महर्षि दयानंद जी ने भी यह दो शब्द शुभ के लिए आरंभ के लिए मंगलार्थ के लिए कहा है ।ओम बोले या अथ बोले लेकिन अथ शब्द कोई और अर्थ को प्रकट करता है वह मैं अपने अंतःकरण से समझ कर इसको आपके बीच रखने का प्रयास कर रहा हूं – अथ शब्द अब वर्तमान तो अब हम योग दर्शन का आरंभ करते हैं यह महर्षि पतंजलि कहते हैं मंगलार्थ ओम कह ले या अथ शब्द अब इति वर्तमान तो वर्तमान ही योग है और जब हम भूत और भविष्य में होते हैं तो हम योग से भिन्न दशा में होते आप कभी विचार किए होंगे कि आपका मन में क्या चल रहा है तो या तो भूत के बारे में सोच रहे होते हैं की पीछे मेरे साथ क्या-क्या घटना घटी क्या-क्या हुआ या तो भविष्य के बारे में प्लानिंग करते हैं योजना बनाते हैं कि यह काम मुझे करना है तो मनुष्य का जीवन ये दो काल में अधिक बीतता है या तो पास्ट के बारे में या फ्यूचर के बारे में हमारा थिंकिंग हमारा सोच हमारा चिंतन चलता रहे योग दर्शन कहता है अथ शब्द वर्तमान में आ जाना वर्तमान में किसी विषय को लेकर के उसे पर कंटिन्यू विचार करना लगातार वही योग हो जाता है भौतिक साइंटिस्ट भी योगी होते हैं भौतिक गवेशक रिसर्चर जब किसी विषय का रिसर्च करता है तो वह वर्तमान में होता है वह पास्ट और फ्यूचर के बारे में नहीं सोचता तभी जाकर के वह कुछ उपलब्धि कर पता है तो योग शास्त्र भी कहता है कि मनुष्य को वर्तमान में आना चाहिए और वर्तमान जब हम साधना के लिए बैठते हैं तो उसमें तो वर्तमान में रहना ही पड़ेगा लेकिन आप जब देखेंगे अपने को परीक्षण करेंगे कि आपका मन में क्या चल रहा है तो विचारों का प्रवाह या तो भूत का चलता है या भविष्य का चलता है । उसको जब हम रोक देते और वर्तमान में एक विषय ले लेते हैं वह ईश्वर विषय बना सकते हैं वह पृथ्वी को विषय बना सकते हैं अग्नि को विषय बना सकते हैं कोई पंचमहाभूत में से कोई एक भूत को ले ले आप जिस विषय पर खोज करना चाहते हैं उपलब्धि प्राप्त करना चाहते हैं तो उस विषय को लेकर के जब लगातार विचार चलता है वही योग है तो वर्तमान का यह विशेष ध्यान रखना चाहिए । अब विचार करते हैं कि अथ योग अनुशासन अनुशासति अनुशिस्यति एक होता हैं शासन एक होता अनुशासन तो योग का शासन योग का उपदेश सर्वप्रथम किसने किया ? तो सर्वप्रथम ईश्वर ने योग का उपदेश वेद में किया ।

योगे योगे तपश्चरम् वाजे वाजे हवामहे

वेद में यजुर्वेद में आया है । तो परमात्मा सबसे पहले योग के उपदेष्ठा हैं और वेद के आधार पर ऋषियों ने योग के बारे में जो कुछ कथन किया, तो वेद के पश्चात ईश्वरोंपदेश के पश्चात बाद में किसी ने बात को कही गई है इसलिए अनुशासन अनुसूशिश्यते बाद में पीछे चल रहा अनुकरण करना योग का तो अब पहला सूत्र तो यही कह दिया ,ऋषि ने कि अब हम योग शास्त्र का या योग अनुशासन का रहे प्रश्न आता योग किसे कहते हैं महर्षि पतंजलि ने कहा

योग चित्त वृत्ति निरोध योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।

चित्त के वृत्तियों को निरोध करना योग कहलाता हैं ।अब चित्त में जो वृत्तीयां चलती हैं विचार का प्रवाह चलता है भूत और भविष्य का चिंतन चलता है संस्कार के अनुसार उन विचारों को हमें रोकना है उन वृत्तियों को रोकना है अब रोकेंगे कैसे यह प्रश्न आ के खड़ा हो जाता है ऐसे किसी उपदेश ने किसी योग शिक्षक ने आपको बता दिया की वृत्तियों का निरोध करो अब करेंगे कैसे वृत्तीय ऐसे नहीं रुकेगी वृद्धियों को रोकने के लिए कुछ उपाय करने पड़ते हैं और उपाय योग दर्शन में बहुत सारे उपाय दिए हुए और कुछ अपना “यथाभिमतध्यानाद्वा।” आगे सूत्र आएगा आपका जैसा अभी मत है अब आपका जैसा भी मत है इसका अर्थ स्वामी सत्यापति परिव्राजक महाराज जी ने यह किया है कि योग दर्शन में जो बातें ऋषि ने ध्यान की प्रक्रिया बताई जितने प्रकार की उसमें से कोई एक अभिमत ऐसा उनके भाष्य में स्वामी जी ने लिखा है लेकिन मैं थोड़ा सा इस विचार से कुछ और भिन्नता रखते हुए यशवी यथा.. अथवा यथावत ज्ञान आत्मा ऋषि का अभिप्राय है कि मैंने योग दर्शन में वर्णन कर दिया यह तो है एक विद्या / विधा है इसको भी आप अपनाओ लेकिन आपके मन में कोई और तकनीक कोई और विधा है मन को रोकने का उनका ज्ञान अस्त्र करने का उसको अपना सकते यह कोई आवश्यक नहीं है कि योग दर्शन में जितनी बातें कही है उसी को हम अनुसरण (फॉलो) करें वह करना ही है वह तो बहुत महत्वपूर्ण है । लेकिन उसके अतिरिक्त भी कुछ विधा यदि आती है कि हम मन को रोकने में सक्षम हो सकते ऐसा विचार ला करके तो उस विधि को अपनाया जा सकता हैं।

मेरे व्हाट्सएप पर एक सज्जन मेरे मित्र हैं वह भी साधक हैं, अब वानप्रस्थी हो गए हैं, पहले पुलिस विभाग में रहे थे। उन्होंने एक वीडियो भेजा तो वीडियो में तीन-चार व्यक्ति के शव एकांत जंगल पहाड़ों में पड़ा हुआ सड़ा हुआ और इन्वेस्टिगेशन हुआ उसका खोज हुआ पुलिस टीम से पुलिस वाले कुछ वहां गए और कुछ उस लाश को कैसे उठा रहे हैं किसी का सिर हाथ सड़ा हुआ है जहां से उठाया है वही हाथ में रह जा रहा है फिर भी उठा रहे तो मैं उसे वीडियो को बड़ा ध्यान से देखा और अब मैं उसको एक हथियार बना लिया जब मैं ध्यान बैठता हूं तो मैं उस चित्र को याद कर हमेशा अपने जब कभी स्मृति आ जाती है उसे चित्र को मन में ले आता हूं कैसे तीन-चार लाशे सड़ी हुई है लोग उसको उठा रहे हैं किसी तरह से उठाकर के गाड़ी में भर रहे हैं पोस्टमार्टम के लिए ले जा रहे हैं तो मैं उसे पर विचार कर लेता हूं थोड़ा सा ध्यान देता हू तो मैं सोचता हूं कि मेरा भी शरीर वही है ऐसा ही कर करके ऐसा ही हो जाएगा अब मैं कुछ भी नहीं है शरीर मेरा दो दिन का है पता नहीं कहां के छूट जाए इस अवस्था में शरीर पड़ा मिलेगा ऐसी स्थिति हो सकती है यह शरीर के सड़ी-गली चीज है कितनी बदबू आ रही है वही चीज तो मेरे पास है जिसे मैं बैठा हूं ऐसा सोचते ही मन समाहित होने लगता है आत्मस्थ होने लगता है, यथाभिज्ञान.. योग में जाने के लिए आप बहुत तरह के जो आपकी सोच है उसको आप एक विधि बनाकर के वहां कैसे भी आप अपने मन को समाहित कर ले चित्त वृत्तियों का निरोध कर ले संसार में हमारा मन भाग रहा है तो संसार में हमें राग है उसमें सुख दिखाई देता है किसी भी विषय का विचार यदि व्यक्ति मन में करता है तो उस विषय में उसको सुख अनुभव होता है अपनी बुद्धि विवेक का आधार पर इसलिए मन वहां जा रहा है । परमात्मा के बारे में हम विचार नहीं कर पाते हैं क्योंकि परमात्मा को शब्दों में जानते हैं परमात्मा के लाभ सुख का विशेष शाब्दिक ज्ञान तो है अनुभवात्मक ज्ञान नहीं है और अप्रत्यक्ष ज्ञान है प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं है इसलिए ईश्वर में मन नहीं लगता इतना बड़ा सुख इतना बड़ा आनंद और इसका लंबे समय तक अनुभव नहीं है इसलिए वहां पर हमारा मन नहीं जाता ।

आईये तो कहा योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।
क्या है चित्त के वृत्तियों का निरोध करना ? योग है ।

अब देखिए चित्त की वृत्तियों को आपने रोक दिया कोई विचार नहीं चलता योग अवस्था में आ गये योग अर्थात संसार का विचार तो नहीं चलेगा लेकिन वहां पर परमात्मा का विचार आत्मा का विचार यह बोध रहेगा तो यहां पर वृत्ति शब्द से सांसारिक विषयों के चिंतन को रोकने का है ना कि ईश्वर का चिंतन रोकना ईश्वर का विचार तो हमें उत्पन्न करना है ईश्वर के विचार में अभ्यास्थ तो होना है ईश्वर कर व्यापक है निराकार है आनंद घन है वह एक शक्ति है मैं चेतन हूं मैं शुद्ध हूं मैं बुद्ध हूं यह भाव ये वृत्तीया तो मन में रहेगी इसको तो नहीं रोकता है सांसारिक वृतियों को रोकना है ।यही योग है।
फिर कहा योग की स्थिति में जब व्यक्ति होता है तो क्या होता है ऋषि ने कहा “तदा द्रष्टु: स्वरुपेऽवस्थानम्।”

अब द्रष्टु: शब्द आया है द्रष्टु शब्द का अर्थ दो है आत्मा और परमात्मा जब व्यक्ति योग की अवस्था में होता है ध्यानस्थ होता है, समाधिस्थ होता है तो अपने स्वरुप में होता है और परमात्मा के स्वरुप में भी रहता है मैं ऐसे समझता हूं नदी का दो किनारा है आप नदी के एक किनारे पर गए जल को स्पर्श किया प्रवेश कर गये जल में तो आप नदी के दूसरे किनारे को भी आपने टच कर लिया स्पर्श कर लिया। क्योंकि जल का संबंध इस किनारे से भी है उस किनारे से भी नदी के उसे किनारे को भी स्पर्श कर लेना उदाहरण से इसलिए मैं समझा रहा हूं कि आप समझ पाए इस बात को यदि योग की स्थिति में जब आत्मा अपने स्वरुप को जान लेती है तो परमात्मा के स्वरुप को भी वह जान लेती है । दोनों के स्वरुप प्रकट होते वहां पर, यही योग है ।आत्मा को यह बोध होता है कि मैं अल्पज्ञ हूं चेतन हूं एक देशीय हूं और हमारे साथ में अनंत है और यह भी बोध होता है कि परमात्मा सर्वव्यापक है अखंड है एक रस है सर्वशक्तिमान है सर्वरक्षक है वह परमात्मा में मैं हूं यह भी बोध‌ रहता है। जैसे आप आईने में शीशे में आप अपने को देखते हैं तो शीशे में जो दिखाई देता है वह चित्र वह भी देख रहे हैं और अपना भी बोध रहता है की चित्र जैसा है वैसा मैं हूं बैठा इसलिए वैसा में दिख रहा हूँ । तो उसी तरह से द्रष्टु शब्द से यहां पर ऋषि ने भी भाव ऐसा किया और भाष्यकार ने वैसा अर्थ किया की आत्मा और परमात्मा के स्वरुप में स्थित होता है आत्मा अपने स्वरुप में और परमात्मा के स्वरुप में अवस्थित होता है, इसी का नाम है “तदा” योग के स्थिति में तब कब ? जब योग की स्थिति में होंगे योग: काश्ती समाधि योग समाधि उच्चयते ये यह व्यास जी कह रहे हैं योग का अर्थ होता है समाधि और मैं एक बात बताऊं जो आप सब जानते भी होंगे सन्यास संन्यासी और योगी, योग और सन्यास यह दोनों (पैरेलल) पर्यायवाची है । सन्यासी वही है जो योगी है, जो योगी है वह सन्यासी है ।

संन्यास – जिसके अंदर से अच्छे प्रकार से त्याग लोकेषणा वित्तैषणा पुत्रैषणा का त्याग हो गया है, वह योगी हो गया वहीं सन्यासी है । लेकिन सन्यास कई प्रकार के होते हैं इसमें से क्रम सन्यास है गोण सन्यास है अब संयास प्रकरण को पढ़ेंगे सत्यार्थ प्रकाश में चतुर्थ समुल्लास में संभवत: देखें तो वहां पर आपको मिलेगा क्रम संन्यास गौण संन्यास का क्या मतलब होता है मुख्य संन्यास का क्या मतलब होता है यहां मुख्य सन्यासी की चर्चा कर रहा था संन्यास और योग योगी और मुख्य संन्यासी एक ही होते हैं मुख्य संन्यासी और योग के बारे में महर्षि व्यास जी ने तो कहा योग समाधि उच्चयते योग का मतलब होता है समाधि। समाधि को ही योग कहा जाता है और समाधि दो प्रकार की होती है और यह आगे चर्चा हम इस पर करेंगे आज तो पहला दिन है तो पहले पाद की कुछ सूत्रों की चर्चा हम करके आगे बढ़ेंगे ।

तो समाधि ही योग है । अब आइए अगला सूत्र को देखते हैं अगले सूत्र में कहा “वृत्तिसारूप्यम् इतरत्र ।”
अब हम समाधि में नहीं है योग में नहीं है । योग का समय तो एक घंटा होगा, 2 घंटा होगा, 5 घंटे आप बैठे हैं लेकिन समाधि टूट गई योग से आप हट गए तो योगी की स्थिति क्या होगी तो महर्षि पतंजलि कहते हैं वृत्तिसारुप्य = वृत्ति के स्वरूप के जैसा ।
अब हमारे चित्त में जैसी वृति है वैसे ही अपने को देखेंगे लोभ मोह काम सांसारिक में मेरा तेरा जो भी विचार मन में है उसी के अनुरुप अपने आप को हम जानते हैं ।

मैं एक उपदेशक हूं अध्यापक हूं व्यवसाय करने वाला हूं आदि आदि ..में पिता हूं भाई हूं बस यह जानेंगे जो विचार मन में है वृत्ति उसी का अनुरुप । अब योग से जब भिन्न अवस्था में साधक होता है [ इतरत्र – दूसरे समय में अर्थात् वृत्तियों के निरोध से भिन्न अवस्था में (द्रष्टा का) ] तो उस अवस्था में वृत्ति के जैसा ही वह व्यवहार करता है । इसलिए आरंभिक अवस्था में अनावश्यक बातें नहीं करना मौन रहना मुनि भाव में एकांत में रहना । कहते हैं कुमारी शंखवत सांख्यदर्शन में आया था कुमारी के हाथ में शंख की चूड़ियां होती है चूड़ियां दो होगी ना तो भी खनकेगी आपस में टकराएगी तो वह आवाज होगी ना । तो साधना के क्रम में साधक एकाकी रहे अब दो व्यक्ति भी रहेंगे तो कुछ क्लेश होगा राग द्वेष कुछ न कुछ व्यवहार से बातचीत से उत्पन्न हो जाएगा तो वहां पर कहा कि एकान्त में रहे ईश्वर प्राणिधान की भावना में रहे मूल वृक्ष के मूल में बसे कंदमूल फल खाए कि बहुत सारे उपाय हम सोचते हैं, तो यहां पर आया है की वृत्ति ..
जब हम योग से हट जाते हैं तो वृत्ति के स्वरूप में ही हमारा जीवन चलता है मैं कुछ दिन पहले जब साधना का अभ्यास करता रहा तो मेरे मन में एक दो बार ऐसी झलक आया कि जब ध्यान से उठता था तो मन दुखी हो जाता था कि मैं कितना सुंदर अवस्था में था अब मेरे मन में विचार आ गया तो फिर घबराहट एक क्लेश होता था कि यह वह स्थिति वह ठीक थी इसमें तो मन में बेचैनी सी है। तो यह अलग होता वृत्ति के जैसा मन में विचार चलता रहता है। समाधि से उठने के बाद वृत्ति के स्वरूप के जैसा अपने को देखा उसे तो उस समय आप देखेंगे कि क्या योगी है ? यह तो मेरे जैसा ही बातचीत करता है, यह सारी बातें व्यवहार करना क्या अंतर है सामान्य व्यक्ति की तरह दिखेगा लेकिन उनकी स्थिति थोड़ी और भिन्न होती योग में जब होते हैं या और व्यवहार में भी देखते हैं ।

आगे चलते हैं इस पर विचार करेंगे  ” वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टाऽक्लिष्टा: । “

यह सूत्र बहुत महत्वपूर्ण है सबके लिए इसको आप ध्यान से सुनेंगे विचार करेंगे तो आपको बहुत बड़ी-बड़ी चीजें महत्वपूर्ण बातें आपको समझ में आएगी। महर्षि जी ने कहां बताया वृतियां पांच हैं और क्लिष्ट होते अब यह एक अक्लिष्ट और आप क्लिष्ट को समझ लिया तो आप वृत्तियों के बारे आधी बात को समझ ली ,! आप लोग हम सब समझ लेंगे इस विषय में व्यास जी ने विस्तार से व्याख्या किया । मैं तो केवल यह पांच दिनों में संक्षेप से केवल चर्चा करते हुए आगे बढ़ता जाऊंगा कि आप जो पढ़ते समय पढ़ें हैं गुरु मुख से पढ़ेंगे तो विस्तार से पढ़ेंगे तो क्लिष्ट है जिसमें क्लेश होता है और क्लेश कितने हैं ? आप सब को याद होता है याद है ? अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनवेश ये पांच क्लेश है । जिन वृत्तियों में जिन विचारों में यह क्लेश है – अविद्या है अस्मिता है राग है द्वेष है अभिनिवेश मिला हुआ है मिश्रित है वह क्लिष्ट वृत्ति।

और अक्लिष्ट वृत्ति क्या है जिन में क्लेश नहीं हैं ।अब क्लेशों रहित वृत्ति कौन सी है इस पर विचार करते हैं जिसमें क्लेश नहीं है । तो यह आप प्रवचन अभी सुन रहे हैं इसमें भी क्लेश हो सकता है आपके लिए को मेरे से व्यक्तिगत उतना स्नेह नहीं है वो कह सकते हैं बेकार की बात बोल रहा है बड़े लंबे चौड़े भाषण दे रहे हैं अपना जीवन तो देखा ही नहीं इन्होंने ऐसा भी लोग रहे हो क्लेश हो गया राग द्वेष और मैं जानता ही हूं अहंकार आ गया क्लेश हो सकता है तो जिन विचारों में सुने हुए देखे हुए यह चिंतन किए हुए विचारों में क्लेश है वह क्लिष्ट वृत्ति है वह आपको सुख देगा या तो दुख देगा यही दो काम करेगा । जब आप ध्यान करते हैं ईश्वर के बारे में विचार करते हैं वह भी एक वृति है क्योंकि जहां विचार आया जिस विषय में हम सोचते हैं तो वृत्ति है ईश्वर के विषय में सोचते हैं आत्मा के विषय में हम सोचते हैं अष्टांग योग के बारे में विचार करते हैं वेद पढ़ते हैं आर्ष ग्रन्थों को हम पढ़ते हैं अब वहां पर यदि राग द्वेष नहीं है निष्पक्षता से आप यदि विचार करते हैं तो वह अक्लिष्ट वृत्ति है । जहां पर राग नहीं है द्वेष नहीं है निष्पक्ष ऋतंभरा तत्र प्रज्ञा ..आगे चर्चा होगी ऋतंभरा जो सत्य को धारण करने वाली बुद्धि है वृत्ति है व्यापार है और सत्य के ईश्वर के बारे में हमें जो ज्ञान है आत्मा के बारे में जो ज्ञान है उसका विचार करते हैं उसमें क्लेश नहीं होता है (अक्लिष्ट) तो ऐसे विचार जो अक्लिष्ट होता है जो दुख नहीं देता है सुख नहीं देता है लेकिन वह भी छोड़ने योग्य है, अंत में उसको भी छोड़ना पड़ेगा एक और उदाहरण दूंगा तो बात स्पष्ट हो सकती है – क्लिष्ट वृत्ति को छोड़ने के लिए अक्लिष्ट वृत्ति को उत्पन्न करना पड़ता है अब अक्लिष्ट वृत्ति है ईश्वर का चिंतन आत्मा का चिंतन वेद का स्वाध्याय ईश्वरीय विद्या का चिंतन मनन, सत्य का चिंतन अक्लिष्ट वृत्ति है और आप अक्लिष्ट वृति को जितना आप बढ़ाएंगे उतना अक्लिष्ट वृत्ति राग द्वेष वाला जो विचार है वह कम होता जाएगा ।

जैसे हमारे पैर में कांटे चुभ गए अब कांटे लगे हुए हैं ।

जंगल में हम तो अभी अरण्य में ही रहते तो यदा कदा पैर में कुछ कांटा लग जाता है और उसे कांटे को निकालने के लिए दूसरे कांटे को लेते हैं और कुरेद कर पैर में लगा कांटा निकाल लेते हैं । जब पैर में लगा कांटा निकल जाता है तो जो पैर में लगा हुआ था वह भी फेंक देते हैं जो दूसरा काटा हमें लिया था उसको भी फेंक देते हैं ।

तो क्लिष्ट वृत्ति से बचने के लिए अक्लिष्ट वृत्ति का अभ्यास करना पड़ता है – ईश्वर का चिंतन अक्लिष्ट वृत्ति है ध्यान का अभ्यास अक्लिष्ट वृत्ति है आत्मा का चिंतन और मनन अक्लिष्ट वृति है वेद उपनिषद मंत्रो का विचार अक्लिष्ट वृत्ति है योग दर्शन के सूत्रों पर विचार अक्लिष्ट वृत्ति है इसका अभ्यास कर कर के अक्लिष्ट वृत्ति को प्रबल करना होता है तो सांसारिक वृत्तियां वह दब जाती है अंत में जब इसी वृत्ति में हम अक्लिष्ट वृत्ति में होते हैं तो एक दिन इस अक्लिष्ट वृत्ति को भी छोड़ना होता है और अक्लिष्ट वृत्ति को छोड़ना इतना सहज है कि – जैसे पैर में लगा हुआ कांटा को निकाल करके फेंकना कठिन होता है और जो हाथ में जिस कांटे से हम दूसरे कांटे को निकल रहे था अब वह हाथ में पड़ा हुआ कांटा को फेंकना बड़ा सरल होता है आसानी से उसको फेंक सकते हैं लेकिन पैर में जो लग गया है उसको निकालना पड़ेगा उसको दर्द को सहना पड़ेगा अभ्यास करना पड़ेगा तो अक्लिष्ट वृति बाधक नहीं है पर अंत में इन्हें भी छोड़ना पड़ता हैं । वृत्तीय तो पांच है उनका नाम भी याद होना चाहिए – “प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः।”

प्रमाण , विपर्यय , विकल्प , निद्रा , स्मृतयः॥

हम सबको क्योंकि अपने जीवन को सुंदर बनाना है ।मनुष्य जीवन को सार्थक करना है तो योग दर्शन पढ़ें बिना मनन किए बिना उसका अभ्यास किए बिना हम अपने मनुष्य जीवन को व्यवस्थित नहीं कर सकते चाहे आप कितनी ही उन्नति कर लें बहुत धन वैभव प्रतिष्ठा सम्मान कमाले तो ऋषि कहते हैं यदि अपने को नहीं जाना ईश्वर को न जाना अपने वृत्तियों को ना रोक पाया महती विनश्ती…

हम वृत्तियों के नाम कैसे जानते हैं तो याद कर ले
(१) प्रमाण (२) विपर्यय (३) विकल्प (४) निद्रा और (५) स्मृति । यह पांच हो गए।

प्रमाण विपर्यय विकल्प निद्रा और स्मृति यह जो पांच है इनके जानने के लिए प्रमाण वृति क्या है – प्रत्यक्ष अनुमान और आगम प्रमाण ।
प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम यह तीन शब्द को हम समझते प्रमाण व्यक्ति को तीन प्रकार से दिया जाता है ।
ऋषि ने प्रमाण को कहा प्रत्यक्ष प्रमाण आगम प्रमाण और अनुमान प्रमाण यह वृत्ति का नाम है ।

प्रमाण वृत्ति एक है उसका तीन विभाग है तो प्रत्यक्ष क्या है तो प्रत्यक्ष प्रमाण वृत्ति बनती है कि … इंद्रियस‌न्निकट उत्पन्न ज्ञानम प्रत्यक्षण और उद्देश्य अभी विचार व्यवसायमकाम तो अब यहां दर्शन के सूत्र लाकर के यहां पर खड़ा करना पड़ेगा प्रत्यक्ष को समझने के लिए की इंद्रियों के सन्निकट से इंद्रिय अर्थ इंद्रिय कहते हैं जो पांच ज्ञानेंद्रिय और अर्थ होते हैं पांच जो विषय हैं रूप रस गंध स्पर्श शब्द आंख नाक कान जिव्हा त्वचा यह पांचो ज्ञान इंद्रियां का संबंध पांचो अपने-अपने विषय से है यह सब आप जानते हैं।

इन इंद्रियों के द्वारा उन विषयों के उन अर्थों के साथ विषय के साथ जब संबंध होता है इंद्रियों का विषय के साथ संपर्क होता है उससे जो ज्ञान हमें बनता है उस ज्ञान के आधार पर जो हम विचार मन में उठाते हैं वह प्रत्यक्ष प्रमाण वृत्ति प्रत्यक्ष प्रमाण वृत्ति का अर्थ यह हुआ कि इंद्रियों के द्वारा जो समझ हमने उत्पन्न किया और वह समझ को हम विचार करते हैं वह जो विचार है वह वृति है वह प्रत्यक्ष प्रमाण ।

फिर आता है आगम = वेद को आगम कहते हैं आगम निगम बखानी यह लोक कहावत है आगम निगम निगम इति वेद आगम इतिवेद श्रुति इति वेद मंत्र इतिवेद संहिता इति वेद को कई के नाम से तो यहां पर आया वेद आर्ष ग्रंथ वेद अनुकूल ग्रंथो के द्वारा जो भी हमने पढ़ा है सुना है सुन करके देखा यह जो हमने पढ़कर के वृत्तियों को ज्ञानों को इकट्ठा किया है उसके आधार पर जो हम सोचते हैं यह है आगम प्रमाण वृत्ति । अब इसको और विचार करते अगला क्रम आता है अनुमान – अनुमान प्रमाण वृत्ति क्या है ?

अनुमान प्रमाण वृति कहते हैं जो अनुमान करके अनुमान कैसे होगा न्याय दर्शन में जाइए फिर प्रत्यक्ष पूर्वक अनुमानम् त्रिविम प्रत्यक्ष पूर्वक बिना प्रत्यक्ष का अनुमान नहीं होगा आकाश में बादल देखा छाए हुए और बादल से वर्षा होते हुए भी हमने देखा प्रत्यक्ष किया हुआ है अब या तो आपने देखा या किसी के द्वारा अपने सुना पूर्वजों के द्वारा … तब जाकर आप अनुमान लगा सकते हैं कि ऐसा एक बादल है तो वर्षा होगी तो प्रत्यक्ष यदि नहीं है तो अनुमान भी नहीं होगा तो प्रत्यक्ष के साथ ही अनुमान का संबंध होता है यह गौतम ऋषि ने न्याय दर्शन में लिखा । अनुमान जो हम करते हैं शब्द के द्वारा प्रत्यक्ष के द्वारा आगम और प्रत्यक्ष प्रमाण के आधार पर अनुमान प्रमाण वृत्ति बनती है आपने मुझे देखा है और फिर दस वर्ष बाद विश्व में अन्य देश में आपने देख लिया यही प्रभामित्र है । हमको आपने कभी नहीं देखा आप मैं प्रभामित्र हूं आपका कैसे अनुमान लगाएंगे तो प्रत्यक्ष यदि हुआ या अपने किसी से सुना है वह ऐसे हैं, ऐसा डीलडोल है ऐसे वह कपड़े पहनते हैं ऐसी वेशभूषा है तो सुने हुए बात पर अनुमान लगा ले । इसी प्रकार आगम का आधार पर वेद में आपने पढ़ा है ईश्वर के बारे में ईश्वर के बारे में अनुमान लगा सकते हैं । और आपने पढ़ा ही नहीं सुना ही नहीं तो फिर अनुमान भी नहीं लगा सकते इसलिए अनुमान किस पर आधारित है आगम पर और प्रत्यक्ष पर इस तीसरे नंबर पर महर्षि पतंजलि एक बहुत बड़े वैज्ञानिक थे वह यह जो क्रम रखा है ना सुंदर ढंग से प्रत्यक्ष अनुमान आगम लेकिन अब यहां पर के अनुमान जो है कि बीच में है इस बताना (कन्वे) करना पड़ेगा संस्कृत में आगे पीछे करना पड़ेगा तब अर्थ खुलता है प्रत्यक्ष होगा आगम होगा फिर अनुमान होगा ।

क्योंकि सुने हुए देखे हुए विषयों का ही अनुमान होता है तो अनुमान के आधार पर जो हमारा ज्ञान बनता है जो हम विनती व्यापार उठाते हैं उसको अनुमान प्रमाण वृत्ति कहते हैं । अब एक बात और इस पर जोर करके देखिएगा थोड़ा क्लिष्ट और अक्लिष्ट को यहां पर समझने का प्रयास करते की प्रत्यक्ष जो भी प्रत्यक्ष प्रमाण वृत्ति प्रत्यक्ष के आधार पर जो ज्ञान बना है जो विचार हमारे मन में आता है वह विचार क्लिष्ट भी हो सकता है और आपकी अक्लिष्ट भी हो सकता है आगम के द्वारा जो हमने शास्त्र को पढ़ा है वह क्लिष्ट भी हो सकता है और अक्लिष्ट भी हो सकता है अनुमान के द्वारा जो हमने वृत्ति को बनाया है वह अनुमान प्रमाण वृत्ति क्लिष्ट भी हो सकता है और अक्लिष्ट भी हो सकता है कैसे ? की प्रत्यक्ष द्वारा इंद्रियों के द्वारा शास्त्रों को पढ़कर के या अनुमान के आधार पर जो ज्ञान और ज्ञान का आधार पर जो वृति है यदि उसमें क्लेश हमने मिला दिया ।

क्लैश मिला हुआ है अविद्या.. है वेद पढ़ कर भी रावण जैसे लोग इतिहास मे अहंकारी लोग हुए हैं हम आप में भी बहुत सारा अहंकार आ जाता है वह ऐसा है वह क्लेश करते हैं उसके बारे में बोलते हैं कुछ प्रशंसा करते हैं तो प्रशंसा करेंगे द्वेष है तो निंदा करेंगे कि यह जो होते हैं इसमें जो राग द्वेष मिला हुआ अभी आज भले वह वेद की बात है वह शास्त्र की बात है लेकिन राग जहां मिल गया द्वेष मिल गया उल्टा समझ बन गए तो अहंकार आ गया तो वह क्लिष्ट वृत्ति बन जाएगी और यदि हमने अविद्या आदि को अलग रखा निष्पक्ष होकर के हमने विचार किया विनीत सरल होकर के हमने विचार किया परमात्मा को साक्षी मानकर के सिद्धांत कारण से अपनी बात को समझो एक दूसरे प्रति व्यवहार किया वह अक्लिष्ट वृत्ति बन जाएगी ।
तो क्लिष्ट और अक्लिष्ट को आप जब भी समझने का प्रयास करेंगे तो जहां पर क्लेश को हटा दिया तो अक्लिष्ट वृत्ति होगी और जहां हमने क्लेश मिला दिया अविद्या मिला दिया आदि वह क्लिष्ट वृत्ति बन जाएगी । तो यह प्रत्यक्ष प्रमाण अनुमान प्रमाण और आगम प्रमाण यह तीनों विभाग को मिलाकर के यह प्रमाण वृत्ति बनती है और वह वृत्तीयां हमारे चित्त में होती है । तो इसमें है-

“विपर्ययो मिथ्याज्ञानम् अतद्रूपप्रतिष्ठम् ।”

अब यहां पर जिनको क्लेश कह रहे थे क्लेश जो पांच है अविद्या अस्मिता राग द्वेष अभिनिवेश तो यह जो क्लेश है यह विपर्यय वृति ज्ञान है मिथ्या ज्ञान है और मिथ्या ज्ञान विपर्यय वृति ये सब मूल है क्लिष्ट वृतियां का तो विपर्यय वृति को समझ लिया तो हम क्लिष्ट वृत्ति से बच सकते हैं ।

तो विपर्यय जो वृत्ति है विपर्यय मिथ्या ज्ञान/उल्टा ज्ञान उसे अविद्या कहा अविद्या क्षैत्रम् उपदेशाम् तो अविद्या क्षेत्र भूमी हैं आगे वाले क्लेशों का अस्मिता राग द्वेष अभिनवेश का तो जो अपने रूप में प्रतिष्ठित ना हो वह विपर्यय वृती है मिथ्या ज्ञान जैसे उदाहरण समझ लीजिए कि मैं और आप आपलोग हमसब यहा संसार में मरने के लिए आए हैं इसका नाम है मृर्त्यलोक हैं और मृत्यु लोक में आए ही मरने के लिए लेकिन हम लोग क्या मानकर के बैठे हैं बगल वाले तो मरे हमारे मित्र कई लोग हमारे चले गए तो कहते हैं वो गये जी मैं जाने वाला नहीं, और अपनी मृत्यु को भूले रहते हे इसको कहते है विपर्यय वृति मिथ्था ज्ञान, जानते हैं पर अपना बोध नहीं कि मैं भी मरुंगा भाई और मारूंगा तो 10वर्ष, 20 वर्ष, 50 वर्ष के बाद मारूंगा ऐसा मान कर बैठे हैं यह जो सोच है यह विपर्यय वृति है मिथ्या ज्ञान हैं ।आप हम हो सकता हो कि ना रहे हमेशा मृत्यु को याद रखना हम मरने के लिए आए हैं और कभी भी मर सकते है अभी मर सकते हैं बोलते बोलते मेरी वाणी बंद हो सकती है प्रभामित्र या चंद्रशेखर एक सेकंड में भी जा सकता है कोई व्यक्ति कभी भी जा सकता है। तो… मृत्यु को याद ना रखना यह विपर्यय वृत्ति है और एक और बात बताऊं अभी मैंने कहा था वह वीडियो को मैं देखा तो एक बार और मन में आता रहता है यह जो शरीर है जो दिखाई दे रहा आपको शीशे में देखते हैं आपको रोज नहाते धोते और खूब इसको सजाते हैं बढ़िया-बढ़िया खिलाते भी है यह गंदगी का ढ़ेर हैं सड़ा हुआ है।

आत्मा शरीर से निकल जाए तो 24 घंटे के अंदर इतनी बदबू शरीर में आने लगेगी तब कोई खड़ा नहीं रह सकता वहां। वही चीज हमारे पास ..वही है .. यह इतने यह जो मांस का पिंड का लोथरा है यह सड़ी गली चीज है लेकिन यह मरने के लिए है, मानने को तैयार नहीं, यह याद नहीं रखते इसको मुख से कितनी बदबू आती है पेट साफ करने को कितनी गंद निकलता है लेकिन हम इसको पवित्र मानकर के बैठे हैं इसी का नाम है विपर्यय वृति इसी का नाम है, अपने स्वरूप को शरीर को सजा रहे हैं बढ़िया कपड़े पहन के सेंट लगा करके और सजाना चाहिए मैं इसका विरोध नहीं करता हूं मैं भी करता हूं लेकिन इसको हमेशा याद रखना चाहिए यह मल मूत्र का पिंड है यह आत्मा निकलते कितनी बदबू आती है इसको यहां पर एक सेकंड पर खड़ा रहना नहीं चाहेगा, तो वही शरीर मेरे पास है इसको याद रखना यह विद्या है और इसको भूल जाना है यह विपर्यय वृत्ति है मिथ्या ज्ञान है । शरीर का स्वरूप ही ऐसा है गंदगी का तो इसको याद यह रखना यह विद्या है तभी मुक्ति मिलेगी नहीं तो इसमें बने रहना चाहेंगे और जब यह भाव मन में रहेगा यह गंदगी का ढ़ेर में हे आत्मान तू तो कहां बैठा है सड़ी गली चीज में गंद में तो निकालो जल्दी से निकलना चाहेंगे अगर मोक्ष में जाना चाहेंगे और याद नहीं रहता है क्योंकि हम अविद्या में हैं उल्टा समझ रहे हैं यह तो पवित्र है देवालय है शिवालय है इसे खूब इसको सजाते हैं ।

– चंद्रशेखर शर्मा ( जयपुर)

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