पेशवा बाजीराव प्रथम

(हिन्दी स्वराज के संस्थापक शिवाजी और उनके उत्तराधिकारी पुस्तक से..)

महान पेशवा बाजीराव प्रथम – अध्याय 12

जैसा कि हम पूर्व अध्याय में ही स्पष्ट कर चुके हैं कि बालाजी विश्वनाथ की मृत्यु के उपरांत उनके पुत्र बाजीराव प्रथम को मराठा साम्राज्य का अगला वंशानुगत पेशवा बनाया गया। बाजीराव प्रथम अपने उत्कृष्ट सैनिक गुणों, नेतृत्व क्षमता और राजनीतिक व कूटनीतिक चातुर्य के कारण इतिहास में विशेष स्थान बनाने में सफल हुए। उनका व्यक्तित्व अपने आप में विराट था। यही कारण है कि उन्हें इतिहास में बहुत ही सम्मानजनक ढंग से देखा जाता है। वह अपराजित सेनानायक रहकर 20 वर्ष तक मराठा साम्राज्य के माध्यम से ‘हिंदवी स्वराज्य’ की सेवा करते रहे। जिसका परिणाम यह निकला कि उनके पेशवा पद पर रहते हुए उत्तर भारत में भी मराठा साम्राज्य ने अपना विस्तार करने में सफलता प्राप्त की। वह अपने 20 वर्षीय पेशवा पद के कार्यकाल में कभी भी किसी भी युद्ध में पराजित नहीं हुए, इसीलिए उन्हें ‘अपराजित सेनानायक सम्राट’ के रूप में भी इतिहास में जाना जाता है।

हाँ, प्रथम बाजीराव ही पेशवाओं का सिरमौर है।
स्वराज्य का स्वप्नद्रष्टा फिर बताओ कौन है?
अपराजित योद्धा ही सदा प्रवाह समय का मोड़ते।
उपस्थित हुई चुनौतियों को नहीं भाग्य पर वे छोड़ते ।।

बाजीराव प्रथम सन 1720 में मराठा साम्राज्य के पेशवा के पद पर नियुक्त किए गए। वह मराठा साम्राज्य के चौथे छत्रपति शाहूजी महाराज के पेशवा अथवा प्रधानमंत्री रहे। उनको इतिहास में ‘बाजीराव बल्लाल’ तथा ‘थोरले बाजीराव’ के नाम से भी जाना जाता है। अपने महान गुणों के कारण वह मराठा साम्राज्य में जन-जन के प्रिय हो गए थे। अपने 20 वर्षीय सेवाकाल में उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। निरंतर आगे बढ़ते रहे और अपने साम्राज्य को लेकर निरंतर प्रगति पथ पर आरूढ़ रहे। उनके प्रयत्नों से मराठा साम्राज्य ‘हिंदवी साम्राज्य’ का आकार लेने में भी सफल हुआ। यही कारण है कि बाजीराव प्रथम को सभी 9 महान पेशवाओं में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

पिता से मिले नेतृत्व के गुण

बालाजी विश्वनाथ जो कि बाजीराव प्रथम के पिता थे, अपने आप में एक महान सेनानायक थे। बचपन से ही बाजीराव अपने पिता के साथ रहने में आनंदित होते थे। यही कारण था कि पिता के सानिध्य में बालक बाजीराव राजनीति और कूटनीति के कई ऐसे गुणों को सीख गया जो अच्छे-अच्छे मनुष्यों को बहुत देर तक भी नहीं आ पाते हैं। उसने बचपन में ही पिता के साथ रहकर तीरंदाजी, घुड़सवारी और अस्त्र शस्त्र चलाने की कला भी सीख ली थी, जो उसे एक महान सेनानायक बनाने में सफल हुए। इसी प्रकार पिता के साथ रहकर उन्होंने दरबार में निष्पादित किए जाने वाले आचरण, व्यवहार और वहाँ पर कूटनीतिक और राजनीतिक विषयों में किस प्रकार सहभागिता की जाती है आदि पर भी अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया था। पिता से मिले यह गुण बाजीराव के लिए जीवन भर काम आए, क्योंकि जब वह सन 1720 में मराठा साम्राज्य का पेशवा बना तो अगले 20 वर्ष तक वह अपने बौद्धिक बल से ही मराठा साम्राज्य का संचालन करता रहा।

अद्भुत रणनीतिक प्रतिभा का किया प्रदर्शन

पेशवा पद पर नियुक्ति के पश्चात से ही बाजीराव प्रथम ने सभी चुनौतियों को स्वीकार करना आरंभ कर दिया था। उसने किसी भी चुनौती से मुँह नहीं फेरा, अपितु आने वाली हर चुनौती को सहर्ष अपनी ओर आने दिया। उस पर ईश्वर की यह अनुकंपा ही थी कि उसने प्रत्येक चुनौती का मुंहतोड़ उत्तर दिया। बाजीराव के भीतर अदम्य साहस व अपूर्व रणकौशल था। जिसके कारण वह किसी भी युद्ध में पराजित नहीं हो पाए थे। उन्होंने अपने कार्यों के संपादन में अपने छोटे भाई श्रीमन चिम्माजी साहिब अप्पा का सहयोग भी प्राप्त किया। जिन्होंने अपने ज्येष्ठ भ्राता के प्रति पूर्ण सम्मान और श्रद्धाभाव रखते हुए उन्हें अपनी सेवाएँ प्रदान कीं।

वास्तव में इन दोनों भाइयों की सेवाएँ निहित स्वार्थ के लिए की गई सेवाएँ नहीं थीं, उन्होंने जो कुछ भी किया वह राष्ट्र के प्रति समर्पित होकर किया। ‘इदम राष्ट्राय, इदन्नमम’ उनके जीवन का आदर्श था। वह राष्ट्र के लिए जीते रहे और राष्ट्र के लिए समर्पित होकर ‘हिंदवी स्वराज्य’ की सेवा करते रहे। उनके सपनों में, उनके विचारों में व उनके भावों में केवल एक ही आदर्श था, एक ही उद्देश्य था और एक ही लक्ष्य था ‘हिंदवी स्वराज्य को सुदृढ़ करना।’ वह चाहते थे कि भारत के प्राचीन आदर्शों को स्थापित कर राजनीति का हिंदूकरण किया जाए। जिस बात को बहुत आगे चलकर सावरकर जी ने ‘राजनीति का हिंदूकरण और हिंदुओं का सैनिकीकरण’ कहकर बहुत बाद में जाकर महिमामंडित किया, उसे मराठा साम्राज्य के यह वीर स्वतंत्रता सेनानी ‘हिंदवी स्वराज्य’ के आदर्श को लक्ष्य में रखकर इसी समय चरितार्थ करने में लगे हुए थे।

अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए पेशवा बाजीराव प्रत्येक युद्ध को जीतता चला गया। वह शिवाजी महाराज की भांति बहुत ही कुशल घुड़सवार था। घोड़े पर बैठे- बैठे भाला चलाना व बंदूक चलाना उसे बहुत ही कुशलता से आता था। श्रीमंत बाजीराव के भाले की फेंक इतनी भयानक व घातक होती थी कि सामने वाला घुड़सवार अपने घोड़े सहित घायल हो जाता था। जिसे देखकर शत्रु दांतों तले उंगली दबाने को भी विवश हो जाता था, ऐसी युद्धनीति और रणनीति के सामने उनका शत्रु टिक नहीं पाता था।

जिस समय मराठा साम्राज्य अपना विस्तार पा रहा था और बाजीराव प्रथम उसका नेतृत्व कर रहे थे, उस समय मुगलों के अत्याचारों से तो हिंदू समाज उत्पीड़ित था ही साथ ही साथ अब ऐसे ही दो डकैत और भी आ चुके थे और ये डकैत अंग्रेज व पुर्तगाली थे, जो धर्मांतरण के माध्यम से हिंदू समाज पर अत्याचार कर रहे थे। उनका उद्देश्य भी न्यूनाधिक वही था जो अभी तक मुस्लिमों का रहा था। इन सबका सामना करना भी बाजीराव प्रथम के सामने एक बड़ी चुनौती थी। जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया। दक्षिण भारत सहित उत्तर भारत तक उन्होंने हिंदू समाज के लोगों को आश्रय देना आरंभ किया। जिससे वह बहुत ही लोकप्रिय हो गए थे। लोग उन्हें शिवाजी का अवतार कहने लगे थे। उनके रहते न केवल मुसलमान अपितु पुर्तगाली और अंग्रेज भी भारतीय हिंदू महिलाओं पर अत्याचार करने, बच्चों का वध करने और हिंदुओं के देव स्थानों को तोड़ने के कार्यों को करने से पहले 10 बार सोचने लगे थे।

महान विजयों का अभियान

शकरखेडला में श्रीमंत पेशवा ने मुबारिज खाँ को सन् 1724 में परास्त किया। मालवा तथा कर्नाटक पर 1724-26 में प्रभुत्व स्थापित किया। पालखेड़ में महाराष्ट्र के परम शत्रु निजामउलमुल्क को 1728 में पराजित कर उससे चौथ तथा सरदेशमुखी वसूली। मालवा और बुंदेलखंड पर आक्रमण कर मुगल सेनानायक गिरधरबहादुर तथा दयाबहादुर पर 1728 में ही विजय प्राप्त की। तदनंतर मुहम्मद खाँ बंगश को 1729 में परास्त किया। दभोई में त्रिंबकराव को नतमस्तक कर सन 1731 में उसने आंतरिक विरोध का दमन किया। सीदी, आंग्रिया तथा पुर्तगालियों एवं अंग्रेजों को भी विजित किया। सन् 1737 में दिल्ली का अभियान उनकी सैन्यशक्ति का चरमोत्कर्ष था। उसी वर्ष भोपाल में श्रीमंतबाजीराव पेशवा ने फिर से निजाम को पराजय दी। अंततः सन 1739 में उन्होंने नासिरजंग पर विजय प्राप्त की।

इतिहास का एक महान सेनानायक था बाजीराव प्रथम

बाजीराव प्रथम ने पालखेड़ के युद्ध में निजाम की सेनाओं को हराकर अपनी सैनिक योग्यता का परिचय दिया था। निजाम पर की गई इस विजय के पश्चात बाजीराव की सैनिक योग्यता की धाक जम गई। वास्तव में यह एक बहुत बड़ा कार्य था, जिसे उस समय किया जाना किसी बाजीराव प्रथम के ही वश की बात थी। इसी समय कुछ पुर्तगाली भारत में लोगों का धर्म परिवर्तन कर अपने पश्चिमी विचारों और धर्म व संस्कृति को उन पर बलात थोपने का कार्य कर रहे थे। उनकी इस धृष्टता की जानकारी जब बाजीराव प्रथम को हुई तो उसने अपने भाई चिमाजी अप्पा के साथ मिलकर उनको भी कड़ा पाठ पढ़ाया और लोगों के धर्म की रक्षा की। उनके साथ सन् 1739 में वसई की संधि कर सदा-सदा के लिए पुर्तगालियों के इस धृष्टतापूर्ण कार्य पर उन्होंने रोक लगा दी।

मराठा साम्राज्य के जिन अन्य सेनापतियों व प्रमुख व्यक्तियों ने बाजीराव प्रथम को संपूर्ण भारतवर्ष पर अधिकार करने में सहायता प्रदान की, उनमें प्रमुख थे- मल्हारराव होलकर व राणोजीराव शिंदे । बाजीराव प्रथम की सबसे महान विजय सन 1728 में पालखेड की लड़ाई में हुई। जिसमें उन्होंने निजाम की सेनाओं को पूर्णतया दलदली नदी के किनारे ला खड़ा किया। निजाम को अंत में आत्म-समर्पण करने के लिए विवश होना पड़ गया था। 6 मार्च, 1728 को उन्होंने मुंगी सेवगाव की संधि की। जिसमे दक्खिन में बाजीराव प्रथम को सरदेशमुखी और चौथ लेने का अधिकार मिल गया और साहू को मराठा साम्राज्य का निजाम ने वास्तविक छत्रपति स्वीकार कर लिया, साथ ही संभाजी द्वितीय को उसने कोल्हापुर का छत्रपति स्वीकार कर लिया।

बाजीराव प्रथम ने इन सभी युद्धों में न केवल अपनी सैनिक क्षमताओं का प्रदर्शन किया, अपितु उसने यह भी सिद्ध किया कि वह युद्ध की परिस्थितियों में किस प्रकार एक उत्कृष्टतम नेतृत्व देने में सक्षम था ? इससे जो लोग उसके पेशवा बनने पर असहमत या क्रोधित थे, वह भी धीरे-धीरे उसके समर्थक बन गए। जिससे उसकी स्थिति मराठा साम्राज्य में और भी अधिक सुदृढ़ हो गई।

विजय रथ पर आरूढ़ हो निरंतर बढ़ा गंतव्य को।
शत्रु भी न समझ सका कभी उसके मंतव्य को ।।
उसके विषय में सत्य बस एक ही ध्यातव्य है।
समर्पित रहो उसके लिए जो सर्वहित प्राप्तव्य है।।

दिल्ली पर भी की चढ़ाई

दिल्ली प्रारंभ से ही भारत की राजनीति का केंद्र रही है। दिल्ली पर विजय प्राप्त करने का अभिप्राय होता है कि संपूर्ण भारतवर्ष पर अधिकार स्थापित कर लिया। दिल्ली केंद्र होने के कारण यह भ्रांति इतिहास में स्थापित कर दी गई कि जिसके हाथ में दिल्ली वही हिंदुस्तान का बादशाह है। यद्यपि हमारे अनेकों हिंदू शासकों ने दिल्ली को विदेशियों से मुक्त कराने के लिए देश के विभिन्न भागों में अलग- अलग समय पर अनेकों युद्ध किए। जब बाजीराव प्रथम ने दिल्ली की ओर प्रस्थान किया तो उसके सन्दर्भ में यहाँ पर यह विचार करने योग्य बात है कि भारत के दूसरे प्रांतों के हिन्दू राजाओं ने या समकालीन इतिहास की ऐसी हिन्दू शक्तियों ने जो हिंदुत्व के लिए और भारत के लिए काम कर रही थीं, दिल्ली पर जब-जब भी चढ़ाई की तब-तब उन्होंने विदेशियों को भगाने के लिए ही ऐसा कार्य किया। अतः बाजीराव प्रथम भी यदि यहां पर आ रहे थे तो उसके दो कारण थे एक तो यह है कि वह दिल्ली को अपने नियंत्रण में ले लेना चाहते थे, जिससे कि मराठा संपूर्ण भारतवर्ष के शासक बन जाएँ, दूसरे विदेशी मुगलों को यहाँ से खदेड़ने का भी उनका लक्ष्य था।

सन् 1737 में बाजीराव ने दिल्ली पर चढ़ाई की। उस समय उनका सामना मोहम्मद शाह रंगीला के सेनापति सआदत अली खान ने किया, जो एक लाख की सेना लेकर उनसे युद्ध करने के लिए आया। जब बाजीराव प्रथम अपनी सेना के साथ लालकिले के सामने पहुँचे तो उनकी सैनिक वीरता के बारे में पूर्व से ही परिचित मोहम्मद शाह रंगीला और उनके सेनापति के होश उड़ गए। कहा जाता है कि मोहम्मदशाह रंगीला ने तो उनके सामने आना तक भी उचित नहीं समझा और वह कहीं जाकर छुप गया था। इस प्रकार दिल्ली पर बाजीराव प्रथम ने बड़ी सहजता से अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया। अब वह दिल्ली जिसमें बैठकर मुगल बादशाह हिंदुस्तान पर दूर-दूर तक शासन किया करते थे, हमारे हिंदू राष्ट्रनायक बाजीराव प्रथम के अधीन हो चुकी थी। यह समकालीन इतिहास की एक बहुत बड़ी क्रांति थी। जिसे ‘केसरिया क्रांति’ कहा जाना ही उचित होगा, क्योंकि यह ‘हिंदवी स्वराज्य’ के एक नायक के माध्यम से की गई थी। जिसका अपना राष्ट्रध्वज केसरिया था।

जब बाजीराव प्रथम दिल्ली पर अपना नियंत्रण स्थापित कर और उसे लूट कर वापस पुणे जा रहा था तो मोहम्मदशाह रंगीला ने अपने सेनापति सआदत अली खान और हैदराबाद के निजाम को यह आदेश दिया कि वह लौटते हुए बाजीराव को घेरकर मार्ग में ही उसका अंत कर दें, परंतु मोहम्मद शाह रंगीला की यह योजना भी सफल नहीं हुई, क्योंकि बाजीराव प्रथम ने इन दोनों की संयुक्त सेनाओं को पराजित कर उन्हें भी संधि के लिए विवश कर दिया। यह संधि भोपाल की संधि के नाम से जानी जाती है। इसके पश्चात मराठों को मालवा का क्षेत्र भी प्राप्त हो गया। इसके फलस्वरूप बाजीराव प्रथम की शक्ति में और भी वृद्धि हो गई।

हिंदुस्तान शाही की की गई घोषणा

दिल्ली और मालवा पर अपना अधिकार स्थापित होते ही बाजीराव प्रथम ने ‘हिंदुस्तान शाही’ की घोषणा की। जिसके अंतर्गत उन्होंने भारतवर्ष के सभी हिंदुओं को एक होकर विदेशी शक्तियों के विरुद्ध लड़ने का आह्वान किया। उनकी इस घोषणा से स्पष्ट हो जाता है कि उनका संघर्ष विदेशी शक्तियों के विरुद्ध था तथा – साथ ही वह जो कुछ भी कर रहे थे, भारतवर्ष की स्वतंत्रता के लिए कर रहे थे। बाजीराव प्रथम ने अपने सप्रयासों से पुर्तगालियों के षडयंत्र और अत्याचार पूर्ण कृत्यों से भारतीय हिंदुओं की रक्षा की। बाजीराव प्रथम के इस प्रकार के वीरतापूर्ण आचरण और व्यवहार को देखकर पुर्तगालियों और विदेशियों के मन मस्तिष्क में उनके प्रति भय व्याप्त हो गया था। उन्हें लगने लगा था कि जब तक बाजीराव प्रथम भारतवर्ष में है तब तक उनके सपने यहाँ पर साकार नहीं हो सकते। अब जयपुर के राजा जयसिंह द्वितीय भी उनके प्रशंसक हो चले थे। 1731 में उन्होंने महाराजा छत्रसाल की पुत्री से विवाह किया और बुंदेलखंड का एक तिहाई भाग मराठा साम्राज्य में मिला लिया।

जब बाजीराव अपनी पूर्ण प्रतिभा के बल पर भारत के राजनीतिक गगनमंडल पर एक दैदीप्यमान सूर्य की भांति चमक रहा था, तभी नियति ने उसे हमसे 28 अप्रैल, 1740 को मात्र 40 वर्ष की अवस्था में ही छीन लिया। सचमुच यह भारत का दुर्भाग्य का दिन था, ऐसे महा सेनानायक को और महान देशभक्त को अभी और समय मिलना चाहिए था। यदि वह और कुछ समय तक जीवित रहते तो भारत की खोई हुई स्वतंत्रता की घोषणा उसी समय हो जाना बहुत संभव था। जिस प्रकार उन्होंने अपने जीवन काल में विदेशी षड्यंत्रकारियों और सत्ताधीशों को एक कोने में बैठने के लिए विवश किया था, यदि ऐसा क्रम अगले 20 वर्ष और चल जाता तो बहुत संभव था कि विदेशी षड्यंत्रकारी मिशनरियों और सत्ताधीश भारत छोड़कर ही भाग जाते। परंतु बाजीराव प्रथम की अचानक मृत्यु के पश्चात उन्हें फिर से भारत में पैर जमाने का अवसर प्राप्त हो गया।

मस्तानी नामक मुसलमान स्त्री से उनके संबंध के प्रति विरोध प्रदर्शन के कारण श्रीमंत साहेब के अंतिम दिन क्लेशमय बीते। मराठा साम्राज्य सीमातीत विस्तृत होने के कारण असंगठित हो गया। मराठा संघ में व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएँ प्रस्फुटित हुई, तथा मराठा सेनाएँ विजित प्रदेशों में असंतुष्टिकारक प्रमाणित हुई; तथापि श्रीमंत बाजीराव पेशवा की लौह लेखनी ने निश्चय ही महाराष्ट्रीय इतिहास का गौरवपूर्ण परिच्छेद रचा। इतिहास तथा राजनीति के एक विद्वान सर रिचर्ड टेंपिल ने बाजीराव की महत्ता का यथार्थ अनुमान एक वाक्य समूह में किया है, जिससे उसका असीम उत्साह फूट-फूट कर निकल रहा है। वह लिखता है-सवार के रूप में बाजीराव को कोई भी मात नहीं दे सकता था। युद्ध में वह सदैव अग्रगामी रहता था। यदि कार्य दुस्साध्य होता तो वह सदैव अग्नि-वर्षा का सामना करने को उत्सुक रहता। वह कभी थकता न था। उसे अपने सिपाहियों के साथ दुःख-सुख उठाने में बड़ा आनंद आता था। विरोधी मुसलमानों और राजनीतिक क्षितिज पर नवोदित यूरोपीय सत्ताओं के विरुद्ध राष्ट्रीय उद्योगों में सफलता प्राप्त करने की प्रेरणा उसे हिंदुओं के विश्वास और श्रद्धा में सदैव मिलती रही। वह उस समय तक जीवित रहा जब तक अरबसागर से बंगाल की खाड़ी तक संपूर्ण भारतीय महाद्वीप पर मराठों का भय व्याप्त न हो गया। उसकी मृत्यु डेरे में हुई, जिसमें वह अपने सिपाहियों के साथ आजीवन रहा। युद्धकर्ता पेशवा के रूप में तथा हिंदू शक्ति के अवतार के रूप में मराठे उसका स्मरण करते हैं। जब भी इतिहास में महान योद्धाओं की बात होगी तो निस्संदेह महान् पेशवा श्रीमंतबाजीराव के नाम से लोग अवश्य ही ऊर्जान्वित हो ओत-प्रोत होंगे।

वास्तव में बाजीराव प्रथम अपनी सैनिक व प्रशासनिक क्षमता और बौद्धिक कौशल के कारण इतिहास के महानायक थे। उन्होंने ‘हिंदवी स्वराज्य’ को ‘हिंदुस्तान शाही’ तक ले जाने का महानतम कार्य किया जो कि उन्हें भारतवर्ष के इतिहास का महानतम नायक बना देता है।

हीरा मिले अनमोल तो समझो अपना भाग्य ।
मारी ‘बाजी’ राव ने तो देश का बदला भाग्य ।।

क्रमशः

– डॉ राकेश कुमार आर्य
(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता है।)

Comment:

vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betpuan giriş
betpark giriş
betpuan giriş
betpark giriş
betpipo giriş
betpipo giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
safirbet giriş
vaycasino giriş
madridbet giriş
madridbet giriş
vaycasino giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
madridbet giriş
myhitbet giriş
myhitbet giriş
meritking giriş
betpark giriş
betpark giriş
meritking giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
madridbet giriş
madridbet giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
madridbet giriş
betvole giriş
betvole giriş
norabahis giriş
betpipo giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
milanobet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
noktabet giriş
noktabet giriş
casinofast
safirbet giriş
safirbet giriş
betebet giriş
betebet giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
damabet
milanobet giriş
milanobet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş