सलाह या सुझाव देने का अधिकार किसको है ?

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सलाह देना या सुझाव देना परोपकार का कार्य है। यह भी एक प्रकार की समाज सेवा है। “परन्तु सलाह या सुझाव देने का अधिकार सबको नहीं है।”
किसी को सुझाव देने का अर्थ होता है, “उसकी बुद्धि को अपनी बुद्धि से कम समझना, और अपनी बुद्धि को उसकी बुद्धि से अधिक समझना।” जब व्यक्ति ऐसा समझता है, तभी कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को सुझाव देता है। यदि आप किसी को सुझाव देते हैं तो इसका अर्थ यह हुआ, कि परोक्ष रूप से आपने उस पर एक आरोप लगाया, कि “आपकी बुद्धि मुझसे कम है।” यह उस व्यक्ति पर एक प्रकार का आक्रमण है। “इस आक्रमण से दूसरा व्यक्ति अपना अपमान अनुभव करता है। इसलिए वह किसी का सुझाव सुनना नहीं चाहता।”
“अतः व्यर्थ में किसी को बिना पूछे सुझाव देकर उसकी बुद्धि पर आक्रमण न करें। यदि आप ऐसा करेंगे, तो हो सकता है, वह आपके इस आक्रमण तथा सुझाव से चिढ़कर आपकी कोई छोटी या बड़ी हानि भी कर दे।”
प्रश्न — “तो फिर सलाह या सुझाव देने का अधिकार किसको है?” उत्तर — “जो व्यक्ति जिस कला को या जिस विद्या को अच्छी प्रकार से जानता हो, जिसने 20-30 वर्ष तक किसी विद्या या क्षेत्र में परिश्रम किया हो, जिसको उस विद्या या क्षेत्र का लंबा अनुभव हो, जो चरित्रवान हो, बुद्धिमान धार्मिक सदाचारी परोपकारी ईश्वरभक्त और ईमानदार हो, ऐसे व्यक्ति को सलाह देने का अधिकार होता है।” “वह व्यक्ति भी अपने से किसी छोटे व्यक्ति को सलाह दे सकता है, या कभी-कभी अपने बराबर वाले व्यक्ति को भी सलाह दे सकता है।”
“अपने से अधिक योग्य व्यक्ति को तो कभी भी सलाह नहीं देनी चाहिए। क्योंकि यह सभ्यता नहीं है।” “जैसे एक सामान्य सैनिक, सेना के विंग कमांडर या कर्नल साहब को सलाह नहीं दे सकता। सेना का कोई छोटा अधिकारी, अपने से बड़े अधिकारी ब्रिगेडियर साहब आदि को सलाह नहीं दे सकता। यही सभ्यता और अनुशासन है।” “जैसे सेना में इस सभ्यता और अनुशासन का पालन किया जाता है, इसी प्रकार से नागरिक क्षेत्र में भी इस सभ्यता और अनुशासन का पालन करना चाहिए।”
नागरिक क्षेत्र में यदि कभी आप अपने बराबर योग्यता वाले व्यक्ति को अथवा अपने से छोटे व्यक्ति को सलाह देते भी हैं, तो उसको सलाह देने से पहले, उससे पूछें, कि “मैं इस विषय में एक कुशल और निपुण व्यक्ति हूं। मेरे पास इस विद्या या क्षेत्र का लंबा अनुभव है, मैं आपको एक सुझाव देना चाहता हूं, क्या आप मेरा सुझाव सुनना चाहेंगे?” तब यदि वह दूसरा व्यक्ति कहे, कि “हां, मैं आपका सुझाव सुनना चाहता हूं, आप मुझे अपना सुझाव सुनाइए।” तब तो उसे सुझाव देना ठीक है। “अन्यथा बिना पूछे, बिना अधिकार के किसी को भी सुझाव देना सभ्यता और अनुशासन से बाहर है।” “इस प्रकार से सभ्यता और अनुशासन का पालन करते हुए ही किसी को सुझाव दें। अन्यथा सबके पास अपनी-अपनी बुद्धि है। सब लोग अपनी-अपनी बुद्धि से जीना और अपना-अपना काम करना चाहते हैं। फिर उनके काम का परिणाम जो भी हो। वे उस परिणाम को भुगतने को तैयार हैं। इसलिए बहुत सोच समझकर ही किसी को सुझाव या सलाह देवें।”
—- “स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक – दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात.”

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