भारत’ शब्द* *का उदय और वास्तविक भावार्थ*

images - 2023-09-15T083144.649

*
Dr D K Garg
सहयोग:आचार्य राहुलदेव,दिल्ली

यह तो आप स्वीकार करते है की भारत देश अतीत में सोने की चिड़िया और विश्व गुरु के नाम से जाना जाता रहा है। हमारे ऋषि मुनि विज्ञान , अध्यात्म ,चिकित्सा और शिक्षा के क्षेत्र में विश्व गुरु रहे है। चाणक्य, आर्यभट्ट, शुश्रुत,चरक, धनवंतरी, अत्रि ऋषि, गौतम , विश्वामित्र आदि अनंत ऋषि हुए है जिनका लोहा विश्व आज भी मानता है ।
हमारे मूल ग्रंथ संस्कृत भाषा में ही है।संस्कृत हमारी देव भाषा है और अन्य सभी भारतीय भाषाएं भी संस्कृत भाषा का ही प्रत्यक्ष या अप्रत्क्षय रूप है । हमारे पुरातन ग्रंथ परमात्मा की वाणी चारो वेद भी संस्कृत में है ।इसलिए हमारे नाम ,शहरो के नाम,नदियों के नाम आदि भी संस्कृत भाषा से प्रभावित है ।इससे यह भी पता लगता है कि हमारे पर्वतों, नदियों, नगरों आदि के नाम भी वेदों से लिये गये हैं।
उपरोक्त विशिष्ट विशेषताओं वाले देश को भारत नाम दिया गया। और यहाँ रहने वाले भारतीय।
ये एक सम्मान सूचक शब्द है।जिसके हम सभी हकदार है।इसी भूमि पर राम,कृष्ण,बुद्ध,दयानंद जैसे महापुरुष पैदा हुए।

भारत शब्द का भावार्थ:

जब भी कोई शब्द विशेष रुप से चर्चा में आता है तो उस शब्द का वास्तविक भावार्थ समझने के लिए मैं उस शब्द को पहले वेद में तलाश करके उसके विभिन्न भावार्थ का अध्ययन करता हूं।

चारो वेद में ढूंढने से मालुम हुआ कि भारत शब्द मूल रुप से वैदिक शब्द है। यह शब्द वेद में भी मिलता है। इसका अर्थ भी बहुत अच्छा है।

ये ध्यान रहे की वेदों मंत्रो में ‘भारत’ शब्द द्वारा कोई भारत का इतिहास या भारत की कोई गाथा नहीं गाई गई है। क्योंकि वेदों में कोई इतिहास नहीं होता। परन्तु हमारे भारतीय शब्दों की महिमा क्या होती है, हमारे शब्द कितने अर्थ पूर्ण और भाव पूर्ण होते है उसका अनुभव आपको जरूर होगा।
आइए इसका भावार्थ समझते है।

‘भासृ दीप्तौ’ धातु से भारत शब्द बनता है अर्थात् प्रकाश या ज्ञान में रत रहने वाला ‘भारत’ कहलाता है।

हमारे गौरव और स्वाभिमान के प्रतीक ‘भारत’ शब्द को चारों वेदों में ढूंढने पर छः मन्त्रों में भारत शब्द मिलता है।

श्रेष्ठं यविष्ठ भारताग्ने द्युमन्तमा भर।
वसो पुरुस्पृहं रयिम्॥ – ऋग्वेद २/७/१

पदार्थ – हे (वसो) सुखों में वास कराने और (भारत) सब विद्या विषयों को धारण करनेवाले (यविष्ठ) अतीव युवावस्था युक्त (अग्ने) अग्नि के समान प्रकाशमान विद्वान् ! आप (श्रेष्ठम्) अत्यन्त कल्याण करनेवाली (द्युमन्तम्) बहुत प्रकाशयुक्त (पुरुस्पृहम्) बहुतों को चाहने योग्य (रयिम्) लक्ष्मी को (आ, भर) अच्छे प्रकार धारण कीजिये।

-त्वं नो असि भारताग्ने वशाभिरुक्षभिः।
अष्टापदीभिराहुतः॥ – ऋग्वेद २/७/५

पदार्थ – हे (भारत) सब विषयों को धारण करनेवाले (अग्ने) विद्वान् ! जो (वशाभिः) मनोहर गौओं से वा (उक्षभिः) बैलों से वा (अष्टापदीभिः) जिनमें आठ सत्यासत्य के निर्णय करनेवाले चरण हैं। उन वाणियों से (आऽहुतः) बुलाये हुए आप (नः) हम लोगों के लिये सुख दिये हुए (असि) हैं।सो हम लोगों से सत्कार पाने योग्य हैं।

य इमे रोदसी उभे अहमिन्द्रमतुष्टवम्। विश्वामित्रस्य रक्षति ब्रह्मेदं भारतं जनम्॥
– ऋग्वेद ३/५३/१२

पदार्थ – हे मनुष्यो ! (यः) जो (इमे) ये (उभे) दोनों (रोदसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी (ब्रह्म) धन वा ब्रह्माण्ड (इदम्) इस वर्त्तमान (भारतम्) वाणी के जानने वा धारण करनेवाले उस (जनम्) प्रसिद्ध मनुष्य आदि प्राणि स्वरूप की (रक्षति) रक्षा करता है जिस (इन्द्रम्) परमात्मा की हम (अतुष्टवम्) प्रशंसा करें उस (विश्वामित्रस्य) सबके मित्र की ही उपासना आप लोग करें।

तस्मा अग्निर्भारतः शर्म यंसज्ज्योक्पश्यात्सूर्यमुच्चरन्तम्।
य इन्द्राय सुनवामेत्याह नरे नर्याय नृतमाय नृणाम्॥
– ऋग्वेद ४/२५/४

पदार्थ – हे मनुष्यो ! (यः) जो (अग्निः) अग्नि के सदृश वर्त्तमान (भारतः) धारण करनेवाले का यह धारण करनेवाला (शर्म्म) गृह के सदृश सुख को (यंसत्) प्राप्त होवे वह (उच्चरन्तम्) ऊपर को घूमते हुए (सूर्य्यम्) सूर्य्यमण्डल को (ज्योक्) निरन्तर (पश्यात्) देखे (तस्मै) उस (नृणाम्) विद्या और उत्तमशीलयुक्त मनुष्यों के (नृतमाय) अत्यन्त मुखिया (नरे) नायक (नर्य्याय) मनुष्यों में कुशल (इन्द्राय) उत्तम ऐश्वर्य्यवान् के लिये (इति) ऐसा (आह) कहता है, उसको हम लोग (सुनवाम) उत्पन्न करें।

आग्निरगामि भारतो वृत्रहा पुरुचेतनः।
दिवोदासस्य सत्पतिः॥
– ऋग्वेद ६/१६/१९

पदार्थ – हे विद्वान् जनो ! जो (दिवोदासस्य) प्रकाश के देनेवाले का (भारतः) धारण करने वा पोषण करने और (वृत्रहा) मेघ को नाश करनेवाला (पुरुचेतनः) बहुत चेतन जिसमें वह (सत्पतिः) श्रेष्ठ स्वामी (अग्निः) अग्नि के सदृश तेजस्वी सूर्य्य (आ, अगामि) प्राप्त किया जाता है, उसका हम लोग सेवन करें।

उदग्ने भारत द्युमदजस्रेण दविद्युतत्।
शोचा वि भाह्यजर॥
– ऋग्वेद ६/१६/४५

पदार्थ – हे (भारत) धारण करनेवाले (अजर) जरा दोष से रहित (अग्ने) विद्वन् ! आप (अजस्रेण) निरन्तर (द्युमत्) प्रकाशवाले को (दविद्युतत्) प्रकाशित करते हो, उसके लिये आप (उत्, शोचा) अत्यन्त प्रकाशित हूजिये और (वि, भाहि) विशेष करके प्रकाशित करिये।

उदग्ने भारत द्युमदजस्रेण दविद्युतत्।
शोचा वि भाह्यजर॥ – सामवेद – १३८५
आचार्य रामनाथ वेदालंकार –
पदार्थ – हे (भारत) शरीर का भरण-पोषण करनेवाले, (अजर) अविनाशी (अग्ने) जीवात्मन् ! तुम (द्युमत्) शोभनीय रूप से (अजस्रेण) अविच्छिन्न तेज से (दविद्युतत्) अतिशय चमकते हुए (उत् शोच) उत्साहित होओ, (वि भाहि) विशेष यशस्वी होओ ॥

#आओ वेदों की ओर लौटें

Comment:

Kuponbet Giriş
betgaranti giriş
Teknik Seo
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betlike giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betebet giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betlike giriş
betparibu giriş
betebet giriş
norabahis giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
betnano giriş
parmabet giriş
parmabet giriş
betlike giriş
norabahis giriş
betovis giriş
betovis giriş
piabellacasino giriş
parmabet giriş
parmabet giriş
betovis giriş
casinomilyon giriş
casinomilyon giriş
casinomilyon giriş
milanobet giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
norabahis giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betebet giriş
betgaranti mobil giriş
parmabet giriş