प्रकृति से खिलवाड़ करता मनुष्य और उसके दुखों का वास्तविक कारण

images (91)

जीव को होने वाले दु:खों के कारण क्या हैं ?

जीवन में दुख कोई नहीं चाहता। सब सुख को तरसते हैं। यह अलग बात है कि सुख की चाह रखने वाला मानव दुख प्राप्ति के ही कार्यों में लगा रहता है। यह एक अबूझ पहेली बनी हुई है कि दुखों के मार्ग पर चलने वाला मनुष्य सुखों की कामना क्यों करता रहता है? यद्यपि मोक्ष के सामने सुखों की कामना भी बहुत घाटे का सौदा है, परंतु सुख को ही यदि व्यक्ति के जीवन का लक्ष्य मान लिया जाए तो उसमें भी वह सफलता प्राप्त नहीं कर पाता । उल्टे उसे दुख आ घेरते हैं तो हमें इस विषय पर चर्चा करनी ही चाहिए कि जीव को होने वाले दुखों के वास्तविक कारण क्या हैं ?


जीव को होने वाले दुखों के निम्न कारण :-
1 – भारतीय वैदिक चिंतन के अनुसार यदि विचार किया जाए तो पता चलता है कि आरंभ में मनुष्य रोग, दोष ,दुख दारिद्र्य से मुक्त था। न वह पापी था न रोगी।
वह विशुद्ध था, और ईश्वरीय तेज उस में विद्यमान था।

2- उस अवस्था में मनुष्य स्वयं अपने अपराध से, स्वच्छंदता और आज्ञाभंग से पतित हुआ और संसार का स्वैर्गिक सुख खो बैठा।

3 – उसने स्वयं अपनी योग्यता और उन्नति से न राज्य किया न शासन, परंतु अपराधों की वृद्धि की, जिससे रोग, दोष, दुख, दरिद्रता ने आ घेरा। विषय वासना से उत्पन्न हुई दास्तां से सारी दुर्गति हो गई।

4 वर्तमान वैज्ञानिक अन्वेषण ने जीवित पशुओं के शरीर काट काटकर आंख, कान ,हृदय, पेट आदि को निकाला। इन बेदर्द अपराधों के लिए वर्तमान विज्ञान उत्तरदाई है।

5 – विज्ञान बेदम है। भूकंप आने के पहले पशु पक्षी भाग जाते हैं ,परंतु तथाकथित विज्ञानवेत्ता मनुष्य को पता नहीं लगता। एक बार विज्ञानवादियों का कमीशन भी कुछ पता पा न सका और भूकंप आ गया।

6 – बीमारी पाप है ।यदि संसार में पाप न हो तो बीमारी भी न हो ।यह मानी हुई बात है कि मानसिक विकार अर्थात स्वार्थ, ईर्ष्या, द्वेष , अनुदारता और क्रोध आदि का भयंकर प्रभाव शरीर पर पड़ता है।

7 – मनुष्य के पापों का प्रभाव समस्त प्रकृति को दूषित कर देता है। मनुष्य ने उन्नति के नाम से प्रकृति को बिगाड़ दिया है ।जंगलों को काटकर वायु को दुर्गंध युक्त करके और शिकार खेलकर प्रकृति को अस्वाभाविक बना दिया है।

8 – संसार में समस्त मनुष्य अनेक प्रकार के रोगों से पीड़ित हहैं। पागलपन बढ़ रहा है, और आत्महत्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जाती हैं ।यदि भौतिक विज्ञान की उन्नति एकदम बंद कर दी जाए तो फिर परमेश्वर सहायता करें।

9 – क्या कभी किसी ने विचार किया है कि हम क्यों जीते हैं ? हमारे जीवन का क्या उद्देश्य है ?हम क्यों मरते हैं? संसार का मुख्य प्रयोजन क्या है? और परलोक क्या है?

10 – कला कौशल और व्यापार ने अपना एक नया ही मोड़ ले लिया है। नवीन आविष्कारों ने संसार को उलट दिया है। मनुष्य की दौड़ धूप इतनी बढ़ गई है उसे हम चिंताजनक अशांति कह सकते हैं ।
व्यापार ने संसार में एक लड़ाई कर दी है ।जैसी आज तक कभी नहीं हुई । व्यापारी रेलों , साइकिल और मोटरों व अन्य संसाधनों के द्वारा शहर शहर, पहाड़- पहाड़ ,दरिया – दरिया मारे – मारे फिरते हैं ,जहां यह साधन काम नहीं देते वहां वायु यानों द्वारा जाते हैं। इनको कहीं सुख नहीं। कौन ऐसा व्यापारी है जो रोगी और अशक्त नहीं ?स्नायु पीड़ा पृथ्वी का नरक ही है।

11 – प्रकृति और सभ्यता दोनों परस्पर विरोधी हैं, जो कभी एक नहीं हो सकते। प्राचीन काल में मिस्र, बेबीलोनिया, फिनिशिया, यूनान और रोम आदि ने सभ्यता का विस्तार किया, परंतु आज उनका कहीं पता नहीं है ।आज अनेक श्रमजीवी कारखानों के धुंए और भयंकर यंत्रों से अपना आरोग्य और स्वतंत्रता को रहे हैं।

12 – ऊंची जातियों, अधिकारियों और पूंजीपतियों ने अपनी शक्ति से निर्बल जातियों को कुचल डाला है।
मानसिक पाप से प्रकृति पर धक्का लगता है। जंगलों के काटने हवा और पानी के बिगाड़ने से भीतर ही भीतर प्रकृति में विकृति उत्पन्न हो जाती है।

13 – यदि मनुष्य के लिए पृथ्वी पर चलने की अपेक्षा हवा में उड़ना उत्तम होता तो उसके पंख अवश्य होते।

14 – बहुत से लोगों का विचार है कि मनुष्य प्रकृति की ओर नहीं लौट सकता। वह बुद्धि बल से प्रकृति को पहुंच जाएगा। किंतु पता नहीं यह लोग बुद्धि बल किसे कहते हैं? मनुष्य तो प्रकृति को छोड़कर बुद्धि वाद में चला गया ।अब वह बुद्धिवाद के द्वारा प्रकृति में कैसे आ सकता है? यह मनुष्य को कभी सुखी, निरोग और मृत्युंजय नहीं बना सकती।

15 – सभ्यता ने इसके पूर्व ऐसी उन्नति कभी नहीं की। इसका भी प्रत्याघात होगा , जो या तो इस सभ्यता को नष्ट कर देगा या प्रकृति और परमेश्वर तक पहुंच जाएगा।

16 – मनुष्य प्रकृति को अपना दास बनाकर सुख चाहता है ।परंतु वह इस मार्ग से दुखों की ओर जा रहा है ,क्योंकि उसने ईश्वरीय सृष्टि नियमों का भंग किया है।

17 – डार्विन के विकासवाद से उच्छृंखलता बढ़ी है, और मनुष्य जाति की बड़ी हानि हुई है। इस सिद्धांत से मनुष्य का मान सम्मान बहुत ही कम हो गया है।

18 – भौतिक और आध्यात्मिक सिद्धांत में बड़ा अंतर है ,दोनों परस्पर विरोधी हैं।

19 – जीवन संग्राम धीरे धीरे कम हो जाएगा ,परंतु यह तब तक नष्ट नहीं होगा जब तक भौतिक उन्नति का नाश न हो जाए और आध्यात्मिक जीवन फिर से आरंभ ना हो जाए।

20 जिसे पुन: ईश्वर प्राप्ति पर विश्वास होता है, वह भौतिक उन्नति के तंग मार्ग से निकलकर परमेश्वर के प्रकाश में मार्ग में आता है। यही सच्चा विज्ञान है ।
ऐसा करने से पुनर्जीवन और बल की वृद्धि होती है। और अंत में उसका मोक्ष हो जाता है ।
इसलिए लौटो ! लौटो !! प्रकृति की ओर लौटो ,और नीचे लिखे व्यवहार एवं उपायों से बरतो तभी परमेश्वर तुम पर प्रसन्न होगा और बिगड़ा काम बन जाएगा।

क्रमश:
( पंडित रघुनंदन शर्मा की पुस्तक ‘वैदिक संपत्ति’ से साभार)

  • देवेंद्र सिंह आर्य
    चेयरमैन : उगता भारत

Comment:

Kuponbet Giriş
betgaranti giriş
Teknik Seo
ikimisli giriş
grandpashabet giriş
bonus veren siteler
grandpashabet giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betlike giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet
betparibu giriş
vdcasino giriş
grandpashabet giriş
betlike giriş
betmarino giriş
betmarino giriş
betmarino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
ikimisli giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş