सगोत्र, सप्रवर एवं सपिण्ड विवाह से ख़ाप खफा

1डा0 इन्द्रा देवी
भारतीय विचारक ‘काम’ को मनुष्य की सहज और सर्वाधिक प्रबल प्रवृति मानते हैं। पुरूषार्थ में इसको मान्यता प्रदान की है। श्रृंगार के रसराजत्व की महत्ता भी यही है। समस्त संसारी भावों का समावेश एक मात्र ‘रति’ स्थायी भाव मेें है। मुक्त तृप्ति यदि अमर्यादित एवं पशु जीवन की परिचायक हैं, तो वहीं मर्यादित काम भावना मनुष्य की सृजनशीलता, सौन्दर्यता एवं पारस्परिक सहयोग का मूल आधार है। यौन सम्बन्धों को मर्यादित रूप प्रदान करने हेतु ही सम्भवत: सभ्यता के आदि छोर पर ही भारतीय ऋषियों द्वारा विवाह संस्कार प्रतिष्ठित हुआ। विवाह नर-नारी को पारिवारिक जीवन में प्रवेश करवाने वाली एक संस्था है। लगभग 250 समाजों के विवाह प्रयोजन के सन्दर्भ में अध्ययन करने से यह सार निकला है कि मानव समाज में विवाह के सामान्यत: तीन प्रमुख उद्ेश्य हैं-प्रथम-काम वासना की तृप्ति , द्वितीय आर्थिक सहयोग और तृतीय बालकों का पालन पोषण। विवाह करके सन्तान से मनुष्य अमरत्व पा जाता है। सन्तति, सन्तान, तनय आदि शब्दों के व्यवहार की मूल धातु ‘तन’ का ही विस्तार करना है। इस विस्तार रूप से ही मनुष्य अमरत्व पाता है। पुत्र प्राप्ति की कामना के पीछे भी मनुष्य निरन्तर वर्धित और निरन्तर जीवित रहना चाहता है। पशु पक्षियों में गर्भकाल अल्प और सन्तति संख्या अधिक होती है, किन्तु मनुष्य में गर्भ काल पर्याप्त लम्बा एवं सन्तति संख्या कम होती है। गर्भवती नारी का संरक्षण एवं पालन अत्यन्त जोखिम पूर्ण है। जन्म के उपरान्त भी शिशु पर्याप्त समय तक माँ के दूध पर आश्रित रहता है, पूरे समय माँ एवं शिशु की स्नेहपूर्ण देख-रेख अनिवार्य होती है। अत: बालकों के पालन-पोषण का उत्तरदायित्व ही विवाह में चयन एवं निषेध सम्बन्धी नियमों को स्थापित करने में सहायक है। हमारे समाज में विवाह एक वैयक्तिक घटना नहीं है, अपितु विवाह वह साधन भी है जिससे समाज का अस्तित्व भी सम्भव है। विश्व के अधिकांश देशों में विवाह एक समझौता है, किन्तु भारत में यह एक संस्कार हैै। यद्यपि वैदिक युग में पुरूष की भांति कन्याएं भी ब्रहमचर्याश्रम का पालन करती थीं, किन्तु कालक्रम में यह स्थिति परिवर्तित होती गई। कुछ अपवादों को छोड़कर आधुनिक-वैज्ञानिक युग में भी विवाह ही स्त्री को सामाजिक-धार्मिक क्षेत्र में पूर्णता प्रदान करता है।
प्रत्येक माता-पिता या अभिभावक वर्ग का यह कत्र्तव्य बन जाता है कि वह अपने लड़़के-लड़कियों का विवाह उचित नियम और समय पर करें। विवाह के बिना कुछ धार्मिक-सामाजिक कत्र्तव्य अधूरे हैं। वैदिक कर्मकाण्ड़ का सबसे प्रमुख अंग है-यज्ञ। विवाहिता पत्नी का साथ बैठना अनिवार्य है। पाणिनी ने ‘पत्नी’ शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार दी है-जो पति के साथ यज्ञ में बैठे, वहीं पत्नी है। कालिदास ‘कुमारसंभवम्’ में लिखते हैं कामदेव पर विजय पाने वाले शिवजी के सामने जब सप्तर्षि और अरून्धती आये, उस समय अरून्धती को देखकर उन्हें विवाह करने की इच्छा उत्पन्न हुई, क्योंकि धर्म सम्बन्धी क्रियाओं का मूल पतिव्रता स्त्री है। पुरूष जीवन में पत्नी की इस धार्मिक महत्ता के कारण ही स्त्री को ‘धर्मपत्नी’ के नाम से सम्बोधित किया जाता है। ‘दक्षस्मृति’ में भी प्रथम विवाहिता स्त्री को ‘धर्मपत्नि’ और द्वितीया को ‘रतिवर्धिनी’ कहा गया है। विवाह संस्कार की विधि समाप्ति पर पुरोहित, गुरूजन तथा प्रियजनों द्वारा वर-वधु को सन्तति लाभ का जो आशीर्वाद दिया जाता है, वह इस तथ्य का द्योतक है कि विवाह के लक्ष्यों में एक ‘रतिसुख’ भी है। ‘रति’ को विवाह का उद्ेश्य मानते हुए भी इसे सर्वाधिक निम्न (तीसरा) स्थान दिया गया है। प्रत्येक माता-पिता, अभिभावक एवं खाप पंचायत विवाह का उद्ेश्य या आदर्श सुनिश्चित करते समय इस बिन्दु पर सर्वाधिक चिन्तित दिखाई देते हैं कि उनकी कन्या मात्र ”रतिवर्धिनी” बनकर न रह जाये। वह विवाह द्वारा युवती को ‘सहधर्मिणी’ बनाना चाहते हैं। न पुरूष के बिना स्त्री समुचित रूप से कत्र्तव्य पथ पर चल सके, न स्त्री के बिना पुरूष।
मनु ने हिन्दू विवाह के आठ प्रकारों का उल्लेख किया है-ब्राह्म विवाह, दैव विवाह, आर्ष विवाह, प्राजापत्य विवाह, असुर विवाह, गन्धर्व विवाह, राक्षस विवाह एवं पैशाच विवाह। ब्राह्म विवाह को सर्वोत्तम स्थान मिला है। इससे उत्पन्न सन्तान समाज में सम्माननीय होती है। इस विवाह प्रकार से कन्या का विवाह करने वाले समाज में समादृत होते हैं। ब्राह्म विवाह में वर का चयन तथा विवाह का कार्यक्रम पिता या अभिभावक की ओर से होता है। वर के कुल, शील, विद्या , चरित्र एवं स्वास्थ्य आदि के सम्बन्ध में जान लेने पर कन्या का पिता वर को स्वयं निमंत्रित करके अपनी सुसज्जिता पुत्री को उपहार रूप में दे देता है।
‘सत्यार्थ प्रकाश’ में प्राजापत्य विवाह को भी श्रेष्ठ माना गया है। पिता द्वारा सहधर्माचरण की आज्ञा ही इस विवाह प्रकार का सबसे बड़ा वैशिष्ट्य है-‘तुम दोनों मिलकर साथ-साथ धर्माचरण करो’ इस मंत्र के साथ पिता उपयुक्त वर को अपनी कन्या देता है। वर्तमान युग में अधिकांशत: विवाह ब्राह्म अथवा प्राजापत्य कोटि में आते है। नगरों में शिक्षा के प्रसार के साथ युवक-युवतियों की सहशिक्षा एवं हमपेशा होने के कारण ‘गन्धर्व विवाह’ (प्रेम विवाह) भी प्रचलन में है। पारस्परिक प्रणय होने के कारण इस विवाह प्रकार को प्रशंसनीय श्रेणी में भी रखा गया है। वात्स्यायन ने इसे आदर्श विवाह कहा है। समय-समय पर इस विवाह के प्रति विचारकों की धारणा भी बदली है। इस विवाह में कामातुरता की प्रधानता होने के कारण अभिभावक वर्ग इसे हेय दृष्टि से देखने लगा। दुष्यंत- शकुन्तला का गन्धर्व विवाह, दुष्यंत की श्रृंगारप्रियता और स्त्री लोभ को ही दर्शाता है। धार्मिक संस्कारों से पूर्व ही कामतृप्ति होने के कारण यह आज भी ग्रामीण आंचलिक समाज में कम प्रचलित है।
विवाह में चयन एवं निषेधता के कुछ नियम हैं। सर्वाधिक प्रभावशाली नियम बहिर्विवाह के सम्बन्ध में है जिसके अन्तर्गत एक बड़े समूह के भीतर छोटे छोटे जो उपसमूह होते हंै उनके सदस्य परस्पर विवाह नहीं कर सकते। स्वामी दयानन्द सरस्वती ने सत्यार्थ प्रकाश में बहिर्विवाह के लिए अनेक तर्क प्रस्तुत किए हैं। जिनका महत्व शरीर विज्ञान भी मानता है। ‘सत्यार्थ प्रकाश’ चौधरी चरण सिंह जी का प्रिय ग्रंथ है, यह ग्रंथ किसान जीवन और खाप पंचायतों की आचार संहिता है। यह गं्रथ सगोत्र, सप्रवर और सपिण्ड विवाह करने पर निषेध करता हैं।
एक ही गोत्र के कन्या एवं वर के बीच विवाह निषिद्ध होता है। गोत्र का सम्बन्ध उन व्यक्तियों से था जो कि एक ही परिवार के घेरे में रहते थे । सम्पत्ति के हस्तान्तरण में भी प्राचीन नियम यही था । उस समय सम्पत्ति के सभी उत्तराधिकारी सगोत्र ही होते थे । इस प्रकार सगोत्र के अन्तर्गत वही व्यक्ति आते थे जो किसी एक सामान्य पूर्वज या मूल पुरूष या ऋ षि से सम्बन्धित थे।
गोत्र रक्त सम्बन्ध का सूचक है, तो सप्रवर आध्यात्मिक सम्बन्ध का। सप्रवर संस्कारों या ज्ञान के उस सम्प्रदाय की ओर संकेत करता है, जिससे व्यक्ति का सदैव सम्बन्ध रहा है। सगोत्र अथवा सप्रवर विवाह कर लेने पर सूत्रकारों तथा स्मृतिकारों ने विविध प्रकार के दण्ड का भी विधान किया है। नारी सशक्तीकरण की नारी योद्धा अपने ज्ञान वर्धन हेतु ‘बौधायान धर्म सूत्र’, ‘नारद स्मृति’, ‘पाराशर स्मृति’ , ‘गौतम धर्म सूत्र’ ‘याज्ञवल्क्य स्मृति’ एवं उस पर विज्ञानेश्वर की मिताक्षरा का अवलोकन करें। डा0 काणे के अनुसार सगोत्र और सप्रवर विवाह पर नियम तीसरी शताब्दी के बाद बहुत कठोर हो गया। नवी शताब्दी के बाद सगोत्र विवाह एक क्षमा न करने योग्य पाप समझा जाता था। आज भी विशेषकर महाराष्ट में इस सम्बन्ध में कठोर निषेध है। सन 1949 के हिन्दू विवाह निर्योगता निवारण अधिनियम से वैधानिक कठनाई दूर होने पर भी अपने गोत्र में आज भी विवाह न करने का नियम पालन किया जाता है।
हिन्दूओं में सपिण्ड विवाह का भी निषेध माना गया है। खाप पंचायतें इसे गाँव या गांवड़ कहकर विवाह विरोध करती हैं। जो दो व्यक्ति एक ही शरीर के अंशों से परस्पर सम्बद्घ होते हैं वे सपिण्ड कहलाते हंै। पिता के शरीर का अंश पुत्र में होने से पिता-पुत्र में सपिण्डता है। इसी प्रकार बाबा-पोता, मॉ-ं बेटा नाना दोहता आदि भी सपिण्ड हैं। याज्ञवल्क्य ने पिता की सात पीढी और माता की पांच पीढी तक ही सपिण्डता मानी है। मनु ने मामा मौसी की लड़कियों से विवाह करना बहुत बुरा समझा है। गौतम धर्मसूत्र में विवाह कर लेने पर व्यक्ति को जाति च्युत एवं पतित ठहराया है।
सगोत्र, सप्रवर एवं सपिण्ड विवाह निषेध पर आधुनिक शिक्षित वर्ग खापों पर खार खाये बैठा है। पंचायत फरमान के फ लस्वरूप योग्य लड़के लड़कियों को छोडऩा पड़ता है। पिता की सात और माता की पांच पीढिय़ों में विवाह नही हो सकता इस कारण जीवन साथी चुनने मेें कठनाईयां आती है। इस कठिनाई से लाभ उठाने वालो की संख्या भी कम नही है। लड़कों के पिता कन्या पक्ष से अधिक वर मूल्य की मांग करते है। यह वर मूल्य प्रथा बेमेल विवाह, बाल विवाह एवं नारी स्वातंत्र्य में बाधकता जैसी विसंगतियों को पैदा करती है।
खाप पंचायत का सगोत्रीय एवं सग्रामीण विवाह निषेध बहुत कुछ प्रासगिंक हंै। इन निषेधों का प्रमुख उद्देश्य सर्वमान्य भाई- बहन, माता – पुत्र, पिता – पुत्री एवं एक ही गांव के युवक युवतियों के बीच यौन सम्बन्धों को रोकना है। इसके पीछे ग्रामीण आर्थिक (सम्पति हस्तान्तरण) भी प्रमुख कारण है। यह किसान जीवन (खाप) का मानसिक सामंती पिछड़ापन नही अपितु एक दर्दनाक मजबूरी है। सगोत्र और गॉव के बन्धुओं में विवाह होने से इनमें अशोभन प्रेम व्यवहार पनपने का भय है। जो ग्रामीण मूल्यों के नैतिक पतन की पराकाष्ठा है। नगरीय जीवन में खाप पंचायतों को तुगलकी फरमान दर्शाया जाता है। जबकि इन निषेधों में खापों के देहाती जीवन के गम्भीर और सहज अनुभव का परिचय मिलता है।
हिन्दुओं में विवाह पंचांग होता है। पहले दो अंगों में वर कन्या के अभिभावकों में बातचीत होती है। तीसरा अंग कन्या दान है। जिसमें कन्या के पिता या संरक्षक हाथ में जल लेकर कन्या का दान करते हुए वर से कहता है-अमुक गोत्र में उत्पन्न, अमुक नाम वाली अलंकृत, इस कन्या को आप स्वीकार कीजिए। इस पर वर कहता है। मैं स्वीकार करता हूॅं। कानूनी दृष्टिकोण से भी हवन, पाणिग्रहण और सप्तपदी महत्वपूर्ण अंग हैं। यह कन्यादान नहीं समर्पण है।
वर की सेवा के लिए नही अपितु वर के माध्यम से सनातन शाश्वत धर्म की सेवा के लिए। चौथा अंग वर के द्वारा कन्या को स्वीकार करना है और पांचवां अंग विवाह को पूर्ण मानने के लिए अनिवार्य की गयी सप्तपदी है। इसी पंचांग शब्द से ‘पत्रा’ शब्द प्रचलन में आया है।

Comment:

Kuponbet Giriş
betgaranti giriş
Teknik Seo
betnano giriş
betnano giriş
vdcasino giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betebet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
betebet giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
parmabet giriş
grandpashabet giriş
betpas giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
pusulabet giriş
parmabet giriş
parmabet giriş
betnano giriş
betparibu giriş
grandpashabet giriş
betlike giriş
safirbet giriş
safirbet giriş
betparibu giriş
betlike giriş
parmabet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
parmabet giriş
betlike giriş
vaycasino giriş
betparibu giriş
klasbahis giriş
madridbet giriş
madridbet giriş
mariobet giriş
mariobet giriş
grandpashabet giriş
betlike giriş
parmabet giriş
grandpashabet giriş
betparibu giriş