प्राचीन काल से ही वास्तु एवं स्थापत्य का संगम रहा है राजस्थान

images (61)

 

विवेक भटनागर

ऐतिहासिक रूप से मेवाड़ या शिबि जनपद का भारतवर्ष की राजनीति में अत्यन्त व्यापक प्रभाव है। इस जनपद का वर्णन स्ट्रेबो ने अपनी इण्डिका में शिबोई जन के रूप में किया है। यहां पर स्थापत्य का विकास क्रम इतिहासिक रूप से दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से आगे जाता है। इस क्षेत्र में प्रस्तर युग के अवशेषों के बाद पूर्व सिन्धुकालीन निर्माण और सिन्धुयुग के समानान्तर सरस्वती और बनास की घाटी में विकसित शहरों की लम्बी परम्परा के बाद स्थापत्य के रूप में शुरूआत में चित्तौडग़ढ़ शहर से करीब 12 किलोमीटर उत्तर में बेड़च नदी तट पर ईसा पूर्व 5वीं सदी के करीब बसे एक नगर मझिमिका या मध्यमिका में ऊभ-दीवल (दीप-स्तम्भ) व दूसरा हाथीबाड़ा (नारायण वाटक) मिलता है। नगरी के उत्खननकर्ता पुराविद् प्रो. डी. आर. भण्डारकार इन्हें आम लोगों की नजर में लाए। इसके बाद दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में प्रतापगढ़ के निकट अंवलेश्वर में पवन के पुत्र सारिकुल के उत्तर दिशा के रक्षक भगवान विष्णु को समर्पित मंदिर और कीर्ति स्तम्भ से सम्बंधित अभिलेख प्राप्त होता है। इसकी पूरी शृंखला आगे चल कर सौलहवीं सदी में उदयपुर शहर में बनाए गए विष्णु को समर्पित जगदीश मंदिर पर आकर समाप्त होती है।

स्थापत्य का ऐसा चमत्कार एक क्षेत्र में या तो विजयनगर में देखा जा सकता है या फिर मेवाड़ में। मंदिरों के निर्माण से अपनी शक्ति के प्रदर्शन के अलावा राजाओं ने अपने समर्पण और सफलताओं को ईश्वर के प्रति समर्पित करने का प्रयास किया। इस कारण ये मंदिर स्थापत्य के सामान्य नमूने नहीं बनकर आमजन के लिए तीर्थ के रूप में स्थापित हो गए। शायद पत्थरों को गढ़ कर सुन्दर और जीवन्त मूर्तियों में बदलने की कला को स्थापत्य नाम भी इसीलिए दिया गया होगा। आज हम मेवाड़ में विकसित हुई स्थापत्य कला और उसके प्रमाणों की चर्चा कर रहे हैं ताकि मंदिरों के निर्माण के पीछे के सच को जान सकें।

मंदिर के पीछे का भाव और निर्माण का दर्शन
मन्दिर शब्द का निर्माण हुआ है मंद धातु से। संस्कृत की मंद धातु की व्यापक अर्थवत्ता है। मूलत: मंद में जड़ता का भाव है। ईश्वर की महिमा के अनुरूप ही मन्दिर भी महिमा वाला शब्द है। जड़ता का यही भाव मन्द से बने मन्दर में प्रमुखता से उभरा है, मन्दर पर्वत को भी सम्बोधित किया गया है। वैशेषिक दर्शन में महर्षि कणाद ने सूत्र रूप में इसका वर्णन लिखा। कणाद एक ऋषि थे और ये ‘उच्छवृत्तिÓ थे और धान्य के कणों का संग्रह कर उसी को खाकर तपस्या करते थे। इसी लिए इन्हें ‘कणाद या ‘कणभुक्त’ कहते थे। वहीं, यह भी माना गया कि कण अर्थात् परमाणु तत्व का सूक्ष्म विचार करने के कारण इन्हें ‘कणाद’ कहते हैं। किसी का मत है कि दिन भर ये समाधि में रहते थे और रात्रि को कणों का संग्रह करते थे। उन्होंने कणों को मन्दार पर्वत के समान स्थिर और इसमें ईश्वर के सभी गुणों की उपस्थित का प्रतिपादन भी किया। यह विचार आगे चलकर पाशुपत दर्शन का आधार भी बना। इस प्रकार के मन्द से मन्दार यानी पर्वत बनने के पीछे वही प्रणाली काम कर रही है, जिसने अचल शब्द में पर्वत की अर्थवत्ता स्थापित की। वैशेषिक दर्शन में ईश्वर को अपरिवर्तनीय बताते हुए जड़ या अचल भी बताया गया है। इस तरह मन्दार यानी पर्वत के समान बने ईश्वर के आवास को मन्दर या मन्दिर कहा गया है। इसका एक अन्य अर्थ प्राचीनकाल से ही मनुष्य ने पर्वतों की उपत्यकाओं में आश्रय तलाशने से भी निकाला गया। वेदों में यह कहा गया है कि पहाड़ों की गुफाओं में रहना और साधना करना श्रेष्ठ है। इसके बाद बौद्ध युग में अपने दार्शनिक के अस्थि और अन्य भौतिक अवशेषों को विशाल स्तूपों में संरक्षित करने की परम्परा प्रारम्भ हुई, धीरे-धीरे मंदिरों के निर्माण में परिवर्तित होने लगती है। दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के चित्तौड़ के निकट घोसुण्डा अभिलेख में विष्णु को समर्पित नारायण वाटक का निर्माण किया गया। इसमें विष्णु को समर्पित गरूड़ स्तम्भ भी निर्मित किया गया। यह वही समय है जब बौद्ध स्तूपों का भी बड़े पैमाने पर निर्माण हो रहा था। मंदिरों का वर्तमान स्वरूप गुप्त काल में देखने को मिलता है। इसके बाद छठी-सातवीं सदी में मंदिरों की नागर शैली में कई समावेश हुए और पर्वताकार मंदिरों का निर्माण किया गया और इनका स्वरूप रथाकार रखा गया। राजस्थान में गुप्तकालीन मंदिरों की एक लम्बी शाृंखला देखने को मिलती है। लेकिन मंदिरों का निर्माण अधिक प्रमुखता से गुर्जर-प्रतिहार साम्राज्य के दौरान हुआ। राजस्थान व आस पास के क्षेत्रों में छठवीं शताब्दी में गुर्जर-प्रतिहार अर्थात मारू-गुर्जर वास्तुकला का विकास हुआ। इस विधा का मूल विकास मूर्ति व वास्तुकला की मथुर शैली से होता है। यह मंदिर निर्माण की नागर शैली का एक स्वरूप है।

गुर्जर प्रतिहार शैली
मारू गुर्जर या गुर्जर प्रतिहार शैली के विकास से पूर्व राजस्थान में मिलने वाले सभी स्थापत्य एक साथ मौर्य युग से गुप्त युग तक मथुर शैली की देन है। इसके बाद सातवीं सदी के मध्य तक उत्तर भारत में प्रगट प्रबल क्षत्रीय वंश गुर्जर प्रतिहार ने मंदिरों का निर्माण करवाया। इस प्रकार राज्य में एक नई स्थापत्य शैली गुर्जर प्रतिहार का विकास हुआ। यह शैली अत्यन्त शानदार और स्थापत्य के उच्च मानकों का स्थापित करने वाली रही। प्राचीन काल से ही राजस्थान और गुजरात में समाजिक, नैतिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक पहलुओं में समानता रही है। राजस्थान का प्राचीन नाम मरुदेश था जबकि गुजरात को गुर्जरत्रा कहा जाता था। भारत की इन दो भौतिक इकाईयों की सीमा पर स्थित श्रीमाल शहर (जालौर या भीनमाल) में एक राजवंश का उदय हुआ। इसका नाम गुर्जर-प्रतिहार पड़ा।

मारु-गुर्जर शिल्प की संरचनाओं में राजस्थानी शिल्पकारों के परिष्कृत कौशल की गहरी समझ नजर आती है। इस वास्तुकला में दो प्रमुख शैलियां हैं महा-मारु और मारु-गुर्जर। पुरातत्वविद् एम.ए. ढाकी के अनुसार, महा-मारू शैली मुख्य रूप से मारवाड़, सम्पादलक्ष (सांभर), सूरसेन (करौली, भरतपुर क्षेत्र, इसे गोपालपाल के नाम से भी जाना गया है) और उपरमाला (मेवाड़ का अंतिम छोर बिजौलिया और टोंक में) के कुछ हिस्सों में विकसित हुई। जबकि मारू-गुर्जर मेदपाट (मेवाड़), गुर्जरदेस-अर्बुदा (आबू), गुर्जर देस-अनारता और गुजरात के कुछ क्षेत्रों में उत्पन्न हुई। जॉर्ज माइकल, एम.ए. ढाकी, माइकल डब्ल्यू. मिस्टर और यू.एस. मूर्ति जैसे मंदिर वास्तु शिल्प के विद्वानों का मानना है कि मारु-गुर्जर मंदिर वास्तुकला पूरी तरह से पश्चिमी भारतीय वास्तुकला है और उत्तर भारतीय मंदिर वास्तुकला से काफी अलग है। मारु-गुर्जर वास्तुकला और होयसला मंदिर वास्तुकला के बीच एक जुड़ाव है। इन दोनों शैलियों में वास्तुकला का मूर्तियों के साथ एक सा व्यवहार किया जाता है।

राजस्थान में वास्तुकला कई अलग-अलग प्रकार की इमारतों का प्रतिनिधित्व करता है। जिन्हें मोटे तौर पर या तो निजी आवास, मंदिर और जन उपयोगी निर्माण में वर्गीकृत किया जा सकता है। जन उपयोगी निर्माण में शहर, गांव, कुएं, बगीचे शामिल हैं। ये सभी प्रकार की इमारतें सार्वजनिक और नागरिक उद्देश्यों के लिए थी। घर और महल निजी आवास के लिए बनाए गए थे। मंदिरों का निर्माण धर्म और आस्था के अनुरूप था।

राजस्थान का वास्तुशिल्प की श्रीवृद्धि में उल्लेखनीय योगदान रहा है। मन्दिर वास्तु शिल्प के उद्भव का स्रोत वे छोटे-छोटे मन्दिर रहे हैं, जिन्हें प्रारम्भ में लोगों की धार्मिक अनुभूतियों को प्रोत्साहित करने के लिए बनवाया गया था। प्रारम्भ में बने मन्दिरों में केवल एक कक्ष होता था जिसके साथ दालान जुड़ा रहता था, चौथी और पांचवी सदियां स्थापत्य शिल्प के इतिहास में स्वर्ण युग की अगुआ रही है जब रुप सज्जा और धार्मिक निष्ठा संयोग ने भक्तों पर प्रभाव डाला। राजस्थान केवल अपनी कीर्ति कथाओं या त्याग और बलिदानों के कारण ही यशस्वी नहीं है अपितु अपने असंख्य समृद्धिशाली मन्दिरों के लिए भी प्रसिद्ध है। स्थापत्य शिल्प के क्षेत्र में राजस्थान ने स्वयं अपनी एक अत्युत्तम शैली को जन्म दिया जो ओसिया, किराडु, हर्ष, अजमेर, आबू, चन्द्रावती, बाडौली, गंगोधरा, मेनाल, चित्तौड़, जालौर और बागेंहरा के रमणीक मन्दिरों में दृष्टव्य है।

चौहानों, परमारों और कुछ अन्य राजपूत वंशों के महान निर्माताओं की संज्ञा दी जानी चाहिए और पृथ्वीराज विजय उनकी उपलब्धियों में मात्र जीते हुए युद्धों का ही नहीं वरन् उनके द्वारा निर्मित महान और श्रेष्ठ मन्दिरों के निर्माण की भी महान कहानी है। साथ-साथ बने हिन्दू और जैन मन्दिरों के निर्माण में स्थापत्य के सिद्धान्त एक-दूसरे के अत्यन्त अनुरुप थे। मुख्य संस्थापक मंदिरों की रुपरेखा और योजना बनाने के लिए उत्तरदायी होता था। इनका निष्पादन शिल्पी, स्थापक, सूत्र ग्राहिणी, तक्षक और विरधाकिन आदि कारीगर करते थे। यद्यपि इन संरचनाओं में एकरुपता दृष्टिगोचर होती है तथापि इन पर क्षेत्रीय प्रभाव पड़े बिना नहीं रह सका जो मंदिरों, गर्भग्रहों, शिखरों और छतों के अलंकरणों में दृष्टव्य है। राजस्थान को स्थापत्य शिल्प का उत्तराधिकारी सीधा गुहा काल से प्राप्त हुआ जो कला के नये कीर्तिमानों की प्रचुरता के कारण स्वर्ण युग माना जाता है। ओसिया के मन्दिर स्थापत्य कला के केत्र में अत्यधिक पूर्णता प्राप्त स्मारक हैं।

दीप स्तम्भ (ऊभ-दीवल) – नगरी, चित्तौडग़ढ़
चित्तौडग़ढ़ शहर से करीब 12 किलोमीटर उत्तर में बेड़च नदी तट पर ईसा पूर्व 5वीं सदी के करीब से एक नगर बसा हुआ था। इसका नाम मझिमिका या मध्यमिका था। इसे वर्तमान में नगरी (घोसुण्डी) के नाम से जाना जाता है। इसके ऐतिहासिक अध्ययन का काम सर्व प्रथम 1872 में एक ब्रिटिष अधिकारी ए.एल.सी. कार्लायल ने किया। इसके बाद वहां से पुरातत्वविदों को बड़ी मात्रा में शिबि जनपद के सिक्के प्राप्त हुए, जिससे यह प्रमाणित हुआ कि यह लम्बे समय तक इस क्षेत्र का प्रमुख नगर रहा। सिक्कों पर मझिमिका शिबि जनपद छपा हुआ है। नगरी में मेवाड़ के प्रसिद्ध इतिहासकार कविराज श्यामलदास ने दो प्रमुख निर्माण की जानकारी दी है। पहला ऊभ-दीवल (दीप स्तम्भ) और दूसरा हाथीबाड़ा (नारायण वाटक)। नगरी के उत्खननकर्ता पुरातत्वविद प्रो. डी. आर. भण्डारकार इन्हें आम लोगों की नजर में लाए। जब अकबर चित्तौड़ की चढ़ाई के लिए आया, तो उसने नारायण वाटक को हाथी बांधने के काम में लिया और इसी कारण यह हाथीबाड़ा के नाम से प्रसिद्ध हुई। हाथीबाड़ा एक चतुर्भुजाकार निर्माण है। इसकी लम्बाई 88.35 मीटर और चौड़ाई 44.20 मीटर है। इसमें प्रवेश के लिये दक्षिण दीवार पर षटकोण के आकार की विशाल पत्थरों से बनी आकृति है। पत्थरों को पॉलिश किया हुआ है। इसका आकार पिरामिड का है। ऊभ-दीवल हाथी बाड़ा से दो किलोमीटर दूर स्थित है। इसके आधार 4.44 मीटर लम्बा और 4.36 मीटर चौड़ा है। इसके निर्माण में धूसर रंग के चमकीले (पॉलिश वाले) पत्थरों का उपयोग किया गया है। इसमें एक के ऊपर एक 20 तहों में पत्थरों को जमाया गया है। शिखर का पत्थर जमीन पर गिर चुका है और वहीं पास में पड़ा है। डी.आर. भण्डारकर का मानना है कि ऊभ-दीवल कभी हाथी बाड़ा के पास ही था। जब अकबर की सेना ने यहां हाथियों को बांधा तो ऊभ-दीवल उसमें बाधा बना। सेना ने पाया कि इसे यहां से हटाया जा सकता है, तो उन्होंने उसे वर्तमान स्थान पर स्थापित कर दिया होगा। ऊभ-दीवल वास्तव में नारायणवाटक में स्थित वासुदेव संकर्षण के मंदिर से जुड़ा हुआ था। इसका प्रमाण उसके शीर्ष के पत्थर में बना गरुड़ है। जो अब ऊभ-दीवल के निकट ही पड़ा है। वास्तव में स्थानीय भाषा में इसे ऊभ-दीवल अर्थात् दीप स्तम्भ अज्ञानतावश कह दिया गया है। शीर्ष पत्थर पर गरुड़ की मूर्ति का अंकन यह प्रमाणित करता है कि यह मंदिर की गरूड़ ध्वजा रही होगी।

यहां से प्राप्त शिलालेख
हाथीबाड़ा से (घोसुंडी शिलालेख या हाथीबाड़ा शिलालेख) प्राप्त शिलालेख ब्राह्मी लिपि में संस्कृत के प्राचीनतम शिलालेख में से एक हैं। यह शिलालेख वैष्णव धर्म से सम्बन्धित हैं। घोसुण्डी का शिलालेख चित्तौड़ के निकट घोसुण्डी गांव में प्राप्त हुआ था। इस लेख में प्रयुक्त की गई भाषा संस्कृत और लिपि ब्राह्मी है। यह लेख कई शिलाखण्डों में टूटा हुआ है। इसके कुछ टुकड़े ही उपलब्ध हो सके हैं। इसमें एक बड़ा खण्ड उदयपुर संग्रहालय में सुरक्षित है। इस शिलालेख को सर्वप्रथम डॉ. भंडारकर ने पढ़ा था। यह राजस्थान में वैष्णव या भागवत संप्रदाय से संबंधित सर्वाधिक प्राचीन अभिलेख है। इस अभिलेख से ज्ञात होता है कि उस समय तक राजस्थान में भागवत धर्म लोकप्रिय हो चुका था। इसमें भागवत की पूजा के निमित्त शिला प्राकार बनाए जाने का वर्णन है। इसमें संकर्षण और वासुदेव के पूजागृह के चारों ओर पत्थर की चारदीवारी बनाने और गजवंश के सर्वतात द्वारा अश्वमेध यज्ञ करने का उल्लेख है।

कैटभरिपु (विष्णु) मंदिर-कठड़ावन, उदयपुर
उदयपुर-सिरोही हाई-वे (एन.एच.-76) पर शहर से करीब 20 किलोमीटर दूर कुण्डा गांव के निकट कठड़ावन स्थित कैटभरिपु (विष्णु) मंदिर अपने अभिलेख के लिए अधिक प्रसिद्ध है। कुण्डा ग्राम से प्राप्त अभिलेख मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी विक्रम संवत् 718 (661 ईस्वी सन्) का है। इसमें तेजस्वी शासक अपराजित का उल्लेख है। यह मारू-गुर्जर शैली के प्रारम्भिक मंदिरों में से एक है।

अभिलेख
अभिलेख के अनुसार अपराजित के सेनापति वैरिसिंह की धर्मपरायण पत्नी यशोमती ने संसार रूपी सागर को पार करने के लिए इस मंदिर को बनवाया था। यशोमती कृष्ण की परम् उपासक रही थी, जिस कारण अभिलेख में विष्णु के कृष्ण स्वरूप का बार-बार वर्णन किया गया है। इस लेख की रचना ब्रह्मचारी के पुत्र दामोदर ने की और यशोभट पुत्र वत्स ने उत्कीर्ण किया है। इसकी लिपि कुटिल और भाषा संस्कृत है। अभिलेख वर्तमान में राजकीय संग्रहालय, उदयपुर में संग्रहित व प्रदर्शित है। मंदिर के पीछे के भाग में पहाड़ी पर प्राचीन शहर के अवशेष दिखाई देते हैं, जो यहां बड़ी आबादी के बसे होने की सूचना देते हैं।

शैली और विन्यास
यह पंचायतन विष्णु मंदिर छाजनदार शैली में निर्मित है, जो तिथियुक्त अभिलेख का आरम्भिक उदाहरण है। इसके निर्माण में श्वेत संगमरमर का प्रयोग किया गया है। मुख्य भूमि से करीब 23 सीढिय़ां चढऩे के बाद मुख्य चौक आ जाता है। चौक से मंदिर के सभा मंडप में प्रवेश के लिए सीढिय़ों वाली षटकोणीय जगती बनी है। मुख्य मंदिर विशाल है, जिसका तलछंद विस्तार, सभामण्डप, कोली और गर्भगृह में विभक्त है। साथ ही उध्र्वछंद विस्तार जगती, वेदिका, कक्षासन पीठ, मण्डोवर, शिखर और आमलक में बंटा है। जगती (प्लेटफॉर्म) की ऊंचाई 12.5 फीट, लम्बाई 100 फीट और चौड़ाई 66 फीट है। प्लेटफॅर्म के दाहिने भाग के विशाल पत्थर पर दो पंक्ति का लेख है, जिसमें वि.सं. 1393 लिखा है। इससे पता चलता है कि सम्भवत: मंदिर का वि.सं. 1393 में जीर्णोद्धार किया गया हो या कोई बड़ा आयोजन यहां हुआ होगा। मंदिर के सभा मंडप के सामने गरुड़ की प्रतिमा के लिए एक मण्डप बना हुआ है।

देवकुलिकाएं
चारों दिशाओं में चार देव कुलिकाएं बनी हैं। मंदिर के दक्षिण पूर्व कोने पर देव कुलिका में विष्णु की प्रतिमा स्थापित है। उत्तर पूर्व की देवकुलिका में गणेश प्रतिमा प्रतिष्ठित है। दक्षिण पश्चिम कोने की देव कुलिका में सूर्य देव शोभायमान है। वहीं उत्तर पश्चिम कोने की देवकुलिका में माँ दुर्गा विराजित हैं। मंदिर के पीछे के भाग में एक कुण्ड भी विद्यमान है, जिसमें पानी भरा है।

सभा मण्डप
सभा मण्डप का प्रवेश द्वार (जगमोहन) पर दो खम्भे बने हुए हैं। उसके आगे सभा मण्डप 16 खम्भों पर टिका है। स्तम्भों के मध्य पत्थर के लिंटल लगे हैं और इन पर नीले रंग से चित्रकारी की गई है। सभा मण्डप की छत पर 12 छोटी प्रतिमाएं जड़ी हुई है। इनकी भाव-भंगिमा बांसुरी, मृदंग और सितार बजाते हुए है। मंदिर की दीवारों पर भी चित्रकारी की गई है। मंदिर का शिखर ईंटों से बना हैं व आंशिक क्षतिग्रस्त है। चतुष्कोणीय, अष्टकोणीय व वृत्ताकार स्तम्भों पर चतुष्कोणीय व पंचकोणीय बैठकी साधारण है। स्तम्भ का शीर्ष अलंकरण रहित हैं, लेकिन दण्ड छाज पर ग्रास मुकुट का अंकन महत्वपूर्ण है। नलीदार छाजन आरम्भिक शिल्प का बोध करवाते हैं।

गर्भगृह
मंदिर के गर्भगृह में विशाल प्लेटफॉर्म पर काले पत्थर से बनी विष्णु के अद्वितीय सौन्दर्य वाली मूर्ति प्रतिष्ठित है। विष्णु प्रतिमा स्थानक अवस्था में है। प्रतिमा के दोनों तरफ दो छोटी प्रतिमाएं हैं। मुख्य प्रतिमा के पास ही चतुर्भुज विष्णु की संगमरमर से बनी प्रतिमा रखी है। इसके द्वार की शाखा पर नाभि पुष्पित अलंकरण से सज्जित यक्ष की प्रतिमा मेवाड़ के शिल्प पर मथुरा शैली के प्रभाव को प्रदर्शित करती है। गर्भगृह के द्वार के स्तम्भ पर एक लेख उत्कीर्ण है। इस पर इसके सूत्रधार रामाजी सुतार, देवा सुतार व रूपनाथ अंकित है। मंदिर का शिखर ईंटों से निर्मित है।

इस विवरण से यह साफ हो जाता है कि राजस्थान का वास्तु शिल्प न केवल काफी विकसित रहा है, बल्कि यह हमारी उत्कृष्ट भवन निर्माण कला, विज्ञान और तकनीकी, तीनों का प्रतीक भी रहा है। यह हमारे देश की ज्ञान-विज्ञान परंपरा का एक प्रत्यक्ष उदाहरण है।

Comment:

vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
betnano giriş
vdcasino
Vdcasino giriş
vdcasino giriş
ngsbahis
ngsbahis
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark giriş
milanobet giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
kolaybet giriş
kolaybet
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
betgaranti giriş
casibom giriş
casibom giriş
vdcasino giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
runtobet giriş
runtobet giriş
runtobet giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş