बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के कुछ सरल उपाय

how-to-increase-immunity-of-kids-in-hindi.img (2)

 

वैद्य भगवान सहाय

हम स्वस्थ रहें, इससे अधिक चिंता हमें इस बात की होती है कि हमारे बच्चे स्वस्थ रहें। इसके लिए आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने कई प्रकार के अनुसंधान किए हैं। इनमें से एक है टीकाकरण। टीकाकरण का सीधा अर्थ है कि किसी बीमारी को होने से पहले ही रोकने का उपाय करना। इसे हम रोग प्रतिरोधक क्षमता के रूप में भी समझ सकते हैं। किसी भी मनुष्य की रोग प्रतिरोधक क्षमता का अर्थ है शरीर में अंदर पैदा होने वाले और बाहर से प्रवेश करने वाले जीवाणुओं, विषाणुओं, प्रतिजीवियों और रोग पैदा करने वाले अन्य कारकों से लड़ने की क्षमता। यह क्षमता जितना अधिक होगी, व्यक्ति उतना ही कम बीमार पड़ेगा। इस रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के लिए ही टीके लगाए जाते हैं।
हालांकि यह कोई नयी विधा नहीं है और न ही यह आविष्कार आधुनिक चिकित्सा विज्ञान का है। भारत में पहले से भी विविध प्रकार के टीकाकरण चलते रहे हैं। उदाहरण के लिए चेचक के लिए भारत में टीकाकरण की एक पद्धति प्रचलित थी, जिसे अंग्रेजी में वेरियोलेशन कहा गया था। यह पद्धति न केवल अंग्रेजी पद्धति से कहीं अधिक लाभकारी थी, बल्कि उसकी तुलना में अधिक सरल और न्यूनतम पीड़ादायक भी थी। वेरियोलेशन पद्धति का अध्ययन करके ही इंग्लैंड में चेचक के टीके की खोज की गई, हालांकि वह इसके समान प्रभावशाली नहीं था।
बहरहाल, आज दुनिया में टीकाकरण के दुष्प्रभाव सामने आने लगे हैं। अमेरिका में एक अध्ययन में पाया गया है कि वहां मिजिल्स यानी कि छोटी माता से होने वाली मौतों से अधिक मौतें उसके टीके के दुष्प्रभावों के कारण होती हैं। ऐसे अनेक शोध कार्यों के आधार पर आज अमेरिका जैसे विकसित देशों में टीकाकरण का विरोध प्रारंभ हो गया है। लोगों को यह अनुभव होने लगा है कि टीका अब केवल स्वास्थ्यरक्षा के लिए नहीं रह गया है, यह दवानिर्माता कंपनियों के लाभवृद्धि का साधन बन गया है और इसलिए अनावश्यक टीके भी लगाए जा रहे हैं। इसमें उनका साथ वे सरकारें दे रही हैं, जो बनती ही उनकी लॉबिंग के कारण हैं। यही कारण है कि टीके कारण होने वाली अधिकांश मौतों में टीके को दोषी ठहराने से चिकित्सक परहेज करते हैं। इस कारण टीकों से होने वाली मौतों की संख्या दिखने वाली संख्या से कहीं अधिक बड़ी है।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या फिर हम बच्चे को बीमार पड़ने के लिए छोड़ दें? क्या उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के लिए कोई और उपाय भी हैं? कोई ऐसा उपाय जो इस सामान्य टीकाकरण से हट कर हों, उससे अधिक प्रभावी हों और न्यूनतम खर्च में किए जा सकें? उत्तर है हाँ। आयुर्वेद में जैसे चेचक के टीकाकरण की व्यवस्था थी, उसी प्रकार नवजात शिशु की स्वास्थ्य रक्षा के लिए भी कई विधान किए गए थे। इन विधानों के प्रयोग से बच्चा स्वस्थ और निरोगी होता था। उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती थी।
आयुर्वेद की इन विधियों और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की विधियों में एक मौलिक अंतर है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान जहां रोग विशेष के लिए रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित करता है, वहीं आयुर्वेद शिशु की समग्र रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने का उपाय करता है। आधुनिक टीके केवल कुछेक रोगों से बचाव प्रदान करते हैं, वहीं आयुर्वेदिक पद्धति न केवल शिशु की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है, बल्कि उसे समस्त अंगों और धातुओं को पुष्टि भी प्रदान करती है। इस प्रकार शिशु केवल कुछ रोगों से ही लड़ने में सक्षम नहीं होता, बल्कि किसी भी प्रकार की प्रतिकूल परिस्थिति को झेलने में समर्थ बनता है।
आयुर्वेद में मनुष्य शरीर की रचना धातुओं से मानी गई है और उन धातुओं के पुष्ट होने से रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि होना साबित भी किया गया है। रोग प्रतिरोधक क्षमता का सकारात्मक पक्ष है बलवान होना। इसलिए आयुर्वेद में इसे बल कहा गया है। यह बल ही हमारी शारीरिक क्रियाओं के संपादन में हमें सहायता करता है और साथ ही हमें रोगी होने से भी बचाता है।
इसे आचार्य चरक ने तीन प्रकार का बताया है –
1. सहज बल (जन्मजात रोग प्रतिरोधक क्षमता)
2. कालज बल (आयु आधारित रोग प्रतिरोधक क्षमता)
3. व्यक्तिकृत बल (अर्जित रोग प्रतिरोधक क्षमता)
विशिष्ट आहार- रसायन द्रव्य, सदवृत्त, आचार रसायन आदि के निरन्तर अनुशीलन से जो बल प्राप्त किया जाता है यह युक्ति कृत बल कहा गया है। जो किसी व्याधि विशेष के लिए ही नही अपितु शरीर की स्वाभाविक रक्षणी शक्ति एवं जीवनीय शक्ति की वृद्धि करते हुए शारीरिक-मानसिक कार्याें को अक्षुण्ण बनाये रखते हुए सभी व्याधियों से मनुष्यों की रक्षा करते हैं। इसीलिए आयुर्वेद में रोगप्रतिरोधक क्षमता को व्यापक अर्थो में परिभाषित किया गया है।
‘‘रोगप्रतिरोधक क्षमतां नाम व्याधिबल विरोधित्वं व्याध्युत्पादक प्रतिबन्धकत्वमिति‘‘ अर्थात् उत्पन्न व्याधि के बल के विपरीत तथा अन्य रोगो को उत्पन्न नहीं होने देने की क्षमता को ही रोगप्रतिरोधक क्षमता कहा गया है।
सम्पूर्ण आयुर्वेद को आठ अंगों (अष्टांग आयुर्वेद) में विभाजित करते हुए रसायन नाम से एक विशिष्ट अंग माना गया है।
इसमें मनुष्यों को कैसे रोगमुक्त रखा जाए, इसका विधान विस्तार से मिलता हैं। यहां रसायन शब्द की व्याख्या करना उचित होगा। रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र, इन सातों को धातु कहा जाता है, क्योंकि ये शरीर को धारण करते हैं। ये धातु रस के रूप में रहते हैं। इनके प्राकृत स्थिति में रहने से ही मनुष्य स्वस्थ रह सकता है।
उक्त प्रशस्त रसरूपी धातुओं की प्राप्ति के उपाय को ही आयुर्वेद में रयायन कहा गया है। रसायन द्रव्य वयःस्थापन यानी आयु को स्थिर करने वाले, आयु-मेधा-बल बढ़ाने वाले तथा रोग निवारण में समर्थ माने गये हैं।
रसायन द्रव्य सभी प्राकृत गुणों से मुक्त होकर जठराग्नि या पाचक रस एवं धात्वग्नियों यानी कि मेटाबॉलिज्म को बलवान बनाते हुए रस रक्तादि धातुओं की पूर्ति करते हैं जो चिर स्थायी आरोग्य एवं बल प्रदान करते हैं। ये द्रव्य स्त्रोतों को शुद्ध करते हुए रस के वहन को सुचारु बनाते हैं तथा उत्तरवर्त्ती सभी धातुओं की पुष्ट करते हैं। आयुर्वेद के अनुसार रसायन सेवन की आवश्यकता बाल्यकाल तथा मध्यम आयु से ही होती है।
बालकों में उक्त सभी धातु अपरिपक्व होते है। अतः बालकों के स्वास्थ्य को बनाये रखने के लिए तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढाने के लिए धातुओं को अतिरिक्त पोषण की आवश्यकता होती है।
शरीर के वृद्ध होने के पर पोषक रस एवं उसके मार्गो (अयन) का ह्रास होता है और वह रस धातु आदि सभी धातुओं का पोषण आदि कार्य करने में पूर्णतः सक्षम नही होता। अतः शरीर निर्बल होता है। परन्तु रसायन द्रव्यों से रस का अयन (वहन) सुचारू होने से सभी धातुओं की पुष्टि ठीक से होती है तथा वृद्धावस्था आने ही नही पाती तथा यौवन स्थिर रहता है। इसलिए इन्हें वयःस्थापक भी कहा गया है।
अतः बुद्धिजीवी वर्ग, सम्पन्न वर्ग तथा चिन्तनशील व्यक्ति के लिए रसायन का उपयोग आवश्यक है। चिन्तनशील व्यक्तिओं द्वारा निरन्तर चिन्तन के कारण रसवाही स्त्रोत दूषित होकर शरीरिक-मानसिक रोगों को उत्पन्न करते है तथा बचाने के लिए रसायन सेवन आवश्यक है।
आयुर्वेद में जन्म से 16 वर्ष पर्यन्त बाल्यावस्था मानी गई हैै। इस अवस्था में शरीर की धातु की आवश्यकता होती है। शरीर कोमल, क्लेश सहने में असमर्थ, बल-वर्ण की से अपूर्ण होता है। ऐसे समय में बालकों की रोग प्रतिरोधक क्षमता अल्प होने से अनेकानेक रोगों से ग्रस्त होने की सम्भावना अधिक रहती है। इस वैज्ञानिक सत्य को दृष्टिगत रखते हुए आयुर्वेदाचायों अनेक निर्देश दिये हैं जो बालकों को बलवान बनाते हुए रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि करते हैं। इन्हें बाल रसायन के नाम से जाना जाता है।

प्राशन
आचार्यों के अनुसार नवजात को सर्वप्रथम शहद तथा घी चटाना चाहिए जिसे प्राशन कहा जाता है। तत्पश्चात् यथासम्भव शीघ्रातिशीघ्र माता का दूध पिलाना प्रारम्भ कर देना चाहिए। व्यावहारिक दृष्टि से यह विधान बालक के लिए आवश्यक प्रारंभिक पोषण की पूर्ति करता है, क्योंकि मधु ग्लूकोज तथा प्रोटीन का प्रचुर स्त्रोत है और आवश्यक पर्याप्त ऊर्जा बालको को उपलब्ध करा देता है। यह बालक के पोषण की दृष्टि से मील का पत्थर सिद्ध होती है
फल प्राशन
पाँच मास तक पूर्णतः माता के दूध के सेवन के बाद आचार्यों ने फल प्राशन का विधान किया है। इसमें धार्मिक अनुष्ठान के साथ शिशु को फलों का रस पिलाया जाता है ताकि बढ़ते हुए बालक को अतिरिक्त विटामिन तथा लौहतत्व आदि सूक्ष्म पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा मिले।
बालक के एक वर्ष का होने पर अन्न प्राशन संस्कार किया जाना चाहिए। इस संस्कार के बाद बालकों को दूध, फल तथा अन्न का सेवन प्रारम्भ कराया जाता है, जो बालक की उचित विकास के लिए आवश्यक है।
लेहन
बालकों के स्वास्थ्य संवर्धन हेतु औषधियों को चटाना लेहन कहा जाता है।
बालरोग के आधार ग्रंथ काश्यप संहिता में इस हेतु एक अलग अध्याय का उल्लेख मिलता है। कश्यप कहते हैं कि बालकों का रोगों एवं निरोगी होना लेहन पर ही निर्भर है। यह लेहन के महत्व को प्रदर्शित करता है। आचार्यों ने बालकों की मेधा-बृद्धि शरीर एवं रोग प्रतिरोधक क्षमता की वृद्धि के लिए अनेक लेहन योगों का वर्णन किया है जिनमें मुख्य इस प्रकार हैं।
स्वर्ण प्राशन
मधु एवं घृत में स्वर्ण शलाका को हिलाकर बालक को चटाना स्वर्ण प्राशन कहलाता है। यह मेघा-अग्नि तथा बल को बढ़ाने बाला है और आयु में वृद्धि करने वाला है। इसका एक मास तक लगातार प्रयोग करने से बालक बुद्धिमान तथा लगातार छह मास तक प्रयोग करने से बालक श्रुतधर हो जाता है। ऐसा आचार्य कश्यप का मत है।
इसी निर्देश को ध्यान में रखकर आजकल कई स्थानों पर स्वर्ण बिन्दुप्राशन नाम से लेहन किया जाता है। यह पुष्य नक्षत्रा में किया जाता है।
स्वर्ण बिन्दु प्राशनः
स्वर्ण भस्म 100 ग्राम
बचा, गुडूची, मुलेठी, ब्रास्मी, प्रत्येक 2.5 ग्राम (घनसत्व)
मधु – 250 गा्रम
गौधृत – 125 ग्राम
मात्रा – 4 बूंद प्रतिमास पुष्य नक्षत्रा में 6 मास तक।
ब्राह्मी, मण्डूक पर्णी, गिफजा, चित्राक, वचा, शतपुष्पी, शतावरी, दंती, नागबला, निशोथ, में से कोई एक मधु और घृत के साथ प्रयोग करने से बालक शारीरिक एवं मानसिक रूप स्वस्थ रहता तथा बुद्धि की वृद्धि होती है। निम्न लेहन औषध योग बाजार में भी उपलब्ध हैं –
1. कल्याण घृत
2. पंचगव्य घृत
3. ब्राह्मी घृत
4. संवर्धन घृत
5. सारस्वत घृत
6. अष्टांग घृत
7. वचादि घृत
आचार्य सुश्रुतोक्त लेहन योग
1. स्वर्ण भस्म नागरमोथा, वचा, घृत-मधु से
2. स्वर्ण भस्म, मत्स्याक्षक, शंखपुष्पी, मधु और घृत से
3. स्वर्ण भस्म, अर्कपुष्यी, वचा मधु और घृत से
4. स्वर्ण भस्म, श्वेत दूर्वा, कैडर्य, घृत के साथ
यहां स्वर्ण जीवाणुरोधी है तथा संक्रमण को रोकता है। मधु, परागयुक्त होने से ऐसे बालकों को व्याधि क्षमत्व प्रदान करता है जिन्हें पराग से एलर्जी के विपरीत होती है।
मधु एवं घृत सम मात्रा में विरूद्ध माने गये हैं जिससे बालक में अनुर्जता, एलर्जी के विरूद्व बाल में प्रतिरोधी तंग उत्पन्न हो जाता है। मधु के हरमिन नामक तत्व होता है जो प्राण वह संस्थान के रोगों के प्रति प्रतिरोधी क्षमता विकसित करता है। घृत उच्च पोषक तत्वों से युक्त है जो बालक पचने के बाद दो उष्मा तथा ऊर्जा देता है जो शरीर को तापमान नियंत्राण करने में सहायक है।
सामान्यतः बालक माता के दूध या अन्य स्तन्य के रूप में केवल मधुर रस का ही सेवन करता है जो कि आयुर्वेद सिद्वान्त से उचित नहीं क्योंकि एक रस का सेवन दुर्बलता का कारण माना गया है। इन लेहन द्रव्यों के माध्यम से बालक को अन्य रसों की भी प्राप्ति हो जाती है। इसप्रकार यदि आयुर्वेद के नियमों का पालन किया जाए तो बच्चों को टीका दिलवाने की जरूरत नहीं रहेगी।

Comment:

Kuponbet Giriş
betgaranti giriş
Teknik Seo
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betlike giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betebet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betlike giriş
betparibu giriş
betebet giriş
norabahis giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
betnano giriş
parmabet giriş
piabellacasino giriş
betovis giriş
casinomilyon giriş
casinomilyon giriş
casinomilyon giriş
milanobet giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
norabahis giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betebet giriş
betgaranti mobil giriş
parmabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
savoybetting giriş
parmabet giriş
jojobet giriş
betlike giriş
betcup giriş
hitbet giriş
norabahis giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
jojobet giriş