सम्पूर्ण विश्व में भारत का सम्मान ऊंचा किया था महाराजा रणजीत सिंह ने

IMG-20201130-WA0024

 

विवेक भटनागर

कम्युनिस्टों से लेकर राष्ट्रवादियों तक सभी एक स्वर से भारत की हजार वर्ष की गुलामी की बात सरलता से कह जाते हैं। बारहवीं शताब्दी में मोहम्मद गोरी के दिल्ली पर कब्जा करने से लेकर वर्ष 1947 में अंग्रेजों के जाने तक के काल को सभी सहज भाव से भारत की गुलामी का काल मान लेते हैं। परंतु वे यह भुला देते हैं कि भारत एक विशाल देश है और पूरे भारत पर कब्जा न तो कभी मोहम्मद गोरी का हुआ और न ही औरंगजेब का। अंग्रेज ही इस काम में सफल हो पाए थे। महाराणा प्रताप, राजा कृष्णदेव राय, राजा समुदिरी से लेकर छत्रापति शिवाजी और राजा रणजीत सिंह तक बड़ी संख्या में हिंदू राजा हुए जिन्होंने न केवल इस पूरे कालखंड में स्वतंत्रा रह कर शासन चलाया, बल्कि वे मुस्लिम कब्जों के विरुद्ध भी जबरदस्त युद्ध करते रहे। इनमें से अनेक राजाओं ने तो यूरोपीय आक्रांताओं से भी युद्ध जीता। राजा रणजीत सिंह इनमें एक प्रमुख नाम है।


17वीं सदी केे भारतीय इतिहास में अंग्रेजों और पठानों को एक साथ वश में कर सिख सत्ता को उत्तर भारत में अपने चरम पर पहुंचाने वाले महाराजा रणजीत सिंह ने गजनवियों और अन्य तुर्कों केे द्वारा लूटे गए भारतीय सम्मान को लौटाने का सफलतम प्रयास किया। उसमें रणजीत सिंह एक हद तक सफल रहे। उन्होंने उत्तर भारत में कंधार और काबूल तक हिन्दू साम्राज्य को पुनः स्थापित करने का काम किया। रणजीत सिंह ने हिंदुओं और सिखों से वसूले जाने वाले जजिया पर भी रोक लगाई। कभी भी किसी को सिख धर्म अपनाने के लिए विवश नहीं किया। उन्होंने अमृतसर के हरमिंदर साहिब गुरूद्वारे में संगमरमर लगवाया और सोना मढ़वाया, तभी से उसे स्वर्ण मंदिर कहा जाने लगा। वे शेर-ए पंजाब के नाम से प्रसिद्ध महाराजा रणजीत न केवल पंजाब को एक सशक्त सूबे के रूप में एकजुट रखा, बल्कि अपने जीते-जी अंग्रेजों को अपने साम्राज्य के पास भी नहीं फटकने दिया। महाराजा रणजीत खुद अनपढ़ थे, लेकिन उन्होंने अपने राज्य में शिक्षा और कला को बहुत प्रोत्साहन दिया। बेशकीमती कोहिनूर हीरा महाराजा रणजीत सिंह के खजाने की रौनक था।
जीवन परिचय
रणजीत सिंह का जन्म सन 1780 में गुजरांवाला (अब पाकिस्तान) के जट्ट सिख महाराजा महासिंह के घर हुआ था। उन दिनों पंजाब पर सिखों और अफगानों का राज चलता था, जिन्होंने पूरे इलाके को कई मिसलों में बांट रखा था। रणजीत के पिता महासिंह सुकरचकिया मिसल के शासक थे। पश्चिमी पंजाब में स्थित इस इलाके का मुख्यालय गुजरांवाला में था। छोटी सी उम्र में चेचक की वजह से रणजीत सिंह की एक आंख की रोशनी जाती रही। महज 12 वर्ष के थे, जब पिता चल बसे और राजपाट का सारा बोझ इन्हीं के कंधों पर आ गया। 12 अप्रैल 1801 को रणजीत ने महाराजा की उपाधि ग्रहण की। गुरु नानक के एक वंशज ने उनकी ताजपोशी संपन्न कराई। उन्होंने लाहौर को अपनी राजधानी बनाया और सन् 1802 में अमृतसर की ओर रूख किया। सन 1839 में महाराजा रणजीत का निधन हो गया। उनकी समाधि लाहौर में बनवाई गई, जो आज भी वहां कायम है। उनकी मौत के साथ ही अंग्रेजों का पंजाब पर शिकंजा कसना शुरू हो गया। अंग्रेज-सिख युद्ध के बाद 30 मार्च 1849 में पंजाब ब्रिटिश साम्राज्य का अंग बना लिया गया और कोहिनूर महारानी विक्टोरिया के हुजूर में पेश कर दिया गया।
कोहिनूर भारत लौटा
जमान शाह अहमद शाह अब्दाली के बेटे तैमूर शाह का बेटा था, जिसका भाई था महमूद शाह। महाराजा रणजीत सिंह स्वयं चाहते थे कि वे कश्मीर को अता मोहम्मद से मुक्त करवाएं। सुयोग आने पर महाराजा रणजीत सिंह ने कश्मीर को आजाद करा लिया। उनके दीवान मोहकमचंद ने शेरगढ़ के किले को घेर कर वफा बेगम के पति शाहशुजा को रिहा कर वफा बेगम के पास लाहौर पहुंचा दिया। राजकुमार खड्गसिंह ने उन्हें मुबारक हवेली में ठहराया। पर वफा बेगम अपने वादे के अनुसार कोहिनूर हीरा महाराजा रणजीत सिंह को भेंट करने में विलम्ब करती रही। यहां तक कि कई महीने बीत गए। जब महाराजा ने शाहशुजा से कोहिनूर हीरे के बारे में पूछा तो वह और उसकी बेगम दोनों ही बहाने बनाने लगे। जब ज्यादा जोर दिया गया तो उन्होंने एक नकली हीरा महाराजा रणजीत सिंह को सौंप दिया, जो जौहरियों के परीक्षण की कसौटी पर नकली साबित हुआ। रणजीत सिंह क्रोध से भर उठे और मुबारक हवेली घेर ली गई। दो दिन तक वहां खाना नहीं दिया गया। एक जून, 1813 को महाराजा रणजीत सिंह शाह शुजा के पास आए और फिर कोहिनूर के विषय में पूछा। धूर्त शाह शुजा ने कोहिनूर अपनी पगड़ी में छिपा रखा था। किसी तरह महाराजा को इसका पता चल गया। अतः उन्होंने शाह शुजा को काबुल की राजगद्दी दिलाने के लिए गुरुग्रंथ साहब पर हाथ रखकर प्रतिज्ञा की। फिर उसे पगड़ी-बदल भाई बनाने के लिए उससे पगड़ी बदल कर कोहिनूर प्राप्त कर लिया। पर्दे की ओट में बैठी वफा बेगम महाराजा की चतुराई समझ गईं। अब कोहिनूर महाराजा रणजीत सिंह के पास पहुंच गया था और वे संतुष्ट थे कि उन्होंने कश्मीर को आजाद करा लिया था। उनकी इच्छा थी कि वे कोहिनूर हीरे को जगन्नाथपुरी के मंदिर में प्रतिष्ठित भगवान जगन्नाथ को अर्पित करें। हिन्दू मंदिरों को मनों सोना भेंट करने के लिए वे प्रसिद्ध थे। काशी के विश्वनाथ मंदिर में भी उन्होंने अकूत सोना अर्पित किया था। परंतु जगन्नाथ भगवान (पुरी) तक पहुंचने की उनकी इच्छा कोषाध्यक्ष बेलीराम की कुनीति के कारण पूरी न हो सकी।
सोमनाथ के द्वार आए काबुल से
11वीं सदी में महमूद गजनवी ने सौराष्ट्र के सोमनाथ मंदिर को लूटा था। इस दौरान वह मंदिर के चंदन से बने दरवाजे भी साथ ले गया। ये दरवाजे 12वीं सदी में काबूल लाए गए। 1835-40 के बीच जब महाराजा रणजीत सिंह ने काबूल पर अपना अधिकार किया तो उसने वहां के शासक शाह शूजा से ये दरवाजे वापस ले लिए। तब से ये ऐतिहासिक दरवाजे अमृतसर में स्वर्ण मंदिर का एक हिस्सा रहे हैं। ये दरवाजे चन्दन आधार व चांदी और हाथीदांत नक्काशी और सोने के शिकंजे वाले हैं। परंतु सिख समुदाय ऐसा नहीं मानता है।
पहली आधुनिक भारतीय सेना
सिख खालसा सेना गठित करने का श्रेय भी उन्हीं को जाता है। उनकी सरपरस्ती में पंजाब अब बहुत शक्तिशाली सूबा था। इसी ताकतवर सेना ने लंबे अर्से तक ब्रिटेन को पंजाब हड़पने से रोके रखा। एक ऐसा मौका भी आया जब पंजाब ही एकमात्रा ऐसा सूबा था, जिस पर अंग्रेजों का कब्जा नहीं था। इसके लिए उन्होंने फ्रांसीसी सैन्य अधिकारियों को सेना के प्रशिक्षण के लिए रखा। सैनिकों को आधुनिक बंदूक और तोप चलाने के प्रशिक्षण के साथ ही नियमित ड्रिल भी कराई जाती थी। उनकी कार्यपद्धति को देख ब्रिटिश इतिहासकार जेटी व्हीलर ने दावा किया कि अगर वह एक पीढ़ी पुराने होते, तो पूरे हिंदूस्तान को ही फतह कर लेते।
रणजीसिंह की सफलता
महाराजा रणजीत ने अफगानों के खिलाफ कई लड़ाइयां लड़ीं और उन्हें पश्चिमी पंजाब की ओर खदेड़ दिया। अब पेशावर समेत पख्तून क्षेत्रा पर उन्हीं का अधिकार हो गया। 11वीं सदी के बाद यह पहला मौका था जब पख्तूनों पर किसी हिन्दू ने राज किया। उसके बाद उन्होंने पेशावर, जम्मू कश्मीर और आनंदपुर पर भी अधिकार कर लिया। सन् 1798 ई. में जमान शाह के पंजाब से लौट जाने पर उन्होने लाहौर पर अधिकार कर लिया। धीरे-धीरे सतलज से सिंधु तक, जितनी मिस्लें राज कर रही थीं, सबको उसने अपने वश में कर लिया।
सतलज और यमुना के बीच फुलकियों मिस्ल के शासक राज्य कर रहे थे। सन् 1806 ई. में रणजीतसिंह ने इनको भी अपने वश में करना चाहा, परंतु सफल न हुए। इसके बाद उन्होंने पंजाब के दक्षिणी, पश्चिमी और उत्तरी भागों पर आक्रमण करना प्रारंभ किया और दस वर्ष में मुल्तान, पेशावर और कश्मीर तक अपने राज्य को बढ़ा लिया। रणजीतसिंह ने पेशावर को अपने अधिकार में अवश्य कर लिया था, किंतु उस सूबे पर पूर्ण अधिकार करने के लिए उसे कई वर्षों तक कड़ा संघर्ष करना पड़ा था। वह पूरे पंजाब का स्वामी बन चुकाय और उसे अंग्रेजों के हस्तक्षेप का सामना नहीं करना पड़ा। परंतु जिस समय अंग्रेजों ने नैपोलियन की सेनाओं के विरुद्ध सिक्खों से सहायता मांगी थी, उन्हें प्राप्त न हुई। 1802, 1806 और 1810 ई. में मुल्तान पर चढ़ाई की और अधिकार कर लिया। काबूल के शाह शूजा से संधि करके अपने यहां रखा और उससे एक गिलास पानी के बदले कोहेनूर हीरा देने पर मजबूर कर दिया। 1811 ई. में काबूल के शाह महमूद के आक्रमण की बात सुनकर और यह जानकार कि महमूद का इरादा काश्मीर के शासक पर आक्रमण का है, उसने काश्मीर पर आक्रमण कर दिया ताकि महमूद को वापस जाना संभव हो जाए और उसकी मित्राता भी इसे मिल जाए।
काश्मीर के बाद इसने पेशावर पर 1822 में चढ़ाई कर दी, यार मुहम्मद खां अफगानियों का नेतृत्व करता हुआ बहुत बहादुरी से लड़ा लेकिन अंत में पराजित हुआ। इस युद्ध में सिक्खों का भी बड़ा नुकसान हुआ। 1838 में पेशावर पर रणजीतसिंह के अधिकार से भयभीत होकर दोस्त मुहम्मद खां काबुल नरेश बहुत भयभीत हुआ और रूस तथा ईरान से दोस्ती कर ली। इस बात को ध्यान में रखकर अंग्रेजों ने स्वयं रणजीतसिंह तथा शाहशुजा के साथ एक त्रिगुटसंधि कराई। महाराजा रणजीतसिंह अस्वस्थ हो रहे थे। 1838 में उन्हें लकवा हो गया, उपचार किया गया और अंग्रेज डाक्टरों ने भी इलाज किया, लेकिन 27 जून 1839 ई. को उनका निधन हो गया।

Comment:

betpark giriş
betgaranti giriş
bettilt giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
vdcasino giriş
pokerklas giriş
pokerklas giriş
supertotobet giriş
hititbet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
supertotobet giriş
Bettilt Giriş
Supertotobet Giriş
Vdcasino Giriş
supertotobet giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
hititbet giriş
Hititbet Giriş
hititbet giriş
betorder giriş
betorder giriş
betorder giriş
hititbet giriş
betmatik
betkom
betpark giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betkom giriş
betmatik giriş
betpark giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
betpark giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
kralbet giriş
kralbet giriş
betorder giriş
betine giriş
xslot giriş
timebet giriş
roketbet giriş
timebet
timebet
roketbet
roketbet
vaycasino giriş
bettilt giriş
betine giriş
betine giriş
xslot giriş
xslot giriş
bettilt giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
Hititbet Giriş
Hititbet Giriş
xslot giriş
Hititbet Giriş
timebet
meritking giriş
meritking
norabahis
norabahis
meritking giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş