आयुर्वेद में शल्य चिकित्सा के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं

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भारत के पुनरुत्थान की ओर सरकार के बढते कदम
खबर है कि भारत सरकार अब स्वास्थ्य-चिकित्सा विषयक उच्च-शिक्षा  को
युरोपियन मेडिकल साइंस की गिरफ्त से मुक्त करने और प्राचीन भारतीय
ज्ञान-विज्ञान के विस्तार का मार्ग प्रशस्त करने की दिशा में भी एक बहुत
बडा कदम उठा चुकी है । देश में अब तक शल्य-चिकित्सा (सर्जरी) पर लेवल और
केवल ‘मेडिकल साइंस’ के एलोपैथिक डॉक्टरों का ही एकाधिकार कायम रहा है;
लेकिन सरकार ने अब यह अधिकार आयुर्वेद के वैद्यों को भी दे दिया है कि वे
आवश्यकतानुसार अपनी पद्धति से अपने मरीजों का सर्जरी ऑपरेशन भी कर सकते
हैं। अब आयुर्वेद के स्नातकोत्तर छात्रों को भी शल्य-चिकित्सा का
आयुर्वेदिक प्रशिक्षण दिया जाएगा ; उसी प्रकार से जैसे मेडिकल साइंस के
छात्रों को सर्जरी का प्रशिक्षण दिया जाता रहा है । इसके लिए बाकायदा
आयुर्वेदिक शिक्षा का पाठ्यक्रम तैयार किया जा रहा है । सेन्ट्रल कॉउंसिल
ऑफ इण्डियन मेडीसिन की ओर से यह स्वीकइति दे दी गई है और तत्सम्बन्धी
निर्देशिका भी जारी कर दी गई है ।
‘आयुर्वेद में सर्जन’ की इस सरकारी पहल का एलोपेथिक डाक्टर कड़ा विरोध
कर रहे हैं। उनका कहना है कि यदि आयुर्वेदिक वैद्यों को शल्य-चिकित्सा
करने का अधिकार दे दिया गया तो देश में चिकित्सीय अराजकता फैल जाएगी।
हॉलाकि सरकार ने अभी वैद्यों को केवल मुख्मण्डल (आंख-कान-नाक-गला) हड्डी
और पेट की शल्य-चिकित्सा का ही अधिकार देने की पहल की है ; लेकिन इतने
मात्र से ही एलोपैथिक डॉक्टर ‘लाल-पीले’ होते दिख रहे हैं । ऐसा इस कारण
क्योंकि उनकी अनापशनाप कमाई का मार्ग अब बन्द होने जा रहा है । वे लोग
जिस अराजकता की बात बता रहे हैं सो तो दरअसल उन्हीं के द्वारा एलोपथिक
चिकित्सा-क्षेत्र में आज सर्वत्र कायम है और उनकी इफरात कमाई का जरिया
बना हुआ है । ऐसे में डॉक्टरों की ‘शल्य- मनमानी’ से पीडित लोग तो यह भी
चाह रहे हैं कि वैद्यों को दिल-दिमाग व कैंसर की बीमारियों में भी
‘शल्य-चिकित्सा’ का अधिकार मिलना चाहिए ।
अंग्रेजी-मैकाले पद्धति की शिक्षा से ‘अभारतीय’ युरोपियन मेडिकल
साइंस पढ कर डॉक्टर बने जो लोग वैद्यों को शल्य-चिकित्सा का अधिकार दिए
जाअने काअ विरोध कर रहे हैं उन्हें शायद यह मालूम नहीं है कि एलोपैथिक
चिकित्सा-पद्धति का ईजाद होने के हजारों साल पहले से ही भारत की
आयुर्वेदिक चिकित्सा-पद्धति में शल्य-चिकित्सा की एक समृद्ध परम्परा कायम
रही है। सुश्रुत-संहिता में 132 शल्य-उपकरणों का उल्लेख है । इनमें से कई
उपकरण आज भी- वाराणसी, बेंगलुरु, जामनगर व जयपुर के आयुर्वेद संस्थानों
में उपलब्ध हैं और प्रतिष्ठित वैद्यों द्वारा विभिन्न चिकित्सीय कार्यों
में प्रयुक्त होते रहे हैं । युरोपियन मेडिकल साइंस के जो डाक्टर
आयुर्वेदिक सर्जरी का बिना किसी तथ्य के ही विरोध कर रहे हैं,  उन्हें यह
सत्य मालूम होना चाहिए कि अब से महज सौ साल पहले तक यूरोप के डॉक्टर यह
भी नहीं जानते थे कि सर्जरी करने के लिए मरीज को बेहोश कैसे किया जाए।
जबकि भारत में इसकी कई विधियां सदियों से प्रचलित रही हैं। भारत में
आयुर्वेदिक वैद्यगण चिकित्सा की मुख्यधारा से आज दरकिनार तो इस कारण हैं
क्योंकि लगभग दो-ढाई सौ वर्षों तक यहां उन्हीं अंग्रेज धूर्तों का शासन
रहा जिनकी चिकित्सा-पद्धति का नाम है ‘एलोपैथ’। तब उनने भारतीय
शिक्षा-पद्धति को नष्ट करने के साथ-साथ भारतीय (आयुर्वेदिक)
चिकित्सा-पद्धति को भी जबरिया अवैध घोषित कर दरकिनार कर दिया था और आजादी
के बाद भी दुर्भाग्यवश यह देश अंग्रेज-परस्त कांग्रेसी शासन की कृपा से
उन्हीं अंग्रेजी कारगुजारियों का शिकार बना रहा ।
अंग्रेजी-परस्त डॉक्टरों और उनके सिपहसालारों के लिए यह
उल्लेखनीय है कि दुनिया भर के समस्त ज्ञान-विज्ञान का मूल स्रोत ‘वेद’ ही
हैं । ‘स्टोरी ऑफ सिविलाइजेशन’ नामक प्रसिद्ध ग्रंथ के अमेरिकी लेखक व
इतिहासकार- विल डुरांट ने भारत को दुनिया भर की समस्त सभ्यताओं की जननी
कहा है । उन्होंने ‘ दी केस फॉर इण्डिया’ नामक अपनी पुस्तक में लिखा है-
“भारत से ही सभ्यता की उत्पत्ति हुई । संस्कृत सभी यूरोपियन भाषाओं की भी
जननी है । हमारा समूचा दर्शन संस्कृत से ही उपजा है । विज्ञान और गणित
इसकी ही देन हैं । लोकतंत्र और स्वशासन भी भारत से ही उपजा है । अनेक
प्रकार से भारत माता हम सब की माता है । ” निष्पक्ष रूप से लिखी इस
पुस्तक में उन्होंने विस्तार से बताया है कि  अंग्रेजी शासन से पहले भारत
कैसा था ? अंग्रेजों ने कैसे भारत को लूटा और कैसे भारत की आत्मा  का ही
हनन कर डाला ? वे कोई दक्षिणपंथी लेखक अथवा संघी विचारधारा के विचारक
नहीं थे , बल्कि अमेरिका व युरोप के सर्वमान्य दार्शनिक भी थे, जिन्होंने
द स्टॉरी ऑफ फिलॉसफी नामक पुस्तक भी लिखी, जो दुनिया भर में दार्शनिकों
के बीच प्रसिद्ध है । विल डुरांट एवं उनकी पत्नी एरिएल डुरांट को सन्
१९६८ में अमेरिकी शासन के द्वारा ‘पुलित्जर पुरस्कार’ एवं सन् १९७७ में
राष्ट्रपति का मेडल प्रदान किया गया था । विल डुरांट जैसे और भी अनेक
पश्चिमी विद्वान, दार्शनिक व इतिहासकार हैं, जिनकी मान्यता है कि भारत के
विभिन्न स्रोतों से ही दुनिया में ज्ञान-विज्ञान की धारा प्रवहित हुई और
ये स्रोत संस्कृत-साहित्य में छिपे हुए हैं । छिपे हुए इस कारण हैं
क्योंकि ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के द्वारा ये यत्नपूर्वक छिपाये गए हैं ।
संस्कृत-साहित्य का शिक्षण-संरक्षण व संवर्द्धन करने वाले गुरुकुलों को
नष्ट कर एक योजना के तहत भारतीय शास्त्रों-ग्रंथों का औपनिवेशिक हिसाब से
बिकाऊ भाषाविदों के हाथों विकृत अनुवाद करा कर और उनमें छिपे
ज्ञान-विज्ञान का अपहरण कर शिक्षा की तदनुसार सुनियोजित पद्धति कायम कर
अंग्रेजों ने इस षडयंत्र को अंजाम दिया हुआ है । डुरंट साहब ने अपनी
पुस्तक में यह भी लिखा है- अंग्रेज जब भारत आये तब यहां के सभी सात लाख
गांवों में लगभग इतने ही गुरुकुल थे । किन्तु अंग्रेजी राजपाट कायम हो
जाने के बाद उननें प्रायः सभी गुरुकुलों को नष्ट कर दिया । फिर लगभग एक
सौ साल बाद उननें काफी सोच-समझ कर थॉमस मैकाले की योजनानुसार अंग्रेजी
शिक्षा-पद्धति के स्कूलों का विस्तार किया, जिनके माध्यम से भारत की नई
पीढियों को यह पढाया जाने लगा कि संस्कृत जाहिलों की भाषा रही है और
संस्कृत-साहित्य में पूजा-पाठ के मंत्रों व ईश्वर-भक्ति की कथा-कहानियों
के सिवाय कुछ भी नहीं है । गुरुकुलों के विनष्टिकृत पराभव और स्कूलों के
सुनियोजित उद्भव के बीच वाले उस लम्बे कालखण्ड में उनने भारत के प्राचीन
ग्रंथों-शास्त्रों से ज्ञान-विज्ञान को अपहृत कर उन्हें युरोपियन
विद्वानों-विशेषज्ञों की उपलब्धियों में शामिल करने का काम ऐसी चतुराई के
साथ किया कि भारत में किसी को इसकी भनक तक नहीं लगी । फिर तो
परमाणु-सिद्धांत के प्रतिपादक बन गए जॉन डाल्टन, ग्रहों की गति मापने
वाले शास्त्र के नियन्ता बन गए श्रीमान कैपलर महाशय , जीव-विज्ञान की
आधारशिला रख दिए मिस्टर लेमार्क तथा गणित के जन्मदाता हो गए श्रीयुत
युक्लिड महोदय और विमान के आविष्कारक बन गए राइट्स बन्धु ;…और हजारों
वर्ष प्राचीन राष्ट्र- भारत भी महज पांच सौ का ‘इण्डिया’ बन गया ।
किन्तु उन अंग्रेज हुक्मरानों और उनके टट्टू विद्वानों से किसी ने यह
नहीं पूछा कि जब सब ज्ञान-विज्ञान के सारे शोध-अनुसंधान  युरोप में ही
होते रहे , तो युरोप में पहला स्कूल स्थापित होने के हजारों वर्ष पहले से
ले कर  ईस्ट इण्डिया कम्पनी के भारत आने तक यहां जो लाखों गुरुकुल थे
उनमें पढने-पढाने वाले आचार्य व शिष्य केवल झाल बजाया करते थे ? इस एक
प्रश्न के उतर से ही युरोप के सारे ज्ञान-विज्ञान की पोल खुल जाती है ,
क्योंकि तब आपको मालूम होता है कि संस्कृत साहित्य के तमाम ग्रंथों
शास्त्रों के भीतर विभिन्न श्लोकों-मंत्रों की शक्ल में ज्ञान-विज्ञान के
एक से एक सूत्र-समीकरण भरे पडे हैं ।
युरोपीय देशों के राष्ट्र बनने और ईसा का जन्म होने से हजारों साल
पहले के भारतीय शास्त्रों-ग्रंथों यथा- वेद , उपनिषद, ब्राह्मण आरण्यक
में ब्रह्माण्ड के सबसे जटिल व अनसुलझे विषयों जैसे फोर्स, टाइम, स्पेश,
ग्रैविटी, ग्रविएशन, डार्क एनर्जी, डार्क मैटर, फोटोन, ग्रैविटोन, मास,
वैक्यूम एनर्जी, मैडिएटर पार्टिकल्स इत्यादि के विषद वर्णन हैं । इन
ग्रन्थों में आज के भौतिक विज्ञान के कॉस्मोलॉजी, एस्ट्रो-फिजिक्स,
क्वांटम फिल्ड थ्योरी, प्लाज्मा फिजिक्स, पार्टिकल फिजिक्स एण्ड स्ट्रिंग
थ्योरी जैसे गम्भीर विषयों की भी व्यापक विविचना है । इतना ही नहीं,
द्रव्यमान एवं ऊर्जा का स्वरूप व उत्पत्ति, विद्युत् आवेश का स्वरूप व
उत्पत्ति, विभिन्न बलों की उत्पत्ति, स्वरूप व  क्रिया, तारों व
गैलेक्सियों की उत्पत्ति-प्रक्रिया, गैलेक्सी में तारों की कक्षाओं का
निर्माण, ब्रह्मांड की मूल अवस्था, सृष्टि उत्पत्ति की प्रक्रिया आदि
अनेक गम्भीर व मौलिक विषयों की विस्तृत व्याख्यायें भरी पडी हैं ।
चिकित्सा के क्षेत्र में प्लास्टिक सर्जरी जैसी तकनीक तो सुश्रुत ऋषि
युरोप के मेडिकल साइंस का जन्म होने से पहले ही दे चुके हैं । हमारे
आयुर्वेद में कायाकल्प के तो चमत्कार ही चमत्कार हैं, किन्तु उसे भी
पश्चिम के मेडिकल साइंस का मोहताज बना दिया गया है । ‘वैदिक गणित’ में तो
ऐसे-ऐसे सूत्र-समीकरण भरे-पडे हैं कि उनके प्रयोग से वृक्षों की पत्तियां
तक गिनी जा सकती हैं । आर्यभट्ट और वराहमिहिर जैसे हमारे महान खगोलविदों
व गणितज्ञों के ग्रंथों को खंगाला जाये तो एक से एक ऐसे-ऐसे सूत्र-समीकरण
मिलेंगे, जिनके उपयोग से भारतीय प्रतिभा पूरी दुनिया को अचम्भित कर सकती
है । किन्तु दुर्भाग्य है कि भारत के नवनिहालों को आज भी पश्चिम से
आयातित गणित और विज्ञान पढाये जाते हैं । जबकि यह एक स्वयंसिद्ध सत्य है
कि भारत का पुनरुत्थान ‘अभारतीय’ ज्ञान-विज्ञान से कतई सम्भव नहीं है और
महर्षि अरविन्द व युगऋषि श्रीराम शर्मा आचार्य जैसे तत्वज्ञानी मनीषियों
की भविष्योक्तियों को मानें तो २१वीं सदी से  भारत का पुनरुत्थान
अवश्यम्भावी है;  तब ऐसे में भारत-सरकार का यह कदम अवश्य ही भारत की
नियति से निर्देशित है । ज्ञान-विज्ञान के भारतीय स्रोतों को, जिन्हें
अंग्रेजों ने अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए बाधित व अपहृत कर रखा था,
वे अगर पुनः प्रवाहित होने लगें तो उस प्रवाह  से भारत पुनः ‘वैभवशाली
भारत’ बन कर रहेगा । इस दृष्टि से देखें तो ‘आयुर्वेद में सर्जन’ का
प्रावधान किया जाना  भारत के पुनरुत्थान की दिशा में सरकार का एक बहुत
बडा कदम है  और इसकी अपेक्षा तो भाजपा-मोदी की सरकार से ही की जा सकती थी
।
•       मनोज ज्वाला

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