मनुष्य का कर्तव्य धर्म पालन सहित सरकार के अच्छे कार्यों का समर्थन है

ओ३म्

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परमात्मा ने हमारे पूर्वजन्म के कर्मों के आधार पर हमें इस जन्म में मनुष्य बनाया है। हम सब अपनी अपनी आयु के कुछ सोपान पार चुके है। जीवन का जो समय बीत गया वह वापिस नहीं आ सकता परन्तु जो वर्तमान व भविष्य का समय है उस पर विचार व चिन्तन कर हम सत्य व कल्याण के मार्ग पर अग्रसर कर सकते हैं। हमें यह कैसे ज्ञान हो कि हमारा अधिकतम कल्याण कैसे होगा? इसका उत्तर यह है कि हमें प्रमुख विद्वानों के ग्रन्थों का अध्ययन वा स्वाध्याय करना चाहिये। हमें वेद, दर्शन और उपनिषदों सहित, मनुस्मृति, रामायण एवं महाभारत का अध्ययन भी करना चाहिये। इससे हमें अपने जीवन को किस दिशा में ले जाना चाहिये, क्या कर्म करने चाहियेें उनकी की प्रेरणा मिल सकती है। ऋषि दयानन्द ने देश व संसार के लोगों का यह कार्य एक अत्यन्त महत्वपूर्ण ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश लिख कर सरल कर दिया है। हमें सबसे पहले केवल सत्यार्थप्रकाश का पूरी गम्भीर एवं एकाग्रता से अध्ययन कर लेना चाहिये। जो स्थल कुछ कठिन व समझने में न आयें, उन्हें आर्यसमाज के विद्वानों से पूछ कर समझ लेना चाहिये। कुछ विद्वानों से फोन पर सम्पर्क कर भी शंका समाधान किया जा सकता है। सत्यार्थप्रकाश मनुष्य को उसके जीवन की यथार्थ स्थिति से परिचित कराते हैं। यह ग्रन्थ वेदों, उपनषिदों, दर्शनों, रामायण, महाभारत, मनुस्मृति आदि सभी ग्रन्थों का सार है। आप इन सभी ग्रन्थों को पढ़कर जो ग्रहण करेंगे वह सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ में मात्र 15-20 दिन में कर सकते हैं।

सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ का जिन लोगों ने लेखक के अभिप्राय को ध्यान में रखकर निष्पक्ष भाव से अध्ययन व स्वाध्याय किया है वह सब इसके प्रशंसक एवं अनुगामी बने हैं। इस ग्रन्थ को पढ़कर मनुष्य का भाग्योदय होता है और वह ईश्वर व आत्मा के सत्य स्वरूप एवं गुण-कर्म-स्वभाव को जानकर ईश्वर के सत्यस्वरूप का ध्यान व उपासना कर ईश्वर को प्राप्त कर लेता है। इससे न केवल वर्तमान जीवन में उन्नति होती है अपितु भविष्य का जीवन भी सुधरता है। हमारे सामने स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती, पं0 लेखराम, मनीषी पं. गुरुदत्त विद्यार्थी, महात्मा हंसराज जी, स्वामी दर्शनानन्द सरस्वती, लाला लाजपतराय, भाई परमानन्द जी आदि अनेकानेक महान व्यक्तित्व हैं जो ऋषि दयानन्द और उनके ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश से प्रेरणा लेकर महानता को प्राप्त हुए थे। सत्यार्थप्रकाश ने देश के लोगों को आजादी की प्रेरणा की थी। ऋषि दयानन्द, सत्यार्थपकाश तथा आर्यसमाज के द्वारा देश में सदियों से प्रचलित सभी अन्धविश्वासों का पराभव हुआ। मिथ्या परम्परायें दूर हुई तथा देश सुसंगठित हो रहा है। सत्यार्थप्रकाश ने ही देश व विश्व के लोगों को विद्या का महत्व बताया। ऋषि दयानन्द ने इसके लिये नियम बनाया कि मनुष्य को अविद्या का नाश करना चाहिये और विद्या की वृद्धि करनी चाहिये। इसी से प्रेरणा ग्रहण कर ऋषि दयानन्द के अनुयायियों ने देश भर में गुरुकुल और डी0ए0वी0 स्कूल व कालेज खोल कर देश से अज्ञान दूर किया। आर्य कन्या पाठशालायें भी खोली गई। कन्या विद्यालय व महाविद्यालय भी स्थापित किये गये। हमारे शहीद भगतसिंह, रामप्रसाद बिस्मिल, लाला लाजपतराय, भाई परमानन्द आदि सभी ऋषि दयानन्द, सत्यार्थप्रकाश और आर्यसमाज से प्रेरणा पाकर और गुरुकुल व डी.ए.वी. स्कूल एवं कालेज से सम्बद्ध होकर ही क्रान्तिकारी, समाज सुधारक व वेद प्रचारक बने। इन सबने देश को आजाद कराने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पं. श्यामजी कृष्ण वम्र्मा क्रान्तिकारियों के आद्य गुरु के गौरवनपूर्ण स्थान पर प्रतिष्ठित हैं। उन्होंने धर्म और क्रान्ति की शिक्षा ऋषि दयानन्द के सान्निध्य में रहकर ही प्राप्त की थी। ऋषि दयानन्द की प्रेरणा से ही वह लन्दन आक्सफोर्ड शिक्षणालय में संस्कृत पढ़ाने तथा वहां वैदिक धर्म व संस्कृति का प्रचार करने गये थे। देश की परिस्थतियां ऐसी थी कि उन्हें वहां इन कार्यों के साथ देश की स्वतन्त्रता के लिये भी प्रेरणा करनी पड़ी और उन्हें आगे चलकर लन्दन छोड़ना पड़ा था। उनकी मृत्यु जेनेवा, फ्रांस में हुई थी। भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने गुजरात में उनके जन्म स्थान माण्डवी में उनका भव्य स्मारक बनवाया है। वहां जो भी जाता है उनके पं. श्यामजी कृष्ण वम्र्मा सहित ऋषि दयानन्द के आदर्श व्यक्तित्व से प्रभावित होता है और उनकी प्रशंसा करता है।

शास्त्राध्ययन करने व व्यापक रूप से विचार करने पर ज्ञात होता है कि मनुष्य का अपने अनेकानेक कर्तव्यों वा धर्मों को जानना और उनका पालन करना ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य है। धर्म व कर्तव्य दोनों पर्यायवाची शब्द हैं। हमारा धर्म वही होता है जो हमारा कर्तव्य होता है। धर्म को राजनीतिक दलों तथा मत-मतान्तरों की दृष्टि से देखते हैं तो धर्म के प्रति अन्याय होता हुआ दिखता है। धर्म किसी मनुष्य व उनके आचार्य द्वारा चलाया गया सम्प्रदाय नहीं होता अपितु धर्म का प्रादुर्भाव स्वयं इस सृष्टि के रचने, इसकी व्यवस्था व पालन करने वाले परमेश्वर द्वारा सृष्टि के आरम्भ में ही हो जाता है। परमात्मा प्रदत्त धर्म ज्ञान वा वेद ज्ञान पूर्ण एवं सब मनुष्यों को समान रूप से हितकारी होते हंै। वह सबके लिये समान होते हैं। ऐसा नहीं होता कि धर्म एक देश के लिये कुछ व दूसरे के लिये कुछ और हो। वह विश्व के सभी लोगों के लिये एक होता है। वेदों पर आधारित व प्रचलित सत्य सनातन धर्म ही सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर द्वारा प्रवृत्त धर्म है। चार वेदों ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद में जो ज्ञान व शिक्षायें हैं उनको जानना, समझना तथा उन्हें अपनी प्रवृत्ति व क्षमता के अनुसार आचरण में लाना, उनके विरुद्ध आचरण न करना ही मनुष्य का धर्म व कर्तव्य होता है। सृष्टि के आरम्भ से लेकर महाभारत पर्यन्त यही वेद धर्म संसार भर में प्रवृत्त रहा।

महाभारत के बाद ऋषि परम्परा व वेदाध्ययन बाधित होने से अज्ञानी व अल्पज्ञानी लोगों द्वारा वेद धर्म में विकृतियां उत्पन्न की जाने लगी। अहिंसक यज्ञों में हिंसा होने लगी। सामाजिक नियमों में भी विकार उत्पन्न हुए। नारी एवं शूद्र बन्धुओं को वेदाध्ययनाधिकार से वंचित कर दिया गया। ब्राह्मण वर्ण भी वेदाध्ययन से विमुख हो गया जिसका प्रमुख कार्य वेद पढ़ना व पढ़ाना तथा यज्ञ करना व करवाना था। अतः धर्म व उसकी सत्य मान्यताओं में विकृतियां होना स्वाभाविक था। आगे चलकर देश विदेश में मत-मतान्तरों की स्थापना होने के साथ उनकी शाखाओं एवं संख्या में वृद्धि सहित उनकी मान्यताओं में अन्तर आता गया। सभी मत अविद्या से युक्त हैं। इसका कारण इन मत-सम्प्रदायों के आचार्यों का अल्पज्ञ होना व वेदों के ज्ञान से दूरी थी। मनुष्यों में अविद्या के कारण लोभ, मोह, क्रोध, इच्छा, द्वेष दुर्गुण पाये जाते हैं। इस इस कारण भी मत-मतान्तर इन दोषों से प्रभावित हुए हैं। मनुष्य की भी देव व मनुष्य मुख्य कोटियां होती हैं। देवों में ऋषि, मुनि, योगी एवं अन्य साधारण ज्ञानी मनुष्यों की श्रेणियां होती हंै। ऋषियों व वेद मर्मज्ञों से इतर मनुष्य वेद को नहीं समझ सकते। वह आंशिक सत्य को ही जान सकते हैं। उनके ज्ञान में असत्य एवं अविद्या की पर्याप्त मात्रा भी होती है। यही कारण है कि मत-मतान्तरों में अविद्या पायी जाती है। ऋषि दयानन्द ने अपने ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश के ग्यारहवें से चैदहवें इन चार समुल्लासों में देश व विश्व के प्रमुख सभी मतों की अविद्या पर संक्षिप प्रकाश डाला है। अविद्या मनुष्यों के लिये हानिकर होती है। अतः मत-मतान्तरों से अविद्या को दूर किया जाना आवश्यक है। इसी कारण मनुष्यों को अपने जीवन को उसके उदेश्य के अनुरूप व्यतीत करने व आत्मा के अन्तिम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति के लिये वेद ज्ञान को प्राप्त होकर प्रयत्न करने चाहियें। अतीत में हमारे सभी ऋषि, योगी तथा वेदों के अध्येता मोक्ष की प्राप्ति के लिये ही प्रयत्नशील रहते थे। इन्हीं कारणों से देश के राजा भी इनका सम्मान करते थे और इनकी सत्य आज्ञाओं का पालन करते थे। सच्चा योगी, वेदाचार्य एवं ऋषि होना मनुष्य जीवन की सबसे महत्वपूर्ण स्थितियां एवं उपलब्धियां हैं। जो इनको प्राप्त करने के लिये प्रयत्नशील होते हैं वह वस्तुतः प्रशंसनीय एवं वन्दनीय होते हैं। इसके विपरीत मनुष्यों का जीवन उस सीमा तक ही महत्वपूर्ण, उपयोगी एवं प्रशंसनीय होता है जहां तक वह अंधविश्वासों तथा अज्ञान से मुक्त होकर सर्वजनहिताय और सर्वजनसुखाय सहित प्राणीमात्र के हित के लिये कार्यरत रहते हैं। हमें ऐसा मत एकमात्र धर्म ‘‘वैदिक धर्म” ही प्रतीत होता है। अतः सभी को वैदिक धर्म को अपनाकर अपने जीवन को सन्मार्गगामी बनाकर मोक्ष की प्राप्ति के लिये प्रयत्नशील होना चाहिये।

मनुष्य को सत्यधर्म का ही पालन करना चाहिये। ऐसा न होने पर समाज में अव्यवस्था को रोका नहीं जा सकता। सद्धर्म के पालन के साथ सभी मनुष्यों को देश के समाज विरोधी व स्वार्थी तत्वों के प्रति भी जागरूक रहकर उनका विरोध करते रहना चाहिये। देश की सरकार जो अच्छे कार्य करती है उन सब का समर्थन एवं उसकी प्रशंसा करनी चाहिये। सत्पुरुषों का यह भी कर्तव्य है कि वह अपने विवेक से समाज विरोधी लोगों को पहचानें और उनके मन्सूबों को सफल न होने दे। ऐसे समाज विरोधी लोगों की जानकारी देश की रक्षा में संलग्न संस्थाओं को देनी चाहिये। वर्तमान समय में अनेक शिक्षित लोग भी समाज विरोधी गतिविधियों में लिप्त हैं जिनका कार्य अपने स्वार्थों को सिद्ध करते हुए देशी-विदेशी लोगों द्वारा संचालित देश व सरकार विरोधी गतिविधियों में सहयोग कर देश को कमजोर करने में मदद करना होता है। धार्मिक, शिक्षित व देशभक्त लोगों का कर्तव्य होता है कि वह देश व समाज विरोधी लोगों व उनके विचारों से परिचित होकर उनके निवारण के लिए देश की सरकार सहित उनके संगठन के योग्य नेताओं को जानकारी देते रहें। सभी देशवासियों को देश की व्यवस्था संचालन में सरकारी संस्थाओं का सहयोग करना चाहिये। ऐसा करने पर ही हमारा देश सुरक्षित रह सकता है। यदि हम सब कुछ सरकार पर छोड़ देंगे तो इससे हमारा अपना जीवन व भविष्य भी खतरे में पड़ सकता है। हमें अपने धार्मिक, सामाजिक तथा देश से जुड़े कर्तव्यों के पालन में भी सजग रहना चाहिये। आज की परिस्थितियों में हमें केन्द्र की सरकार का भरपूर सहयोग करना चाहिये। ऐसा करके हम देश को विश्व का एक आदर्श एवं उन्नत राष्ट्र बना सकते हैं। यदि हम अपने कर्तव्यों की उपेक्षा करेंगे तो निश्चय ही उसके हमारे व देश के लिए बुरे परिणाम होंगे। हमें सावधान रहने का संकल्प लेना चाहिये और कुतर्क करने वाले शिक्षित लोगों से विचलित नहीं होना चाहिये अपितु उनके कुतर्कों का खण्डन करना चाहिये। कुतर्क करने वाले बहुत से शिक्षित लोग हमें अपने आसपास व आर्यसमाज में भी मिल जाते हैं। हम सरकार की अच्छी नीतियों का खुलकर समर्थन एवं सहयोग करेंगे तो इससे हमें ही लाभ होगा। यह सिद्धान्त ठीक नहीं है कि हमारे एक के करने से क्या होगा। दूसरे तो करते ही हैं। हमें अपने कर्तव्य का पालन करना जिससे दूसरे भी हमसे प्रेरणा ग्रहण कर सकें। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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