आपरेशन सिंदूर : विजय का श्रेय, पराजय का अपयश किसको ?

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लेखक – आर्य सागर

सफल सैन्य नियंत्रित सीमित आतंक रोधी अभियान ऑपरेशन सिंदूर के रूप में आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक वाॅरफेयर के मामले में भारत का लोहा पूरी दुनिया ने माना है। विशेषज्ञ बताते हैं भावी युद्ध आकाश में ही नहीं अंतरिक्ष में भी लड़े जाएंगे एक दूसरे की सेटेलाइट प्रणाली को निशाना बनाकर ,भारत इसकी भी तैयारी कर रहा स्पेस डिफेंस फोर्स के रूप में है। अमेरिका चीन सरीखे देश इस दिशा में काफी प्रगति कर चुके हैं,इस दशक में ही भारत इस क्लब में भी शामिल हो जायेगा।

जब यह ऑपरेशन चल रहा था तो कुछ विपक्षी दलों व उनके समर्थको के मन में यह आशंका पल रही थी इस सफल सैन्य अभियान का श्रेय मोदी जी को मिलेगा ऐसे में मोदी की लोकप्रियता में इजाफा होगा विपक्षी दलों के राजनीतिक लक्ष्य इससे प्रभावित होंगे।

अब विपक्ष नरेंद्र मोदी या भारत के प्रधानमंत्री पर यह आरोप लगा रहा है कि वह इस सैन्य ऑपरेशन का श्रेय ले रहे हैं जबकि पराक्रम भारत की सेना ने दिखाया है।

वही यह भूल जाते हैं सेना का पराक्रम अपने लिए नहीं अपने राजा के लिए होता है, जो समय पर साहसिक निर्णय लेता है और राजा भी यह निर्णय अपने लिए नहीं अपने राष्ट्र या राज्य के लिए लेता है। राजा के माध्यम से अंतिम श्रेय राष्ट्र को ही मिलता है।

यह सवाल आज का नहीं है सदियों से यह सवाल नीति के विद्वानों के समक्ष उठाया जाता रहा है कि जब दो देशों या दो राजाओं की सेना में युद्ध होता है तो विजेता पक्ष में जीत का श्रेय किसको मिलना चाहिए सैनिक को, सेनापति को या राजा को या उस देश की प्रजा को, ठीक इसके विपरीत पराजय की स्थिति में यह अपयश किसको मिले। महाभारत के अनुशासन पर्व, शांति पर्व ,कौटिल्य के अर्थशास्त्र आदि में तो इस प्रश्न का तार्किक समाधान मिलता ही है साथ ही आध्यात्मिक मोक्ष ग्रंथ पतंजलि ऋषि के योगदर्शन के व्यास भाष्य में भी इसका सुंदर समाधान हमें मिलता है।

योग दर्शन में महर्षि व्यास आत्मा ही कर्ता भोक्ता है इस विषय को उदाहरण के रूप में समझाते हैं वह कहते हैं -यथा च जय: पराजयो वा योद्धषु वर्तमान: स्वामिनि व्यपदिश्यते ,स हि तस्य फलस्य भोक्तेति अर्थात जैसे दो सेना या योद्धाओं के मध्य युद्ध होता है सैनिक ही लड़ते हैं लेकिन जब विजय व पराजय की बात आती है तो कहा जाता है अमुक राजा विजित हुआ या पराजित हुआ ऐसे ही मन ,बुद्धि में भोग कर्म आदि आरोपित ना होकर आत्मा में ही आरोपित होते हैं ऐसे ही विजय पराजय सेना में आरोपित ना होकर राजा में आरोपित होती है ।

प्राचीन काल हो या आधुनिक काल युद्ध का निर्णय कभी भी सेना या सेनापति या सेना अध्यक्ष का नहीं होता यह निर्णय राजा आज के परिवेश में राष्ट्रीय अध्यक्ष , प्रधानमंत्री ही लेता है। शेष सभी परामर्शदाता की भूमिका में होते हैं।

कौटिल्य अर्थशास्त्र व मनुस्मृति के सातवें अध्याय में इस प्रकरण पर बहुत ही समाधान परक प्रकाश डाला गया है युद्ध से अर्जित लाभ व युद्ध से होने वाली हानि‌ का उतरादायी राजा को ही माना गया है। इतना ही नहीं यह दुनिया दो-दो विश्व युद्धों की साक्षी रही है आज भी जब उन युद्धों का निष्कर्ष निकाला जाता है तो विजित पक्ष जिसमें रूस ब्रिटेन आदि शामिल थे उनके राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री का ही नाम शामिल होता है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान विंस्टन चर्चिल ब्रिटेन के प्रधानमंत्री थे अपनी बेहतर रणनीति के चलते उन्होंने युद्ध का पासा ही पलट दिया इतना ही नहीं द्वितीय विश्व युद्ध के इतिहास को भी उन्होंने लिखा जिसके लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार भी मिला ।कहा जाता है वह ऐसे आधुनिक राजनेता हुए जिन्होंने युद्ध लड़कर भी व युद्ध का इतिहास लिखकर दोनों ही तरीके से इतिहास रचा।

यदि ऑपरेशन सिंदूर असफल होता तो इस हार का ठीकरा भी भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सिर पर फुटता और आज ऑपरेशन सिंदूर एक सफल सैन्य अभियान है उसका श्रेय निसंदेह भारत के प्रधानमंत्री को ही मिलना चाहिए यही शाश्वत युद्ध के बाद की सम्मान नीति है दुनिया जिस पर आज भी चलती है। भारत के विपक्षी दल एक व्यक्ति या दल के विरोध में इतने आगे ना बढे कि वह राष्ट्र के गौरव को ही कुचल दे।सेना के शौर्य का अन्तिम तम श्रेय राजा को ही मिलता है शौर्य रचने वाली सेना तो इस श्रेय की सृजक होती है। किसी भी देश की सेना हो वह किसी शाबाशी व सम्मान की मोहताज नहीं होती। भारत की वीर सेना तो इसमें भी बढ़-चढ़कर होती है। भारत ऐसा इकलौता देश है जिसके महाभारत आदि ग्रंथों में अनेकों श्लोक मिलते हैं जिनमें यह कहा गया है की सेना का जवान मरकर या शत्रु को मारकर स्वर्ग लोक को भी पार कर जाता है अर्थात जो गति एक जीवन मुक्त योगी की होती है उत्तम सुख की प्राप्ति वही गति एक सैनिक को होती है दुनिया के किसी साहित्य में ऐसे वचन आपको नहीं मिलेंगे।

ऐसे में नरेंद्र मोदी यदि इस उपलब्धि को प्रचारित कर रहे है उसका श्रेय ले रहे है तो वह कोई अनैतिक कार्य या अपराध नहीं कर रहे ऐसे में इस विषय को लेकर किसी के मन में भी कोई शंका नहीं रहनी चाहिए। क्या ऐसी सोच रखने वाले राजनेता राजनीतिक दल उनके समर्थक यह अपेक्षा करते हैं कि युद्ध के दौरान मोदी जी स्वयं फाइटर जेट उड़ाये या रक्षा उपकरणों को संचालित करें ऐसा करना ना प्राचीन काल में ना आज के काल में कभी भी व्यावहारिक नहीं रहा है।राजा का पराक्रम उसके निर्णय सुझ बूझ में ही निहित होता है। दुनिया में ऐसे भी युद्ध इतिहास मिलते हैं जहां सेना बहुत ही सशक्त बलशाली शौर्यशाली थी लेकिन राजा कमजोर था समय पर निर्णय न लें पाया ऐसे में राष्ट्र को पराजित होना पड़ा। ऐसे भी इतिहास मिलते हैं जहां सेना का संख्या बल बहुत कम था लेकिन उनका शौर्य विपक्षी की संख्या व संसाधनों पर भारी पड़ा उसमें भी राजाओं की मुख्य भूमिका रही।

अतः आपरेशन सिंदूर जैसे आतंक रोधी सफल अभियान का उत्सव सभी को मिलजुल कर मनाना चाहिए।

लेखक – आर्य सागर
तिलपता ग्रेटर नोएडा

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