ओ३म् -आगामी श्रावणी व रक्षाबन्धन पर्व 19 अगस्त पर- “वेदों का स्वाध्याय एवं वैदिक जीवन जीने का पर्व है श्रावणी पर्व”

images (59)

========
श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन देश के आर्य व हिन्दू बन्धु श्रावणी पर्व को मनाते हैं। वैदिक धर्म तथा संस्कृति 1.96 अरब वर्ष पुरानी होने से विगत दो ढाई हजार वर्ष पूर्व उत्पन्न अन्य सब मत-मतान्तरों से प्राचीन है। वैदिक धर्म के दीर्घकाल के इतिहास में लगभग पांच हजार वर्ष हुए महाभारत युद्ध के कारण धार्मिक एवं सामाजिक अवनति का दौर चला जो अब तक न तो थमा है और न ही हम व विश्व के लोग पुनः अपने प्राचीन वैदिक धर्म की ओर लौट ही सके हैं। सौभाग्य से ईसा की उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरकाल में देश में ऋषि दयानन्द जी का आगमन हुआ था जिन्होंने प्राचीन वैदिक धर्म एवं संस्कृति का वैदिक काल के अनुरूप पुनरुद्धार किया। अविद्यायुक्त मत-मतान्तरों का सहयोग न होने के कारण देश व समाज से अविद्या दूर न हो सकी। परिणामतः आज भी वेद विरोधी व अविद्यायुक्त मत-मतान्तरों का प्रचलन व प्रभाव विद्यमान है। इन कारणों से प्राचीन काल में प्रचलित वेद-सम्मत श्रावणी पर्व का वास्तविक स्वरूप अब भी प्रायः आंखों से ओझल है। वर्तमान काल में श्रावणी पर्व मनाया तो जाता रहा है परन्तु इसका स्वरूप वैदिक नहीं रहा है। मध्यकाल व मुस्लिम शासकों के समय से यह पर्व रक्षा बन्धन पर्व के रूप में प्रचलित हो गया जो वर्तमान में इसी रूप में मनाया जाता है।

दिनांक 10 अप्रैल, 1875 को आर्यसमाज की स्थापना के बाद हमारे वैदिक विद्वानों ने इस पर्व की शास्त्रीय दृष्टि से जांच पड़ताल की तो ज्ञात हुआ कि प्राचीन काल में यह पर्व श्रावणी पर्व वा ऋषि तर्पण के रूप में मनाया जाता था जिसका उद्देश्य श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन वेदों का स्वाध्याय व पारायण आरम्भ किया जाता था जिसे उपाकर्म कहते हैं। इस दिन से पौष मास की पूर्णिमा जो चतुर्मास पूरे होने पर आती है, इस उपाकर्म का उत्सर्जन व समापन किया जाता था। अतः श्रावणी पर्व सृष्टि के आरम्भ से वेदों के स्वाध्याय का व्रत लेने, उस पर आचरण करने व ऋषि तर्पण पर्व के रूप में मनाया जाता रहा है। पर्व का उद्देश्य पितृयज्ञ एवं अतिथियज्ञ के समान वेद के मर्मज्ञ ऋषियों को सन्तुष्ट करना होता था जिससे मनुष्य का अपना ही कल्याण होता है। ऋषियों की सबसे प्रिय वस्तु वेद का स्वाध्याय, उसका रक्षण व सभी मनुष्यों को वेदज्ञान से आलोकित करना था। वह हर समय इसी कार्य में संलग्न रहते थे। यही कार्य उनका प्रियतम व मानुष्यमात्र का कल्याणकारी था। जो लोग वेदों का अध्ययन करते व उसकी शिक्षाओं पर आचरण करते थे वह लोग ऋषियों को प्रिय होते थे। इसलिये ऋषियों को प्रसन्न व सन्तुष्ट करने के लिये प्राचीन काल में लोग श्रावण मास की पूर्णिमा को वेदों के स्वाध्याय व पारायण का उपाकर्म कर पौष मास की पूर्णिमा पर उसका उत्सर्जन किया करते थे। मध्यकाल में यह परम्परा टूट गई। इस काल में ऋषियों का उत्पन्न होना भी बन्द हो गया था। ऋषि दयानन्द ने वेदाध्ययन व अपनी योग-समाधि की सिद्धि से ऋषित्व को प्राप्त कर वेदों का पुनरुद्धार किया और मध्यकाल में अवरुद्ध सभी वैदिक पर्वों के यथार्थ स्वरूप का अनुसंधान कर उनको प्रचलित कराने का अभियान चलाया। इसी का परिणाम है कि वर्तमान में वैदिक धर्मी आर्यसमाजी लोग रक्षाबन्धन पर्व को श्रावणी पर्व के रूप में मनाते हैं। इस दिन समाज मन्दिरों व गुरुकुलों आदि में विशेष यज्ञों का आयोजन होता है, भजन व प्रवचन होते हैं। बड़ी संख्या मेें श्रोता समाज मन्दिरों में एकत्रित होते हैं और इस अवसर पर वेदों के महत्व तथा दैनिक जीवन में वेदों के स्वाध्याय तथा ऋषियों के ग्रन्थों यथा उपनिषद्, दर्शन, मनुस्मृति, सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका का अध्ययन करने की प्रेरणा की जाती है। इस परम्परा से मोक्ष में विचरण करने वाली आत्मायें भी सन्तुष्ट होती होंगीं ऐसा हम अनुमान करते हैं। इस कारण से यह पर्व वर्तमान समय में भी ऋषि तर्पण के रूप में मनाये जाने की दृष्टि से सार्थक है। वेदों के स्वाध्याय से मनुष्य का कल्याण होता है। वेदाध्ययन करने से मनुष्य जीवन को पतन के मार्ग पर ले जाने वाले विचारों व कामों से बचता है। उसकी इस जन्म व जन्मान्तरों में श्रेष्ठ योनि व परिवेश में मानव पुनर्जन्म मिलने से उन्नति व कल्याण होता है। शास्त्रकारों ने वेदों के स्वाध्याय के अनेक लाभ बताये गये हैं। यह सभी लाभ इस पर्व को मनाते हुए इसकी मूल भावना से एकात्मता उत्पन्न करने से कर्ता को लाभान्वित करते हैं। अतः श्रावणी पर्व का प्राचीन काल के अनुसार ऋषितर्पण वा वेदस्वाध्याय के उपाकर्म एवं चार मास बार उत्सर्जन के रूप में मानने से मनुष्य का जीवन सफलता को प्राप्त होता है। यही इस पर्व की आज के समय में प्रासंगिकता व उपयोगिता है जिसे हमें श्रद्धापूर्वक करना चाहिये।

श्रावणी पर्व के विषय में आर्य पर्व-पद्धति पुस्तक में कहा गया है कि शास्त्रीय विधान के अनुसार मनुष्य को स्वाध्याय से ऋषियों की, होम से देवों की, श्रद्धा से पितरों की, अन्न से अतिथियों की, बलिवैश्वदेव कर्म से कीट-पतंगों आदि प्राणियों की यथाविधि पूजा करनी चाहिये। मनुस्मृति आदि ग्रन्थों में विशेष अवसरों पर विशेष स्वाध्याय द्वारा विशेष ऋषि तर्पण का विधान है। वेदधर्म के अनुयायियों में नित्य और नैमित्तिक कर्मों की शैली सर्वत्र विद्यमान व प्रचलित है। वैदिक काल में वेदों के अतिरिक्त अन्य गन्थों की अविद्यमानता वा विरलता के कारण वेदों और वैदिक साहित्य के ही पठन-पाठन का विशेष प्रचार था। लोग नित्य ही वेदपाठ में रत रहते थे किन्तु वर्षाऋतु में वेद के पारायण का विशेष आयोजन किया जाता था। इसका कारण यह था कि भारत वर्षा बहुल तथा कृषि प्रधान देश है। यहां की जनता आषाढ़ और श्रावण में कृषि के कार्यों में विशेषतः व्यस्त रहती है। श्रावणी (सावनी) शस्य की जुताई और बुवाई आषाढ़ से प्रारम्भ होकर श्रावण के अन्त तक समाप्त हो जाती है। इस समय श्रावण पूर्णिमा पर ग्रामीण जनता कृषि के कार्यों से निवृत्ति पाकर तथा भावी शस्य के आगमन से आशान्वित होकर चित्त की शान्ति और अवकाश लाभ करती है। क्षत्रियवर्ग भी इस समय दिग्विजय यात्रा से विरत हो जाता है। वैश्य भी व्यापार, यात्रा, वाणिज्य और कृषि से विश्राम पाते हैं। इसलिए इस दीर्घ अवकाश-काल में विशेष रूप से वेद के पारायण और प्रवचन में जनता प्रवृत्त होती थी। उधर ऋषि-मुनियों, संन्यासी और महात्मा लोग भी वर्षा के कारण अरण्य और वनस्थली को छोड़कर ग्रामों के निकट आकर अपना चातुर्मास्य (चैमासा) बिताते थे। श्रद्धालु श्रोता और वेदाध्यायी लोग उनके पास रहकर ज्ञान श्रवण और वेद पाठ से अपने समय को सफल बनाते थे और ऋषियों के इस प्रिय कार्य से ऋषियों का तर्पण मनाते थे। जिस दिन से इस विशेष वेद पारायण का उपक्रम (प्रारम्भ) किया जाता था, उस को उपाकर्म कहते थे। और यह श्रावण शुदि पूर्णिमा वा श्रावण शुदि पंचमी को होता था। ऋषियों का तृप्तिकारक होने के कारण पीछे से उपाकर्म का नाम ऋषितर्पण भी पड़ गया। यह उपाकर्म वा ऋषि तर्पण विशेष विधि से होता था। इसका विवरण ऋषियों द्वारा निर्मित ग्रन्थों गृह्यसूत्रों में मिलता है। इस प्रकार यह विशेष वेदपाठ प्रारम्भ होकर साढ़े चार मास तक नियमपूर्वक बराबर चला जाता था और पौष मास में उसका ‘उत्सर्जन’ (त्याग या समापन) होता था। ‘उत्सर्जन’ भी एक विशेष संस्कार व पर्व के रूप में किया जाता था। उपाकर्म और उत्सर्जन के विधान विविध गृह्यसूत्र ग्रन्थों में कुछ परिवर्तनों के साथ वर्णित हैं। यह विषय विद्वानों द्वारा विचारणीय होता है और इससे वह उपयोगी बातों को समाज के लोगों के सम्मुख प्रस्तुत कर उससे लाभान्वित कर सकते हैं। सामान्यजनों को श्रावणी पर्व पर वेदाध्ययन व वेदपारायण का वैदिक पद्धति के अनुरूप उपाकर्म करना चाहिये, इसी में इस पर्व की सार्थकता है।

हम समझते हैं कि वर्तमान काल में वैदिक परम्पराओं को जारी रखने के लिये सभी मनुष्यों को श्रावणी पर्व को ऋषि तर्पण के रूप में ही मान्यता देनी चाहिये और इस अवसर पर वेदाध्ययन का संकल्प लेने का निश्चय करना चाहिये। इससेे वैदिक धर्म व संस्कृति का संरक्षण होगा और समाज से अविद्या दूर की जा सकेगी। इस अवसर पर उपलब्ध सम्पूर्ण वैदिक साहित्य के संरक्षण पर भी ध्यान देना चाहिये जिससे हमारी भावी पीढ़िया हमारे वर्तमान एवं पूर्व विद्वानों के उपयोगी वेद विषयक वैदिक साहित्य से वंचित न हों। श्रावणी पर्व के दिन सभी बन्धुओं को परिवार सहित समाज मन्दिरों तथा गुरुकुलों आदि में जाकर वहां वृहद् यज्ञों को करने के साथ भजनों व विद्वानों के सारगर्भित लाभकारी प्रवचनों से लाभ उठाना चाहिये। परस्पर मिलकर भोजन करना चाहिये। वैदिक धर्म की रक्षा के लिए दान देने सहित सत्संकल्प लेने चाहियें। इस दिन आर्यसमाज तथा गुरुकुलों के आचार्यों को वेद प्रचार की ठोस योजना भी बनाई चाहिये। समाज में असंगठन को दूर करने पर चिन्तन कर संगठन को सदृढ़ बनाने पर भी विचार कर सकते हैं। ऐसा करने में ही इस पर्व को मनाने और हमारे जीवन की सार्थकता है।

श्रावणी पर्व को रक्षा बन्धन पर्व में निहित भाई व बहिन के प्रेम व परस्पर सहयोग की भावना की दृष्टि से जारी रखा जा सकता है, ऐसा आर्यसमाज के अनेक विद्वानों का विचार रहा है। इस रूप में भी हम इस पर्व को मना सकते हैं। इस दिन सभी बन्धु अपने यज्ञोपवीत भी बदलते हैं। इस कार्य को सामूहिक रूप से करना चाहिये जिससे वेदानुयायियों में उत्साह का संचार होता है। इस विषय पर भी विद्वानों के प्रेरक प्रवचन होने चाहिये। यदि हम वेदों के स्वाध्याय, सन्ध्या, अग्निहोत्र तथा वेद प्रचार में सहयोग के कार्य करते रहेंगे तो इससे हमारा कल्याण होगा तथा समाज व देश को भी लाभ होगा। वर्तमान समय में वैदिक धर्म पर अनेक खतरे मण्डरा रहे हैं। वैदिक सनातन धर्म बाहरी एवं भीतरी घातों से सुरक्षित नहीं है। इसके लिये हमें संगठित होकर रहना होगा व प्रचार करना होगा। हमें देश की सरकार के धर्म और देश रक्षा के कार्यों में उनका सहयोगी होना चाहिये। आगामी श्रावणी पर्व व रक्षा-बन्धन पर्व को हम इन्हीं भावनाओं से मनायें, ऐसा हम उचित समझते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

Comment:

Kuponbet Giriş
betgaranti giriş
Teknik Seo
ikimisli giriş
grandpashabet giriş
bonus veren siteler
grandpashabet giriş
betnano giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
setrabet giriş
setrabet giriş
setrabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
setrabet giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
restbet giriş
restbet giriş
galabet giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet
grandpashabet giriş
betlike giriş