नेताजी सुभाष चंद्र बोस : एक आराधनीय राष्ट्र पुरुष

images (47)

दिनांक 30 दिसंबर 1943 को नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने पोर्ट ब्लेयर में सर्वप्रथम तिरंगा फहराया था। ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली को स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ( जिन्हें कांग्रेस ने चाचा नेहरू के रूप में प्रचारित किया है ) ने एक पत्र प्रेषित किया था। जिसमें लिखा था कि “मुझे भरोसेमंद सूत्रों से पता चला है कि सुभाष चंद्र बोस जो आपके युद्ध अपराधी हैं, उन्हें स्टालिन ने रूस में घुसने की मंजूरी दे दी है। यह रूस का धोखा है, क्योंकि रूस ब्रिटिश अमेरिकन गठबंधन का मित्र देश है। उसे ऐसा नहीं करना चाहिए था। इस पर आपको जो सही लगे वह कार्यवाही करें।”
पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा 27 दिसंबर 1945 को लिखे गए इस पत्र पर केवल जवाहरलाल नेहरू का नाम लिखा है, परंतु हस्ताक्षर नहीं है।
इस पत्र के संबंध में यह भी महत्वपूर्ण है कि इस पत्र का नेहरू के द्वारा कभी खंडन भी नहीं किया गया कि यह पत्र मेरे द्वारा नहीं लिखा गया। 14 अक्टूबर 2015 को पहली बार वर्तमान प्रधानमंत्री मोदी ने सुभाष चंद्र बोस से संबंधित फाइलों पर गृहमंत्री के अनुमोदन के पश्चात प्रमाणीकरण के हस्ताक्षर किए थे ।जो फाइल अब नेशनल आर्काइव्स में सुरक्षित हैं । जहां पर कोई भी इन्हें देख सकता है ।
गांधी व नेहरू के छल धीरे-धीरे देश के समक्ष आते जा रहे हैं। गांधी और नेहरू ने कांग्रेस के प्रभावशाली व्यक्तित्वों को दबाने का और उपेक्षित करने का भरसक प्रयास किया था। जिसमें सरदार वल्लभभाई पटेल पूर्व प्रधानमंत्री एवं भारत के वर्तमान स्वरूप के एक प्रमुख संगठन तथा प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद के प्रति उपेक्षा का व्यवहार भी किया गया था।
नेहरू के उपरोक्त पत्र से स्पष्ट होता है कि उन्होंने सुभाष चंद्र बोस को अंग्रेजों का युद्ध अपराधी बताया है । युद्ध अपराधी को सजा दिए जाने का अपना प्रावधान है। ऐसी परिस्थितियों में इसका तात्पर्य यह हुआ कि नेहरू जी को बोस को सजा दिलवाना अच्छा लग रहा था। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय लॉर्ड माउंटबेटन से सुभाष चंद्र बोस को युद्ध अपराधी होने के कारण अंग्रेजों को सौंपने की शर्त भी नेहरू गांधी ने स्वीकार की थी।
आप जानते हैं कि 23 जनवरी 1897 को सुभाष चंद्र बोस का जन्म कटक बंगाल, (उड़ीसा वर्तमान ) में हुआ था, जो भारत के स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी आंदोलन के अग्रणी तथा सबसे बड़े नेता के रूप में स्थापित हुए।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ने के लिए उन्होंने जापान के सहयोग से आजाद हिंद फौज का गठन किया था तथा सुभाष चंद्र बोस ने ही सर्वप्रथम जय हिंद का नारा बुलंद किया था। सुभाष चंद्र बोस 1937 में कांग्रेस के अध्यक्ष से चुने गए थे। उन्होंने गांधी नेहरू समर्थित कांग्रेस के प्रत्याशी और कांग्रेस के इतिहास लेखक डॉ पट्टाभिसीतारमैया को हराया था। पट्टाभिसीतारमैया नेहरू और गांधी के बहुत ही चहेते उम्मीदवार थे। यह वह काल था जब सुभाष चंद्र बोस की लोकप्रियता दिनों दिन बढ़ रही थी। जिससे गांधी नेहरू परेशान थे। कांग्रेस के यह दोनों नेता नहीं चाहते थे कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस लोकप्रियता में उनसे आगे निकलें । यह दोनों ही नेता चाहते थे कि डॉक्टर पट्टाभिसीतारमैया की जीत हो और नेताजी सुभाष चंद्र बोस को वह पीछे धकेलने में सफल हो सकें। इसके उपरांत भी गांधी जी और नेहरू अपनी योजना में सफल नहीं हो पाए । नेताजी सुभाष चंद्र बोस की लोकप्रियता के चलते सभी कांग्रेसियों ने बड़े भारी बहुमत से उनको अपना नेता चुन लिया। नेताजी सुभाष चंद्र बोस की इस जीत से यह साफ हो गया कि कांग्रेस में गांधी नेहरू के दिन लद चुके हैं और लोग किसी बड़े बदलाव का मन बना चुके हैं। पट्टाभिसीतारमैया के पराजित होने पर गांधी नेपट्टाभिसीतारमैया की हार को अपनी हार बताया था। गांधी जी को साफ दिखाई दे गया कि अब उन्हें कांग्रेस में कोई पूछने वाला नहीं है। यही कारण था कि उन्होंने अपनी एकाधिकारवादी मनोवृति का परिचय देते हुए अपने कुछ विशेष अधिकारों का प्रयोग करने का मन बना लिया। उन्होंने नेताजी सुभाष चंद्र बोस से बोलचाल तक बंद कर दी। जिससे क्षुब्ध होकर सुभाष चंद्र बोस ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद उन्होंने चुपचाप अपने पद से त्यागपत्र दे दिया और फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना कर देश की आजादी के लिए काम करने लगे। नेताजी के इस कदम से उस समय अधिकांश कांग्रेसियों के दिल टूट गए थे। इसके बाद नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने सावरकर जी से संपर्क साधा और उनसे सलाह करने के बाद देश छोड़ने का निर्णय लिया। देश छोड़ने से पहले लाहौर के अनारकली आर्यसमाज में महाशय कृष्ण जी ने उन्हें आर्य समाज की ओर से ₹10000 आर्थिक सहयोग के रूप में दिए। इस अवसर पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आर्य समाज को अपनी मां कहकर संबोधित था।
इसके बाद नेताजी ने 21 जनवरी 1941 को देश छोड़ दिया। काबुल के रास्ते वेश बदलकर गुपचुप तरीके से रुस पहुंच गए थे। जहां से भारत को आजाद करने के लिए सारे प्रयास बोस के द्वारा किए गए।
अंग्रेजों की चमचागिरी के कारण गांधी और नेहरू की दृष्टि में ‌ यही सुभाष चंद्र बोस का अपराध था। क्योंकि सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज का गठन करके अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध प्रारंभ कर दिया था। जबकि गांधी और नेहरू ने शांति और अहिंसा का पुजारी होते हुए कभी भी कोई संघर्ष प्रत्यक्ष तौर पर नहीं किया। प्रत्युत बहुत ही चालाकी से एक षड्यंत्र के तहत इतिहास में हमको पढ़ा दिया गया कि गांधी के चरखे कातने से आजादी आई थी। तथा सुभाष चंद्र बोस जैसे लाखों वीर सपूतों का बलिदान रददी की टोकरी में फेंक दिया गया। यदि उनके बलिदान को इतिहास में दर्ज करते हुए लिख दिया जाता तो गांधी और नेहरू इतिहास पुरुष नहीं बनते।
हम सबके लिए सौभाग्य का विषय है कि वर्तमान सरकार द्वारा भारतवर्ष के इतिहास को पुनः सही रूप में लिखने की गंभीर प्रयास कर रही है। समय की आवश्यकता है कि हम सब मिलकर सरकार के इस गंभीर प्रयास में सहभागी हों। इस दिस दिशा में मेरे प्रिय अनुज सुप्रसिद्ध इतिहासकार डॉ राकेश कुमार आर्य के प्रयास भी सराहनीय हैं। जिन्हें वर्तमान मोदी सरकार द्वारा भी सम्मानित किया गया है। डॉ आर्य इतिहास के विलोपीकरण की प्रक्रिया को सिद्धांत, तर्क और तथ्यों के आधार पर स्थापित करने का भगीरथ प्रयास कर रहे हैं। मेरा आशीर्वाद सदा उनके साथ है।
सुभाष चंद्र बोस की लोकप्रियता उस समय और भी बढ़ गई जब 3 मार्च 1943 को अंग्रेजों के कब्जे से जापान ने अंडमान निकोबार द्वीप समूह को मुक्त कराकर सुभाष चंद्र बोस को सौंप दिया था। जहां पर 30 दिसंबर 1943 को आज ही के दिन 80 वर्ष पहले सुभाष चंद्र बोस ने भारतवर्ष का तिरंगा फहराया था। इसलिए ही सुभाष चंद्र बोस अंग्रेजों के युद्ध अपराधी थे।
परदेसिया समझ चुका है कि देश को आजादी दिलाने में सबसे बड़ी भूमिका देश के क्रांतिकारी आंदोलन की रही थी उसे आंदोलन में भी नेताजी सुभाष चंद्र बोस का योगदान सबसे अधिक था उनके क्रांतिकारी आजाद हिंद फौज ने अंग्रेजों को भयभीत कर दिया था 1945 में खत्म हुए द्वितीय विश्व युद्ध के अनेक भारतीय सैनिक युद्ध काल से ही इस फौज में सम्मिलित होकर अंग्रेजों के लिए सर दर्द बन चुके थे। इसके बाद 1945 में जब संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना हुई तो वहां पर दुनिया के बड़े देशों ने ब्रिटेन को इस बात पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य किया कि अब उपनिवेशवाद की व्यवस्था संसार से खत्म होनी चाहिए । ऐसी परिस्थितियों में ब्रिटेन भारत को आजाद करने के लिए बाध्य हो गया था। इसमें कांग्रेस के अहिंसावादी आंदोलन की कहानी कोई भूमिका नहीं थी ऐसे में अपने वीर बलिदानियों को स्मरण करते हुए उनके बलिदान, त्याग ,तपस्या और साधना को स्मरण करना हम सब का राष्ट्रीय दायित्व है। निश्चित रूप से नेताजी सुभाष चंद्र बोस हम सब के लिए आराधनीय राष्ट्र पुरुष हैं। हमें गर्व है उनके कृतित्व, व्यक्तित्व और शहादत पर ।

देवेंद्र सिंह आर्य एडवोकेट
अध्यक्ष उगता भारत समाचार पत्र

Comment:

Kuponbet Giriş
betgaranti giriş
Teknik Seo
ikimisli giriş
grandpashabet giriş
bonus veren siteler
grandpashabet giriş
betnano giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet
grandpashabet giriş
betlike giriş
betlike giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş