जब भारतवर्ष सर्वत्र अज्ञानता, पाखंड ,अंधविश्वास और ढोंग की दलदल में फंसा हुआ था और विदेशी शासकों की गुलामी को भोगना भारतीय समाज के लिए अभिशाप बन गया था, तब स्वामी दयानंद जी महाराज का आगमन होना समकालीन इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना है । स्वामी दयानंद जी महाराज ने अलसाये हुए भारतीय समाज को झकझोरने का प्रशंसनीय कार्य किया। भारतीय राष्ट्र की बीमारी को उन्होंने जड़ से नष्ट करने का बीड़ा उठाया। उन्होंने ऊपरी तौर पर समाज सुधार का कार्य नहीं किया और ना ही अपनी झूठी प्रशंसा कराने या इतिहास में अपना नाम दर्ज कराने के लिए किसी भी प्रकार के पाखंड को अपनाने में विश्वास व्यक्त किया। उन्होंने एक कुशल वैद्य की भांति निष्काम कर्म करते हुए रोगी को स्वस्थ करने पर ध्यान दिया। उन्होंने लोगों से कहा :-

वैदिक दिव्य दिवाकर अपना सदा चमकता रहता है।
शाश्वत सत्य सनातन अपना, आगे बढ़ता रहता है।।

 पिछले कई सौ वर्ष के इतिहास में स्वामी  जी महाराज पहले व्यक्ति थे जिन्होंने भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के अभ्युदय के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किया। यदि यह कहा जाए कि वर्तमान भारत में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अलख जगाने वाले पहले व्यक्ति स्वामी दयानंद ही थे तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। वास्तव में भारतीय स्वाधीनता आंदोलन को स्वामी दयानंद जी महाराज के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ने ही निर्णायक गति प्रदान की थी।

भारत को उसका ‘स्व’ समझाया

अपने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के आंदोलन के अंतर्गत स्वामी दयानंद जी पहले व्यक्ति थे जिन्होंने भारत के ‘स्व’ को समझने और सारे राष्ट्र को उस ‘स्व’ के प्रति एकताबद्ध हो जाने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने ‘स्व’ की विस्तृत व्याख्या की और विस्तृत व्याख्या करते हुए भारत में सामाजिक क्षेत्र में जहां कई प्रकार के सुधारों पर बल दिया , वहीं राजनीति की दिशा को भी मोड़ने के प्रशंसनीय प्रयास किए। उन्होंने तेजी से अंग्रेजी शिक्षा का शिकार हो रहे भारतीय समाज का तो भारतीयकरण करने का प्रयास किया ही, साथ ही यूरोपियन राजनीतिक विचारों से प्रेरित होती जा रही भारत की राजनीति का भी भारतीयकरण ,आर्यकरण, हिंदूकरण करने का प्रयास किया।

मेरा अपना भारत सक्षम ज्योति जगाने में।
तनिक नहीं संकोच फिरंगी को दूर भगाने में।।

उन्होंने विदेशी राजनीतिक विचारों को भारत के अनुकूल नहीं समझा और लोगों को उनके विरुद्ध खड़ा होने की प्रेरणा दी। एक प्रकार से उन्होंने यूरोपीय विचारों को भारत में फैलने या अपना प्रचार प्रसार करने के सामने अपनी छाती तान दी। छाती तानते हुए स्वामी जी ने जोरदार ढंग से देशवासियों का आवाहन किया कि यूरोपियन विचारों की इस आंधी से देश बर्बाद हो जाएगा यदि अपना भला चाहते हो तो भारत को भारत ही रहने दो। जब उन्होंने लॉर्ड नॉर्थ ब्रुक से कहा कि मैं आपके और आपके साम्राज्य का भारत से यथाशीघ्र प्रस्थान चाहता हूं तो उनके ऐसे कहने का अभिप्राय यही था कि वे ब्रिटिश राजनीतिक विचारधारा और राजनीतिक प्रणाली को भारत के अनुकूल नहीं मानते थे। ब्रिटिश शासकों की अधिनायकवादी सोच का भी उन्होंने विरोध किया और लॉर्ड नॉर्थ ब्रुक से उपरोक्त बात कह कर उन्हें स्पष्ट किया कि आपके भीतर शासन का एक भी गुण नहीं है।

लॉर्ड मैकाले की शिक्षा नीति का किया विरोध

स्वामी दयानंद जी महाराज ने लॉर्ड मैकाले की शिक्षा नीति का पहले दिन से विरोध किया और देश के लोगों का आवाहन किया कि अपनी गुरुकुलीय शिक्षा प्रणाली समाप्त नहीं होनी चाहिए। 1857 की क्रांति के पश्चात जब देश में अंग्रेजी न्याय प्रणाली को लागू किया गया तो स्वामी दयानंद जी महाराज पहले व्यक्ति थे जिन्होंने भारत की प्राचीन पंचायती न्याय प्रणाली की वकालत की और लोगों को प्रेरित किया कि अंग्रेजो के न्यायालयों ,पुलिस थानों और स्कूलों आदि सभी का बहिष्कार करो। उन्होंने लोगों से अपील की कि :-

निर्माण करो उस भारत का जहां अत्याचार का नाम ना हो।
भारत मां का श्रृंगार करो, जहां हत्या और अपराध ना हो।।

लोगों ने स्वामी जी महाराज की बात को माना और अंग्रेजों की कोर्ट कचहरी में या पुलिस थानों में या अंग्रेजों के स्कूलों में बच्चों को भेजना पूर्णतया पाप माना। आगे चलकर कांग्रेस के महात्मा गांधी, नेहरू और दूसरे अंग्रेजपरस्त लोग या नेता जहां अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली को भारत के लिए वरदान मानते रहे थे वहां स्वामी दयानंद जी महाराज इन लोगों के राजनीतिक मंच पर आने से दशकों वर्ष पूर्व अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली को भारत के लिए एक अभिशाप मान रहे थे। कहने का अभिप्राय है कि कांग्रेस के गांधी और नेहरू जैसे नेता जहां स्वामी दयानंद जी के दशकों बाद आने पर भी अंग्रेजी विचारों और अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली को भारत के लिए अभिशाप कहने का साहस नहीं कर पाए, उस कार्य को स्वामी जी महाराज उनके आने से कई दशक वर्ष पूर्व कर रहे थे।
यही कारण था कि महात्मा गांधी और नेहरू जैसे लोग जहां विदेश में पढ़कर बैरिस्टर बनकर भारत की अंग्रेजी न्याय प्रणाली का एक अंग बनने में अपनी शान समझ रहे थे, वहीं दयानंद जी महाराज और उनके अनुयायी इस प्रकार की सोच को ही राष्ट्रविरोधी मानते थे। इस प्रकार स्वामी दयानंद जी महाराज और महात्मा गांधी या उनकी कांग्रेस के स्वदेशी में जमीन आसमान का अंतर है। यह इतिहास का एक बहुत बड़ा चल है कि हमने गांधी जी के स्वदेशी जागरण को पूर्ण मान लिया। जबकि वह आंशिक दृष्टिकोण से ही स्वदेशी था। इसके विपरीत स्वामी दयानन्द जी महाराज का स्वदेशी अभियान अपने आप में एक पूर्ण अभियान था। 

पूर्णत्व के पुजारी स्वामी जी महाराज

स्वामी जी के चिंतन में पूर्णता है। उनके कार्य में पूर्णता है। उनकी सोच में पूर्णता है। उनके व्यक्तित्व में पूर्णता है। वह पूर्णता के पुजारी थे और पूर्णत्व की प्राप्ति को ही अपने जीवन का लक्ष्य मानते थे। उस पूर्णत्व को भारत के पूर्णत्व के साथ समायोजित करना उनके जीवन का लक्ष्य था। उन्होंने लोगों को समझाते हुए कहा कि :-

वैदिक धर्म निभाने से, विश्व गुरु भारत होगा,
आर्य धर्म बचाने से, सकल विश्व उन्नत होगा।
देश हमारा महकेगा नहीं बीज अकारथ जाएगा,
गीत ओम के गाने से निज जीवन भी उन्नत होगा।।

चिंतन की इस ऊंचाई पर न कोई गांधी पहुंच सकता था, ना पहुंचा और ना ही उन जैसी दोगली विचारधारा का कोई व्यक्ति कभी पहुंच पाएगा।
स्वामी दयानंद जी महाराज प्रकाश के उपासक ऋषियों की सेना के सेनापति थे। वह अपने आप में एक महान संस्था थे, विचारों की ज्वाला थे, तेज का पुंज थे, ओज के गायक थे और राष्ट्र के नायक थे। वह योद्धाओं के योद्धा बलदायक थे। अलसाये लोगों के लिए स्वामी जी गति और ऊर्जा के अजस्र स्रोत थे। उनके जीवन काल में लाखों करोड़ों लोगों ने उनसे प्रेरणा प्राप्त की। ऊर्जा प्राप्त की और देश , धर्म संस्कृति की रक्षा के लिए अपने आप को समर्पित कर दिया।
विदेशी शासकों के लिए स्वामी जी सबसे बड़े शत्रु थे और अपने देशवासियों के सबसे बड़े मित्र थे। वेद विरोधी लोगों के लिए स्वामी जी महाराज एक तीक्ष्ण बाण थे तो वेदों में आस्था और विश्वास रखने वाले लोगों के लिए स्वामी जी अमृत की बौछार थे। वह विधवाओं के संरक्षक, पिता, भ्राता आदि सब कुछ थे। वह अनाथों के सहायक थे। वह दलित ,शोषित, उपेक्षित समाज के मसीहा थे। वह आर्य, आर्य भाषा और आर्य राष्ट्र के उपासक थे तथा इंडिया, इंडियन, इंडियन लैंग्वेज अर्थात हिंग्लिश के विरोधी थे। स्वामी दयानंद जी महाराज संस्कृति, संस्कृत और संस्कार के पुजारी थे और अंग्रेजी कल्चर , अंग्रेजी कुसंस्कार और अंग्रेजियत के महान शत्रु थे।

दी अंग्रेजों को चुनौती

उन्होंने भारतवासियों के अधिकारों को कुचलने वाली अंग्रेजियत को चुनौती दी। भारत की संस्कृति को मारकर अपना वर्चस्व स्थापित करने वाली अंग्रेजी कल्चर को चुनौती दी। संसार पर जबरन अपना अधिकार जमाकर अत्याचार और निर्दयता के साथ शासन करने वाली अंग्रेज जाति के कुसंस्कारों को चुनौती दी। इसके लिए स्वामी जी महाराज ने भारत के लोगों को बताया कि तुम्हारे पूर्वज ऋषि रहे हैं, जिन्होंने चिंतन के उच्चतम कीर्तिमान स्थापित किए हैं । तुम्हारी विचारधारा संसार की सबसे पवित्र विचारधारा है। जिसे वेदों की अमृतवाणी ने सींचा है। तुम्हारी संस्कृति संसार की एकमात्र ऐसी संस्कृति है जिसे विश्व संस्कृति कहा जा सकता है और जिसके भीतर सर्व समन्वयवाद की अद्भुत क्षमता है। जो दूसरों के अधिकारों का हनन करना नहीं सिखाती अपितु प्रत्येक को गले लगाकर सबके अधिकारों का सम्मान करना सिखाती है।
अंग्रेजों द्वारा फैलाई गई इस भ्रांत धारणा को स्वामी दयानंद जी ने अपने तार्किक बाणों के प्रबल प्रहार से सर्वप्रथम तोड़ने का सफल प्रयास किया कि आर्य जाति संसार की सबसे पतित जाति है। इसके स्थान पर उन्होंने भारत के आर्यजनों को बताया कि अंग्रेज सबसे पतित जाति है जो दूसरों के अधिकारों को जबरन छीनकर संसार में गुलामी की मानसिकता और विचारधारा को फैलाने का पाप कर रही है।

जो स्वयं पतित है दुनिया में , वही हमको पाठ पढ़ाता है,
जिसमें नैतिकता नहीं नाम की वह हमको न्याय सिखाता है।
जीवन जिसका अपयश का, वह क्या कभी पुण्य कमाएगा ?
जो स्वयं लूटता दुनिया को , वह किसका भला कर पाएगा ?

स्वामी जी महाराज की निर्भयता ,देशभक्ति, नैतिक साहस और आत्मबल का इसी बात से पता चल जाता है कि उन्होंने डंके की चोट अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए 1857 की क्रांति के समय आवाहन किया और उसके पश्चात जब तक वह संसार में रहे तब तक उनकी नीतियों का विरोध करते रहे।

आर्य समाज ने मिशन को आगे बढ़ाया

स्वामी जी महाराज द्वारा स्थापित किए गए आर्य समाज ने राजनीति और शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति लाने का काम किया।
जब अंग्रेज भारत पर शासन कर रहे थे तो उन्होंने भारत का “इंडियनाइजेशन” करने का पूरा प्रबंध कर लिया था। जहां लॉर्ड मैकाले शिक्षा नीति के माध्यम से भारत का “इंडियनाजेशन” करने की दिशा में ठोस कार्य कर रहा था वहीं अंग्रेजी संस्थाएं भारत का चर्चीकरण या ईसाईकरण करने पर भी ध्यान दे रही थीं। वैदिक मूल्यों को तेजी से नष्ट किया जा रहा था और वैचारिक धरातल पर बहुत ही थोथे सिद्ध हो चुके अंग्रेजी विचारों को भारतीय वैदिक मूल्यों पर ठोकने का प्रयास किया जा रहा था। तब स्वामी दयानंद जी महाराज पहले व्यक्ति थे जिन्होंने इस षड़यंत्र के विरुद्ध आवाज बुलन्द की और भारतवासियों को सावधान करते हुए भारत का भारतीयकरण करने की दिशा में ठोस कार्य किया।
हमारा मानना है कि स्वामी जी का चरित्र चित्रण करते समय उनके बारे में यह कहना कि ‘उन्होंने भारत का भारतीयकरण किया’ भी कहीं उनके व्यक्तित्व को छोटा करके आंकना है। इसके स्थान पर उपयुक्त शब्दावली यही होगी कि उन्होंने भारत का राष्ट्रीयकरण करने का गंभीर प्रयास किया।
स्वामी जी के द्वारा भारत का राष्ट्रीयकरण करने की इस प्रक्रिया में झूठ को भी सच्चा मानने की कहानी की कोई गुंजाइश नहीं थी। उन्होंने झूठे को झूठा कहना आवश्यक माना और जो सत्य था उसका महिमामंडन करते हुए उसी को भारत के राष्ट्रीय संस्कार के रूप में मान्यता देने के लिए राजनीतिक ,सामाजिक और धार्मिक लोगों को प्रेरित किया। स्वामी जी ने अपने इस चारित्रिक गुण के चलते जहां कुरान को गलत या झूठा सिद्ध करना पड़ा वहां उन्होंने ऐसा किया। इसी प्रकार बाइबल को भी उन्होंने जहां वह गलत थी, गलत कहा और उनके स्थान पर मानव के वास्तविक धर्म मानवता का प्रतिपादन करने वाले वेदों का महिमामंडन किया।

स्वामी जी तुष्टीकरण के विरोधी थे

स्पष्ट है कि स्वामी जी महाराज के चिंतन में, उनकी सोच में, उनकी नीतियों में और उनकी कार्यशैली में किसी भी प्रकार के तुष्टीकरण के लिए कहीं कोई स्थान नहीं था। जिन लोगों ने भारत में तुष्टीकरण के माध्यम से राष्ट्रीय एकता को स्थापित करने का आगे चलकर काम किया, वे भारत का राष्ट्रीयकरण करने में इसीलिए सफल नहीं हुए कि उन्होंने तुष्टिकरण के माध्यम से कई विसंगतियों को जीवित बनाए रखने का मूर्खतापूर्ण कृत्य किया। उदाहरण के रूप में इस्लाम और ईसाइयत की सांप्रदायिक मान्यताओं को भी तुष्टिकरण में विश्वास रखने वाले हमारे नेताओं ने उचित करार दिया और वेद की मानवतावादी सोच व चिन्तन को भी उन्होंने सांप्रदायिक मान लिया। यदि स्वामी जी महाराज भारतीय संविधान निर्मात्री सभा में रहे होते तो निश्चित रूप से किसी भी प्रकार के तुष्टीकरण को पूर्णतया असंवैधानिक घोषित करते। वह मानव को मानव बनाकर दूसरों के लिए स्वेच्छा से स्थान छोड़ने के लिए प्रेरित करने वाली शिक्षा पर बल देते और संस्कार आधारित शिक्षा के माध्यम से समाज में व्यापक परिवर्तन कर मानव को मानव के लिए और प्राणीमात्र के लिए उपयोगी बनाने की दिशा में कार्य योजना बनाते।

दया के सागर थे और स्रोत थे आनंद के,
गा रहा है गीत भारत, ऋषि दयानंद के।
पवित्र प्रेरणा हमको देता उनका जीवन,
बंधन काटे सारे जिसने छल पाखंड के।।

स्वामी दयानंद जी महाराज ने सभी देशवासियों से अपने द्वारा लिखित प्रत्येक छोटे-बड़े ग्रंथ में भारत की आत्मा के साथ मिलकर चलने का आह्वान किया। यही कारण था कि जब अंग्रेज 1857 में प्लासी के युद्ध के 100 वर्ष पूर्ण होने पर भारत में अपने शासन के शताब्दी समारोहों की तैयारी कर रहे थे, तब स्वामी दयानंद जी ने उनके बनते हुए खेल को बिगाड़ने के लिए भारत में क्रांति की नींव रख दी थी। स्वामी दयानंद जी महाराज ने उस समय अंग्रेजों को यह चेतावनी दी थी कि भारत भारतीयों का है और इस पर तुम अपने शासन के शताब्दी समारोह नहीं मना सकते। उन्होंने अपनी सिंहगर्जना से लोगों में जागृति पैदा की और उन्हें बताया कि यह हमारे लिए बहुत ही लज्जाजनक स्थिति है कि कोई विदेशी शासक हमारी पवित्र भूमि पर अपने कुशासन के शताब्दी समारोहों का आयोजन करे।

सत्यार्थ प्रकाश क्यों लिखा ?

उस समय कुछ मुट्ठी भर ऐसे भारतीय थे जो अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली में पढकर भारत के साथ गद्दारी करने पर उतर आए थे। वैचारिक रूप से अंग्रेज बने ये भारतीय भारत के लोगों को प्रत्येक क्षेत्र में पिछड़ा हुआ घोषित कर रहे थे और यह मानकर चल रहे थे कि भारत के पास अपना राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक दर्शन नहीं है। तब स्वामी जी ने “सत्यार्थ प्रकाश” के माध्यम से अंग्रेजों सहित ऐसे भारतीयों को भी सटीक उत्तर दिया और उन्हें बतलाया कि भारत के पास न केवल अपना राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक दर्शन है बल्कि वह दर्शन इतना ठोस और सकारात्मक है कि वह संपूर्ण विश्व का मार्गदर्शन कर सकता है। आज ‘सत्यार्थ प्रकाश’ को इतने संकुचित दृष्टिकोण से देखा जाता है कि यह भारत की पौराणिक जगत की पोल खोलने के लिए ही लिखा गया था, जबकि सच यह है कि यह विदेशी सरकार और विदेशी चिंतन के साथ घुलमिल गए भारतीयों की आंखें खोलने और उनको यह बताने के लिए लिखा गया था कि भारत भारतीयों का है और भारत ही संपूर्ण विश्व का नेतृत्व कर सकता है।

अमूल्य चिंतन दे गए, लिखा वेद का सार।
जब तक जगती चल रही गीत गाए संसार।।

उन्होंने किसी सांप्रदायिक पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर ईसाई और इस्लाम का या उनकी मान्यताओं का विरोध नहीं किया बल्कि भारत को बचाने के लिए उनका विरोध किया। भारत को बचाने से अभिप्राय है भारत की वैदिक संस्कृति को बचाना। भारत की सत्य सनातन वैदिक संस्कृति के पुरोधा के रूप में काम करते हुए ऋषि दयानंद जी ने जब हमारे देशवासियों से “वेदों की ओर लौटने” का आवाहन किया तो उसका अर्थ केवल यही था कि संसार की अन्य धार्मिक पुस्तकें धार्मिक न होकर सांप्रदायिक पुस्तकें हैं। जो एक दूसरे के बीच मजहबी आधार पर वैमनस्य पैदा करने और संसार में खूनखराबा करने की योजनाओं को फलीभूत करती देखी जा रही हैं । जबकि वेद अपने एकात्ममानववाद के माध्यम से संपूर्ण संसार में मानवतावाद की स्वरलहरियों को फैलाने का काम सृष्टि प्रारंभ से करता रहा है। उसने संपूर्ण मानव समाज को और मानव जाति के लोगों को एक ही परमपिता परमेश्वर की संतान होने से परस्पर भाई बहन के रूप में देखने की प्रेरणा दी है।

डॉ राकेश कुमार आर्य

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