तुलसीदास की दोहावली में लोकजीवन के नीति तत्वों का निरुपण*

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(डॉ. परमानंद तिवारी- विनायक फीचर्स)
भारतीय संस्कृति अनेकानेक झंझावातों से गुजरती हुई इस अवस्था को प्राप्त हुई है। कई लोगों ने ‘स्वान्त: सुखाय’ की संकल्पना पर आधारित रघुनाथ गाथा को लोक आख्यान नहीं, बल्कि भारतीय सामाजिक संरचना का तात्कालिक संविधान कहा है। तुलसी की रचनाओं का आधार लोक कल्याण ही था। इसमें सभी वर्गों यहां तक कि सम्पूर्ण संसार को ही ‘सियराम मय सब जग जानी’ की विनत भावना से काव्य को दिशा दी गई है। तुलसी सम्पूर्ण काव्य राममय है। यह राम की भक्ति उनके कथ्य में शुचिता सदाशयता और समर्पण की भावना भर देती है।
हमारी संस्कृति में सनातन मूल्यों के साथ राम का चरित्र सदैव मंगलकारी माना गया है। रामकथा को मानवीय मूल्यों से सम्पर्क कर तुलसी सांस्कृतिक एवं सामाजिक चेतना के संवाहक बन गए हैं। तुलसीदास की लोकप्रियता का कारण यह है कि उन्होंने अपनी कविता में अपने देखे हुए जीवन का बहुत गहरा चित्रण किया है। उन्होंने राम के व्यक्तित्व को युगानुरूप वर्णित किया। उन्होंने राम की संघर्ष कथा को अपने युग के अनुरूप बनाया, जिसमें तत्कालीन समाज का स्वरूप उसके आलोक में सहज ही समाहित हो गया। रामचरित मानस में तुलसी ने अपने पूर्व के कवियों की भांति राम को नहीं देखा, बल्कि राम के चरित्र के केन्द्रीय तत्वों को बिना किसी हस्तक्षेप के नये स्वरूप में प्रस्तुत किया।
उनकी सभी रचनाओं का केन्द्रीय भाव रामभक्ति, राम का चरित्र, उनकी अलौकिक सत्ता, उनके चमत्कार ‘नाना पुराण निगमागम सम्मतं’से मेल खाते हैं। तुलसी के राम जिस लोक में प्रतिष्ठित किए गए हैं। वह 15वीं, 16वीं सदी का हमारा भारत देश रहा है, जो विभिन्न प्रकार की विषमताओं से ग्रस्त था। इस विषमताग्रस्त समाज को कलियुग के माध्यम से चित्रित किया गया है, जहां समाज में अनेकानेक विद्रूपताएं विद्यमान थी, दैहिक, दैविक, भौतिक तीन तापों दु:खों के साथ गरीबी, भुखमरी, अकाल, महामारी, बेकारी आदि का वर्णन है। समाज में कपट फरेब अन्यायी राजा, दुर्जन, सज्जन, आडम्बरी साधु और अनय अनीति सब कुछ दिखायी देते है। तमाम प्राकृतिक संरचनाएं नद निर्झर, सरिता, पर्वत, कंदरायें, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे जैव विविधता का सुन्दर स्वरूप भी काव्य में दिखाई देता है।
राम बाललीला राज दरबार वैभव वनवास प्रसंग कोल किरात वनजीवन से परिचय और सबके प्रति अगाध प्रेम अनेक प्रसंग जिसमें कई अन्य स्थलों में विविध पात्रों का यथास्थान वर्णन है, जिससे लोगों को प्रेरणा, शिक्षा तथा जीवन की दिशा प्राप्त होती है।
तुलसीदासजी की रचना संसार का हर मोती अपने स्वरूप और उपादेयता की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, यहां पर उनके काव्य दोहावली में लोक जीवन के साथ नीति तत्वों को तलाशना और उसकी प्रासंगिकता को समय के बदलाव के साथ परखना है। आज से लगभग 500 वर्ष पुरानी रचना में कितनी कालजयी शक्ति है कि उसके भाव उसकी अर्थवत्ता काल के प्रवाह के साथ भी न तो कहीं धूमिल हुई और न उसके संदर्भों में कोई बदलाव आया। समाज में प्रचलित विभिन्न संदर्भों में दोहावली के दोहों का उल्लेख होना उसकी लोक दृष्टि का बोधक है। संग महिमा को किस प्रकार रेखांकित किया गया है। तुलसी भलो सुसंग से पोच कुसंगति सोइ। नाउ किन्नरी तीर असि लोह विलोकहु लोइ। अच्छी संगति से मनुष्य अच्छा और बुरी संगति से बुरा होता है। देखिये जो लोहा नाव में लगने से पार उतारता है। सितार में लगने से मधुर संगीत सुनाकर सुख देने वाला होता है, वही लोहा तलवार और तीर में लगने से जीवों के लिए प्राणघातक हो जाता है। इसी तरह बड़ों की संगति से मनुष्य (सम्मान्य) बड़ा और छोटों की संगति से नाम छोटा हो जाता है। मनुष्य के जीवन में विवेक की बहुत आवश्यकता है, क्योंकि विधाता में ‘जड़ चेतन गुण दोष मय विश्व कीन्ह करतार।’
संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि वारि विकार।
ईश्वर ने इस संसार में जड़ चेतन और गुण दोष बनाए हैं॥
परन्तु संत रूपी हंस दूध में सम्पृक्त जल को त्यागकर मात्र गुणरूपी दूध को ही ग्रहण करते हैं। संसार में सभी प्राणियों को मिलने वाले लाभ-हानि का प्रयोजन भी उसके भाग्य पर निर्भर करता है जैसे बादल तो बरसकर समस्त संसार को प्रसन्न करता है, जिससे सबके ताप और दु:ख दूर होते हैं, लेकिन इसके बावजूद जवासा का पौधा सूख जाता है तो बादल का कोई दोष नहीं है।
बरसि विस्व हरषित करत हरत ताप अघ प्यास।
तुलसी दोष न जलद को जल जरै जवास॥
तुलसीदास जी ने जीवन को बहुत समीप से समझा और जिया है। उन्होंने कहा है कि मित्रता तो सच्ची वही है जो विपत्ति में काम आये- कुदिन हितू सो हित सुदिन हित अनहित किन होई। ससि छवि हर रवि सदन तऊ, मित्र कहत सब कोई॥
मनुष्य सामाजिक प्राणी है। उसका सम्पूर्ण जीवन व्यवहार समाज में ही संचालित होता है। तुलसी जीवन का कल्याण चाहते हैं, इसीलिए वह लौकिक और पारलौकिक दोनों दृष्टियों से कल्याण की कामना करते हैं। उनके दोहावली में मानस की इस घोषणा की भांति- कीरति मनिति भूति भलि सोई। सुरसरि सम सब करतित होई। का हर पल ध्यान रखते हैं। ऐसा कोई पक्ष नहीं है, जिसका लोक पक्ष समाज के लिए हितकारी न हो। ऐसे कई प्रसंग हैं, जिसमें तुलसी लोक को कभी भी नहीं भूलते। यह उदाहरण अत्यन्त रोचक है। जिसका अर्थ कपट अन्तत: खुल ही जाता है। चरन चोंच लोचन रंगौ चली मराली चाल। छीर नीर विवरन समय बक उघरत तेंहि काल॥ बगुला चाहे हंस की तरह भी चलने लगे परन्तु जिस समय दूध और जल को अलग करने का अवसर आता है उसकी पोल खुल ही जाती है।
जिस कलियुग का वर्णन तुलसी ने अनेक विसंगतियों से युक्त बताया है। उस युग अर्थात वर्तमान संदर्भ में कपट की प्रधानता देखने को मिलती है। ‘हृदय कपट पर वेष धरि बचन कहहिं गढि़ छोलि। अबके लोग मयूर ज्यों क्योंकि लिए दिल खोलि।
हर मनुष्य के जीवन में कई ऐसी चीजें होती हैं, जिन पर अपवाद स्वरूप सत्संग का प्रभाव भी नहीं पड़ता। यह स्वभाव प्रधानता का पक्ष है। नीच निचाई नहि तजै सज्जन हूं के संग। तुलसी चन्दन विटप वसि विष नहीं तजत भुजंग। इसी तरह कहा गया है कि सज्जन अपनी सज्जनता एवं दुष्ट’ दुष्टïता का त्याग नहीं कर पाते। भलो भलाईहिं पै लहइ, लहइ निचाइहिं नीचु। सुधा सराहिअ अमरता गरल सराहिअ मीचु॥’
इस संसार में समय जैसी पूंजी नहीं है और अवसर जैसा धन खो जाने पर फिर पश्चाताप के अलावा कुछ नहीं बचता। यह लोक जीवन में नीति का ऐसा पक्ष है, जो सर्वत्र हमारी लोकोक्तियों तक में निहित है। यथा ‘अवसर कौड़ी जो चुकै बहुरि दिए का लाख। दुइजन चंदा देखिये उदौ कहा भरि पाख॥
दोहावली में जीवन का ऐसा कोई भाग नहीं है जो अछूता है। कवि ने अपनी लेखनी विविध पक्षों पर चलाई है। यह संसार स्वार्थ की खदान है। यहां अपने-अपने हित के लिए सभी जागरूक हैं संसार में हित करने वालों की संख्या कम है। तुलसी जग जीवन अहित कतहुं कोउ हित जानि। शोषक भानु कृसानु महिं पवन एक धन दानि॥’ आशय यह कि जगत में जीवों का अहित करने वाले बहुत हैं किन्तु हित करने वाले बिरले ही होते हैं। सूर्य अग्नि जल पृथ्वी पवन सभी जल को सुखाने वाले हैं। देने वाला तो एक बादल है।
संसार में मनुष्यों को आचरण और स्वभाव के अनुसार सज्जन और दुर्जन दो श्रेणियों में रखा गया है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं कि जिन कार्यों को सज्जन लोग करते हैं, वह उनके जीवन का अपरिहार्य अंग है। वहीं ऐसे कार्य दुर्जनों के लिए त्याज्य हैं। पुण्य प्रीति प्रति प्राप्तिउ परमारथ पथ पांच। लहहिं सुजन परिंहरहिं खल सुनहुं सिखावन सांच॥ दोहे में यह बताया गया है कि पुण्य प्रेम प्रतिष्ठा प्राप्ति (लौकिक लाभ) और परमार्थ का पथ इन पांचों को सज्जन ग्रहण करते हैं और दुष्टï त्याग देते हैं इस सही शिक्षा को सुनिए। जीवन का हर मोड़ सीधा मंजिल की ओर नहीं जाता। कहीं गतिरोध तो कहीं टकराव स्वाभाविक है और मनुष्य परिस्थितियों के अनुसार अपना निर्वाह करता है। कई बार समाज में अनायास ही लोग मित्र, शत्रु बन जाते हैं। जिन्हें लोक दृष्टि से तीन स्वरूपों में रखा गया है।
उत्तम मध्यम नीच गति पाहन सिकता पानि।
प्रीति परीक्षा तिहुन की बैर वितिक्र जानि।
समाज में पाये जाने वाले पुरुषों के प्रेम और बैर की तीन स्थितियां देखी गई हैं, जिनमें उत्तम, मध्यम, नीच की गति क्रमश: पत्थर, बालू और जल के सदृश है। उत्तम पुरुष की मैत्री पत्थर पर लकीर, मध्यम की मैत्री बालू पर लकीर किसी हवा के झोंके तक बची रहती है, जबकि जल की लकीर की भांति दुर्जनों की मैत्री होती है। ठीक इसके विपरीत उत्तम आदमी का बैर जल की लकीर, मध्यम का बालू की लकीर और नीच का बैर पत्थर की लकीर की भांति चिरस्थायी होता है। इसलिए ऐसे लोगों से बैर और प्रीति करते समय ध्यान रखना चाहिये। यह कथन लोक जीवन का महत्वपूर्ण तथ्य है। हमारा समाज आज जिस आतंक का सामना कर रहा है तुलसीदास जी ने लड़ाई और आपसी कलह को बहुत ही बुरा बताया है-
‘कलह न जानब छोट करि कलह कठिन परिनाम॥
लगत अगिनि लघु नीच गृह जरत धनिक धन धाम॥’
इस संसार में कलह को कभी भी छोटा नहीं मानना चाहिए, क्योंकि इसके परिणाम बहुत भयंकर होते हैं। गरीब की छोटी-सी झोपड़ी में यदि आग लगती है तो उससे बड़े-बड़े धनिकों के भी धन, धाम जल जाते हैं। मनुष्य को अपने हित अहित का ध्यान रखना चाहिए समय पर कष्ट सह लेने को तुलसी हितकारी मानते हैं, देखिए- ‘लोक रीति फूटि सहहिं आंजी सहइ न कोई। तुलसी जो आंजी सहइ सो आंधरो न होइ।’
इसी प्रकार मनुष्य के जीवन में ऐसी भी परिस्थिति आती है, जब उसे क्रोध आ सकता है। तुलसीदास जी ने क्रोध को रोककर क्षमा को उपयोगी निरूपित किया है। क्रोध अत्यन्त हानिकारक है। कौरव पाण्डव जानिए क्रोध क्षमा के सीम। ‘पांचहि मारिन सौ सके सयौं संधारे भीम।’ कौरवों को क्रोध और पाण्डवों को क्षमा की सीमा समझना चाहिए परन्तु क्रोध के कारण सौ कौरव पांच पाण्डवों को नहीं मार सके इधर अकेले भीम ने सभी सौ कौरवों का संहार कर दिया।
ऐसे अनेकानेक प्रसंग हैं, जिसमें जीवन के विविध पक्ष जिनका लोक स्वरूप है, जिनका जीवन से सीधा संवाद और हमारी सामाजिक संरचना से सरोकार है, जिसमें तुलसीदास जी ने अपनी कलम चलाई है, कबीर की तरह ही ये सभी तथ्य ‘कागद की लेखी नहीं आजीवन आंखिन की देखी’ भोगे हुए प्रतीत होते हैं। मनुष्य जीवन की जिन सच्चाइयों को देखता या जीता है, वह उसका भुक्तभोगी होता है। यह उसका कड़वा और सच्चा अनुभव है-
इस प्रकार दोहावली में नीति है, भक्ति है, प्रेरणा है, शिक्षा लोक जीवन से सरोकार है, जिसमें मानव जीवन के विविध प्रसंगों को अवसरानुकूल उद्घृत किया गया है। दोहावली में निरंतर युगों तक के लिए प्रेरक तत्व विद्यमान हैं। यह तुलसी की कालजयी कृति है। (विनायक फीचर्स)

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